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सरगोशियां
 
उपेक्षा का दंश

उत्तराखण्ड में कांग्रेस के कई दिग्गज चुनावों से ठीक पहले पार्टी का साथ छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे। इन कांग्रेसियों को भाजपा ने हाथों हाथ लिया। न केवल विधानसभा चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार बनाया, बल्कि सरकार बनने के बाद कइयों को मंत्री भी बनाया गया। भाजपा के खांटी कार्यकर्ताओं ने इसका दबी जुबान में ही सही लेकिन विरोध अवश्य किया। वर्तमान में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में मुख्यमंत्री समेत दस मंत्री हैं। इनमें से आधे यानी पांच कांग्रेसी मूल के हैं। हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, यशपाल आर्य और सतपाल महाराज कैबिनेट तो रेखा आर्या राज्यमंत्री बनी हैं। इन मंत्रियों को भारी-भरकम मंत्रालय भी मिले हैं। लेकिन इस सबके बावजूद इन मंत्रियों को त्रिवेंद्र सरकार और भाजपा में यथोचित सम्मान नहीं मिलता दिख रहा। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की सबसे ज्यादा बेकदरी हो रही है। जानकारों की मानें तो स्वयं सीएम त्रिवेंद्र और राज्यमंत्री धन सिंह रावत ने सतपाल महाराज के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। हरक सिंह रावत भी असहज हैं। अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते रहे हरक सिंह तो अपनी पीड़ा को मीडिया के समक्ष बयान भी कर चुके हैं। कुमाऊं से कांग्रेस के एक बड़े नेता ने आखिरी क्षणों में भाजपा की शरण ली थी। वे भी अपनी उपेक्षा के चलते दुखी हैं। कांग्रेस के दौर में उनकी पसंद के अफसर ही उनके जिले में तैनात होते थे। अब हालात यह हैं कि जिले के डीएम आज तक उनसे शिष्टाचार भेंट करने भी नहीं गए हैं। पुलिस कप्तान भी उनकी नहीं सुन रहे। कांग्रेसी अपने पुराने साथियों की इस दशा में चुटकी लेते देखे सुने जा रहे हैं।

रिश्तों में दरार

बिहार में जद ¼यू½ और भाजपा का पुनर्मिलन हुए अभी कुछ ही ऐसा समय हुआ है लेकिन संबंधों में खटास की खबरें आनी शुरू हो गई हैं। जद ¼यू½ के वरिष्ठ नेता और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने तो इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार भी कर लिया है। जानकारों की मानें तो भाजपा का शीर्ष नेतृत्व नीतीश कुमार को पहले जैसा सम्मान देता नजर नहीं आ रहा। चर्चा जोरों पर है कि नीतीश कुमार की भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से बातचीत तक नहीं हो पा रही है। उदय नारायण चौधरी की मानें तो भाजपा नीतीश के साथ सही बर्ताव नहीं करेगी। कयास लगाने शुरू हो चुके हैं कि भाजपा के इस रुख को भांपते हुए नीतीश कुमार नए राजनीतिक समीकरण बनाने की कवायद में जुट गए हैं। इस बीच जद¼यू½ नेता और लेखक पवन कुमार वर्मा की कांग्रेस नेता मनीष तिवारी की पुस्तक से जुड़े एक कार्यक्रम में उपस्थिति से भी इन चर्चाओं को बल मिला है। इस कार्यक्रम में असंतुष्ट भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा भी मौजूद थे। पिछले लंबे अर्से से हाशिए में पड़े शत्रुघ्न सिन्हा के भाजपा छोड़ने की खबरें आती रहती हैं। पवन वर्मा तो लगातार भाजपा के खिलाफ वक्तव्य दे रहे हैं। कुछ अर्सा पहले ही वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इन बातों से यह तो स्पष्ट है कि भाजपा-जद ¼यू½ रियूनिपन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

शाह की बदलती नीति

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अपनी ही कुछ नीतियों पर बदलाव करते दिखाई दे रहे हैं। पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को साइड लाइन करने वाले शाह ने अब अपनी रणनीति को बदलते हुए पुराने दिग्गजों पर फिर से दांव लगाना शुरू कर दिया है। कर्नाटक में ७४ वर्षीय बीएस येदियुरप्पा को सीएम उम्मीदवार बनाने से उन्होंने इसकी शुरुआत की। अब ७३ वर्षीय प्रेम कुमार धूमल को उन्होंने हिमाचल में सीएम फेस द्घोषित कर दिया है। इससे पहले अपनी भोपाल यात्रा के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा कि उम्र के आधार पर पार्टी किसी को दरकिनार नहीं कर रही है। हालांकि शाह की इस बात को बागी भाजपा नेता यशवंत सिन्हा यह कह पहले ही खारिज कर चुके हैं कि पार्टी ७५ बरस पार कर चुके नेताओं को ब्रेन डेड मान ठिकाने लगा रही है। सिन्हा का कथन इस दृष्टि से जायज है कि पार्टी कलराज मिश्र, नजमा हेपतुल्ला, लाल जी टंडन, शांता कुमार, बाबू लाल गौड़ और सीपी ठाकुर जैसे कई नेताओं को उनकी अधिक उम्र के चलते रिटायर कर चुकी है। पार्टी के संस्थापक लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी पहले से मार्गदर्शक का खिताब पा रिटायर जिंदगी जी रहे हैं। बदलते हालात में लेकिन लगता है अमित शाह को मजबूरीवश ही सही पुराने दिग्गजों पर दांव लगाना पड़ रहा है। 

मठाधीश पत्रकारों पर टेढ़ी नजर

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अखिलेश राज के दौरान मशरूम की भांति उग आए अखबारों और पत्रकारों की नकेल कसनी शुरू कर दी है। अखिलेश सरकार के समय अकेले राजधानी लखनऊ में ही कई हजार ऐसे समाचार पत्रों को सरकारी विज्ञापन मिलते थे जिनका प्रसार मात्र चंद प्रतियां हुआ करती हैं। इतना ही नहीं दर्जनों पत्रकारों को सरकारी आवास भी आवंटित किए गए थे। अब योगी सरकार ने युद्ध स्तर पर इन मामलों की जांच शुरू कर सरकारी विज्ञापनों की लूट पर रोक लगा दी है। पत्रकारों को आवंटित मकानों की भी जांच की जा रही है। खबर है कि ज्यादातर पत्रकारों के पास राजधानी में अपने आवास हैं जिसके चलते उन्होंने सरकारी आवास किराए में दे दिए हैं। एक महानुभाव तो एक बैंक से साढ़े तीन लाख रुपए महीना किराए के ले रहे हैं तो एक अन्य ने सरकारी द्घर में भोजनालय शुरू कर रखा है। फर्जीवाड़ा करने वाले ऐसे सभी लोगों पर बड़ी कार्यवाही की आशंका के चलते राजधानी के पत्रकारों में भारी खलबली की खबर है।

 

 

 
         
 
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एक है बिहारी बाबू। जाहिर है बिहार प्रदेश से ही होंगे। लेकिन आप नीतीश कुमार को मत समझ लीजिएगा। बात उन बिहारी बाबू की हो रही है] जो भाजपा में हैं। और भाजपा में होकर भी भाजपा से बाहर हैं।

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