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सुर्खियां जो नहीं बनीं
 
महिला की पहल

यह कहानी है उस महिला की जिसने अपनी मंजिल पर पहुंचने से पहले विराम लिया और वह विराम ही उनकी मंजिल बन गया। ७४ साल की सिस्टर रोज कायाथिंकारा नागालैंड जा रही थीं] उनके रास्ते में गारो पड़ा और वो वहीं की होकर रह गईं। यहां के लोग गरीब थे] लेकिन यहां की जमीन उपजाऊ थी। फिर उन्होंने इसी जगह को अपनी कर्मस्थली बना ली। उन्होंने यहां रबर उगानी शुरू की। उन्होंने ?kj-?kj जाकर मेंडीपाथर के लोगों को रबड़ की खेती करने के लिए समझाया। ये जिला शिलांग से सवा दो सौ किमी दूर है। अब सिस्टर रोज को लोग ^रबर रोज^ के नाम से जानते हैं। आज रबड़ की खेती करने के अलावा] यहां के लोग मुर्गियों और सूअरों को भी पाल रहे हैं। यहां काली मिर्च और हल्दी जैसी चीजों की खेती भी की जाने लगी है। इससे युवाओं और गारो की महिलाओं के लिए रोजगार पैदा हुआ है। इसके साथ ही कई स्वयं सहायता समूहों ने भी लैंगिक समानता के लिए अभियान चलाया और गांवों में द्घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़ाई का आगाज किया। सरकार की कई असफल योजनाओं और कार्यक्रमों के बाद रोज ने एक मिसाल कायम की है। रोज केरल के भरानानगणम से हैं। १९७४ में उन्होंने भोपाल विश्वविद्यालय में समाज कल्याण की पढ़ाई की। इस जिले में अब लोगों की स्थिति सुधरी है और बच्चे भी इस खेती से मिलने वाले पैसों से अच्छे स्कूलों में पढ़ने जाने लगे हैं। वो चाहती हैं कि यहां के बच्चे आगे जाकर उच्च पदों पर काम करें। आज उनकी बदौलत रबड़ की खेती करने वाले किसान सालाना ५-६ लाख कमाने लगे हैं। अब ये किसान नारियल उगाना भी शुरू कर रहे हैं।

बच्चों ने की कायापलट

हर काम दूसरों के भरोसे टालने से अच्छा है कि कुछ कामों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली जाए। इससे काम बहुत बेहतर हो सकता है। कुछ ऐसा ही किया राजस्थान के धोधपुर के चाली गांव के बच्चों ने। यहां के राजकीय माध्यमिक स्कूल में बच्चों ने अपने खर्चे से रोज एक रुपया बचाकर करीब सवा दो लाख रुपए एकत्रित किए। और स्कूल में किचन गार्डन] वॉक-वे] गार्डन और १५ हजार पुस्तकों की लाइब्रेरी बना दी। जहां सरकारी स्कूलों फंड की कमी जूझ रहे हैं जिसके चलते स्कूलों में विकास काम नहीं हो पा रहा है। वहां बच्चों की यह छोटी सी पहल बहुत कारगर साबित हुई है। स्कूल में जमा हुए पैसों का हिसाब-किताब स्कूल की छात्र संसद रख रही है। राज्य सरकार ने अक्षय पेटिका योजना अब शुरू की है] लेकिन इस स्कूल में तीन साल पहले ही इसी थीम पर ^बैंक ऑफ चाली डेवलपमेंट^ बनाया गया। इसका आइडिया स्कूल की हैडमास्टर मंजू शेख ने दिया। उन्होंने छात्र संसद गठित करवाई। इसके तहत स्कूल का प्रधानमंत्री वित्त मंत्री भी है] जो बच्चों में से ही है। छात्र संसद का बाकायदा सत्र होता है] जिसमें स्कूल की जरूरत के अनुसार बजट बनता है] भावी योजनाओं की द्घोषणा की जाती है। इसके लिए स्कूल में पढ़ने वाले ३५० बच्चों के लिए प्रतिदिन एक रुपया अक्षय दान पेटी में डालना अनिवार्य किया गया है। यदि कोई बच्चा पांच दिन नहीं आएगा] वह स्वतरू ही पांच दिन के पांच रुपए डाल देगा।

 

 
         
 
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मनोज रस्तोगी % जिस तरह से आपके अंदर राजनीतिक प्रतिभा] साहित्यिक प्रतिभा और बोलने की प्रतिभा है उससे आपके प्रशंसक सभी बने हुए हैं। भाजपा और कांग्रेस में भी आपके प्रशंसक हैं।

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