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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
यह कैसे दरिद्र नारायण हैं

  • अपूर्व जोशी

केदारनाथ जैसी त्रासदियां तो कहीं भीतर तक ऐसा झकझोरती हैं कि ईश्वर के होने पर ही शंका जन्म लेने लगती है। क्या भगवान केवल अमीरों के लिए] शक्ति संपन्नों के लिए हैं] क्या भगवान से नजदीकी संपर्क भारी दान&दक्षिण के जरिए बन सकता है। यदि ऐसा है तो ईश्वर के जिस स्वरूप को हम जन्म लेते ही आत्मसात्‌ करते हैं] वह पूरी तरह गलत है। फिर तो ईश्वर नामक संस्था भी मनुष्य के बनाए आचरण से बंधी है। गांधी की दृष्टि में ईश्वर दरिद्र नारायण है यानी गरीबों का रक्षक। तब प्रश्न उठता है कि दरिद्र नारायण का कोप अपने उन हजारों आस्थावान पर क्यों बरपा जो देश&विदेश के कोने&कोने से अपनी फरियाद लेकर उससे मिलने अंबानी परिवार की तरह उड़न खटोले से नहीं] बल्कि कठिन पैदल यात्रा कर पहुंचे थे। बड़ा जटिल है इस प्रश्न का उत्तर खोज पाना। केदारनाथ की आपदा के बाद तो दरिद्र नारायण शब्द की महत्ता पर ही बड़ा प्रश्न&चिन्ह लग गया है

 

देश के शीर्ष उद्योगपति मुकेश धीरूभाई अंबानी अपनी असाधारण सफलता के लिए बाबा केदारनाथ और बाबा बद्रीनाथ के आशीर्वाद को मानते हैं। पिछले दिनों सोशल मीडिया में पढ़ने को मिला कि अमेरिका में एक सभा को संबोधित करते हुए मुकेश अंबानी ने यह बात कही। अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स के मुताबिक मुकेश अंबानी इस वक्त एशिया के सबसे धनाढ्य व्यक्ति हैं। बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अनुसार अंबानी परिवार मंदिर में पूजा&अर्चना के लिए करोड़ों का दान दे चुका है। वर्ष २०१८ में आयोजित की जाने वाली किसी विशेष पूजा के लिए उन्होंने मंदिर समिति को एक करोड़ इक्यावन लाख की भेंट दी है और मंदिर की व्यवस्था आदि के लिए अलग से बाइस लाख दिए हैं। यह भी पढ़ने को मिला कि बदरीनाथ में गेस्ट हाउस निर्माण के लिए अंबानी ने पचास लाख का दान दिया था। इतना ही नहीं इंडियन प्रिमियर लीग खेलों में विजयी होने पर अंबानी परिवार ने केदारनाथ धाम के लिए केसर और चंदन की व्यवस्था हेतु साठ लाख दिए थे। यह भी पढ़ने को मिला कि रिलायंस जियो मोबाइल के लॉन्च के समय भी उन्होंने मंदिर में बड़ा दान किया था। निश्चित ही यह अंबानी परिवार की व्यक्तिगत आस्था का प्रसंग है। वे जितना चाहे] जितनी बार चाहे] मंदिरों में दान देने के लिए स्वतंत्र हैं। वे एक बेहद सफल उद्योगपति पिता के योग्य उत्तराधिकारी हैं। कहा जा सकता है कि वे पारस मणि की भांति हैं। जिस भी व्यवसाय में हाथ रख देते हैं] वह सोना बन जाता है। अंबानी परिवार पर बदरीनाथ जी और केदारनाथ जी की इस महत्ती कूपा ने मुझे उनकी याद दिला दी जो शायद आस्था के मामले में मुकेश अंबानी से कहीं भी कमतर नहीं रहे होंगे किंतु उन पर बाबा का आशीर्वाद नहीं कोप बरसा। 

चौदह से सत्रह जून २०१३ के उन त्रासदी भरे दिनों की याद ताजा हो आई जब देश&विदेश से आस्था से सराबोर हजारों भक्तगण केदारनाथ में आई आपदा की भेंट चढ़ गए। सरकारी आंकड़े ही लगभग पांच हजार सात सौ तीर्थयात्रियों] स्थानीय निवासियों के मारे जाने की बात करते हैं। गैर सरकारी आंकड़े तो इससे कहीं अधिक हैं। मैं नास्तिक नहीं हूं] मैं एक हिंदू परिवार में जन्मा] बचपन से ही पूजा&पाठ करता आया ऐसा शख्स हूं जिसे हरेक धर्म में पूरी आस्था है। मैं हिंदू होने की उस विचारधारा का द्घोर विरोधी हूं जो अन्य धर्मों को अपने धर्म से कमतर आंकती है। मैं हर उस विचार का कट्टर विरोध करता हूं जो किसी स्थान विशेष पर मंदिर बनाए जाने को हिंदू गौरव और राष्ट्रभक्ति से जोड़ती है। इसलिए अपने धर्म के प्रति पूरी आस्था होने के बावजूद जब कभी भी धर्म के नाम पर दंगे होते हैं] कत्लेआम होता है या फिर धर्म के नाम पर बड़ा आडंबर होता है तो मन विद्रोह कर उठता है। कौन सा धर्म] कौन सा धार्मिक ग्रंथ हमें हिंसा का मार्ग दिखाता है। और फिर केदारनाथ जैसी त्रासदियां तो कहीं भीतर तक ऐसा झकझोरती हैं कि ईश्वर के होने पर ही शंका जन्म लेने लगती है। क्या भगवान केवल अमीरों के लिए] शक्ति संपन्नों के लिए हैं] क्या भगवान से नजदीकी संपर्क भारी दान&दक्षिण के जरिए बन सकता है। यदि ऐसा है तो ईश्वर के जिस स्वरूप को हम जन्म लेते ही आत्मसात्‌ करते हैं] वह पूरी तरह गलत है। फिर तो ईश्वर नामक संस्था भी मनुष्य के बनाए आचरण से बंधी है। चिंतक कार्ल मार्क्स का कथन है कि धर्म जनता की अफीम है। मैं इस पर पहले भी लिख चुका हूं। इसलिए अभी अपना फोकस मंदिरों] मस्जिदों] गुरूद्वारा और चर्चों को मिलने वाले उस चंदे पर ही रखना चाहता हूं जो अमीर को ईश्वर के करीब लाता प्रतीत होता है। यदि ऐसा न होता तो अंबानी समान ही या उनसे कहीं अधिक भक्तिभाव रखने वाले हजारों यूं ही केदारनाथ धाम की अपनी तीर्थ यात्रा के दौरान अकाल मृत्यु के शिकार न होते। महात्मा गांधी का मानना था कि समाज में धर्म की] ईश्वर की अवधारणा भ्रामक रूप में प्रचलित है। वे धर्म को विचार से जोड़कर देखते थे। गांधी ने धर्म की व्याख्या करते हुए लिखा ^धर्म से मेरा अभिप्राय औपचारिक या रूढ़ीगत धर्म से नहीं] बल्कि उस धर्म से है जो सभी धर्मों की बुनियाद है और जो हमें अपने सृजनहार से साक्षात्कार कराता है। गांधी कहते थे ^मैं किसी ऐसे धार्मिक सिद्धांत को कत्तई नहीं स्वीकार करता जो वृद्धि को न जंचे तथा वह नैतिकता के विरुद्ध हो।^ गांधी ईश्वर में पूरी आस्था रखते थे। उनकी दृष्टि में ईश्वर विश्व के हर कण में व्याप्त हैं। वे लिखते हैं ^मैं यह दृढ़तापूर्वक कह सकता हूं कि मैं बिना जल और बिना वायु के जीवित रह सकता हूं लेकिन ईश्वर के बिना नहीं। तुम मेरी आंखें निकाल सकते हो] मैं नहीं मरूंगा लेकिन यदि ईश्वर से मेरा विश्वास हट गया तो मैं जीवित नहीं रहूंगा।^ वे मानते थे कि ईश्वर एक ऐसी वर्णनातीत चीज है जिसे हम महसूस तो कर सकते हैं किंतु जान नहीं सकते। वे ईश्वर को सत्य और प्रेम मानते हुए कहते हैं ^ईश्वर आचारशास्त्र और नीति है। ईश्वर प्रकाश तथा जीवन का श्रोत है। ईश्वर अंतःकरण है। वह नास्तिक की नास्तिकता भी है। वह शुद्धतम मूल तत्व है। वह केवल उनके लिए है जो विश्वास रखते हैं। उनका कथन है ^अगर मैं यह विश्वास कर पाता कि ईश्वर मुझे हिमालय की गुफा में मिलेगा तो मैं तुरंत वहां पहुंचता लेकिन मैं जानता हूं कि मैं उसे मानवता से अलग जाकर नहीं पा सकता।^ गांधी की दृष्टि में ईश्वर दरिद्र नारायण है यानी गरीबों का रक्षक। तब प्रश्न उठता है कि दरिद्र नारायण का कोप अपने उन हजारों आस्थावान पर क्यों बरपा जो देश&विदेश के कोने&कोने से अपनी फरियाद लेकर उससे मिलने अंबानी परिवार की तरह उड़न खटोले से नहीं] बल्कि कठिन पैदल यात्रा कर पहुंचे थे। बड़ा जटिल है इस प्रश्न का उत्तर खोज पाना। केदारनाथ की आपदा के बाद तो दरिद्र नारायण शब्द की महत्ता पर ही बड़ा प्रश्न&चिह्न लग गया है।

बहरहाल] मेरा उद्देश्य अंबानी परिवार द्वारा करोड़ों की धनराशि को मंदिरों में दान दिए जाने की सार्थकता पर है। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर में खरबों का दान प्रति वर्ष श्रद्धालु करते हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर] पुत्तापर्थी के साईं बाबा समेत अनेकों ऐसे धर्म स्थल हैं जहां खरबों का दान दिया जाता है। इन धर्म स्थलों में प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्तजनों को भोजन कराने की व्यवस्था होती है। कई संस्थान गरीबों के लिए द्घर] उनके बच्चों के लिए शिक्षण संस्थान आदि भी चलाते हैं जो स्वागत योग्य है किंतु यह सब खरबों की आय के कुछ प्रतिशत से होता है बाकी धनराशि का उपयोग किन कार्यों में होता है] यह कोई बताने को तैयार नहीं। एक नहीं कई ऐसे उदाहरण हैं जहां अकूत संपत्ति मंदिरों के खजाने में बरसों से यूं ही पड़ी है। त्रिवेंद्रम के विष्णु मंदिर में खरबों का खजाने होने की बात समने आ चुकी है। इस पद्मानामन स्वामी मंदिर के पांच तहखानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर खोला जा चुका है जिनमें से एक लाख करोड़ मूल्य के हीरे&जवाहारात मिले हैं। एक तहखाने को अभी खोला जाना बाकी है। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार इस मंदिर के खजाने का कुल मूल्य २२ बलियन डॉलर यानी लगभग १४ खरब रुपए हो सकता है। तिरुपति बालाजी मंदिर में अनुमानतः प्रतिदिन तीस हजार भक्त चालीस करोड़ का चढ़ावा चढ़ाते हैं यानी प्रतिवर्ष ४८० करोड़ रुपए। मां वैष्णो देवी के जम्मू स्थित मंदिर को कई टन सोना चढ़ावे के रूप में मिला है। मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर के पास पांच अरब मूल्य का सोना बताया जाता है। शिरडी में साईं बाबा के मंदिर की वार्षिक आय ३६० करोड़ रुपए है तो स्वर्ण मंदिर अमृतसर में साढ़े सात सौ किलो सोना मढ़ा हुआ है। यदि यह सब दरिद्र नारायण का है तो फिर इसे देश के दरिद्रों के कल्याण में लगाया जाना चाहिए। खरबों की इस संपत्ति को मंदिरों] मस्जिदों] गुरूद्वारों और चर्च के मठाधीशों के पास होने का कोई औचित्य नहीं बनता। सत्तर के पूर्वार्द्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। उन्होंने भूतपूर्व राजे&महाराजों] नवाबों को मिलने वाली विशेष सुविधा प्रिवी पर्स को भी खत्म करने का काम किया था। अब समय आ गया है कि देश से कालेधन की बीमारी को जड़ से मिटाने की मंशा रखने वाले प्रधानमंत्री नोटबंदी जैसा ही कड़ा कदम उठाते हुए सभी धार्मिक संस्थानों को मिलने वाले चंदे और भेंट का स्पेशल ऑडिट कराएं और इन संस्थाओं की अकूत संपत्ति को राष्ट्रीय संपत्ति द्घोषित कर उसे राष्ट्र निर्माण के लिए उपयोग में लाएं। रही बात केदार बाबा की अंबानी परिवार पर विशेष कूपा की तो निश्चित ही २०१३ की आपदा के बाद उनके दरिद्र नारायण होने पर प्रश्न चिह्न तो लग ही गया है। बाकी बचा बाबा नागार्जुन की कविता कह देती है&

मेला है] ठेला है] भारी भीड़&भाड़ है

पटना है] दिल्ली है] वहीं सब जुगाड़ है

फ्रिज है] सोफा है] बिजली का झाड़ है

फैशन की ओट है] बस कुछ उधाड़ है

महल आबाद है] झोपड़ी उजाड़ है

गरीबों की बस्ती में उखाड़ है] पछाड़ है

धत्‌ तेरी] धत्‌ तेरी] कुच्छों नहीं] कुच्छो नहीं

ताड़ का तिल है] तिल का ताड़ है

ताड़ का पत्ते हैं] पत्तों के पंख है

पंखों की ओट है] पंखों की आड़ हैं

कुच्छो नहीं] कुच्छो नहीं

ताड़ के तिल है] तिल का ताड़ है

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है

किसकी है जनवरी] किसका अगस्त है

कौन यहां सुखी है] कौन यहां मस्त है

सेठ ही सुखी है] सेठ ही मस्त है

मंत्री ही सुखी है] मंत्री ही मस्त है

उसी की जनवरी है] उसी का अगस्त है

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