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न्यूज़-एक्सरे 
 
फिर अनसुनी फरियाद

 

जनता की शिकायतें ऑनलाइन सुनने और उनके त्वरित समाधान के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के दावे मजाक बनकर रह गये हैं। इस उद्देश्य से लॉन्च किये गये सरकारी वेब पोर्टल की हकीकत यह है कि पहाड़ी जिलों में लोग इस पर शिकायतें दर्ज नहीं करवा पा रहे हैं जबकि मैदानों में उन पर कार्यवाही नहीं होती या उन्हें खारिज कर दिया जाता है। नियमानुसार जिन शिकायतों का निवारण ३० दिन में हो जाना चाहिए था वे दो माह बाद भी लंबित हैं

 

उत्तराखण्ड की विजय बहुगुणा सरकार एक तरफ तो भाजपा सरकार के दौरान हुए घोटालों की जांच कराने का नाटक करती है मगर दूसरी ओर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों की धार कुंद करने पर तुली हुई है। उदाहरण के तौर पर खण्डूड़ी सरकार के दौरान पारित लोकायुक्त लोकपाल बिल का आज कुछ अता-पता नहीं है। जनता की सुविधा के लिए समय पर सरकारी दस्तावेज उपलब्ध कराने और सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार करने वाला महत्वपूर्ण कानून 'सेवा का अधिकार' सरकारी फाइलों में कैद है। इसके कारण आज सेवा अधिकार में जनता के आवेदन तक प्राप्त नहीं किए जा रहे हैं। सूचना अधिकार को निष्प्रभावी बनाने के लिए बनाई गई नियमावली को लेकर बहुगुणा सरकार और सूचना आयोग का टकराव सामने आ ही चुका है।

 

तमाम जनोपयोगी कानूनों पर कैंची चलाने या उनकी धार कुंद करने पर तुली उत्तराखण्ड की बहुगुणा सरकार ने २६ जनवरी २०१३ को बड़े जोर-शोर से विकल्प के आधार पर 'समाधान' पोर्टल को लॉन्च किया। जनता को विश्वास दिलाया  गया कि समाधान पोर्टल में की गई शिकायतों का समय से निस्तारण करने के उद्देश्य से कड़े प्रावधान किए गए हैं। सेवा अधिकार की तर्ज पर इस पोर्टल के माध्यम से की गई ऑनलाइन शिकायतों पर समय से कार्यवाही न होने की स्थिति में 'समाधान' को लागू किए जाने के उद्देश्य से जारी सरकारी आदेश के अनुसार शासन स्तर पर प्रमुख सचिव निदेशालय स्तर पर निदेशकआयुक्त विभागाध्यक्ष और जनपद स्तर पर जिलाधिकारी को पोर्टल के माध्यम से शिकायत दर्ज की जा सकती है। ऑनलाइन शिकायत को दर्ज होने के पश्चात तीनों स्तरों पर शिकायत के निवारण की अवधि ३० दिन रखी गई है। इस अवधि में शिकायत का निवारण न होने उसे स्वतः ही यह पोर्टल व्यावहारिक नहीं होगा संबंधित स्तरों के बड़े अधिकारियों को अंतरित किए जाने का प्रावधान किया गया। वहां से भी समय पर निवारण न होने  पर की गई शिकायत स्वतः मुख्य सचिव को ४५ दिन में अंतरित किए जाने की व्यवस्था की गई थी। लेकिन प्रदेश के पहाड़ी जनपद इस पोर्टल की सुविधा कर लाभ ही नहीं उठा पा रहे हैं। मैदानी जिलों में भी इसकी स्थिति ठीक नहीं है। उदाहरण के तौर पर 'समाधान' के माध्यम से सबसे अधिक शिकायतें  देहरादून जिले में दर्ज हैं। यहां दो माह में ९३ शिकायतें दर्ज होने के पश्चात २० शिकायती आवेदन आज तक लंबित हैं। ५५ आवेदनों को संबंधित विभागों को अंतरित किया गया तो १७ आवेदन खारिज किए जा चुके हैं। दूसरे नंबर पर नैनीताल जनपद का नाम सामने आता है। इस जनपद में दो माह में ४४ शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से २९ को संबंधित विभागों की अंतरित किया गया। १० आवेदन अभी भी लंबित हैं तो चार खारिज किए जा चुके हैं। तीसरे नंबर पर हरिद्वार जनपद है। यहां ४३ आवेदन 'समाधान' के लिए आए। लेकिन निस्तारण की दुर्दशा का आलम यह है कि २६ आवेदन आज तक लंबित पड़े हुए हैं। केवल पांच का होना निस्तारण 'समाधान' के संकट में होने की कहानी बयान करने के लिए काफी है। 

 

उत्तराखण्ड के इन बड़े जनपदों में दो माह में 'समाधान' केवल यहां से वहां भटकता रहा। जिसके चलते एक भी आवेदन का निस्तारण न हो सका। अल्मोड़ा जनपद में ३० में से २२ आवेदन आज तक लंबित ही पड़े हुए हैं। ऊधमसिंहनगर में २२ में से १३ आवेदन खारिज तो पांच लंबित हैं। चंपावत में प्राप्त १३ आवेदनों में से ६ आवेदन आज भी लंबित हैं। पिथौरागढ़ बागेश्वर उत्तरकाशी चमोली टिहरी गढ़वाल तथा रुद्रप्रयाग की जनता तक सरकार का यह 'समाधान' सही तरीके से पहुंच सका। उत्तराखण्ड के इन छह पहाड़ी जनपदों में अकेले नैनीताल से कुछ ही अधिक ५२ आवेदन प्राप्त हुए। जिसमें १६ खारिज तो छह आज भी लंबित पड़े हुए हैं। ३० आवेदन अंतिम कार्यवाही के लिए संबंधित विभागों को भेजे गए हैं। कुल मिलाकर राज्य के १३ जनपदों में 'समाधान' के तहत दो माह में ३२७ आवेदन प्राप्त हुए। १४९ आवेदन संबंधित विभागों को कार्यवाही के लिए भेजे जरूर गए लेकिन निस्तारण वहां से भी न हो सका।

 

जनपदों में संकट के दौर से गुजर रहे 'समाधान' की हालत निदेशालय स्तरों पर भी ठीक नहीं कही जा सकती। यहां सबसे अधिक आवेदन प्रबंध निदेशक यूपीसीएल को प्राप्त हुए। यूपीसीएल को प्राप्त २४ आवेदन में से १६ संबंधित विभाग को भेजे गए तो ७ आवेदन निदेशालय स्तर पर ही खारिज कर दिए गए। निस्तारण एक का भी न हो सका। उपाध्यक्ष मसूरी देहरादून विकास प्राधिकारण को दो माह में ६ आवेदन प्राप्त हुए आज तक ये लंबित हैं। कमोबेश ऐसा ही कुछ हाल राज्य के महत्वपूर्ण महकमे पुलिस विभाग का है। इस दौरान दो माह में पुलिस महानिदेशक को पांच आवेदन प्राप्त हुए। सभी सरकारी विभागों की हालत एक सी है। दो माह की अवधि में महिला सशक्तीकरण विभाग को पांच खाद्य विभाग को मात्र एक उच्च शिक्षा विभाग को पांच ;सिंचाई विभाग को एकलोक निर्माण विभाग को २१ सैनिक कल्याण विभाग को दो पर्यटन विभाग को तीन राज्य संपत्ति विभाग की चार श्रम विभाग को चार सूचना विभाग को दो ऊर्जा विभाग को १० गृह विभाग को १४ लघु सिंचाई दो ग्रामीण अभियंत्रण को चार औद्योगिक विभाग को तीन चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग उत्तराखण्ड को एक आवेदन शासन स्तर पर प्राप्त हुआ। अब शासन स्तर पर 'समाधान' का समाधान देखिए कि इन सभी महकमों में प्राप्त समस्त आवेदनों पर आज तक भी कोई कार्यवाही नहीं की गई। इन सभी महत्वपूर्ण महकमों को प्राप्त समस्त आवेदन आज तक भी कार्यवाही की प्रतीक्षा में सरकारी पोर्टल की शोभा बढ़ा रहे हैं।

 

 

कुछ महकमों ने जरूर कार्यवाही की लेकिन उन विभागों की कार्यवाही भी आवेदन को खारिज करने तथा संबंधित विभाग को अंतरित करने से आगे न बढ़ सकी। आवेदनों के लंबित रहने में सबसे आगे मुख्यमंत्री के अधीन विभाग ही हैं उदाहरण के तौर पर लोक निर्माण विभाग के मुखिया स्वयं मुख्यमंत्री हैं और 'समाधान' के माध्यम से शासन स्तर पर लोक निर्माण विभाग  में दर्ज २१ शिकायतों का आज तक भी निस्तारण न होना समूची कार्यवाही की हालत को बयान करने के लिए काफी है। यही हाल उच्च शिक्षा का है। यह विभाग भी मुख्यमंत्री के अधीन है। उच्च शिक्षा में 'समाधान' के माध्यम से प्राप्त पांचों आवेदन आज तक लंबित पड़े हुए हैं। ऊर्जा विभाग के १० और गृह विभाग के १४ आवेदनों पर भी कोई समाधान न होना मुख्यमंत्री के अधीनस्थ विभागों के अधिकारियों की लापरवाही बयान करने के लिए काफी है। गणतंत्र दिवस के मौके पर जिस पोर्टल को लॉन्च करते समय सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा ने इसकी खूबियां गिनाकर बड़े-बड़े दावे किये थे वह महज दो माह में ही अफसरशाही के बेलगाम होने के चलते हवा में उड़ता नजर आ रहा है। मतलब साफ है जनता की जरूरत बताए जाने वाला 'समाधान' पोर्टल खुद संकट में है। 

 

 

 

बात अपनी-अपनी

सरकार का समाधान पोर्टल दिखावा मात्र है। इस सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के कार्यकाल में लागू किए गए सेवा अधिकार को लगभग समाप्त कर दिया है। बेहतर होता कि सेवा अधिकार को और प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है। 'समाधान' की परियोजना बिल्कुल फेल हो चुकी है। इस पोर्टल पर शिकायत के दूसरे ही दिन एनआईसी का कम्प्यूटर खराब हो गया था। कुल मिलाकर बहुगुणा सरकार का यह समाधान मात्र दिखावा ही है।

अजय भट्ट नेता प्रतिपक्ष 


'समाधान' योजना के अंतर्गत वर्तमान में क्या प्रगति है यह बात आपको मुख्यमंत्री कार्यालय से नहीं बल्कि सचिव सुराज भ्रष्टाचार उन्मूलन सुरेन्द्र सिंह रावत से मिलेगी।

आरसी लोहनी अपर सचिव मुख्यमंत्री 


'समाधान' योजना के अंतर्गत आम जनता की शिकायतें प्राप्त हो रही हैं  और उन शिकायतों पर कार्यवाहियां भी की जा रही हैं।

नितेश झा अपर सचिव सुराज भ्रष्टाचार उन्मूलन विभाग 


 

 

 
         
 
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उत्तराखण्ड राज्य के एक बड़े नौकरशाह अपने परिवार संग एक निजी कंपनी के हेलीकॉप्टर में सफर कर रहे थे। ये नौकरशाह वही हैं जिनकी तूती एक जमाने में राज्य में बोला करती थी। सरकार या सीएम कोई

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