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vad 18 21-10-2017
 
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सिनेमा
 
गिरते करियर को सहारा

  • रवि जोशी

बिना गॉडफादर के बॉलीवुड में काम पा लेना ढेढ़ी खीर है। बॉलीवुड के कई नामचीन सितारे ऐसे हैं जिन्हें एक समय में काम पाने के लिए पापड़ बेलने पड़े हैं और कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें संद्घर्ष के दौरान आजीविका के लिए ^बी ग्रेड^ फिल्मों में भी काम करना पड़ा। इतना ही नहीं करियर के गिरते& पड़ते पड़ाव में कई सुपर स्टार्स ने भी ऐसी ही फिल्मों का सहारा लिया है।

 

इस लिस्ट में सबसे पहला नाम बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार ^राजेश खन्ना^ का हैं। एक समय ऐसा था जब राजेश खन्ना के स्टासरडम के आगे सब फीके नजर आते थे। लेकिन जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने खुद को शराब में इतना डुबो लिया कि ^वफा^ जैसी बी ग्रेड फिल्म में काम करना पड़ा। इस फिल्म में राजेश खन्ना ने एक रईस बुजुर्ग की भूमिका निभाई जो एक एयर होस्टेज से शादी करता है।

 

इसके बाद फिल्म ^बूम^ की बात करते हैं। फिल्म किस दर्जे की है इसके बारे में फिल्म के पोस्टर देखकर ही समझ आ जाता है। इस फिल्म में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन नजर आएं। सन्‌ २००० में कौन बनेगा करोड़पति ने अमिताभ बच्चन की डावांडोल आर्थिक स्थिति को तो संभाल दिया था लेकिन फिल्मों में अभी एक बार फिर वो अपनी पुरानी पहचान ढूंढ रहे थे। इसके अलावा ^बूम^ जैसी फिल्म से कटरीना ने भी अपनी फिल्मी नौका को संभालने की कोशिश की थी।

 

अक्षय कुमार ने भी अपने करियर के शुरुआती दिनों में बी ग्रेड फिल्मों का सहारा लिया था। ^मिस्टर बॉड^ ऐसी ही फिल्म  थी। इस फिल्म में कई बोल्ड सीन थे जिसके कारण वो बहुत चर्चा में रहे हैं। ममता कुलकर्णी भी ऐसी ही अभिनेत्री हैं। अपने फिल्मी करियर की शुरुआत में ममता कुलकर्णी ने भी कई बी ग्रेड फिल्मों में काम किया जिसमें से सबसे ज्यादा चर्चा में रही फिल्म ^डिवाइन टेंपल खजुराहो^ थी। फिल्म के नाम से ही पता चलता है कि इस फिल्म को बनाने के पीछे क्या मकसद होगा।

 

आजकल बॉलीवुड में अभिनय के लिए चचिर्त लोगों में नवाजुद्दी सिद्धिकी का नाम सबसे ऊपर आता है। अपने जानदार अभिनय से पूरी फिल्म को बांध लेना नवाज से बेहतर कोई और नहीं जानता। नवाज ने इस मुकाम को पाने के लिए कई पापड़ बेले हैं। बड़ी फिल्मों में छोटे&छोटे रोल किए और जरूरत पड़ने पर बी ग्रेड फिल्मों में भी काम किया। ऐसी ही एक फिल्म है ^मिस लवली^। बोल्ड सीन्स से भरी इस फिल्म में नवाज ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस लिस्ट में जो दो आखिरी नाम है उनमें से पहला संजय दत्त की पत्नी मान्यता दत्त हैं। जो संजय के साथ शादी से पहले फिल्मों में बोल्ड सीन्स और आइटम सांग्स पर थिरकती थीं। इन्होंने कई बी ग्रेड फिल्मों में भी काम किया। लेकिन इनको सबसे ज्यादा चर्चा ^गंगाजल^ फिल्म के आइटम नंबर ^अल्हड़ जवानी^ से मिली।

 

कॉमेडी सर्कस की जज जो अपनी बिंदास हंसी के लिए जानी जाती हैं उन्हें भी एक समय में बी ग्रेड फिल्मों का सहारा लेना पड़ा था। जी हां अर्चना पूरन सिंह ९० के दशक में न तो फिल्मों में दिख रहीं थी और न ही टीवी सीरियल में। ऐसे में अपने रुके करियर को सहारा देने के लिए उन्होंने बी ग्रेड फिल्मों को चुना। इस तरह से बी ग्रेड फिल्में हर मेन स्ट्रीम सितारे को संभालने और उनके डूबते करियर के दौरान उन्हें थामने के लिए तैयार रहती है।


बदला नहीं नजरयिा

 

जब पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष बनाए गए थे तब लोगों ने विरोध किया था कि वह फिल्मों को संस्कारी बनाना चाहते हैं। अब जब संगीतकार प्रसून जोशी को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है तो भी देखने में आ रहा है कि वह भी फिल्मों को संस्कारी बनाने में लगे हैं। इसका ताजा उदाहरण है ^तूफान सिंह^ फिल्म] जिसे पिछले एक साल से हरी झंडी नहीं मिली है। पहले पहलाज निहलानी ने इसे सर्टिफिकेट नहीं दिया] अब प्रसून जोशी रिलीज करने में रोड़ा बने हुए हैं। दरअसल इस फिल्म में पंजाब के आतंकवाद और खालिस्तान का महिमामंडन है। गौरतलब है कि सेंसर बोर्ड का काम यह है कि वह फिल्म को इस आधार पर सर्टिफिकेट दे कि वह किस उम्र के दर्शकों के लिए उपयुक्त है। फिल्म के तत्वों को सही या गलत मानने का फैसला दर्शकों पर छोड़ दें। सरकार और फिल्म जानकार भी इस पर सहमत हैं] लेकिन सेंसर बोर्ड अपने गठन के बाद से इस रेखा को स्वीकार नहीं कर पाया है। ब्रिटिश राज की सेंसरशिप की तर्ज पर गठित आजाद भारत के सेंसर बोर्ड का ढांचा उसे नैतिकता का थानेदार बनाए हुए है। समस्या की जड़ यही है और इसलिए सेंसर बोर्ड हमेशा निशाने पर आता रहा है। निवर्तमान अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने २८ आपत्तिजनक शब्दों की सूची बना ली थी। इसमें साला शब्द को भी उन्होंने आपत्तिजनक करार दे दिया था। श्याम बेनेगल इस मामले में कह चुके हैं कि आज की परिस्थितियों में सेंसर बोर्ड का कोई औचित्य नहीं है] इसलिए उसे भंग कर दिया जाना चाहिए। इस राय में दुविधा का एक छोटा बिंदु यह है कि इससे फिल्मकारों को कुछ भी बनाने की छूट मिल जाएगी। कुछ हद तक यह खतरा है। लेकिन इसे टाला जा सकता है बशर्ते फिल्मकार आत्मानुशासन बरतें। कुछ जानकारों का कहना है कि सेंसर बोर्ड स्वायत्तशासी संस्था नहीं है। केंद्र में सरकार बदलते ही सेंसरबोर्ड का हुलिया बदल जाता है।


प्रभावशाली महिला

 

बॉलीवुड के टैलेंटेड एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी तो वैसे हमेशा मीडिया की सुर्खियों में रहते हैं लेकिन इस बार वो अपनी एक्टिंग या अवार्ड की वजह से नहीं] बल्कि इस बार वो अपनी मां की वजह से सुर्खियों में आ गए हैं। उनकी मां मेहरुन्निसा सिद्दीकी को दुनिया भर की टॉप १०० महिलाओं में शामिल किया गया है। इस खबर को सुनने के बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी काफी खुश हैं और उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर अपनी मां के साथ एक ब्लैक एंड ह्वाइट फोटो शेयर करते हुए लिखा कि] ^एक छोटे से गांव के परंपरावादी परिवार में आने वाली हर मुसीबत से जूझते हुए जिसने हिम्मत दिखाई मेरी मां।^ बता दें कि उनकी मां ६५ साल की हैं और यूपी के छोटे से गांव से ताल्लुक रखती हैं। मायानगरी मुंबई में अभिनय के दम पर नवाज कामयाबी की बुलंदी तक पहुंचे हैं। बीबीसी द्वारा जारी इस लिस्ट में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज का भी नाम शामिल है। इस लिस्ट में वुमेन राइट एक्टिविस्ट डॉय उर्वशी सहानी] बिजनेस वुमेन अदिति अवस्थी] टीचर और सामाजिक कार्यकर्ता तुलिका किरन और १६ साल की भारतीय स्टूडेंट प्रियंका रॉय का भी नाम शामिल है।

 
         
 
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