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खास खबर 
 
विलय पर रार

  • दिनेश पंत

प्रदेश में निगमों] परिषदों के विलय को लेकर कर्मचारी संगठन एकमत नहीं हैं। जल संस्थान और पेयजल निगम के कर्मचारी शुरू से ही सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद के कर्मचारी भी विलय के विरोध में हैं। दूसरी तरफ गढ़वाल मंडल विकास निगम और कुमाऊं मंडल विकास निगम के कर्मचारी इस शर्त पर विलय के पक्ष में हैं कि उन्हें राज्य कर्मचारियों के तौर पर स्वीकार किया जाए

 

प्रदेश सरकार ने निगमों] परिषदों आदि के कामकाज में गति लाने और ?kkVs को कम करने के लिए उनके विलयीकरण का फैसला लिया है] ताकि एकल विंडो सिस्टम से इनके कामों में तेजी और पारदर्शिता आए। मगर सरकार के फैसले से कर्मचारी संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। सरकार के लिए राहत की बात यह है कि दोनों निगमों ने अपनी शर्तों पर इस फैसले का स्वागत किया। सरकार अब सभी कर्मचारी संगठनों से बात कर इसे अंतिम रूप देना चाहती है।

 

कुछ समय पहले ही त्रिवेंद्र सरकार ने एक विभाग के अंदर अलग&अलग निगमों] परिषदों मंडलों का एकीकरण करने का निर्णय लिया था। इस फैसले का ग्राम पंचायत और ग्राम विकास विभाग के साथ जल संस्थान एवं जल निगम के कर्मचारी शुरू से ही विरोध कर रहे थे। विरोध के इस स्वर में उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद के कर्मचारी भी शामिल हो गए हैं। पर्यटन विकास परिषद को गढ़वाल और कुमाऊं मंडल विकास निगम के साथ विलय करने का फैसला लिया गया है। पर्यटन विकास परिषद के कर्मचारी नेता इस विलय का विरोध कर रहे हैं। लेकिन केएमवीएन और जेएमवीएन के कर्मचारी नेताओं ने दोनों मंडलों के विलयीकरण का स्वागत किया है। हालांकि इन्होंने स्वागत से पूर्व अपनी शर्त भी रखी है। इनकी शर्त है कि दोनों मंडलों के कर्मचारियों को राज्य कर्मचारी के रूप में स्वीकार किया जाए। कर्मचारियों के हितों पर किसी तरह का कोई प्रभाव न पड़े। सरकार संगठनों के साथ बैठक कर चुकी है।

 

प्रदेश सरकार की तरफ से इनके समक्ष दो तरह के प्रस्ताव रखे गए हैैं। सरकार के पहले प्रस्ताव के मुताबिक केएमवीएन और जेएनवीएन का एकीकरण कर इसे उत्तराखण्ड पर्यटक विकास निगम बना दिया जाए। दूसरा प्रस्ताव] कुमाऊं एवं गढ़वाल मंडल विकास निगम को उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद में मर्ज कर दिया जाए। सरकार के इस प्रस्ताव का दोनों ही मंडल के कर्मचारी संगठनों ने स्वागत करते हुए कहा है कि सरकार का सिंगल विंडो सिस्टम अच्छा कदम है। अगर दोनों मंडल पर्यटन विकास परिषद में मर्ज होते हैं तो इससे प्रदेश में पर्यटन विकास को गति मिलेगी। ?kkVs में चल रहे निगमों को भी बड़ी राहत मिलेगी। सरकार से बातचीत में मंडलों के कर्मचारी नेताओं ने कहा कि उनके कर्मचारियों की वरिष्ठता] प्रमोशन में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। दोनों मंडलों के कर्मचारी संगठनों का कहना है कि रोजगार सृजित करने के लिए एकल विंडो सिस्टम ही सर्वोत्तम है। अगर ऐसा होता है तो गेस्ट हाउसों का सुधारीकरण एवं नवीनकरण के कार्य आगे बढ़ेंगे। जरूरत है] पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की। ताकि स्थानीय स्तर पर भी लोगों को रोजगार मिल जाए और पलायन एक हद तक रुक सके।

 

ऐसा नहीं है कि दोनों मंडलों के विलयीकरण का काम पहली बार हो रहा है। इन दोनों मंडलों के अस्तित्व में आने से पहले वर्ष १९७१ में पर्वतीय विकास निगम बनाया गया था। वर्ष १९७६ में इनका पृथकीकरण कर केएमवीएन एवं जेएमवीएन का गठन किया गया। लेकिन कुप्रबंधन के चलते दोनों मंडल अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। इस बीच सरकार ने पर्यटन विकास परिषद का भी गठन कर दिया। अब वर्ष २०१७ में इनके फिर से एकीकरण करने के प्रयास हो रहे हैं। अभी तक प्रदेश में पर्यटन का कार्य एक विंडो से न होकर अलग&अलग विंडो से होता था। वैसे प्रदेश में पर्यटन का सारा काम कुमाऊं एवं गढ़वाल मंडल विकास निगम करता रहा है। कैलाश मानसरोवर एवं छोटा कैलाश आने वाले कुमाऊं मंडल विकास निगम और चारधाम दर्शन करने वाले तीर्थ यात्रियों को गढ़वाल मंडल के विंडो में जाना होता था। जबकि दोनों का काम एक समान है। आज इन मंडलों की स्थिति यह है कि यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए जो गेस्ट हाउस बनाए गए थे उनमें से अधिकतर के नवीनीकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

 

गेस्ट हाउसों की वर्तमान स्थिति को देखें तो गढ़वाल में ८५ और कुमाऊं में ४६ गेस्ट हाउस हैं। इनमें ८० प्रतिशत गेस्ट हाउस खराब हालत एवं ?kkVs में चल रहे हैं। इन्हें नवीनीकरण की जरूरत है। गेस्ट हाउसों को ?kkVs से उबारने एवं इनकी दशा सुधारने के लिए सरकार और निदेशक मंडल की बैठकों में इन्हें पीपीपी मोड पर दिए जाने की भी बात होती रही है। दोनों मंडलों के कर्मचारी नेता इसका विरोध करते रहे हैं। कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि अगर कोई गेस्ट हाउस ?kkVs में चल रहा है तो पहले यह जानने की आवश्यकता है कि वह ?kkVs में क्यों चल रहा है\ उन वजहों को चिह्नित कर उन्हें सुधारने का काम होना चाहिए। अगर उसके बाद भी गेस्ट हाउस ?kkVs से नहीं उबर पाते तब उन्हें पीपीपी मोड पर दिया जाना चाहिए। कई गेस्ट हाउसों के प्रबंधक यह तर्क भी देते हैं कि पूर्व में जिन गेस्ट हाउसों का नवीनीकरण किया गया उनकी आय बढ़ी है। सरकार को चाहिए कि वह इनका नवीनकरण कर इसमें पर्यटकों के लिए सुविधाओं का इजाफा करें और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए ग्लेशियर ट्रैकिंग] एडविंचर एवं माउंटरिंग को रोजगार के साथ जोड़े। इसके अलावा जड़ी बूटी] लीसा] शराब आदि का काम भी निगमों को मिलना चाहिए। इससे निगमों की आय बढ़ेगी और निगम मजबूत स्थिति में आएंगे।

 

^दि संडे पोस्ट^ ने जब कर्मचारियों से इसकी वजह जाननी चाही तो उनका कहना था कि इसके लिए कर्मचारी कम एवं अधिकारी और नौकरशाह ज्यादा जिम्मेदार हैं। इन्होंने ही निगमों को बर्बाद किया है। आखिर दिशा निर्देशन और मॉनीटरिंग का काम तो इन्हीं अधिकारी वर्ग को करना होता है। गेस्ट हाउसों के प्रबंधकों को कोई अधिकार नहीं दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि सरकारों ने पर्यटन के नाम पर प्रदेश को कुछ नहीं दिया। जो कुछ है वह प्रकूत्ति का दिया धरा है। दिल्ली] चेन्नई] मुंबई] कोलकाता] बंगलरू का पर्यटक यहां प्रकूति देखने आना चाहता है लेकिन उसके अनुकूल यहां आधारभूत ढांचा नहीं है। जब तक दूरस्थ क्षेत्रों का विकास नहीं होगा तब तक ये लाभ में नहीं जा सकते। अधिकारी देहरादून और नैनीताल से खिसकते नहीं जबकि चंपावत] बागेश्वर] अल्मोड़ा] पिथौरागढ़ में अधिकारियों को बैठना चाहिए। पर्यटन से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रदेश में पर्यटन विकास के लिए जरूरी है कि एक सेंटर अल्मोड़ा और एक पौड़ी में होना चाहिए। वहीं अधिकारियों को समय&समय पर पर्यटन क्षेत्रों का दौरा कर वहां की स्थितियों को भी जानना चाहिए। कई गेस्ट हाउसों के प्रबंधकों ने नाम न छापने के शर्त पर कहा कि उनके यहां जो सुझाव एवं शिकायत पुस्तिका रखी गई है] उसमें वर्षों से पर्यटकों की शिकायतें एवं सुझाव पड़े हैं। उन्हें कोई पलटने वाला नहीं है। निगमों के एमडी जैसे पदों पर नौकरशाहों के बजाय प्रोफेशनल एमडी की नियुक्ति होनी चाहिए। ऐसे व्यक्ति की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है जो निगमों को ?kkVs एवं कुप्रबंधन से निकाल सके। एकीकरण का फायदा तभी होगा जब अंदर की स्थितियों को सुधारा जाएगा।

 

कर्मचारी इस बात को लेकर भी रोष में हैं कि कर्मचारियों की स्थिति में भी सरकार ने वर्गभेद किया हुआ है। गढ़वाल मंडल विकास निगम कर्मचारियों को कुमाऊं मंडल विकास निगम कर्मचारियों से ज्यादा वेतनमान दिया जाता है। केएमवीएन कर्मचारियों को १९०० ग्रेड पे तो जेएमवीएन के समान कर्मचारी को २८०० गे्रड पे मिल रहा है। यही स्थिति नियमीतीकरण को लेकर भी है। जेएमवीएन में २००८ तक का कर्मचारी नियमित है तो केएमवीएन में वर्ष २००० का कर्मचारी ही नियमित हो पाया है। यह वर्गभेद तब हो रहा है जब दोनों मंडलों का पर्यटन सचिव एक है। सेक्शन ऑफिसर एक है। काम भी समान है। केएमवीएन के कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व में दीपक रावत जब केएमवीएन के एमडी बने थे तो उन्होंने इस ?kkVs वाले मंडल को लाभप्रद स्थिति में ला खड़ा कर दिया था। हमें ऐसे ही अधिकारी की जरूरत है। उन्होंने कर्मचारियों के हितों में भी बेहतर काम किया था। नियमीतीकरण एवं प्रमोशन की दिशा में काम कर कर्मचारियों का सम्मान बढ़ाया था। उनके लिए काम के लक्ष्य भी निर्धारित कर दिए थे।

 

बात अपनी&अपनी

कुमाऊं मंडल विकास निगम के कर्मचारी विरोध नहीं कर रहे हैं। कर्मचारी संगठन से बातचीत हुई है। कर्मचारियों के हितों की रक्षा सरकार की प्राथमिकता है।

डीएस गर्ब्याल] प्रबंध निदेशक कुमाऊं मंडल विकास निगम

 

अगर सरकार कर्मचारी हितों से खिलवाड़ नहीं करती है। गेस्ट हाउसों के नवीनकरण के साथ ही पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की सार्थक पहल करती है तो हम इस सिंगल विंडो के समर्थन में हैं। विलयीकरण के साथ ही महानगरों में स्थित निगमों के पीआरओ ऑफिस को भी सक्रिय करने की जरूरत है। पहला काम पर्यटकों को लाने का होना चाहिए। पर्यटकों के लिए यहां सब कुछ है लेकिन देखा जाय तो कुछ भी नहीं है।

दिनेश गुरूरानी] कर्मचारी नेता कुमाऊं मंडल विकास

निगम

 
         
 
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