fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 18 21-10-2017
 
rktk [kcj  
 
राजनीति
 
अब खण्डूड़ी नहीं जरूरी
  • कृष्ण कुमार

वरिष्ठ और वयोवृद्ध नेता भुवन चंद्र खण्डूड़ी कभी भाजपा के पोस्टर ब्वॉय रह चुके हैं। अपनी सरकार के दौरान जनहित के कई बड़े निर्णयों के लिए वे आज भी प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा स्थान रखते हैं। आज उन्हीं खण्डूड़ी के लिए पार्टी की बैठक में बैठने की समुचित व्यवस्था न होना कई सवाल खड़े कर गया। अमित शाह के साथ मंच पर स्थान न मिलने पर भाजपा के कई विधायकों और कार्यकर्ताओं में इसको लेकर खासी कानाफूसी भी हुई। हैरत की बात यह है कि खण्डूड़ी के बैठक में आने और उनके बैठने की व्यवस्था न होने पर भी किसी विधायक और नेता ने उन्हें अपना स्थान देना मुनासिब नहीं समझा

 

बदलते वक्त के साथ उत्तराखण्ड भाजपा में पिछले एक बरस के दौरान बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। किसी भी कीमत पर हरीश रावत सरकार को बेदखल करने का मन बना चुकी भाजपा ने कांग्रेस में भारी तोड़फोड़ मचाने का काम सफलतापूर्वक किया। जिन कांग्रेसी नेताओं को केदारनाथ आपदा के बाद भाजपा ने हत्यारा तक कहने से गुरेज नहीं किया था] उन्हें ससम्मान पार्टी में लेने से भाजपा नेतृत्व नहीं हिचकिचाया। भाजपा को विधानसभा चुनाव में इस सबके चलते बड़ी सफलता मिली। लेकिन अब बाहरियों की एंट्री के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। मात्र छह माह के भीतर सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठने से भाजपा का कैडर विचलित होता नजर आने लगा है। एक दूसरी बड़ी ?kVuk पुराने भाजपा नेताओं के हाशिए में चले जाने की हुई है। कभी भाजपा नेतृत्व के लिए उत्तराखण्ड में सबसे जरूरी कहलाए जाने वाले पूर्व सीएम भुवनचंद्र खण्डूड़ी इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं।

 

खण्डूड़ी की उपेक्षा का मुद्दा पिछले दिनों तब तूल पकड़ता दिखा जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के देहरादून प्रवास के दौरान आयोजित पार्टी नेताओं की बैठक में खण्डूड़ी के बैठने तक की उचित व्यवस्था न होने का मामला सामने आया। दरअसल] भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दौरे के समय प्रदेश के पदाधिकारियों की बैठक हुई और इस बैठक में प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं के साथ&साथ पांचों सांसद और सभी विधायक शामिल थे। इस बैठक में बीसी खण्डूड़ी के बैठने के लिए कोई व्यवस्था तक नहीं की गई। कुछ देर तक खण्डूड़ी असहज ही खड़े रहे लेकिन किसी भी प्रदेश के भाजपा नेता या विधायक ने उनके लिए स्थान छोड़ने की जहमत तक नहीं उठाई। केवल टिहरी सांसद माला राजलक्ष्मी अपने स्थान से उठीं और खण्डूड़ी को अपनी कुर्सी दी।

 

भाजपा के वरिष्ठ और वयोवृद्ध नेता जो कि कभी भाजपा के पोस्टर ब्वॉय रह चुके हैं ओैर अपनी सरकार के दोैरान कई बड़े जनहित के निर्णयों के लिए आज भी प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा स्थान रखते हैं] उस खण्डूड़ी के लिए बेैठक में बैठने की समुचित व्यवस्था न होना कई सवाल खड़े कर गया। अमित शाह के साथ मंच पर स्थान न मिलने पर भाजपा के कई विधायकों और कार्यकर्ताओं में इसको लेकर खासी कानाफूसी भी हुई। लेकिन हेैरत की बात यह है कि खण्डूड़ी के बैठक में आने और उनके बैठने की व्यवस्था न होने पर भी किसी विधायक और नेता ने उन्हें अपना स्थान देना तक मुनासिब नहीं समझा। 

 

ऐसा नहीं है कि बीसी खण्डूड़ी के साथ इस तरह की अनदेखी पहली बार हुई है। पहले भी खण्डूड़ी को ऐसे महौल से दो&चार होना पड़ा है। विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान रायपुर विधानसभा के एक कार्यक्रम में खण्डूड़ी ने अपना संबोधन आरंभ किया और उनका भाषण चल ही रहा था कि तभी अचानक जलपान का पंडाल भोजन के लिए खोल दिया गया। खण्डूड़ी का भाषण सुनने की बजाय कार्यकर्ता खाने पर टूट पड़े। इससे कार्यक्रम में अफरा&तफरी का माहौल खड़ा हो गया। इससे खिन्न होकर खण्डूड़ी अपना भाषण बीच में ही समाप्त करके मंच से उतर गए। खण्डूड़ी ने इस पर खासा रोष जताते हुए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष से इसकी शिकायत भी की। उनकी नारजगी को देखते हुए पूरे प्रकरण की जांच करवाए जाने की बात अजय उन्होंने कही गई थी। लेकिन आज तक जांच नहीं हो पाई या जांच का निर्णय सार्वजनिक नहीं किया जा सका। सूत्रों की मानें तो भाजपा के भीतर खण्डूड़ी विरोधी लॉबी द्वारा इसे अंजाम दिया गया ओैर इसके पीछे एक बड़े पदाधिकारी का हाथ था जो कि रायपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन कांग्रेस से आए नेता को टिकट देने के चलते उनका चुनाव लड़ना सपना ही रह गया। यह भी कहा जाता है कि भाजपा से रायपुर क्षेत्र के कई ऐसे नेताओं ने भी इस साजिश को अमलीजामा पहनाया जो कि भाजपा उम्मीदवार औेर पूर्व विधायक उमेश शर्मा काउ के विरोधी रहे हैं। बहरहाल मामला दबा दिया गया औेर खण्डूड़ी के विरोध और नाराजगी के बावजूद इस पर कोई कार्यवाही तक नहीं की गई।

 

वर्ष २०१२ के विधानसभा चुनाव में तो खण्डूड़ी की हार का कारण भाजपा की अंदरूनी लड़ाई को ही माना गया। इससे पहले २००९ ^में पांच पर पूरी हार] खण्डूड़ी होगा बाहर^ के नारे से भाजपा के एक बड़े वर्ग में खण्डूड़ी के खिलाफ मोर्चा खोला गया था। लोकसभा चुनाव में भाजपा पांचों सीटों पर चुनाव हार गई थी जिसका ठीकरा खण्डूड़ी के सिर फोड़ा गया और उनको मुख्यमंत्री पद से चलता कर दिया गया।

 

पार्टी के कई नेता खण्डूड़ी को आज भी भाजपा के लिए जरूरी मानते हैं और कई नेता ऑफ द रिकॉर्ड यह कहने से नहीं चूकते कि खण्डूड़ी न होते तो २०१२ में भाजपा महज १२ से १५ सीटों पर ही सिमट सकती थी। तत्कालीन निंशक सरकार पर एक के बाद एक कई गंभीर आरोप लगते रहे जिससे प्रदेश भर में भाजपा का ग्राफ लगातार गिरता जा रहा था। निशंक को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद एक बार फिर से बीसी खण्डूड़ी को प्रदेश की कमान दी गई और इसका परिणाम रहा कि अपने दूसरे महज छह माह के कार्यकाल में ही खण्डूड़ी के सुशासन से जनता में भाजपा का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा।

 

समाजसेवी अन्ना हजारे के देशभर में लोकपाल बिल और भ्रष्टाचारमुक्त भारत के लिए चलाए गए आंदोलन से प्रेरित होकर खण्डूड़ी सरकार ने मजबूत और ताकतवर लोकायुक्त कानून को विधानसभा से पास करवाया। साथ ही राज्य में ट्रांसफर के अद्घोषित उद्योग पर स्थानांतरण एक्ट पास करवाकर लगाम लगा दी थी। सरकार के इन कदमों को जनता ने हाथोंहाथ लिया और जनता में खण्डूड़ी की छवि एक जननेता के तौेर पर उभरी। इसी छवि को चुनाव में भुनाने का काम भाजपा के द्वारा किया गया और बीसी खण्डूड़ी के नेतृत्व में ^खण्डूड़ी हैं जरूरी^ का नारा देकर भाजपा चुनावी रण में उतरी। निशंक के सीएम रहते जहां मात्र बारह सीटों पर जीत की बात भाजपा के ही नेता कहने लगे थे] खण्डूड़ी के चलते भाजपा ३३ सीटों पर विजयी रही।

 

बावजूद इन सबके भाजपा के भीतर लगातार खण्डूड़ी विरोधी लॉबी ताकतवर होतीे चली गई और प्रदेश की राजनीति में खण्डूड़ी जननेता होने के बावजूद कमतर होते चले गए। हालांकि २०१४ के लोकसभा चुनाव में जनता ने खण्डूड़ी को अब तक सबसे बड़े मतों के अंतर से चुनाव में रिकॉर्ड जीत दिलवाने में कोई कमी नहीं की। लेकिन स्वयं भाजपा के भीतर उन नेताओं को खण्डूड़ी के राजनीतिक कद से भय बना रहा जो खण्डूड़ी के चलते उच्च पद पर नहीं पहुंच पा रहे थे।

 

अगर खण्डूडी के विरोध की बात करें तो तमाम हथकंडे अपनाए जा चुके हैं। सोशल मीडिया में तो बकायदा एक अभियान तक छेड़ा गया जिससे खण्डूड़ी की छवि पर दाग लगाया जा सके। कभी खण्डूड़ी की उम्र को लेकर तो कभी उनकी सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। विगत वर्ष खण्डूड़ी के बद्रीनाथ मंदिर में पूजा&अर्चना के दौरान तकरीबन एक ?kaVs खड़े रहने के चलते खण्डूड़ी को चक्कर आया तो मंदिर समिति द्वारा उनको कुर्सी दी गई लेकिन वे कुर्सी पर नहीं बैठे। इस खबर को मीडिया और सोशल मीडिया में खूब उछाला गया। सोशल मीडिया में इस खबर को इस तरह से परोसा गया कि मानो जनरल खण्डूड़ी अपनी वृद्धावस्था के चलते पूरी तरह से असहाय हो चले हैं। मुख्यधारा के मीडिया में भी खबर को सही तरीके से पेश नहीं किया गया। कई समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में तो खबर फैलाई गई कि खण्डूड़ी की तबियत इस कदर खराब हो गई कि उनको हैलीकॉप्टर से दिल्ली के अस्पताल में ले जाया गया जबकि खण्डूड़ी मंदिर में पूजा&अर्चना समाप्त कर अपनी कार से ही वापस आए और इस दौरान दो कार्यक्रमों में भी उन्होंने हिस्सा लिया।

 

खण्डूड़ी को जानबूझ कर बीमार द्घोषित करने के पीछे राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के समीकरण ही बताए गए। भाजपा के अंदरूनी सर्वे के अलावा देशभर के मीडिया और सोशल मीडिया के सर्वे में खण्डूड़ी को ही राज्य का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री और चुनाव के बाद खण्डूड़ी को ही मुख्यमंत्री बनाए जाने पर जनता की मांग को प्रमुखता से दिखाया गया। इसी के चलते भाजपा में खण्डूड़ी विरोधी लॉबी फिर से सक्रिय हुई और खण्डूड़ी के विरोध में तमाम तरह के षडयंत्रों को बुना जाने लगा।

 

अमित शाह की बैठक की बात करें तो इस प्रकरण पर भाजपा ने न तो कोई वक्तव्य दिया और न ही खण्डूड़ी ने इस पर अपनी कोई खास प्रतिक्रिया जताई। लेकिन सोशल मीडिया में जनरल खण्डूड़ी के पक्ष में कई चर्चाएं हुई और इसकी निंदा की गई। फिर अचानक ही ट्वीटर पर जनरल खण्डूड़ी के नाम के अकाउंट से खण्डूड़ी के लगातार कई ट्वीट सामने आने पर मामला गर्मा गया। इस ट्वीट अकाउंट से जारी होने वाले ट्वीट में लिखा गया था कि पार्टी मुझे सम्मान दे या न दे इसका मुझे कोई दुख नहीं है। जनता के दिलों में मेरे प्रति आज भी प्यार है] वही मेरे लिए सम्मान की बात है। इसके बाद एक ट्वीट सामने आया जिसमें कहा गया कि मैंने देश की सेवा की। राजनीित में उत्तराखण्ड के लिए जो मेरा सपना था वह पूर्ण नहीं हो पाया।

 

खण्डूड़ी के इस तथाकथित ट्वीटर अकाउंट से इस तरह के ट्वीट के सामने आने से प्रदेश की राजनीति में कई तरह की चर्चाएं होने लगी। मीडिया और सोशल मीडिया में भाजपा पर कई आरोप लगने लगे और भाजपा को अवसरवादी पार्टी कहा जाने लगा। भाजपा में भी खासी हलचल दिखाई दी। हालांकि कुछ ही समय के बाद खण्डूड़ी ने इस ट्वीटर अकाउंट के फर्जी होने की बात कह कर मामला ही समाप्त कर दिया। उनकी सुपुत्री और यमकेश्वर की विधायक ऋतु भूषण खण्डूड़ी ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को पत्र लिखकर इस ट्वीटर अकाउंट के फर्जी होने और खण्डूड़ी की छवि खराब किए जाने पर मुकदमा दर्ज करवाने का आवेदन दिया। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और मामले की जांच की जा रही है।

 

इस पूरे प्रकरण में एक बात यह भी देखने को मिली है कि पूरे चार दिन तक खण्डूड़ी के कथित ट्वीटर अकाउंट की चर्चाएं होती रहीं और इसकी आंड़ में भाजपा के भीतर कई सवाल भी उठाए जाते रहे लेकिन इसका संज्ञान तक नहीं लिया गया। जब सोशल मीडिया में भाजपा की फजीहत होने लगी तो पार्टी नेताओं को चिंता होने लगी। सूत्रों की मानें तो पार्टी खण्डूड़ी के अमित शाह की बैठक में बैठने की व्यवस्था न होने से जनरल खण्डूड़ी के अपमान होने की बात को नकारने लगी और पार्टी के नियम&कायदों के अनुसार ही कार्यक्रम करने की बात कहने लगी। यह एक तरह से भाजपा के भीतर का मामला है और यह भी तय है कि भाजपा में पार्टी से ऊपर कोई नेता नहीं माना जाता। शायद इसी के चलते तीनों ही पूर्व मुख्यमंत्रियों को मंच पर स्थान नहीं दिया गया।

 

इस पूरे मामले की गहराई को देखें तो लगता है कि अब भाजपा में एक बड़ा बदलाव हो चला है। सत्ता पाने से पूर्व भाजपा जिन मुद्दों को जनहित का मानती थी अब सत्ता पाने के बाद उनसे किनारा करने से भी भाजपा को कोई परहेज नहीं है। साथ ही खण्डूड़ी की ईमानदारी और भ्रष्टाचार मुक्त स्वच्छ शासन को चुनाव में एक बड़े मुद्दे के तौर पर मानती थी वह मुद्दे अब भाजपा के लिए मुसीबत बन चुके हैं तो खण्डूड़ी भी अब भाजपा के लिए अप्रसांगिक माने जा रहे हैं। अब न तो खण्डूड़ी की जरूरत हैं और न ही उनके निर्णयों को दोहराने की। राजनीति के जानकार इसे भाजपा में बदलाव की एक कड़ी के तौर पर देख रहे हैं लेकिन इसका परिणाम २०१९ के लोकसभा चुनाव में क्या होगा यह भविष्य का सवाल है। जिस पर जनता के साथ&साथ भाजपा की भी निगाहें टिकी हुई हैं।

 

krishan.kumar@thesundaypost.in

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 70%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

भाजपा के नए नेतृत्व ने जिन पुराने दिग्गजों को काफी अर्से तक हाशिए में रखा है उनमें एक उत्तराखण्ड के पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल ^निशंक^ भी हैं। हरिद्वार से सांसद निशंक ने इन बुरे दिनों

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1872025
ckj