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vad 18 21-10-2017
 
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आवरण कथा
 
मोदी मिशन को धोखा
  • गुंजन कुमार@अरुण कश्यप

उत्तराखण्ड को खुले में शौचमुक्त राज्य ?kksf"kr कर बेशक मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से वाहवाही बटोर ली हो] लेकिन झूठ के पैर नहीं होते। असलियत यह है कि राज्य के सरकारी महकमों में ही शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का भयंकर अभाव है। जब ६० पुलिसकर्मियों के लिए मात्र तीन शौचालय और एक बाथरूम की सुविधा हो तो ऐसे में प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन की जमीनी हकीकत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। थानों और चौकियों में शौचालयों के अभाव में सबसे अधिक दिक्कत महिला पुलिसकर्मियों को होती है। अधिकतर थानों में तो महिला कर्मियों के लिए कोई शौचालय या बाथरूम नहीं है। इसी तरह गैर आबाद गांवों में गैस कनेक्शन देकर प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी उज्जवला योजना पर पलीता लगाया जा रहा है

 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म दिवस के अवसर पर देश भर में स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम चलाया गया। इसके अलावा ^स्वच्छता ही सेवा^ नाम से एक योजना चलाई जा रही है। इस योजना से देश के नामी-गिरामी लोगों को जोड़ा गया है। निजी क्षेत्रों को भी गांवों] कस्बों और विद्यालयों में शौचालय बनाने के लिए आगे आने को कहा गया है। प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी की इस महत्वाकांक्षी योजना का प्रचार भी खूब किया जा रहा है। २ अक्टूबर २०१९ को महात्मा गांधी की १५० वीं जयंती तक हर द्घर में शौचालय बनाने का केंद्र सरकार का लक्ष्य है। लेकिन इस लक्ष्य को भाजपा शासित उत्तराखण्ड प्रदेश में ही पलीता लगता नजर आ रहा है। उत्तराखण्ड के गांवों और कस्बों को तो छोड़िए यहां कई पुलिस थानों और चौकियों में भी शौचालय और शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। जब प्रदेश के पुलिस बल को ही खुले में शौच आदि के लिए जाना पड़ता है तो फिर प्रधानमंत्री मोदी का स्वच्छ भारत मिशन कैसे पूरा होगा] इस तरह की आशंकाएं हर जगह उठ रही हैं।

 

इसी साल जून माह में प्रदेश सरकार ने उत्तराखण्ड को खुले में शौच से मुक्त राज्य ?kksf"kr किया है। इस ?kks"k.kk के साथ प्रदेश की भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से खूब वाहवाही बटोरी] पर सत्यता इससे बहुत अलग है। ऐसा लगता है कि राज्य सरकार अपने ही प्रधानमंत्री के मिशन से छलावा कर रही है। प्रदेश के गांवों को छोड़ भी दिया जाए तो सरकार के ही कई ऐसे महकमे हैं जहां शौचालय नहीं हैं। यदि कहीं हैं भी तो उपयोग करने के लायक नहीं हैं। ऐसे शौचालयों का होना न होने के बराबर ही है। उत्तराखण्ड पुलिस ऐसा महकमा है] जहां कर्मी भी सबसे ज्यादा हैं और उनके कार्यालय भी प्रदेश भर में सबसे अधिक हैं। पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को थानों और चौकियों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। कई थानों-चौकियों में शौचालय तक नहीं हैं। महिला पुलिसकर्मियों के लिए तो प्रदेश भर में न के बराबर शौचालय एवं बाथरूम हैं।

 

हरिद्वार के एक वकील अरुण भदौरिया ने आरटीआई के जरिए हरिद्वार जिले के थानों-चौकियों में शौचालयों और बाथरूमों की जानकारी मांगी तो सरकारी महकमे में बुनियादी सुविधाओं की कलई खुल गई। अस्थाई राजधानी से सटे मैदानी जिले हरिद्वार में जब पुलिसकर्मियों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं तो पहाड़ी क्षेत्र की स्थिति और खराब होनी स्वाभाविक है। हरिद्वार के सिडकुल थाना और इस थाने के अंतर्गत आने वाले चौकी कोर्ट एवं जेल में एक थानाध्यक्ष सहित ८ सब इंस्पेक्टर] ३ हेड कांस्टेबल और ५१ कांस्टेबल हैं। यानी कुल ६० पुलिसकर्मियों के लिए यहां एक मात्र बाथरूम है। शौचालय की संख्या भी केवल तीन है। यह शौचालय और बाथरूम भी सिडकुल थाने में है। इस थाने में महिला कर्मियों के लिए कोई बाथरूम और शौचालय नहीं है।

 

चौकी कोर्ट और चौकी जेल में स्थिति और भी हास्यास्पद है। इन दोनों चौकियों में न तो शौचालय है और न ही बाथरूम है। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि इन दोनों चौकियों के पुलिस अधिकारी एवं कर्मी अपने नित्य क्रियाक्रम कैसे करते होंगे। पिरान कलियर थाने का अपना भवन नहीं है। यह दरगाह के कमरों से संचालित हो रहा है। कलियर थाना और इसके अंतर्गत आने वाले इमली खेड़ा एवं धनौरी चौकी में ४ सब इंस्पेक्टर सहित कुल ४५ पुलिसकर्मी हैं। इसमें दो महिला कांस्टेबल भी शामिल हैं। जब थाना दरगाह के कमरों में चल रहा तो इसकी स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। धनौरी चौकी का भी अपना भवन नहीं है। यह चौकी सिंचाई विभाग के कमरों में चल रही है। यहां के थानों और चौकियों में भी महिलाओं के लिए शौचालय एवं बाथरूम नहीं हैं। रूड़की के थानों और चौकियों की हालत भी एक समान है। कहीं शौचालय और बाथरूम हैं तो उपयोग के लायक नहीं है। यहां भी महिलाओं के लिए अलग से शौचालय और बाथरूम नहीं है।

 

हरिद्वार जिले के लक्सर थाना के अंतर्गत आने वाली सुल्तानपुर चौकी का भी यही हाल है। सुल्तानपुर चौकी में एक सब इंस्पेक्टर और दो महिला कांस्टेबल सहित आधा दर्जन से ज्यादा पुलिसकर्मी हैं। सुल्तानपुर चौकी दुकान के दो कमरों में चल रही है। वह भी किराए पर। महिला पुलिसकर्मी होने के बावजूद इस चौकी में न शौचालय है न ही बाथरूम। यहां चौकी इंचार्ज सहित सभी पुलिसकर्मी पास के एक स्कूल का शौचालय उपयोग करते हैं। इससे स्कूल के बच्चों को समस्या होती है। स्कूल बंद होने के बाद ये लोग कहां जाते होंगे] इसकी कल्पना भर कीजिए। यहां तैनात एक पुलिसकर्मी बताता है] ^कई बार हमें बाहर शौच के लिए जाना पड़ता है। एक बार स्कूल के प्राचार्य ने शौचालय में ताला लगा दिया ताकि हमलोग उसका इस्तेमाल न कर सकें।^ यहां तैनात महिला पुलिसकर्मी का और भी बुरा हाल रहता है।

 

सुल्तानपुर निवासी इकबाल हुसैन बताते हैं] ^आम लोगों को तो आपने बोतल लेकर खेत में जाते देखा होगा। यहां के पुलिस कर्मियों को भी कई बार हाथ में बोतल लेकर जाते आप देख सकते हैं।^ कुछ समय पहले ही हरिद्वार के जिलाधिकारी दीपक रावत ने क्लैक्टे्रट में एक अधिकारी को खुले में मूत्र त्यागने पर ५ हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। जिलाधिकारी दीपक रावत को कम से कम अपने जिले में ऐसे सरकारी कार्यालय का भी दौरा करना होगा जहां शौचालय एवं बाथरूम नहीं हैं।  

 

बुनियादी सुविधाओं का अभाव सिर्फ हरिद्वार जिले में ही नहीं है। हरिद्वार के अलावा देहरादून जिले में भी स्थिति कमोबेश यही है। देहरादून के कई थानों और चौकियों में बुनियादी सुविधाओं का अकाल है। महिला पुलिसकर्मियों को तो बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें कई बार शर्मिंदा होना पड़ता है। 

 

देहरादून में तैनात एक महिला हेड कांस्टेबल नाम न छापने की शर्त पर कहती हैं] ^महिला आईपीएस अधिकारियों के लिए तो अलग शौचालय या बाथरूम है] मगर महिला पुलिसकर्मियों के लिए कहीं भी अलग से बाथरूम या शौचालय नहीं है। कई थानों में इचार्ज को छोड़ दें तो महिला इंस्पेक्टर या सब इंस्पेक्टर तक के लिए अलग व्यवस्था नहीं है। उन महिला अधिकारियों को भी ^मैनेज^ करना पड़ता है। महिला पुलिसकर्मी की बात ही अलग है।^ अधिवक्ता अरुण भदौरिया कहते हैं] ^आरटीआई से जानकारी लेने पर चंपावत के सीओ कार्यालय से एक-दो पुलिसकर्मियों का फोन आया और उन्होंने शुक्रिया कहा] क्योंकि आरटीआई के बाद वहां शौचालय बनने लगा था।^

 

पिछले साल देहरादून के एक निवासी ने उत्तराखण्ड पुलिस को शुद्ध पेयजल की उपलब्धता से संबंधित शिकायत मानवाधिकार आयोग में की थी। जिसकी सुनवाई के बाद आयोग ने उत्तराखण्ड पुलिस से इससे संबंधित विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा था। पुलिस मुख्यालय ने आयोग के लिए जो रिपोर्ट तैयार की उसे देखकर आयोग के सदस्य भी हतप्रभ रह गए। पुलिस मुख्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून जिले में ही १० थानों और ४४ चौकियों में पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था नहीं है। हरिद्वार जिले में पांच थानों के साथ ही किसी भी चौकी में शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं है। अल्मोड़ा जिले में तीन थानों और पांच चौकियों में पानी की व्यवस्था नहीं है। नैनीताल जिले में चार थानों और सभी १७ चौकियों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है। चंपावत जिले के पांच थानों और चार चौकियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है। पिथौरागढ़ जिले के सात थानों और सभी १७ चौकियों में शुद्ध पेयजल नहीं है। ऊधमसिंह नगर जिले में दो चौकियों में शुद्ध पेयजल नहीं है। उत्तरकाशी जिले में दो थानों और सिर्फ एक चौकी में ही पीने का शुद्ध पानी मिलता है। रुद्रप्रयाग जिले में पांच थाने हैं। इनमें से एक में पेयजल उपलब्ध नहीं है। चमोली की तीन चौकियों में पेयजल उपलब्ध नहीं है।

 

थाने एवं चौकियों में शौचालय और बाथरूप न होने के विषय पर डीजीपी अनिल रतूड़ी से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने मीटिंग में होने की बात कहकर फोन काट दिया। खुले में शौचमुक्त उत्तराखण्ड की ?kks"k.kk पर सरकार के प्रवक्ता एवं शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक को कई बार फोन किया गया लेकिन वह भी अपना पक्ष रखने फोन पर उपलब्ध नहीं हुए।

 

 

  • राज्य में कुल ३८९ थाने और चौकियां हैं। इसमें से २१ चौकियां और ८५ थानों के पास आज भी अपना भवन नहीं है।
  • उत्तराखण्ड पुलिस के कई थाने और चौकियां किराए के भवन या फिर ग्राम समाज की भूमि पर संचालित हो रहे हैं।
  • हिमाचल प्रदेश की सीमा से लगे उत्तरकाशी जिले की सीमांत पुलिस चौकी कुल्हाल में पुलिसकमिर्यों की दयनीय स्थिति व्यवस्था की कलई खोलती है।
  • यहां सालों पूर्व हिमाचल और उत्तराखण्ड की सीमा पर पुल बनाने में लगे मजदूरों के लिए ठेकेदार ने जो कमरे बनाए थे] कुल्हाल पुलिस चौकी के पुलिस कर्मी उन्हीं दड़बेनुमा कमरों से चौकी का संचालन कर रहे हैं। वह कमरा भी अब जर्जर हो चुका है।
  • कुल्हाल की तरह ही प्रदेश के १३ थाने और चौकियां जर्जर भवनों से संचालित हो रहे हैं।
  • सबसे ज्यादा हरिद्वार जिले में चार थाने और २६ चौकियों के पास अपना भवन नहीं है या फिर ये जर्जर भवन में चल रहे हैं।
  • उत्तराखण्ड पुलिस को अत्याधुनिक हथियार के अलावा बुनियादी सुविधाओं की सख्त जरूरत है। इस अभाव की मुख्य वजह बजट की कमी बताई जाती है।

 

gunjan@thesundaypost.in


गैर आबाद गांवं में उज्जवला

 

 

  • जसपाल नेगी

 


पौड़ी जिले के वीरोंखाल प्रखंड में उज्जवला योजना के तहत गैर आबाद गांव में बांट दिए गए गैस कनेक्शन।

 

पौड़ी। जिले के कई लोग केंद्र की मोदी सरकार में सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। प्रदेश के मुखिया से लेकर पड़ोसी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री भी इसी जिले के हैं। मगर पिछले कुछ समय से यह जिला एक के बाद एक उजागर हो रहे ?kksVkyksa के कारण सुर्खियां पा रहा है। ?kksVkys की अगली कड़ी में उज्जवला योजना के तहत बांटे गए रसोई गैस कनेक्शन का मामला सामने आया है।

 

बीरोंखाल प्रखंड के एक गांव में इस योजना के तहत ७२ कनेक्शन बांटे गए हैं। पर हकीकत में उस गांव में एक भी परिवार निवास नहीं कर रहा है। जिस प्रकार कागजों में ये कनेक्शन बांटे गए। उसी प्रकार कागजों में ही अधिकारियों ने जांच भी पूरी कर ली है। जांच का स्तर यह है कि अधिकारियों को अभी तक उस गांव का नाम ही पता नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना में सरकारी अधिकारियों और गैस एजेंसियों की मिलीभगत से भारी ?kksVkys की तस्वीर सामने आई है। दो साल पूर्व जोर शोर से समूचे देश में उज्जवला योजना का शुभारंभ किया गया था। पौड़ी जिले में इस योजना का शुभारंभ स्वयं तत्कालीन पेट्रोलियम राज्यमंत्री] स्वतंत्र प्रभार] धर्मेंद्र प्रधान ने किया था। पौड़ी जिले में यह योजना अपने शुरुआती दौर से ही विवादों में रही। mn~?kkVu अवसर पर जिन लाभार्थियों को उज्जवला योजना के तहत निःशुल्क कनेक्शन आबंटित किये गए] उनमें अधिकांश नेपाली मूल के लोग थे। प्रशासन से तब भी जांच की बात कही थी। पर आज तक यह जांच नतीजे तक नहीं पहुंची है।

 

अब नया ?kksVkyk सामने है। बीरोंखाल प्रखण्ड के एक ही गांव के ७२ परिवारों को गैस एजेंसी की ओर से उज्जवला योजना के तहत निःशुल्क गैस कनेक्शन बांटे गए हैं। बाद में पता चला कि ये सभी कनेक्शन सिर्फ कागजों में बांटे गए हैं। वर्तमान समय में गांव में एक भी परिवार निवास नहीं करता है। पलायन के चलते पूरा गांव खाली है। ७ अगस्त २०१७ को राज्य मंत्री डॉ धन सिंह रावत की अध्यक्षता में आयोजित जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति की बैठक में यह मामला उठा था। उसके बाद जिला पूर्ति अधिकारी पौड़ी को इस प्रकरण की जांच का जिम्मा दिया गया। डेढ़ माह बाद २९ सितंबर को आयोजित बैठक में इस शिकायत की समीक्षा की गई। जांच अधिकारी जिला पूर्ति अधिकारी ने बताया कि उन्होंने इस मामले की जांच पूरी कर ली है। गांव में एक भी व्यक्ति निवासरत नहीं पाया गया। पर जब उनसे गांव का नाम पूछा गया तो उनकी जांच की पोल खुल कर सामने आ गई। जिला पूर्ति अधिकारी को उस गांव का नाम तक पता नहीं था। स्पष्ट है कि सरकारी जांच बिना मौके पर गए पूरी हो रही है। ऐसे में दोषियों का पता लगाना और भी टेढ़ी खीर है। उज्जवला योजना में इस ?kksVkys के सामने आने के बाद अन्य स्थानों से भी भारी गड़बड़ियों की शिकायत सामने आ रही हैं। असल जरूरतमंद सरकारी अधिकारियों और गैस एजेंसियों के चक्कर काटने पर मजबूर हैं। जबकि कागजों में धड़ल्ले से रसोई गैस कनेक्शन बांटे जा रहे हैं।

 
         
 
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