fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 18 21-10-2017
 
rktk [kcj  
 
मेरी बात अपूर्व जोशी
 
ये कहां आ गए हम

भाजपा के वर्तमान नेतृत्व द्वारा हाशिए में डाल दिए जाने का दर्द यशवंत सिन्हा को सता रहा हो। शायद इसी कारण उन्होंने अपनी भड़ास इस लेख के जरिए निकाली हो। यह उनकी निजी कुंठा हो सकती है लेकिन असल मुद्दा उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न हैं जिनका जवाब दे पाने में केंद्र सरकार और भाजपा असमर्थ नजर आ रही है। हालांकि मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं] सही बात तो यह कि मुझे जीडीपी जैसे तकनीकी मुद्दों की समझ नहीं लेकिन जो दिख रहा है वह इतना समझने के लिए काफी है कि देश की अर्थव्यवस्था के हाल ठीक तो कतई नहीं हैं

 

यशवंत सिन्हा ने पिछले दिनों अंग्रेजी दैनिक ^दि इंडियन एक्सप्रेस^ में एक लेख लिखा& 'I need  to speak up now' यानी ^अब मुझे बोलना ही होगा।^ देश के पूर्व वित्त मंत्री का लेख पढ़ते हुए अनायास मी मुझे अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म सिलसिला के एक गीत का स्मरण हो आया] विशेषकर पहली पंक्ति का& ^ये कहां आ गए हम] यूं ही साथ&साथ चलते^। सिन्हा ने अपने इस लेख के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था के पूरी तरह चरमरा जाने की बात सामने रखी। उन्होंने निजी पूंजी निवेश के कम होने] औद्योगिक उत्पाद दर में कमी आने] कूषि और कूषक के गहराते संकट] रियल स्टेट कारोबार में आई भारी मंदी] नोटबंदी के फैसले से उपजा संकट और जीएसटी कानून पर अपने विचार सामने रखे हैं। यशवंत सिन्हा ने अपनी ही राजनीतिक पार्टी की सरकार को ?ksjrs हुए रोजगार सृजन के दावों को गलत बताने से भी गुरेज नहीं किया। जैसा अपेक्षित था] उनके इस लेख के बाद वैसी ही प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर तमाम विपक्षी दलों और भाजपा विरोधियों ने सिन्हा को हाथों&हाथ लेने में देर नहीं की। दूसरी तरफ भाजपा ने भी तीखी प्रतिक्रिया तत्काल दे डाली। वित्त मंत्री अरुण जेटली] जिन्हें इस लेख के जरिए सिन्हा ने अपने निशाने पर रखा हैं] ने सिन्हा को अस्सी बरस की उम्र में भी पद का दावेदार करार दे] आग में ?kh डालने का काम किया। सरकार की तरफ से बचाव की जिम्मेदारी जयंत सिन्हा को सौंपी गई। जयंत यशवंत सिन्हा के पुत्र और मोदी सरकार में नगर विमानन राज्य मंत्री हैं।

 

१९८४ में भारतीय प्रशासनिक सेवा ¼आईएएस½ से इस्तीफा दे तत्कालीन जनता पार्टी में शामिल हो सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने यशवंत सिन्हा ने क्यों भाजपा नेतृत्व पर अपने लेख के जरिए निशाना साधा] इसको समझाने के लिए पहले सिन्हा की बाबत बुछ जानकारी आपसे साझा करता हूं। १९८८ में जनता पार्टी की तरफ से राज्यसभा सदस्य बने सिन्हा ने नब्बे के दशक में अल्पकाल की चंद्रशेखर सरकार में बतौर विदेश मंत्री काम किया। वे १९९६ में भाजपा में शामिल हुए। भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने के बाद उन्हें अटल बिहारी सरकार में पहले वित्त मंत्री और फिर २००२ में विदेश मंत्री बनाया गया। बतौर वित्त मंत्री उनका कार्यकाल मिश्रित नतीजों वाला माना जाता है। बैंकिंग ब्याज दरों में कमी करने और अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वपूर्ण स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना के लिए धन उपलब्ध कराने के लिए यशवंत सिन्हा की बतौर वित्त मंत्री प्रशंसा की जाती है। सिन्हा २००४ का आम चुनाव हार गए थे। इसके बाद उन्हें भाजपा ने अपना राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया। २००९ के आम चुनाव में पार्टी की हार के बाद सिन्हा ने उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे तत्कालीन पार्टी हाईकमान के प्रति अपना अविश्वास प्रकट करने का काम किया था। इसके बाद से ही भाजपा में उनकी प्रासंगिकता कम होती चली गई। जेटली ने अस्सी वर्ष के आवेदक कह सिन्हा को निशाने पर लिया तो इसके पीछे वे चर्चाएं हैं जो दिल्ली के सत्ता गलियारों में सुनने को मिलती रही हैं। ऐसा माना जाता है कि यशवंत सिन्हा योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद स्वयं के लिए मांग रहे थे। मोदी सरकार ने योजना आयोग के स्वरूप में बदलाव करते हुए उसे नीति आयोग में परिवर्तित कर दिया। इसके बाद वे ब्रिक्स बैंक के पहले चेयरमैन बनने की चाह पाल बैठे। ब्राजील] रूस] इंडिया] चीन और साऊथ अफ्रिका के इस प्रस्तावित नवगठित बैंक का पहला अध्यक्ष भारत से होना तय है। जानकार बताते हैं प्रधानमंत्री ने सिन्हा की इस इच्छा को तवज्जो नहीं दी तो इसके लिए सिन्हा जेटली को दोषी मानते हैं। शायद यही कारण है कि उन्होंने अपने लेख में सीधे&सीधे जेटली को आड़े हाथों लिया है। जाहिर है यदि आप किसी पर निशाना साधेंगे तो वह भी अपने बचाव की पूरी तैयारी करेगा। जेटली और भाजपा ने यशवंत सिन्हा को ही निशाने पर ले लिया। उन पर पद के लालची होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। मोदी द्वारा उनकी इच्छा पूरी न किए जाने पर प्रतिशोध स्वरूप सरकार पर हमले की बात कही जा रही है। हो सकता है इसमें सच्चाई हो। भाजपा के वर्तमान नेतृत्व द्वारा हाशिए में डाल दिए जाने का दर्द यशवंत सिन्हा को सता रहा हो। शायद इसी कारण उन्होंने अपनी भड़ास  इस लेख के जरिए निकाली हो। यह उनकी निजी कुंठा हो सकती है लेकिन असल मुद्दा उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न हैं जिनका जवाब दे पाने में केंद्र सरकार और भाजपा असमर्थ नजर आ रही है। मेरी समझ से यही कारण है कि यशवंत सिन्हा के प्रश्नों का उत्तर देने के बजाए उन पर निजी हमले किए जा रहे हैं। हालांकि मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं] सही बात तो यह कि मुझे जीडीपी जैसे तकनीकी मुद्दों की कतई समझ नहीं लेकिन जो दिख रहा है वह इतना समझने के लिए काफी है कि देश केी अर्थव्यवस्था का हाल ठीक तो कतई नहीं है। इसे समझने की गणित बहुत सरल है। मोदी सरकार सत्ता में तीन बरस से अधिक समय पूरा कर चुकी है। २०१४ में जब कांग्रेस के भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता विकल्प को तलाश रही थी तो दो चेहरे सामने आए थे। अन्ना आंदोलन से निकले&निखरे अरविंद केजरीवाल और गुजरात के विकास मॉडल के नायक नरेंद्र मोदी। जनता ने दिल्ली के लिए केजरीवाल तो देश के लिए मोदी को चुना। बिहार में जनता के पास नीतीश कुमार थे इसलिए वहां मोदी का जादू नहीं चला। देश के लिए कोई विकल्प नहीं था। केजरीवाल को भले ही पूरा भारत सराह रहा था किंतु उनका संगठन केवल दिल्ली तक सिमटा था। नतीजा भाजपा को मिला प्रचंड बहुमत और मुख्यमंत्री मोदी का पीएम मोदी बनना रहा। जनता ने उन्हें बहुत आशा&ढ़ेर सारी अपेक्षा के संग यह सत्ता सौंपी। इन तीन बरसों में बड़ी&बड़ी बातें] जुमले] सर्जिकल स्ट्राइक] स्वच्छ भारत] नोटबंदी और जीएसटी को देश ने सुना&देखा &भोगा लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि आम भारतीय का दुख ?kVus के बजाए बढ़ा है। अर्थव्यवस्था के चरमराने का जो प्रश्न सिन्हा ने उठाया वह गैर वाजिब नहीं है। पिछले दो वर्षों के दौरान] विशेषकर नोटबंदी और जीएसटी के बाद हालात तेजी से बिगड़े हैं। हालांकि कोई ऐसा आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं जो संपूर्ण अर्थव्यस्था के सच को एक संग सामने लाता हो] अलग&अलग क्षेत्रों में देखने को मिल रहा नकारात्मक रुझान इतना अवश्य स्पष्ट करता है कि मोदी सरकार की नीतियों के चलते हालात फिलहाल तक तो सुधरे नहीं हैं। उदाहरण कपड़ा उद्योग है जहां रोजगार बड़ी संख्या में द्घटा है। केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि ६७ कपड़ा कारखाने इन तीन बरसों में बंद हो चुके हैं जिसके चलते १७]६०० कामगार बेरोजगार हुए हैं। यह आंकड़े आधे&अधूरे हैं। पिछले दिनों वस्त्र निर्यात उद्योग में भारी मंदी के चलते बेरोजगार हुए कामगारों की संख्या लाखों में है। देश की नामचीन कंपनी लारसन एंड टुरबो ने पिछले छह माह में चौदह हजार कर्मचारियों की छंटनी की है तो देश की पांच बड़ी आईटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर अपने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इन कंपनियों में टाटा कंसल्टेंसी] इन्फोसिस] टेक महिंद्रा] विप्रो और एचसीएल जैसी देश की श्रेष्ठ आईटी कंपनियां शामिल हैं। एचडीएफसी बैंक ने जनवरी&मार्च २०१७ के दौरान छह हजार से ज्यादा को हटा दिया है तो ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी सुजलोन ने १५०० कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया है। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी ^स्टार्ट अप योजना^ के अंतर्गत शुरू हुई कंपनियों में से २१२ कंपनियों में ताला पड़ चुका है। y?kq और ?kjsyw कुटीर उद्योगों के हालात ज्यादा भयावह हैं। जीएसटी के चलते अनिश्चितता का माहौल उद्योग जगत की कमर तोड़ चुका है। सूरत के कपड़ा व्यापारियों की मानें तो कपड़े पर जीएसटी लगने के बाद से प्रतिदिन सवा करोड़ के व्यापार का नुकसान हो रहा है लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। यह वह सब कुछ है जिसे मैं और मेरे जैसे अन्य गैर आर्थिकी समझ वाले लोग महसूस रहे हैं। अर्थशास्त्रियों की बात करूं तो हालात और खराब होते नजर आते हैं। ^बीबीसी^ को दिए एक साक्षात्कार में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ अरुण कुमार ?kjsyw विकास दर एक या दो फीसदी मानते हैं। इसे समझिए। डॉ कुमार के अनुसार असंगठित क्षेत्र के व्यापार में साठ से अस्सी फीसदी की गिरावट आ चुकी है। हमारी पूरी अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी पैंतालिस प्रतिशत है। सरकार जो भी सुधार ला रही है] वह सब संगठित क्षेत्र के लिए हैं यानी बड़े और मझोले उद्योग के लिए। गैर संगठित क्षेत्र के लिए कोई सुधार] कोई योजना के न होने से यह क्षेत्र बर्बाद हो चला है। संगठित क्षेत्र में भी सुधारों का तात्कालिक असर नदारद है। कारण है बड़े उद्योगों को अधिक ऋण न मिल पाना] बैंकों का कर्ज डूबना और विदेशी पूंजी निवेश में कमी आना। जनता की परेशानियों से विपक्ष के साथ&साथ एनडीए के ?kVd दल भी चिंतित हैं। शिव सेना प्रमुख ने तो मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए यहां तक डाला कि ^विकास तो पागल हो गया है।^ कभी मोदी के प्रशंसक रहे महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बुलेट टे्रन जैसी परियोजनाओं पर सीधे पीएम को आड़े हाथों fy;k है।

 

कुल मिलाकर जो अपन को समझ में आता है वह यही कि मोदी जी के दिखाए सपने टूटने लगे हैं। इन सपनों के टूटने की आहट पहले धीमी थी] अब बहुत तेजी से सुनाई देने लगी है। जब सपने टूटते हैं तो दर्द बहुत गहरा होता है। फिर यह तो एक सौ पच्चीस करोड़ देशवासियों के स्वप्न का मसला है। निश्चित ही इसका असर २०१९ के आम चुनावों और कुछेक राज्यों में जल्द होने जा रहे विधानसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है। यदि जनता जनार्दन के मन में ठगे जाने की भावना ?kj कर गई तो अगला जनादेश कहीं २००४ के उदित भारत जैसा न हो जाए। हालांकि हमारे पीएम भी निश्चित ही इस संकट को समझ रहे होंगे] क्या पता कोई ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक कर दें कि २०१९ में एक बार फिर जनता जनार्दन चमकृत हो उठे।

editor@thesundaypost.in

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 70%
uk & 14%
 
 
fiNyk vad

  • दिकदर्शन रावत

गिरधारी लाल साहू के खिलाफ अब लोग अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं। ^दि संडे पोस्ट^ के पिछले अंकों में सिलसिलेवार प्रकाशित गिरधारी के जमीन फर्जीवाड़े

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1872034
ckj