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खास खबर 
 
सीबीआई का कसता शिकंजा

  • गुंजन कुमार

पतंजलि योग पीठ में स्वामी रामदेव के बाद महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले आचार्य बालकृष्ण पर सीबीआई की नजर है। ^दि संडे पोस्ट^ ने ११ साल पहले खुलासा किया था कि बालकृष्ण नेपाली नागरिक हैं और उनका पासपोर्ट फर्जी है। इस खोजी खबर के बाद बालकृष्ण के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ और उन्हें जेल भी देखनी पड़ी। इस बीच सीबीआई उनके मामले में एक बार फिर सक्रिय हो गई है

 

आचार्य बालकूष्ण के फर्जी पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर सीबीआई फिर से सक्रिय हो गई है। उनके फर्जी पासपोर्ट और नागरिकता की जांच कर रही टीम पिछले सप्ताह हरिद्वार नगर निगम कार्यालय पहुंची। इससे पहले भी ये टीम यहां से दस्तावेज लेने के लिए आ चुकी है पर उस वक्त उसे आचार्य बालकूष्ण से जुड़े दस्तावेज नहीं मिले। इस बार भी सीबीआई टीम को निराशा ही हाथ लगी। ग्यारह साल पूर्व ^दि संडे पोस्ट^ ने अपनी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में आचार्य बालकूष्ण के फर्जी पासपोर्ट और नेपाली नागरिकता का खुलासा किया था। सीबीआई इसके करीब छह साल बाद मामला दर्ज कर जांच कर रही है। 

सीबीआई की जांच टीम २८ अगस्त को हरिद्वार नगर निगम पहुंची। दो सदस्यीय टीम के अधिकारियों ने मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी  डॉ ़ प्रवीण कुमार और एक लिपिक से आचार्य बालकूष्ण के जन्म प्रमाण पत्र मामले में पूछताछ की। सीबीआई ने करीब एक द्घंटे तक दोनों से उक्त प्रकरण में जानकारी जुटाई। निगम कार्यालय में प्रमाण पत्र से जुड़े दस्तावेज भी टीम ने खंगाले। पड़ताल पूरी होने के बाद टीम वापस लौट गई। मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी ने बताया कि सीबीआई टीम के दो सदस्य नगर निगम पहुंचे थे। उन्होंने बालकूष्ण के जन्म प्रमाण पत्र संबंधी पत्रावली की जानकारी मांगी। लेकिन उन्हें पत्रावली नहीं मिली है। बताया जाता है कि टीम को बालकूष्ण से जुड़ी कई पत्रावली गायब मिलीं। 

आचार्य बालकूष्ण ने १९९७ में हरिद्वार नगर निगम में जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन किया था। इस आवेदन के बाद उन्होंने जन्म प्रमाण पत्र हासिल किया। लेकिन वर्ष २००५ में बालकूष्ण ने पुनः जन्म प्रमाण पत्र के लिए नगर निगम में आवेदन किया। इस बार 

उन्होंने अलग तथ्य देते हुए बताया कि उनका जन्म नेपाल में हुआ। २००५ में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र संबंधित काम आदेश नाम का क्लर्क देखता था। जबकि १९९७ में इस काम को क्लर्क सुबोध देख रहा था। वर्तमान में सुबोध हरिद्वार नगर निगम के एग्री कैरेज में लिपिक पद पर कार्यरत हैं। इस पूरे प्रकरण में शक की सुई सुबोध पर आकर रुक जाती है क्योंकि केवल सुबोध के कार्यकाल की पत्रावलियां निगम के रिकॉर्ड रूम से गायब हैं। ये १९९७ के बालकूष्ण के जन्म प्रमाण पत्र से संबंधित हैं। २८ अगस्त को सीबीआई के कुछ अधिकारियों के आने की सूचना जब क्लर्क सुबोध को मिली तो वह रफ्फूचक्कर हो गया। बताया यहां तक जाता है कि सीबीआई के अधिकारियों ने सुबोध को कई बार फोन भी किया पर उसने फोन रिसीव नहीं किया। सीबीआई अंत में उसे ३१ अगस्त तक पेश होने का समय देकर चली गई। मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ ़ प्रवीण ने बताया कि सीबीआई को हमने जवाब दे दिया है। हमने कहा कि अपने स्तर पर पत्रावली ढूंढ़ी गई मगर नहीं मिली।

प्रमाण पत्र बनवाने में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के आरोप में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। मामले की जांच सीबीआई कर रही है। वर्ष २०११ में पहली बार सीबीआई की टीम ने हरिद्वार नगर निगम पहुंचकर गहन तफ्तीश की थी। लेकिन आचार्य बाकृष्ण के जन्म प्रमाण पत्र से सम्बंधित दस्तावेज की पूरी फाइल ही गायब पाई गई थी। इसके बाद सीबीआई की टीम ने तत्कालीन निगम अधिकारियों और करीब छह लिपिकों से भी पूछताछ की थी। लेकिन उसके बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया था। अब एक बार फिर मामला ठंडे बस्ते से निकलकर बाहर आया है। सीबीआई ने निगम अधिकारियों को गायब दस्तावेज उपलब्ध कराने को लेकर निर्देश दिया है।

स्वामी रामदेव का दाहिना हाथ माने जाने वाले आचार्य बालकूष्ण की नागरिकता पहले से ही संदेह के ?ksjs में है। जिसकी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट ^दि संडे पोस्ट^ ने सबसे पहले वर्ष २००६ में प्रकाशित की। उस साल के १५ जनवरी] अंक ९ में प्रकाशित खबर-^बालकूष्ण का फर्जी पासपोर्ट^ में पहली बार इसका खुलासा किया गया था। उस खबर के मुताबिक बालकूष्ण मूल रूप से नेपाली हैं। इतना ही नहीं उन्होंने फर्जी तरीके से भारतीय पासपोर्ट बनाया है। दि संडे पोस्ट की तब की पड़ताल ने यह भी उजागर किया था कि उत्तराखण्ड पुलिस की खूफिया इकाई ने अपनी परम गोपनीय रिपोर्ट में बालकूष्ण को नेपाली मानते हुए उनके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की संस्तुति की है। यहां तक कि सरकारी वकील ¼एसपीओ½ ने अपने पत्रांक संख्या-७]२००४-०५/१२१ दिनांक ५ सितंबर २००५ में बालकूष्ण को आईपीसी की धारा ४६८] ४७१ और भारतीय पासपोर्ट अधिनियम की धारा १२ का दोषी माना है। इस खबर के बावजूद तत्कालीन उत्तराखण्ड सरकार ने बालकूष्ण के विरुद्ध किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं की। 

इसके बाद ^दि संडे पोस्ट^ अपने संवाददाता को नेपाल भेजकर बालकूष्ण के जन्म स्थान की भी जांच की। बालकूष्ण के जन्म स्थान नेपाल स्थित स्यांजा पहुंचने पर यह भी साफ हो गया कि ^दि संडे पोस्ट^ की खबर सही थी। वहां बालकूष्ण का एक विशाल हवेलीनुमा मकान अपने पैतृक गांव में है जिसमें उनके माता-पिता एवं अन्य सगे-संबंधी रहते मिले। यही नहीं ^दि संडे पोस्ट^ संवाददाता बालकूष्ण के उस स्कूल तक भी गया जहां उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की थी। इस बीच संवाददाता को सरकारी भाषा में परम गोपनीय आख्या संख्या एलआईयू १६/५ दिनांक १५/०७/२००५ हाथ लगी। इस रिपोर्ट में बालकूष्ण की पैदाइश नेपाल में होने की पुष्टि के साथ उनके माओवादी होने की भी आशंका व्यक्त की गई थी। इस पड़ताल के दौरान एक और चौंकाने वाला साक्ष्य हाथ लगा। बालकूष्ण ने २५ जनवरी २००७ को एसडीएम हरिद्वार के समक्ष एक आवेदन किया कि उनको नया पासपोर्ट जारी करने के लिए एनओसी जारी करें। 

हरिद्वार के तत्कालीन एसडीएम डॉ पंकज कुमार पाण्डे ने हरिद्वार के एलआईयू इंस्पेक्टर की रिपोर्ट ¼गोपनीय एलआईयू/आईएनएसपी/ जांच ०७] दिनांक १५ नवंबर २००७½ के आधार पर यह एनओसी जारी कर दी। इसमें खास बात यह है कि एलआईयू इंस्पेक्टर ने जो रिपोर्ट एसडीएम को सौंपी वह पूरी तरह झूठी है क्योंकि अपनी इस रिपोर्ट में इंस्पेक्टर सत्यवीर सिंह ने लिखा कि श्री बालकूष्ण पुत्र श्री जयबल्लभ दिव्य योग मंदिर] कनखल हरिद्वार के निवासी हैं। श्री बालकूष्ण के विरुद्ध स्थानीय अधिसूचना इकाई हरिद्वार के अभिलेखों में कोई विपरीत लेख होना नहीं पाया गया। जबकि एलआईयू की ही पिछली एक रिपोर्ट में बालकूष्ण को नेपाली मानते हुए उनके माओवादियों के साथ संबंध होने की आशंका व्यक्त की गई थी। इसके अलावा भारतीय पासपोर्ट अधिनियम की धारा १२ तथा भारतीय दंड संहिता की धारा ४६८ और ४७१ का दोषी सरकारी वकील भी मान चुके थे। फिर भी तत्कालीन अधिकारियों ने उन्हें पासपोर्ट बनाने के लिए एनओसी जारी कर दिया। 

बालकूष्ण सिर्फ फर्जी पासपोर्ट-नागरिकता को लेकर संदेह के ?ksjs में नहीं हैं] बल्कि उनकी शिक्षा को लेकर भी भ्रम है जो उन्होंने स्वयं ही अलग-अलग दस्तावेज देकर पैदा किया है। सरकारी पत्रावली पर यकीन करें तो बालकूष्ण १९९४ से हरिद्वार के निवासी बताए गए हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा गुरुकुल कालवा] जिंद हरियाणा और संपूर्णानंद सांख्या और योग विद्यालय हाथरस से हुई है। नैच्युरोपैथी में डिप्लोमा महात्मा गांधी नैच्युरोपैथी विद्यालय से होना बताया गया है। दूसरी तरफ बालकूष्ण ने पासपोर्ट बनाने के लिए जो दस्तावेज दिए उनके अनुसार छठवीं] सातवीं और आठवीं की पढ़ाई बालकूष्ण ने गौतमनगर नई दिल्ली स्थित श्रीमद्दयानंद वेदार्ष महाविद्यालय न्यास से की है। इन्होंने अपने पासपोर्ट रिन्युअल कराने के क्रम में जो दस्तावेज सरकार को सौंपे हैं उसमें उनके इस स्कूल के प्रमाण पत्र भी हैं। विद्यालय द्वारा जारी प्रमाण पत्र में प्राचार्य ने लिखित द्घोषणा की है कि बालकूष्ण ने उनके विद्यालय में १२/०७/१९८६ को प्रवेश लिया और उनकी जन्मतिथि २५/०७/१९७२ है। प्राचार्य के मुताबिक अगली तीन कक्षाओं तक उन्होंने यहीं शिक्षा हासिल की। लेकिन जब ^दि संडे पोस्ट^ संवाददाता ने विद्यालय का रजिस्टर देखा तो उससे फर्जीवाड़े की पुष्टि हुई। रजिस्टर में बालकूष्ण का जो रिकॉर्ड दिखाया गया उसमें उनके नाम के आगे का क्रमांक गायब था। जबकि बालकूष्ण के ऊपर और नीचे वाले छात्रों का क्रमांक सहित ब्यौरा उपलब्ध था। 

ऊपर और नीचे के क्रम के अनुसार क्रमांक संख्या २९० पर ईश्वर दत्त पुत्र लालचंद्र शर्मा निवासी फतेहपुर बेरी नई दिल्ली दर्ज था। इसके अगले क्रमांक संख्या २९१ के बीच बालकूष्ण पुत्र जयबल्लभ भारद्वाज और कार्य कूषि लिखा हुआ था। जो बाद में काट दिया गया था। इस पर पता विश्व ज्ञान मंदिर कूपालु बाग मंदिर कनखल हरिद्वार दर्ज था। बालकूष्ण का यह नाम कक्षा छह में प्रवेश के लिए दर्ज था। जो रजिस्टर के बिल्कुल नीचे खाली पड़ी रहने वाली लाइनों में अंकित था। इस फर्जीवाड़े को उसकी लिखाई भी सिद्ध कर रही थी जो क्रमांक संख्या २९०- २९१ में एक जैसी ¼हल्के पेन से½ लिखी हुई थी जबकि बिना क्रमांक संख्या के बालकूष्ण का नाम दूसरे पेन से ¼गहरी स्याही से½ लिखा गया था। दो क्रमांक के बीच में बालकूष्ण का नाम होना और ऊपर-नीचे के नाम की लिखावट में इस्तेमाल पेन एवं बालकूष्ण के नाम के लिए इस्तेमाल पेन का अलग होना भी कहीं न कहीं संदेह पैदा करता है।

gunjan@thesundaypost.in

 

 

 

 
         
 
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