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vad 23 25-11-2017
 
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राजनीति
 
सरकार में आउटसाइडर

  • कृष्ण कुमार

चुनाव के समय भाजपा ने अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए दरवाजे खोलकर एक तरह से प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा बदल कर रख दी। प्रदेश में पहली बार कोई पार्टी दो तिहाई बहुमत से भी अधिक सीटें हासिल कर सत्ता में आई। लेकिन जैसी आशंकाएं राजनीतिक जानकार भाजपा के इस कदम को लेकर व्यक्त कर रहे थे वे आज सही साबित होने लगी हैं। जानकारों की आपसी अंदरद्वंदों के तेजी से उभरने की आशंकाएं सच होती प्रतीत हो रही हैं। भाजपा के पांच माह के शासन में जिस तरह से मंत्रियों को अविश्वास की नजरों से देखा जा रहा है। उनके कामकाज की फाइलें जिस कदर लटक रही हैं उससे यही जाहिर होता है कि सरकार में सब कुछ ठीक नहीं है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस से आए मंत्रियों पर भरोसा नहीं है या फिर ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है कि वे अपने कामकाज में असफल साबित हो जाएं\

सही मायनों में देखा जाये तो नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के चलते इन पांच माह में अपने को सर्वेसर्वा साबित करने तथा दूसरे को नाकाम करने की रणनीति सरकार के भीतर पनप चुकी है। जिस तरह मंत्रियों के कामकाज में हस्तक्षेप करके उन पर एक तरह का मानसिक दबाब बनाया जा रहा है। उससे उनके कामकाज और उनकी कार्यक्षमता पर प्रतिकल असर पड़ता नजर आने लगा है। सत्ता और सरकार की धुरी के तौर पर जाने जाने वाले हरक सिंह रावत की अपनी ही सरकार से नाराजगी पहली बार नहीं हुई है। यह बात और है कि कांग्रेस में रहते हरक सिंह रावत सरकार पर दबाब बनाकर अपने विभाग में खुले हाथ से काम करने के आदी रहे हैं। लेकिन मौजूदा हालत में वह बेबस नजर आ रहे हैं। उनके विभागों में काम उतनी तेजी से नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वे अपेक्षा करते रहे हैं। वन विभाग में  हरक सिंह रावत ने शुरूआती दोैर में तेजी से काम करने की परिपाटी डाली। पांच महीने के कार्यकाल में वह तेजी सुस्त पड़ चुकी है। सूत्रों की मानें तो हरक सिंह रावत के विभागों की कई फाइलें सचिवालय के चौथे माले स्थित सीएम कार्यालय में दबी पड़ी हैं। इसमें नियुक्तियों से लेकर स्थानांतरण और बजट तक की महत्वपूर्ण फाइलें हैं। जिन पर कोई काम नहीं हो पा रहा है। वन विभाग में कई ऐसे मामले भी सामने आ चुके हैं जिनमें पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय के ?kksVkys और अनियमिततायें शामिल हैं। हरक सिंह रावत इस पर कठोर कार्यवाही करने की मंशा सार्वजनिक कर चुके हैं लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया।

हरक सिंह रावत के मामले को इस बात से भी समझा जा सकता है कि वन विभाग की समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री के सामने ही प्रदेश के लीसा की बिक्री न होने के सवाल पर हरक सिंह रावत ने वन विभाग के उच्चाधिकारियों से पूछा था कि जब प्रदेश से लीसा बिक नहीं रहा है तो लीसे के कारखाने किस तरह चल रहे हैं। लीसा कोई खेतों में तो नहीं पैदा होता\ अपने ही विभाग के कैबिनेट मंत्री के इस सवाल पर न तो कोई जबाव मिलना था और न ही मिला। लेकिन इतना तो साफ हो गया कि वन विभाग में कुछ भी ठीक नहीं है।

यह सारा मामला मीडिया के सामने हुआ तो बचाव के लिए कहा गया कि इसकी विभागीय जांच करवाई जायेगी। सूत्रों की मानें तो हरक सिंह इस पर पूरी जांच करवाने और दोषियों पर कार्यवाही करने के मूड में थे। लेकिन मामले के पांच माह के बावजूद इस पर अभी तक कोई जांच के आदेश जारी हुये या नहीं] इसका कोई पता नहीं है। जांच और कार्यवाही की बात तो बहुत दूर है।

वन विभाग में स्थानांतरण को लेकर स्वीकृत फाइल पर सचिवालय के चौथे तल से कोई  स्वीकृति नहीं मिल पा रही है। बताया जा रहा है कि हरक सिंह रावत जिन अधिकारियों के स्थानांतरण की सूची स्वीकृत कर चुके हैं उनमें से कई नाम राजनीतिक रसूख के चलते अटकाए गये हैं। इसको लेकर हरक सिंह रावत की पीड़ा कई बार सामने आ चुकी है। हालांकि वह पीड़ा किसी अन्य मामले में आती है क्योंकि यह भाजपा का पार्टी अनुशासन है जिससे हरक सिंह बाहर निकलने की हिम्मत उस तरह से नहीं दिखा पा रहे हैं जिस तरह से वे कांग्रेस में दिखाने के लिए मशहूर रहे हैं।

इसी तरह से हरक सिंह के आयुष मंत्रालय के कामकाम को लेकर भी कई खबरें उड़ रही हैं। यहां भी हरक सिंह रावत को कई बार बाईपास किए जाने की खबरें सामने आई हैं। चिकित्सकों के स्थानांतरण के मामले में सीधा मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव के साथ हरक सिंह रावत की नाराजगी भी आयुष विभाग के चलते ही सामने आई है। अपने विधानसभा क्षेत्र कोटद्वार के एक चिकित्सक के स्थानांतरण को लेकर हरक सिंह ने आपत्ति दर्ज की] लेकिन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सचिव ओम प्रकाश ने सभी आपत्तियों को नकार कर चिकित्सक का स्थानांतरण कर दिया। इसका यह असर हुआ कि उक्त चिकित्सक ने स्थानांतरण स्वीकार करने के बजाए वीआरएस के लिए आवेदन कर दिया।

गौर करने वाली बात यह है कि किसी भी कार्यक्रम में हरक सिंह रावत कोई ?kks"k.kk या सहमति देते हैं तो उस पर शासन में कोई काम नहीं हो रहा है। आयुर्वेद चिकित्सकों के मानदेय और वेतन के मामले में हरक सिंह रावत ने कई वादे और दावे किए] लेकिन उन पर अभी तक कोई काम नहीं हो पाया है।

सूत्रों की मानें तो हरक सिंह रावत के खिलाफ इस तरह का वातावरण जानबूझ कर पैदा किया जा रहा है। इसका कारण यह भी माना जा रहा है कि हरक सिंह रावत किसी भी बात को सार्वजनिक तौर पर कहने से कभी गुरेज नहीं करते और जो बात उनके मन में होती है उसको कह देना उनकी आदत में शुमार रहा है। शायद इसी आदत के चलते हरक सिंह ने सरकार के एक माह के दौरान ही एक कार्यक्रम में सबसे बेहतर मुख्यमंत्री निंशक और हरीश रावत को बताने में भी कोई गुरेज नहीं किया।  

बहुगुणा सरकार के समय बहुगुणा के राजनीतिक चाणक्य के तौर पर पहचान बनाने वाले सुबोध उनियाल भी सरकार के भीतर सरकार और भाजपा के भीतर भाजपा के माहौल से दो चार हो रहे हैं। सुबोध उनियाल मंत्री बनने के बाद जिस तेजी से अपने विभाग में कामकाज करने से सुर्खियों में आये थे। वह स्थिति अब नहीं रही। कृषि] उद्यान और फल उद्योग जैसे अति महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री बनने के बाद सुबोध उनियाल ने ताबड़तोड विभागीय बैठकें करके विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक योजना बनाई जिससे राज्य में खास तौर पर पर्वतीय क्षेत्र में खेती और बागवानी के लिए राहत की उम्मीद दिखाई दी। लेकिन वह उम्मीद अब तक धरातल पर नहीं पहुंच सकी है।

सूत्रों की मानें तो उनियाल के विभागों की भी कई फाइलें शासन में दबी हुई हैं। जिसमें उद्यान विभाग को कृषि विभाग में मर्ज करवाने की बात हो या किसानों के लिए हॉर्टीकल्चर की बात हो] तकरीबन हर योजनाओं और फाइलों पर स्वीकृति नहीं मिल पाई है। सुबोध उनियाल का फोकस राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि को लाभप्रद बनाये जाने पर था जिसके चलते कई योजनाओं के प्रारूप शासन से स्वीकृत होने हैं। लेकिन उन पर कोई कार्यवाही न होने से उनियाल भी खासे नाराज हैं। शायद अपनी नाराजगी को उनियाल सीधे तौर पर नहीं कह पाए] लेकिन शासन में उच्चस्तर पर बैठे लोगों पर वे सवाल जरूर उठा चुके हैं। एक कार्यक्रम में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का निर्माण केवल हरिद्वार और उधमसिंह नगर के विकास के लिए नहीं हुआ है।

उनियाल के इस वक्तव्य से यह साफ हो गया है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सरकार औेर शासन के भीतर उपेक्षा का भाव बना हुआ है। जिसको दूर करने में सरकार का ही एक मंत्री असहाय प्रतीत हो रहा है। जबकि भाजपा चुनाव में पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को बढ़ावा देने के लिए तमाम तरह के वादे करती रही है। स्वंय आरएसएस भी सरकार को इस ओर सचेत कर चुका है। अंदरखाने से आ रही खबरों की मानें तो सुबोध उनियाल ने जिस तरह से अपने विभागों में अनियमिताओं और भ्रष्टाचार को लेकर कड़ा रुख बनाया है उससे शासन में बैठे कुछ अधिकारियों को भी परेशानी हो रही है। इसका प्रमाण तराई बीज विकास निगम के मामले के तौर पर देखा जा सकता है। इस प्रकरण में कई अधिकारियों पर कार्यवाही हो चुकी है लेकिन यह भी सत्य है पूर्व में इन अधिकारियों को बचाने के लिए सचिव कृषि ओमप्रकाश की भूमिका रही है। वर्तमान में ओमप्रकाश मुख्यमंत्री के सबसे खास और एक तरह से सर्वेसर्वा नौकरशाह हैं जिनकी तूती चौथे माले पर बोलती है। जिस तरह से सुबोध उनियाल के विभागों में चल रहा है उससे तो यह प्रतीत होता है कि जल्द ही उनके कामकाज और कार्यक्षमता पर सवाल खड़े होने लगेंगे। जानकारों के मुताबिक कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज भी सरकार के भीतर दबाव महसूस कर रहे हैं। इसकी वजह यह है कि उन्हें शुरू से ही उपेक्षित किया जा रहा है। स्थिति यह है कि इस साल जब चारधाम यात्रा का शुभारंभ हुआ तो इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के साथ विभागीय मंत्री सतपाल महाराज नहीं थे। बात सिर्फ इतनी भर नहीं थी] बल्कि सतपाल के छोर्ट भाई भोले महाराज इस कार्यक्रम बतौर अतिथि मौजूद थे। चूंकि सतपाल महाराज और उनके छोटे भाई भोले महाराज के बीच की दूरियां जगजाहिर हैं। लिहाजा कार्यक्रम में सतपाल की गैरमौजूदगी और भोले की मौजूदगी तब बड़ा मुद्दा बना था। नागरिक उड्डयन विभाग की मनमानी से खिन्न होकर महाराज को शिकायत करनी पड़ी। इस शिकायत का क्या हुआ किसी को पता नहीं। यही नहीं महाराज के समर्थक उन्हें रेल पुरुष बनाने में हर संभव कोशिश करते रहे हैं। लेकिन जब सरकार ने चारधाम के रेल संपर्क के लिए फाइनल लोकेशन सर्वेक्षण कार्यक्रम किया तो उसमें सतपाल महाराज को शिामिल करने की जरूरत महसूस नहीं की गई। यह विषय भी उस समय चर्चा में रहा था।

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समय में सितारगंज सीट पर जिस तेजी से काम होते रहे हैं उन पर अब लगाम सी लगाई जा रही है। विजय बहुगुणा के सुपुत्र सौरभ बहुगुणा अब इस सीट से विधायक हैं। सौरभ भी अपनी पीड़ा जाहिर कर चुके हैं। स्वंय विजय बहुगुणा प्रदेश भाजपा और सरकार में अपनी और अपनों की उपेक्षा से नाराज बताये जा रहे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट से उनकी मुलाकात को इसी कड़ी के तौर पर देख जा रहा है।

अब सवाल इस बात का है कि क्या वास्तव में ^सरकार के भीतर सरकार^ का वातावरण तैयार हो चुका है। मंत्रियों के कामकाज पर हस्तक्षेप भले ही सामने दिखाई नहीं दे रहा हो] लेकिन शासन स्तर से कामकाज में  हो रही देरी कई सवाल खड़े कर रही है। ठीक इसी तरह से भाजपा के भीतर भाजपा का माहौल भी बन चुका है कि ^असल भाजपा^ या ^कांग्रेस भाजपा^\ इन सवालों के उत्तर शायद ही कभी सामने आ पाएं। लेकिन यह तो साफ है कि भाजपा और भाजपा सरकार के भीतर एक अविश्वास का माहौल बन चुका है। जल्द ही इसके परिणाम सामने आने वाले हैं।

 

हरक सिंह % वन विभाग के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध पांच माह बाद भी कार्रवाई नहीं करवा सके। अधिकारियों के स्थानांतरण की फाइलों पर अमल नहीं करवा सके।

 

सुबोध उनियाल % कृषि को लाभप्रद बनाने की योजना को साकार नहीं करवा पा रहे। अपने विभागों के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई करवाने में असमर्थ।

 

सतपाल महाराज % नागरिक उड्डयन विभाग के अधिकारियों के विरुद्ध की गई शिकायत का क्या हुआ किसी को पता नहीं है। न तो यात्रा के शुभारंभ और न ही चारधाम रेल लोकेशन सर्वे कार्यक्रम में शामिल किए गए विभागीय मंत्री।

krishan.kumar@thesundaypost.in

 

 

 

 

 
         
 
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