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vad 23 25-11-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
कुछ गांधी] कुछ डरबन की
  • अपूर्व जोशी

कहावत है ^?kj का जोगी जोगड़ा] आन गली का संत^। महात्मा गांधी को लेकर तमाम प्रकार के सवाल उनके ही देश में उठाए जाते रहे हैं। खासकर इन दिनों गांधी पर प्रश्न चिन्ह लगाने का काम जोरों पर है। दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका में गांधी को बहुत आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। देश को आजादी दिलाने के संद्घर्ष में गांधी के योगदान को चाहे कोई भी कितना नकारने का प्रयास करे] सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। महात्मा कल भी प्रेरणा के स्रोत थे] आज भी हैं और आने वाले समय में भी उनके विचारों की प्रासंगिकता बनी रहेगी

 

डरबन दक्षिण अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। मुझे यहां जाने का जैसे ही प्रस्ताव आया] पहला विचार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर मन में कौंधा। गांधी को महात्मा गांधी बनाने में इस शहर का सबसे बड़ा योगदान है। उन्होंने अपनी प्रतिभा को सही अर्थों में यहीं पहचाना था। गांधीजी ने लंदन से कानून की पढ़ाई अवश्य की लेकिन उन्हें पहचान न तो लंदन और न ही मुंबई अथवा अपने गृहनगर पोरबंदर में मिली। विख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी हालिया प्रकाशित जीवनी ^बियॉन्ड द लाईन्स^ में लिखा है कि वामपंथी विचारधारा के होने के बावजूद वे मानते हैं कि मनुष्य की जीवन यात्रा में भाग्य का महत्वपूर्ण रोल होता है। मोहनदास करमचंद गांधी का डरबन आना शायद उनका वह प्रारब्ध था जिसने उनकी जीवन दिशा ही बदल दी। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि महात्मा ने अपने जीवन के लक्ष्य की पहचान दक्षिण अफ्रीका के इस शहर में ही की। गांधी जब मुंबई में अपने आपको एक वकील के तौर पर स्थापित करने के लिए संद्घर्ष कर रहे थे तभी उन्हें डरबन में रह रहे भारतीय व्यापारी दादा अब्दुल्लाह का प्रस्ताव मिला। दादा अब्दुल्लाह को एक वकील की जरूरत थी जो उनके डरबन की अदालत में उनके मुकदमे लड़ सके। इस प्रकार मोहनदास करमचंद गांधी का २४ मई १८९३ में डरबन आगमन हुआ। जब वे वहां पहुंचे थे] उन दिनों भारतीय श्रमिकों का उत्पीड़न और उनको वापस भारत खदेड़े जाने का मामला अपने चरम पर था। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में पहुंचते ही खलबली मचाने का काम किया। दादा अब्दुल्लाह के साथ वे एक अदालत में मात्र यह देखने की मंशा से पहुंचे कि वहां की अदालतों के काम करने का तरीका क्या है। जज ने गांधी से पगड़ी उतारने को कहा। गांधी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। बकौल गांधी भारत में पगड़ी उतारना अपमानजनक माना जाता है इसलिए पगड़ी उतारने के बजाय उन्होंने कोर्ट से बाहर जाना उचित माना। स्थानीय अखबार ^नटाल एड्वेट्रायजर^ ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया। गांधी को उनके आते ही इस प्रसंग के चलते भारतीय समुदाय में पहचान मिलनी शुरू हो गई। दादा अब्दुल्लाह से संबंधित एक कोर्ट केस में गांधी को कुछ समय बाद दक्षिण अफ्रीका की राजधानी प्रिटोरिया जाना पड़ा। उन्होंने ट्रेन के फर्स्ट क्लास का टिकट लिया। इस यात्रा के दौरान वह द्घटना द्घटी जिसने गांधी की राजनीतिक सोच को ही बदल दिया। ट्रेन के अंग्रेज कंडक्टर ने नस्लीय हिंसा का परिचय देते हुए गांधी को फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर जाने को कहा। उनके इंकार करने पर जबरन डरबन से कुछ दूर स्थित पीटरमेट्रिजब्रग स्टेशन पर उन्हें धक्के देकर उतार दिया गया। गांधी पूरी रात ठंड में ठिठुरते स्टेशन में ही पड़े रहे। इस द्घटना ने उनके जीवन को ही बदल दिया। उन्होंने नस्लीय भेदभाव और हिंसा के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार के खिलाफ विश्व प्रसिद्ध आंदोलन खड़ा कर दिया।

मुझे डरबन हवाई अड्डे पर उतरते ही एक अजब किस्म की सुखद अनुभूति हुई। बचपन से ही डरबन आना मेरा एक सपना था। मैं महसूसना चाहता था इस शहर की फिजा को जिसने विश्व को एक महानतम नेता और दार्शनिक दिया। महात्मा को यहां के लोग विशेष सम्मान की दृष्टि से याद करते हैं। यहां गांधीजी की आदमकद प्रतिमा पीटरमेट्रिजब्रग स्टेशन के बाहर लगाई गई है। स्टेशन के भीतर एक शिलापट्ट पर लिखा है “In the vicinity of this plaque MK Gandhi was evicted from a first-class compartment on the night of 7 June 1893. This incident changed the course of his life. He took up the fight against racial oppression. His active non-violence started from that date.”  अपने स्थानीय संपर्क से मैंने महात्मा गांधी रोड से चलने को कहा। महात्मा के सम्मान में शहर की महत्वपूर्ण प्वाइंट रोड का नाम महात्मा गांधी रोड किया गया है। यहां से मैं पुराने डरबन शहर की ग्रे स्ट्रीट पहुंचा] जहां दादा अब्दुल्लाह के अतिथि के तौर पर गांधी रहा करते थे। अब इस ग्रे रोड का नाम डॉ युसूफ दादू स्ट्रीट है। युसूफ दादू नस्ल विरोधी आंदोलन के अग्रणी नेता रहे हैं। गांधी ने इनके पिता के मुकदमों की पैरवी की थी। युसूफ दादू गांधी के पक्के अनुयायियों में से एक रहे हैं। १९४० में दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने महात्मा के सत्याग्रह आंदोलन की तर्ज पर आंदोलन किए थे। डरबन में मेरे पास मात्र एक दिन ही था। इसलिए शहर को देखने के साथ-साथ मेरा अगला पड़ाव ^ओल्ड कोर्ट हाउस म्यूजियम^ रहा। यह वही इमारत है जहां १८९३ में शहर की अदालत लगा करती थी। यहीं जज ने गांधी को अदालत के भीतर पगड़ी उतारने को कहा था। अब यह इमारत एक संग्रहालय में बदल दी गई है। यहां पहुंच निराशा हाथ लगी। संग्रहालय के रिशेप्शन में मुझे बताया गयाा कि गांधी से संबंधित सारी वस्तुएं एक नए भवन में स्थानांतरित की जा चुकी हैं। नए भवन में गांधी की स्मृति में एक बड़ा संग्रहालय बनाया जा रहा है। यह जानने पर कि मैं गांधी के देश से बड़ी उम्मीद के साथ आया हूं] वहां मौजूद एक युवक व युवती ने अपनी भाषा में कुछ देर बात करने के बाद मुझे दुमंजिले में स्थित एक कक्ष में बैठा दिया। थोड़ी ही देर में महात्मा से संबंधित ढेर सारी फाइलें मेरे सामने रख दी गईं। इन फाइलों में गांधीजी के डरबन प्रवास के दुर्लभ चित्र] उनके बारे में स्थानीय अखबारों में प्रकाशित लेख] गांधी के अफ्रीका में रह रहे परिजनों की बाबत जानकारी आदि थी। समय चूंकि कम था इसलिए मैंने फटाफट इन चित्रों और आलेखों की तस्वीर अपने मोबाइल फोन से खींच लीं। महात्मा को दक्षिण अफ्रीका में बहुत आदर की दृष्टि से याद किया जाता है। वहां गांधी के प्रति प्रेम और श्रद्धा को देख मुझे अपने देश के उन गांधी विरोधियों पर तरस आया जो महात्मा पर अनेकानेक आरोप लगाते रहते हैं। 

अब कुछ बात डरबन शहर की। दक्षिण अफ्रीका की गिनती गरीब मुल्कों में होती है। हमारे देश की तरह ही यहां एक वर्ग ऐसा है जिसके पास अकूत संपत्ति है। यह वर्ग दिनों दिन अमीर होता जा रहा है तो दूसरा एक वर्ग है जिसके पास दो जून की रोटी का भी जुगाड़ नहीं है। दक्षिण अफ्रीका में असमानता का पैमाना बहुत अधिक है। इसकी गिनती विश्व के टॉप दस उन देशों में होती है जहां आर्थिक विषमता अपने चरम पर है। इसके बावजूद डबरन शहर अपने आप में प्राकूतिक सुंदरता के साथ-साथ कुशल शहरी प्रबंधन का अद्भूत नमूना है। मैं यह देखकर दंग रह गया कि शहर इतना साफ-सुथरा] टै्रफिक इतना व्यवस्थित कि पूरे भारत में शायद एक भी शहर राजधानी दिल्ली समेत ऐसा न हो। निश्चित ही प्रकूति ने दक्षिण अफ्रीका पर विशेष कूपा की है। समुद्र के किनारे पहाड़ी पर बसे इस शहर की हरियाली] यहां का मौसम] सब कुछ अद्भूत अद्वितीय हैं। यूं मैं बहुत ज्यादा विदेश जाता नहीं हूं लेकिन जितना भी मैंने द्घूमा है] मैं कह सकता हूं दक्षिण अफ्रीका का डरबन सबसे सुंदर और कुशल प्रबंधन वाला शहर है। हालांकि व्यक्ति को आशावादी होना चाहिए लेकिन मुझे नहीं लगता स्मार्ट शहर बनने जा रहे हमारे चुनिंदा शहर डरबन जैसे बन पाएंगे। बहरहाल] दक्षिण अफ्रीका के अखबारों को खंगालने बैठा तो एक बड़ी समानता अपने मुल्क से जो मुझे लगी] वह है सरकारी स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार। लगभग सभी अखबार टेंडरों में हो रहे करोड़ों के द्घोटाले] नेलसन मंडेला की अफ्रीकन नेशनल पार्टी की सरकार के मंत्रियों के द्घोटालों] यहां तक कि राष्ट्रपति जैकब जूमा पर ही गंभीर आरोप मुझे पढ़ने को मिले। एक बड़ा आश्चर्य भारत से संबंधित समाचारों का प्रथम पृष्ठ में पाया जाना रहा। डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम से संबंधित समाचारों को दक्षिण अफ्रीकी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। वापसी में दुबई रुका था। वहां के भी समाचार पत्रों में राम रहीम छाए थे।

कुल मिलाकर डरबन जाने का सपना पूरा हुआ। शहर की सुंदरता और गांधीजी के प्रति वहां की जनता के मन में सम्मान की भावना ने यात्रा को सार्थक करने का काम किया। कहावत है ^?kj का जोगी जोगड़ा] आन गली का संत^। महात्मा गांधी को लेकर तमाम प्रकार के सवाल उनके ही देश में उठाए जाते रहे हैं। खासकर इन दिनों गांधी पर प्रश्न चिह्न लगाने का काम जोरों पर है। दूसरी तरफ दक्षिण अफ्रीका में गांधी को बहुत आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। देश को आजादी दिलाने के संद्घर्ष में गांधी के योगदान को चाहे कोई भी कितना नकारने का प्रयास करे] सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। महात्मा कल भी प्रेरणा के स्रोत थे] आज भी हैं और आने वाले समय में भी उनके विचारों की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

 

बैंगलुरू में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या वर्तमान समय का वह कड़वा सच है जो हमें लगातार चेताने का काम कर रहा है कि सच के साथ खड़े रहना और अन्याय का मुखर विरोध करना कितना खतरनाक होता जा रहा है। २०१३ में नरेंद्र दाभोलकर] २०१५ में गोविंद पनसारे] २०१५ में ही एमएम कुलबर्गी इन्टॉलरेंस के शिकार हो गए। पत्रकारों पर जानलेवा हमलों की वारदातें बढ़ रही हैं। ऐसे दौर में जरूरत लेकिन ज्यादा मुखर हो] बेखौफ अपने विचारों को सामने रखनी की है। यदि हम डर गए तो निश्चित ही हम भले जिंदा रहें] लोकतंत्र की मौत हो जाएगी। गौरी लंकेश को विनम्र श्रद्धांजलि

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केदारनाथ जैसी त्रासदियां तो कहीं भीतर तक ऐसा झकझोरती हैं कि ईश्वर के होने पर ही शंका जन्म लेने लगती है। क्या भगवान केवल अमीरों के लिए] शक्ति

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