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vad 15 30-09-2017
 
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आपका प्रबंधन
 
नाकाम रहा प्रबंधन

 

उत्तराखण्ड में कहने को तो आपदा प्रबंधन मंत्रालय है। सरकार के मंत्री और अधिकारी आपदा प्रबंधन के गुर सीखने के बहाने विदेशों के दौरे कर करोड़ों रुपए भी फूंक आते हैं। लेकिन बुरे वक्त पर आपदा प्रबंधन की पोल खुल जाती है। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि पीड़ितों को राहत के नाम पर दिए जाने वाले चैक बाउंस हो जाते हैं। क्षतिग्रस्त पुलों मार्गों भवनों और योजनाओं के पुनर्निर्माण की आड़ में सरकारी धन को ठिकाने लगाने की लूट मच जाती है

 

उत्तराखण्ड देश का पहला ऐसा राज्य है जिसका अपना अलग आपदा प्रबंधन मंत्रालय है। साथ ही यहां आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन भी किया गया है। लेकिन यह सब सिर्फ कागजों तक ही सिमट कर रह गया है। हकीकत में आपदा के समय न तो आपदा प्रबंधन का कोई काम हो पाता है और न ही आपदा से निपटने के लिए पूर्व नियोजित योजनाओं पर काम किया जाता है। इतना जरूर है कि कुछ विभागों के लिए आपदा एक वरदान के समान भी आती रही है। इसकी आड़ में उन्हें अपनी नाकामियों और भ्रष्ट कारनामों को छिपाने का मौका मिल जाता है। इसी के चलते आपदा के नाम पर वर्षों से लूट का खेल होता रहा है।

 

आपदा प्रबंधन पर यदि गौर करें तो हर वर्ष आपदा से निपटने के लिए सरकारी मशीनरी के तैयार रहने का दावा किया जाता है। हर जिले में आपदा की टीम को प्रशिक्षित करने के लिए सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम सेवन डेज सिस्टम एवं कई अन्य कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।

 

लेकिन आपदा के समय हकीकत कुछ और ही निकलती है। राज्य में सबसे अधिक मौतें पर्वतीय मार्गों में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में होती हैं। यहां विगत दस वर्षों में सैकड़ों मुसाफिर अपनी जान से हाथ धो चुके हैं। वहीं राहत और बचाव के कार्यों में सरकारी मशीनरी लकवाग्रस्त ही दिखाई दी है। वर्ष २०१२ में राज्य में दो भीषण बस दुर्घटनायें हुई हैं जिनमें बचाव के कामों में जिस तरह से आपदा प्रबंधन नाकाम दिखा उससे विभाग की हकीकत भी ख्ुाल कर सामने आई है। फरवरी २०१२ में देहरादून जिले के थानोधरकोट मार्ग पर बडेरना के समीप बारात की मारुति वैन दुर्घटनाग्रस्त जिसमें ७ व्यक्तियों की मौत हुई। उसमें भी आपदा प्रबंधन के नाम पर कुछ नहीं किया गया। रात्रि को सैकड़ों फिट गहरी खाई में गिरी मारुति वैन के मुसाफिरों को तत्काल कोई भी मदद नहीं पहुंचाई गयी। सुबह होने का इंतजार किया गया जिससे किसी को बचाया नहीं जा सका। स्थानीय निवासियों के अनुसार रात भर एक घायल गहरी खाई में तड़पता रहा और सुबह होने पर ही उसने दम तोड़ा था।

 

ऐसा ही कुछ २२ मई  २०१२ को व्यासी में हुई चारधाम यात्रा से लौट रही बस के दुर्घटनाग्रस्त के समय में भी हुआ। इससे आपदा विभाग की कलई खुल गयी। जहां पुलिस को आपदा से निपटने के लिये हर वक्त तैयार रहने का प्रशिक्षण दिये जाने की बातें होती हैं वहीं पुलिस घटना स्थल पर तत्काल पहुंचीलेकिन बिना किसी जरूरी उपकरण के। गहरी खाई से घायलों को निकालने के लिए जो भी उपकरण होते हैं वह न तो आपदा विभाग की टीम के पास थे और न ही स्थानीय पुलिस के। स्थानीय पुलिस और आपदा प्रबंधन टीम को स्थानीय लोगों का सहारा न मिलता तो न जाने कितने यात्री और मर जाते। व्यासी के पास हुई दुर्घटना के बाद लाशों को मोर्चरी मे रखा गया लेकिन इसके लिए बर्फ की व्यवस्था तक प्रशासन नहीं कर पाया। प्रशासन ने मध्य प्रदेश के इन यात्रियों के शवों को मोर्चरी में रखवा तो दिया लेकिन उनकी हिफजत के कोई इंतजाम नहीं किए गए।

 

अगस्त २०१२ में त्यूणी हनोल मार्ग में हुई बस दुर्घटना के समय भी सरकारी मशीनरी पूरी तरह लचर रही जबकि इस भीषण दुर्घटना से २७ स्थानीय मुसाफिरों की मौत हो गई और कई घायल हुए। बस दुर्घटना के स्थान से कई मीलों दूर तक आपदा प्रबंधन की टीम का वजूद ही नहीं था। किसी तरह आपदा प्रबंधन की टीम अपने साजो-समान के साथ चकराता पहुंची भी तो वहां से त्यूणी के लिये टीम को कोई वाहन तक नहीं मिल पाया और टीम वाहन का इंतजार ही करती रही। तहसील प्रशासन कई घटों की देरी से पहुंच पाया।

 

यह भी गौर करने वाली बात है कि वर्ष २०१२ में बरसात का मौसम शुरू होने से पूर्व इस क्षेत्र में प्रशासन ने आपदा से निपटने और राहत कार्यों के लिए कई बैठकों का दौर भी चलाया। जिसका समाचार पत्रों में खूब प्रचार किया गया लेकिन दुर्घटना के समय सभी बैठकों का सार यही निकला कि आपदा के नाम पर केवल बैठकों के अलावा कुछ नहीं होता है। हकीकत यही है कि आपदा के प्रबंधन के नाम पर राहत और बचाव कार्यों के उपकरणों का कहीं अता-पता ही नहीं था।

 

राज्य सरकार की संवेदनहीनता और प्रशासन की लापरवाही की हद यह है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा उत्तराखण्ड सरकार को जनवरी २०१२ में ही आपदा से निपटने के उपकरण खरीदने को कहा गया था। जिससे माह जून से सितम्बर में होने वाली बरसात के दिनों में भूस्खलन और बाढ़ से बचाव के लिए सभी सुविधाएं मिल सकें लेकिन सरकार ने समय पर कोई उपकरण खरीदने का प्रयास तक नहीं किया। सितंबर माह में जब बरसात का मौसम समाप्त हो जाता है तब शासन ने सभी जिलों में आपदा से निपटने के लिए तीस लाख के उपकरणों को खरीदने के आदेश जिलाधिकारियों को दिये।

 

वर्ष २०१२ में उत्तरकाशी और ऊखीमठ में आई आपदा ने तो सरकार और प्रशासन के सभी दावों की हकीकत समाने रख दी। कई दिनों तक आपदा प्रबंधन और बचाव टीम गांवों तक नहीं पहुंच पाई। जिससे ७० गांवों के ३५ हजार से भी अधिक कीे आबादी को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया। जहां सरकार ने राहत के कामों में तेजी दिखाई तो वहां भी राहत के नाम पर केवल दिखावा किया गया। हालात इस कदर बन चुके थे कि राहत शिविरों में खाना और पानी तक मुहैया नहीं करवाया जा सका। बादल फटने के तीन दिन तक सरकार राहत और बचाव के कामों को पूरा नहीं कर पाई। जिससे स्थानीय लोगों ने ही एक- दूसरे की मदद करके बचाव कार्य किया। सरकारी अमला हैलीकाप्टर से राहत सामग्री का वितरण करने में लगी रहा लेकिन मौसम के खराब होने के चलते हैलीकॉप्टर उड़ान ही नहीं भर सका। जिससे पांच दिनों तक राहत सामग्री आपदा प्रभावितों तक नहीं पहुंचाई जा सकी।

 

ऊखीमठ में बादल फटने के बाद राहत और बचाव कामों में जिस तरह की ढिलाई बरती गई और प्रशासन की संवेदनहीनता सामने आई उससे नहीं लगता कि सरकार की कोई पूर्व तैयारी रही होगी। इस क्षेत्र में कई बार भीषण आपदायें आ चुकी हैं। पूर्व की घटनाओं की बात करें तो ऊखीमठ की मनसूना घाटी के उनियाणा गांव में ११ अगस्त १९९८ को भारी बरसात से भूस्खलन हुआ जिसमें तकरीबन ७० लोग मारे गये। इसमें कुछ दिन के बाद १८ अगस्त को फिर इसी गांव और घाटी में दोबारा भूस्खलन हुआ जिसमें ४० लोग मारे गये। इसके अलावा १९४५में मदमहेश्वर घाटी में बड़ा भूस्खलन हुआ जिसमें चार लोग मारे गये और कई गांव पूरी तरह तबाह हो गये थे। इसके बाद १९६२ में भी इसी मदमेश्वर घाटी में नदी पर भूस्खलन से झील बनने के कारण भीषण तबाही हुई थी। १९७९ में मंदाकिनी नदी घाटी में कौंथा गांव पूरी तरह तबाह हुआ और तकरीबन ५० लोग मारे गए। १६ अगस्त १९९१ में चमोली जिले के देवाल घाटी में बादल फटने की घटना हुई और इसमें २९ लोगों सहित दो दर्जन से भी अधिक पशु मारे गये।

 

इतने बड़े पैमाने पर प्राकूतिक आपदाओं से यह क्षेत्र जूझता रहा है। बावजूद इसके सरकार और प्रशासन ने इससे निपटने की कभी कोई पूर्व नियोजित योजना नहीं बनाई। जब आपदा आ जाती है तब ही प्रशासन सक्रिय होता है। लेकिन नाकाम ही साबित होता रहा है। इसके अलावा चारधाम यात्रा जो कि उत्तराखण्ड की आर्थिक रीढ़ मानी जाती है के समय में भी आपदा प्रबंधन नाकाम साबित हुआ है। वर्ष २०१२ में यात्रा के आरंभ होने के केवल एक माह में ही १७ तीर्थ यात्रियों की अत्याधिक ठंड लगने के कारण हदय गति रुकने से मौत हुई है। मरने वाले सभी तीर्थयात्री थे। लेकिन प्रशासन ने बचाव के कोई प्रयास नहीं किए और न ही तीर्थयात्रियों का स्वास्थ्य प्रशिक्षण किया गया। जबकि प्रशासन ऐसे तीर्थ यात्रियों को यात्रा पर जाने से रोक सकता था। उनके लिये ऑक्सीजन दवाओं आदि की व्यवस्था कर सकता था। हालात इस कदर बदतर हो चुके थे कि एक माह की शुरुआती यात्रा में सभी प्रकार की दुर्घटनाओं में चाहे रोड एक्सीडेंट हो या अत्याधिक ठंड लगने से या फिर हार्ट अटैक से ६० लोगों की मौतें हुई।

 

एक के बाद एक लगातार १७ तीर्थयात्रियों की अत्याधिक ठंड लगने और हार्ट अटैक से मौतें होती रही लेकिन राज्य का स्वास्थ्य विभाग सोता रहा। गौर करने वाली बात यह है कि आपदा प्रबंधन में स्वास्थ्य विभाग एक बड़ा महत्वपूर्ण विभाग माना जाता है बावजूद इसके यात्रा मार्गों पर चिकित्सकों की तैनाती तक सरकार नहीं करवा पाई और न ही यात्रियों के लिए तत्काल चिकित्सा सुविधाएं जुटा पाई। ऋषिकेश के शांति प्रपन्न शर्मा राजकीय चिकित्सालय ऋषिकेश के लिए २०१० में कुम्भ मेले के चलते ट्रॉमा सेंटर केन्द्र सरकार के द्वारा दे दिया गया। ४३ लाख ६६ हजार की लागत से इसकी स्थापना की गयी। लेकिन इसमें चिकित्सक और एक भी तकनीशियन की राज्य सरकार नियुक्ति नहीं कर पाई जिसके चलते इस ट्रॉमा सेंटर में कोई भी मरीज उपचार नहीं पा सका। वेंटीलेटर राष्ट्रमंडल खेलों के लिये यहां से दिल्ली वापस ले जाये गये और तब से इसमें कोई वेंटीलेटर तक नहीं है। आज भी उक्त ट्रॉमा सेंटर बगैर किसी चिकित्सक और स्टाफ के एक इमारत भर रह गया है। कैग ने अपनी २०१० की रिपोर्ट में आपदा प्रबंधन के लिये जरूरी ट्रॉमा सेंटर की स्थापना पर भी सवाल खड़े किये हैं। कैग के अनुसार राज्य सरकार आपदा से निपटने के लिए बेहद जरूरी ट्रॅामा सेंटरों के प्रति लापरवाह और नाकाम रही है। 

 

इसके अलावा इन १२ वर्षों में आपदा प्रबंधन के बाद पुनर्वास मामले में भी राज्य की अब तक की लगभग सभी सरकारें नाकाम रही हैं। सैकड़ों ऐसे गांव हैं जिन पर समय-समय पर भारी आपदायें बरपी हैं और कई ऐसे गांव भी हैं जहां मानव जीवन खतरनाक जोन में है। ऐसे गांवों के पुनर्वास और विस्थापन के मामले में भी सरकारें ठोस प्रयास नहीं कर पाई हैं। राज्य सरकार अपनी नाकामी का ठीकरा वन विभाग और केंद सरकार के ऊपर फोड़ती रही है लेकिन हकीकत यह भी है कि राज्य सरकार से इस संबंध में केंद्र को कोई भेजे भी प्रस्ताव ही नहीं गये हैं।

 

 प्रदेश के महालेखाकार सीएजी ने भी सरकार के आपदा प्रबंधन पर उंगलियां उठाई हैं। २०१० की रिपोर्ट में कैग ने अपनी जांच में पाया है भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा किये गये सर्वेक्षण (जून २००८) के आधार पर उत्तराखण्ड सरकार केवल १०० गावों को जिसमें ३०३९ परिवारों के १५३७२ लोग शामिल थे चिह्नित कर सकी। चयनित पांच जिलों के ८० गावों के १०११० लोगों जो कि १९७६ परिवारों के थे के पुनर्वास के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने कोई भी कदम नहीं उठाये। बावजूद इसके चिह्नीकरण के दो वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। 

 

पुनर्वास के मामले में सीएजी ने छह गांवों का अध्ययन किया है जिसमें सरकार ने पुनर्वास के अलावा आपदा से निपटने के उपायों को भी पूरा नहीं किया है। इसमें पिथौरागढ़ के बरम व मल्ला सैंण और लॉ-झेकला गांव चमोली जिले के गडोरा व अमरपुर गांवों में सरकार आपदा से निपटने के उपायों को पूरा नहीं कर पाई जबकि इन गांवों में भारी आपदा से २६ लोगों की मौतें हुई हैं और रहने के मकान आदि बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए थे। अध्ययन और निरीक्षण में सीएजी ने पाया कि इन सभी गांवों में आपदा से निपटने के लिए कोई उपाय नहीं किए गए।

 

कैग ने राज्य में चल रहे आपदा प्रबंधन पर कई सवाल खड़े किये थे। अक्टूबर २००७ में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन तो कर लिया गया था। लेकिन यह भी हैरत की बात है कि इस प्राधिकरण की आज तक केवल एक बैठक जनवरी २००९ में ही की गयी। नौवें वित्त आयोग ने उत्तराखण्ड में आपदा से निपटने के लिये ४९९ करोड़ ४३ लाख की भारी भरकम धनराशि प्रदान की थी। सीएजी के अनुसार यह धनराशि सही तरीके से खर्च नहीं की गयी।

 

शेष भाग आगे..

 
         
 
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