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शिक्षा
 
भारी बजट] बदहाल शिक्षा

  • दिनेश पंत

राज्य गठन के समय शिक्षा पर जो छह अरब रुपया खर्च हो रहा था वह आज दस गुना बढ़कर ६१ अरब रुपए जा पहुंचा है। इसके बावजूद प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक शिक्षा का बहुत ही बुरा हाल है। इससे तंग आकर ६८ हजार बच्चे सरकारी स्कूलों को छोड़ चुके हैं। सत्ता में बैठे राजनेताओं ने वोट बैंक के लिए स्कूलों का धड़ाधड़ उच्चीकरण तो किया लेकिन उन्हें यह देखने की फुर्सत नहीं रही कि प्राथमिक से लेकर माध्यमिक स्तर के स्कूलों में शिक्षकों के सैकड़ों पद रिक्त हैं। उच्च शिक्षा का हाल यह है कि ४७ डिग्री कॉलेजों के पास अपने भवन नहीं हैं। ४० कॉलेजों में प्राचार्य नहीं हैं। कई कॉलेजों में यूजीसी के मानकों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं

 

उत्तराखण्ड में सरकारी शिक्षा की बदहाली रोकना प्रदेश सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। पूर्व में कई बार अदालतें भी सरकारी शिक्षा की बदहाली के लिए प्रदेश सरकार को पफटकार लगा चुकी हैं। शिक्षा की बिगड़ती सेहत दुरुस्त करने के लिए ज्यों-ज्यों दवा की जा रही है वैसे-वैसे मर्ज बढ़ता चला जा रहा है। राज्य बनने के समय शिक्षा पर होने वाला खर्च जहां ६ ़७४ अरब रुपए था जो अब बढ़कर ६१ अरब पहुंच चुका है। इसके बावजूद प्राथमिक स्तर पर बच्चों की संख्या बढ़ने के बजाय द्घटती जा रही है। राज्य के ६८ हजार से भी अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों से तौबा कर चुके हैं। निजी स्कूलों में दाखिले को लेकर मारामारी हो रही है। शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति यह है कि एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की रिपोर्ट कहती है कि ४२ प्रतिशत बच्चे शब्द तक ठीक से नहीं पढ़ पाते। वहीं छठी से लेकर आठवीं तक के बच्चे गणित की समझ नहीं रख पा रहे हैं। २०१६ में प्रकाशित 'असर' की रिपोर्ट कहती है कि १४ प्रतिशत स्कूलों में पानी नहीं है। १३ ़७ प्रतिशत स्कूलों में नल तो लगे हैं] लेकिन उनमें पानी नहीं आता। २ ़८ प्रतिशत स्कूलों में शौचालय की सुविध नहीं है। २२ ़४ प्रतिशत शौचालय प्रयोग करने योग्य नहीं हैं। १७ ़४ स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग से शौचालय नहीं हैं। १० प्रतिशत स्कूलों के शौचालयों में ताला लगा हुआ है। ११ ़४ प्रतिशत छात्राओं के लिए बने शौचालय प्रयोग करने लायक नहीं हैं। तमाम विद्यालय एकल शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। 

प्रदेश में जिस रफ्तार से नए विद्यालय खोले जा रहे हैं उससे अधिक रफ्तार से स्कूल बंद हो रहे हैं। बिजली] पेयजल] सांइस लेबोरेट्री] लाइब्रेरी] कंप्यूटर कक्ष] खेल का मैदान] कक्षा कक्ष जैसे आधारभूत ढांचे लगातार जर्जर होते जा रहे हैं।  सरकार शिक्षा महकमे पर जमकर दौलत लुटा रही है] लेकिन विद्यालयों में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। छात्र संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। उच्च प्राथमिक स्तर पर ६८ हजार बच्चे कम हो गए हैं। अगर स्कूल खोलने की दर देखें तो बीते १६ साल में १४३३ प्राथमिक] ४९९ उच्च प्राथमिक] २००० से अधिक सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय प्रदेश सरकारें खोल चुकी हैं। अवस्थापना विकास की स्थिति यह है कि ५६ प्रतिशत लड़कियों के लिए शौचालय नहीं हैं। सुरक्षा की दृष्टि से ५४ प्रतिशत विद्यालयों में चाहारदीवारी नहीं हैं। ३२ प्रतिशत विद्यालय खेल मैदानों से वंचित हैं। चार हजार से अध्कि प्राथमिक विद्यालयों में बिजली नहीं है। सात हजार विद्यालयों में पानी की व्यवस्था नहीं है। २०० माध्यमिक विद्यालय पेयजल एवं २७७ बिजली से वंचित हैं। सात हजार से ज्यादा प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में खेल के मैदान नहीं हैं। ९५ प्रतिशत प्राथमिक] ४३ प्रतिशत उच्च प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों ने कंप्यूटर नहीं देखा है। ४८ प्रतिशत विद्यालयों में विज्ञान प्रयोगशालाएं नहीं हैं। ५५ प्रतिशत विद्यालयों में खेल मैदान नहीं है। १४ प्रतिशत स्कूलों में कक्षा कक्ष की कमी है। बिजली विहीन स्कूलों की स्थिति देखें तो १७८७ विद्यालयों में अभी तक बिजली नहीं पहुंच पाई है। 

देहरादून में ४७] उत्तरकाशी ५७] टिहरी में २०] चमोली में ८०२] नैनीताल में २२४] पिथौरागढ़ में ४०४] चंपावत में १६३ प्राथमिक विद्यालयों में बिजली नहीं है। पहाड़ के माध्यमिक विद्यालयों में भी संसाधनों का द्घोर अभाव है। वोट बैंक की खातिर विद्यालयों का उच्चीकरण तो किया गया लेकिन व्यवस्था नहीं बनाई गई। छात्र-संख्या लगातार द्घटती जा रही है। प्रदेश में २०५९० प्राथमिक स्कूल हैं जिनमें १४६२१७५ बच्चे नामांकित हैं। प्राथमिक स्कूलों में ४६५४५ पद सृजित हैं लेकिन तैनाती  ३३९२८ में ही है। प्राथमिक विद्यालयों में १२६१७ पद रिक्त चल रहे हैं। यही हाल ३४३९ माध्यमिक विद्यालयों का भी है। यहां ४६२२१ पद सृजित हैं] लेकिन तैनाती ३१३३० में ही है जबकि १४८५१ पद रिक्त चल रहे हैं। यही स्थिति आधरभूत ढांचें की भी है।

अकेले कुमाऊं में ९०० स्कूल बंद होने जा रहे हैं।  जिसमें अल्मोड़ा में २८७] बागेश्वर में ६३] चंपावत में ६६] नैनीताल में १०६] पिथ्ाौरागढ़ में ३७०] यूएसनगर में ०६ शामिल हैं। वर्तमान में अकेले कुमाऊं मंडल में शून्य छात्र संख्या की वजह से १५५ प्राथमिक एवं ११ उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पहले ही ताला लटका है। कुमाऊं में ८१६ प्राथमिक एवं ८२ उच्च प्राथमिक स्कूलों में छात्रों की संख्या १० से कम है। अब ९०० सरकारी स्कूलों में गाज गिरने जा रही है। अब प्रदेश सरकार दस से कम छात्रा संख्या वाले स्कूलों को बंद कर हर ब्लॉक में आवासीय विद्यालय खोलने जा रही है। प्रदेश के शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डे का कहना है कि इसके लिए सभी शिक्षा अधिकारियों को सर्वेक्षण करने के निर्देश दे दिए हैं। वह कहते हैं विकासखंड स्तर पर आवासीय माडल स्कूल विकसित करने की भी पहल की जा रही हैं कम छात्रा संख्या वाले विद्यालयों को सरकार आवासीय विद्यालयों में समायोजित करेगी।  

 उच्च शिक्षा का हाल भी ठीक नहीं है। प्रदेश सरकार हर ब्लॉक में डिग्री कॉलेज खोलने की ?kks"k.kk तो कर रही है। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि प्रदेश के २१ विकासखंडों में एक भी कॉलेज नहीं है जबकि कई विकासखंड ऐसे हैं जहां पर कई-कई कालेज हैं। इसके लिए सरकार की नजर उन कॉलेजों पर है जहां १०० से कम छात्र हैं। इन कालेजों को बंद कर नजदीकी कालेजों में समायोजित करने की योजना बनाई जा रही है। पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार ने २२ नए डिग्री कालेज खोलने की ?kks"k.kk अपने शासन काल में थी लेकिन त्रिवेन्द्र सरकार का कहना है कि कालेजों की अधिक संख्या के चलते इनके संचालन में सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। बेहतर शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। सरकार शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए उच्च शिक्षा आयोग का गठन करने भी जा रही है। प्रदेश सरकार का जोर शैक्षणिक माहौल सुधारने के लिए न्यूनतम १८० दिन शिक्षण] नशामुक्त कालेज परिसर] छात्रों के लिए यूनिफार्म] वंदेमातरम व राष्ट्रगान का गायन] छात्रा संद्घ चुनाव] फीस ढांचा] संस्थान की समस्याएं] राष्ट्रवाद की भावना] लिंगदोह समिति की सिफारिशें] शैक्षिक माहौल बेहतर करने पर है। लेकिन हालत इतने जटिल हैं कि यह बयानबाजी से नहीं सुधरने वाले हैं। 

प्रदेश में १०० राजकीय एवं १७ अशासकीय कालेज हैं] इनमें ११५००० छात्र-छात्राएं पंजीकूत हैं। इसके अलावा ४६ डिग्री कालेज कुमाऊं एवं ५२ डिग्री कालेज गढ़वाल में हैं। इनमें १९५० शिक्षकों के पद सृजित हैं। लेकिन १५०० शिक्षक ही कार्यरत हैं। ४५० शिक्षकों के पद रिक्त चल रहे हैं। १९ कालेजों के पास अपनी भूमि नहीं है। ४७ कालेजों के पास अपने भवन नहीं हैं। २ कालेज किराए के भवनों पर चल रहे हैं। कई महाविद्यालय प्राथमिक विद्यालयों में चल रहे हैं। राजनीति किस कदर हावी हुई इसको देखना हो तो समझा जा सकता है। राज्य गठन के समय ३६ कॉलेज थे जो आज ११० पर पहुंच चुके हैं। १०१ डिग्री कॉलेज अस्तित्व में आ चुके हैं। राज्य के ४० डिग्री कॉलेजों के पास स्थाई प्राचार्य नहीं हैं। विषय के अनुकूल तैनाती नहीं है। यूजीसी के नियम यहां काम नहीं करते। कहने को सैमेस्टर सिस्टम है लेकिन मूल्याकंन करने की कोई व्यवस्था नहीं है। गरुड़ के डिग्री कालेज प्राथमिक स्कूल में तो कांडा का गोदाम में चल रहा है। पूरे कुमाऊं के करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी किराए के भवनों में शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। ३८ ़३ प्रतिशत राजकीय महाविद्यालयों में] २७ ़५ फीसदी सहायता प्राप्त महाविद्यालयों में] ५० प्रतिशत विश्वविद्यालयों में पद रिक्त चल रहे हैं। चार साल पहले हल्द्वानी] काशीपुर] खटीमा] पिथौरागढ़] कोटद्वार को ऑटोनोमस किया जाना था इसके प्रस्ताव यूजीसी में लटके पड़े हैं। सुदूरवर्ती महाविद्यालय पिथौरागढ़ में सब रजिस्ट्रार कार्यालय खोलने की मांग लंबे समय से चल रही है। इसके पीछे तर्क दिया जाता रहा है कि जनपद के दुर्गम क्षेत्रों में स्थित छात्र-छात्राओं को अंकतालिकाओं] डिग्री] आव्रजन प्रमाण पत्र में त्रुटियों के लिए दूर की यात्रा करनी पड़ती है जिससे छात्रों के समय के साथ आर्थिक नुकसान भी होता है। लेकिन विश्वविद्यालय व शासन स्तर पर इन समस्याओं को सुनने वाला कोई नहीं है। इसके अलावा कक्षा कक्षों की संख्या का कम होना] समय पर प्रवेश परीक्षा पूरी न होना] मानक से अधिक विद्यार्थी] शिक्षकों की अन्य कामों में व्यस्तता प्रदेश की उच्च शिक्षा की बदहाल तस्वीर बनाती है। यही हाल प्रदेश के तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों का भी है। ये संस्थान उधर के बायोडाटा के भरोसे देश का भविष्य तराश रहे हैं। निरीक्षण के समय दिखाए जाने वाले शिक्षक व एआइसीटीई को दिए जाने वाले शिक्षकों के बायोडाटा में हकीकत में धरती आसमान का अंतर होता है। स्थिति यह है कि मान्यता मिलते ही संस्थान में शिक्षकों की नई कतार नजर आ जाती है।

 अधिकतर संस्थान शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में यूजीसी व एआइसीटीई के मानकों की अवहेलना कर रहे हैं। कागजों पर मानक पूरे हैं लेकिन संस्थान की हालत दूसरी है। इन संस्थानों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की गुणवत्ता व योग्यता शक के दायरे में रही है। ऐसी स्थिति में ३५ हजार से अधिक विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। इन संस्थानों में मानकों के अनुरूप योग्य शिक्षक नहीं पढ़ा रहे हैं। ये संस्थान फर्जीवाड़े का नया इतिहास रच रहे हैं। कारण भले ही योग्यताधरी शिक्षकों की कमी हो या फिर निजी संस्थानों में काम नहीं करने की इच्छा या लंबे समय तक टिक न पाने की समस्या] लेकिन स्थितियां यूजीसी के मानकों की ध्ज्जियां उड़ा रही हैं। 

यूजीसी के मानक कहते हैं कि हर संस्थान के प्रत्येक विभाग में एक प्रोफेसर] एक एसोसिएट प्रोफेसर एवं पांच असिस्टेंट प्रोफेसर होने चाहिए। स्नातक व स्नातकोत्तर विषयों में २५ छात्रों में एक शिक्षक होना चाहिए। असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति को नेट या संबंधित विषय पर पीएचडी अनिवार्य होनी चाहिए। 

वैकल्पिक नियुक्ति के लिए पीजी में ५५ प्रतिशत एवं कम से कम दो वर्ष का अनुभव होना चाहिए। तकनीकी और व्यावसायिक विषयों में प्रत्येक १५ छात्रों पर एक शिक्षक की नियुक्ति होनी चाहिए। लेकिन राज्य के निजी शिक्षण संस्थानों में गैर अनुभवी व गैर योग्यताधरी शिक्षकों की नियुक्ति हो रही है। नए खुले स्कूलों में फैकल्टी] संसाधनों का अभाव है। द्वाराहाट एवं पिथौरागढ़ के इंजीनियरिंग कॉलेज में ५० प्रतिशत फैकल्टी नहीं हैं।

 
         
 
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