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vad 18 21-10-2017
 
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सामयिक
 
नदी ऊपर पुल नहीं

  • गुंजन कुमार

उत्तराखण्ड में चार साल पहले आई विनाशकारी आपदा में बहे पुल अब तक नहीं बन पाए हैं। लोग ट्रॉलियों और कच्चे पुलों के जरिए उफनती नदियों को पार कर रहे हैं। dsnkj?kkVh में ट्रॉलियों से गिरकर लोगों की जानें जा रही हैं। अब तक कई लोग इनसे गिरकर जान गंवा चुके हैं 

 

dsnkj?kkVh के ग्रामीणों का दर्द असहनीय है। हम उनके ?kko तो नहीं भर सकते लेकिन उन पर मरहम लगाकर उनका दर्द थोड़ा कम जरूर कर सकते हैं। हमने सरकार से बात की है। सरकार और प्रशासन ने हमें आश्वासन दिया है कि इस साल के अंत तक तीन महत्वपूर्ण झूला पुलों का निर्माण हो जाएगा। यदि आश्वासन पर काम नहीं होता तो आगे हम शांत नहीं रहेंगे। ?kkVh के लोगों के साथ खड़े रहेंगे।

मनोज रावत] विधायक केदानाथ

 

वह बहुत ही दुखद ?kVuk थी। प्रशासन कुछ स्थानों पर झूलापुल का निर्माण करवा रहा है। स्थानीय लोगों के जीवन को सरल बनाने में हम पूरी तत्परता से जुटे हुए हैं।

मंगेश f?fYM;ky] जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग

 

केदारनाथ में चार साल पहले आई आपदा आज भी नासूर बनकर स्थानीय लोगों को तकलीफ दे रही है। उस आपदा में मंदाकिनी नदी ने भयंकर तबाही मचाई। बादलों का फटना बहुत भारी पड़ा। रामबाड़ा सहित कई गांवों का अस्तित्व मिट गया। आपदा ने जो गहरे जख्म दिए वे अब तक नहीं भर पाए हैं] उल्टे समय-समय पर हरे हो जाते हैं। अभी जुलाई महीने के अंतिम दिन फाटा के पास ट्रॉली से नदी पार कर रही एक लड़की मंदाकिनी नदी में गिर गई। कई दिनों तक उसका शव नहीं मिल पाया। आपदा के पहले यहां झूला पुल था जो आपदा में बह गया। समस्या अकेले फाटा की नहीं है] बल्कि चार साल से पूरी ?kkVh के हजारों लोग कच्चे पुलों] ट्रॉली आदि से नदी पार कर रहे हैं। इस दौरान थोड़ी सी चूक उन्हें मौत के मुंह में धकेल देती है। 

सोलह जून २०१३ की आपदा से पहले dsnkj?kkVh के गांवों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए मंदाकिनी नदी पर दर्जन भर से ज्यादा झूला पुल थे। एक तरह से कहा जाए तो  झूला पुल पहाड़ी लोगों की ^लाइफ लाईन^ थे। आपदा के बाद की सरकारें केदार ?kkVh की इस लाइफ लाईन को फिर से जीवित नहीं कर पाईं। यही कारण है कि क्षेत्र के लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं।

केदारनाथ आपदा में अपना सब कुछ गंवाने के बाद भी लोग आज बेमौत मरने को मजबूर हैं। ताजा मामला ३१ जुलाई का है। फाटा के पास रैल गांव की २१ वर्षीय रेशमा ट्रॉली से मन्दाकिनी नदी पार करते समय उफनती नदी में जा गिरी। dsnkj?kkVh में ट्रॉली से नदी में गिरने की यह कोई पहली ?kVuk नहीं है। आपदा के बाद से अब तक इस तरह कई मौतें हो चुकी हैं। इसके बाद भी सरकार ने dsnkj?kkVh के लोगों की सुध नहीं ली। रेशमा फाटा बाजार में  सिलाई सीखती थी। ३१ जुलाई को भी वह रोज की तरह सिलाई सीखकर गांव लौट रही थी। उसके  साथ उसकी  दो सहेलियां ममता और पूनम भी थीं। बताया जा रहा है कि तीनों ट्राली में बैठीं और ट्रॉली कुछ दूर गई ही थीं कि रेशमा को चक्कर आने लगा। जब तक उसकी सहेली उसे पकड़ती तब तक रेशमा ट्राली से नदी में गिर गई। 

आंखों के सामने सहेली को नदी में गिरते देख दोनों  सहेलियों की चीख पुकार मच गई। रोती बिलखती दोनों युवतियों ने जैसे-तैसे गांव पहुंचकर ?kVuk की जानकारी दी। इसके बाद पूरा गांव नदी किनारे पहुंचा और खोजबीन करता रहा। दो दिनों तक प्रशासन और परिवार के लोग रेशमा के शव को खोजते रहे] मगर मिला नहीं। इस पर गांव वालों का कहना है कि अगर सरकार ने आपदा में बहे पुल को बनवा दिया होता तो रेशमा के साथ यह हादसा नहीं होता। एक ही दिन में ?kkVh में दो बड़े हादसे हुए। रेशमा की मौत के अलावा बरसाती गदेरे में बहने से एक आठ वर्षीय बच्चे की मौत हो गई। कोटि बड़मा निवासी आठ वर्षीय अजय अपनी मां गुड्डी देवी के साथ स्कूल से द्घर आ रहा था। रामगंगा गदेरे को पार करते समय अजय का हाथ छूट गया। जिससे अजय अपनी मां की आंखों के सामने गदेरे में बह गया।

रैल गांव के ग्रामीण चार साल से पुल निर्माण की मांग प्रशासन और सरकार से करते आ रहे हैं। पिछले महीने ही ग्रामीणों ने ट्रॉली के स्थान पर शासन से पक्के पुल के निर्माण की मांग की थी। स्वीकृति मिलने के बाद बहे पुल के स्थान पर दोनों तरफ लोनिवि ने पिलर भी खड़े किए] लेकिन पुल का निर्माण अभी तक नहीं हो सका। वर्तमान में ग्रामीण एनजीओ के सहयोग से लगाई गई एक छोटी ट्रॉली के माध्यम से जान जोखिम में डालकर आवाजाही करने को मजबूर हैं। रैल गांव निवासी बृजमोहन और सरिता देवी कहते हैं कि नदी का जल स्तर बढ़ने के बाद से ग्रामीण ट्रॉली से जान जोखिम में डाल कर आवाजाही करने को मजबूर हैं। स्कूल जाने वाले छात्रों को विद्यालय में आने-जाने में सबसे ज्यादा परेशानी होती है।

पिछले महीने ही विजयनगर के समीप भी मंदाकिनी नदी पार करते समय एक व्यक्ति ट्रॉली में फंस गया था। चंद्रापुरी गांव के पंकज जोशी अपने बीमार बेटे की दवा लेने जा रहे थे। पंकज 

मंदाकिनी को पार करने के लिए ट्रॉली में चढ़े। ट्रॉली कुछ आगे गई ही थी कि उसका एक तार टूट गया। पंकज भाग्यशाली रहे कि वह पांच द्घंटे तक मंदाकिनी के बीचोंबीच ट्रॉली में फंसे रहे] पर उन्हें कुछ नहीं हुआ। लेकिन पंकज जैसे सब भाग्यशाली नहीं थे। बीते वर्ष २७ जुलाई को चंद्रापुरी में एक युवक ट्राली से गिरकर मंदाकिनी नदी में बह गया था। ६ सितंबर को विजयनगर में स्कूल से द्घर आते समय ३ साल की प्राची ट्राली से नदी में गिर गई थी। इसके अलावा बीते चार वर्षों में २० से अधिक लोग ट्राली से जख्मी हो चुके हैं] जिनमें एक बच्चे का हाथ कंधे से ही कट गया था। बावजूद इसके आज तक प्रभावित स्थानों पर पुल नहीं बन पाए हैं। 

उत्तराखण्ड की dsnkj?kkVh १६ जून २०१३ को दैवीय आपदा से पूरी तरह तबाह हो गई थी। कई माताओं की गोद सूनी हो गई थी तो कई सुहागिनों का सिंदूर उजड़ गया था। कई बच्चों के ऊपर से मां-बाप का साया ही उठ गया था। यह आपदा ऐसे जख्म दे गई थी जिन्हें जीवनभर नहीं भरा जा सकता है। dsnkj?kkVh का गौरीकुंड] रामबाड़ा] द्घिनुर] बडासू] भणिग्राम] लमगौंडी] देवली जैसे दर्जनों गांव चार साल पहले आई दैवीय आपदा की कहानी आज भी बयां कर रहे हैं। बडासू गांव के दो दर्जन बच्चों को केदारनाथ हादसा लील गया था। भणिग्राम की चार दर्जन से ज्यादा महिलाएं विधवा हो गई थीं। रामबाड़ा का तो नामो निशां ही मिट गया।

आपदा के बाद राहत एवं बचाव कार्य सेना की मदद से हुआ। उसके बाद राज्य सरकार ने मुआवजा राशि बांटी। सरकार का पूरा फोकस केदारनाथ के पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय राजमार्ग को बनाने तक सीमित रहा। प्रभावित गांवों का पुनर्वास से लेकर पुलों का निर्माण आज भी अधर में है। आपदा के चार साल बाद भी प्रभावित गांवों में कोई खास सुधार नहीं आया है। उस वक्त बहे कई पुल तथा सड़कें आज भी नहीं बनी हैं। कई गांवों में आवागमन के लिए गांववालों ने लकड़ी के फट्टों से कामचलाऊ पुुल बना रखे हैं। मंदाकिनी नदी ने तब रामबाड़ा समेत कई गांवों का अस्तित्व ही मिटा दिया था। मंदाकिनी नदी पर दो दर्जन से ज्यादा गांवों में संपर्क के लिए कई जगहों पर झूला पुल बने हुए थे। ये अब तक नहीं बन पाए हैं।

केदारनाथ आपदा में गौरी कुंड का बहुत बड़ा हिस्सा तबाह हो गया था। सोनप्रयाग का तो नक्शा ही बदल गया था। यहां आपदा के दो साल बाद राज्य सरकार ने मंदाकिनी नदी के किनारे तकरीबन ९५ लाख रुपए की लागत से लगभग ३२ मीटर की सुरक्षा दीवार बनाई थी जो बारिश के कारण ढह गई। मंदाकिनी नदी में चंद्रापुरी और विजयनगर कस्बों को जोड़ने के लिए दो झूला पुल बनने थे] जो आज तक नहीं बन पाए हैं। इन पुलों के न बनने से करीबन १५० गांवों का संपर्क इन दोनों कस्बों से अभी तक कटा हुआ है। ये लोग अस्थायी पुलों से आवाजाही करते हैं। बारिश के समय मंदाकिनी का जलस्तर बढ़ने पर वह अस्थायी पुल भी खतरे की जद में आ जाते हैं। बकौल केदारनाथ विधायक मनोज रावत] ^झूला पुल निर्माण के सिलसिले में मुख्यमंत्री से बात हुई है। अधिकारियों ने इस साल के अंत तक तीन पुल बनने का अश्वासन दिया है।^

केदारनाथ आपदा के बाद इस क्षेत्र में १९६४ किलोमीटर लंबी ११३ सड़कों में केवल १०४ पर ही काम शुरू हो पाया है। ?kkVh में २५०० लोगों को आवास बनाने के लिए पांच लाख रुपए चार किस्तों में दिए जाने के शासनादेश हुए थे। लेकिन अभी तक ४१२ लोगों को ही पहली किस्त मिली है। सिर्फ पुल और आवास की दिक्कत ही ?kkVh में नहीं है। यहां पुनर्वास भी समस्या बनती जा रही है। वरिष्ठ पत्रकार एवं आंदोलनकारी रमेश पहाड़ी का कहना है कि २०१३ में केदारनाथ आपदा के बाद करीब ४५५ से ज्यादा गांव अत्यंत संवेदनशील बने हुए हैं। इन्हें सुरक्षा के लिहाज से रहने लायक नहीं माना गया है। इन गांवों का पुनर्वास तथा विस्थापन होना है। लेकिन इस दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ है। इसके लिए राज्य सरकार को करीब ९००० करोड़ रुपए की जरूरत है। लेकिन अभी तक केंद्र सरकार से इन गांवों को पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई है] जबकि राज्य सरकार के पास इन गावों के विस्थापन के लिए आर्थिक संसाधनों का टोटा है।

        gunjan@thesundaypost.in

 
         
 
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