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संवाद
 
^मानसिक पीड़ा से मुक्त हुए नीतीश^

बिहार की राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से गुंजन कुमार की बातचीत के मुख्य अंश

बिहार के नए राजनीतिक ?kVukØe के बाद कौन नफे में रहा किसका नुकसान हुआ\

नफा&नुकसान की बात करें तो बिहार में बने नए राजनीतिक ?kVukØe का सबसे ज्यादा लाभ बीजेपी यानी नरेंद्र मोदी को हुआ। उसके बाद नीतीश कुमार। लालू यादव और कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। मेरा मानना है] लालू के साथ गठबंधन के दौरान नीतीश कुमार मानसिक पीड़ा में थे। उससे वे अब मुक्त हो गए। बीजेपी के साथ वे सहज रहते थे। नीतीश कुमार के पहले भी बीजेपी के केंद्रीय नेताओं से अच्छे संबंध रहे हैं। आडवाणी] अरुण जेटली से उनके संबंध पहले से अच्छे हैं। अब नरेंद्र मोदी से भी उनके संबंध अच्छे हो गए हैं। केंद्र के रुके हुए पैसे बिहार को मिलेंगे। राज्य और केंद्र के प्रोजेक्ट रफ्तार पकड़ेंगे। लालू गठबंधन के दौरान हो रहे अपराध पर फिर से अंकुश लगेगा। इससे बिहार को भी लाभ होगा।

लोकसभा चुनाव २०१९ में बिहार और राष्ट्रीय स्तर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा\

नीतीश के एनडीए में जाने के बाद २०१९ से पहले ही केंद्र सरकार लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी मजबूत हो गई है। जदयू के दस राज्यसभा सदस्य अब सदन में भाजपा के साथ होंगे। रही बात २०१९ की तो बिहार में गठबंधन बदलने के बाद कांग्रेस और विपक्ष और भी कमजोर हो गया है। बिहार का संदेश पूरे देश में गया है। अब तमिलनाडु में एआईएडीएमके  भी एनडीए के साथ आने को तैयार है। हो सकता है २०१९ आते&आते कई अन्य दल एनडीए में आ जाएं। तब विपक्ष में कांग्रेस के साथ सिर्फ लालू ही दिखेंगे।

नीतीश कुमार ने एक ईमानदार नेता की छवि गढ़ी है। भाजपा&जदयू गठबंधन पार्ट १ में नीतीश ने मोदी का विरोध कर एक धर्मनिरपेक्ष नेता की भी छवि बनाई थी। नीतीश की यह दूसरे नंबर वाली छवि क्या इससे धूमिल नहीं होगी\

मेरा मानना है] भारतीय राजनीति के वर्तमान समय में नीतीश एक अलग रंग&रूप के नेता हैं। वह पहले की तरह अपनी छवि बनाए रखेंगे] ऐसा मुझे लगता है। इसके दो उदाहरण बताता हूं। पहला] नीतीश कुमार ने अटल जी के साथ गठबंधन बनाने से पूर्व अपनी दो शर्तें रखी थीं। धारा ३७० और समान आचार संहिता को भाजपा नहीं उठाए। जिसके बाद कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बना] जिसमें दोनों महत्वपूर्ण मुद्दों को नहीं डाला गया। दूसरा उदाहरण ताजा है। नीतीश कुमार भाजपा के साथ जब पहली दफा सरकार बनाए थे तो उन्होंने भागलपुर दंगा की जांच को फिर से शुरू करवाया था। जो लालू अपने को धर्मनिरपेक्षता के सबसे बड़े पैरोकार मानते हैं] उन्होंने ही भागलपुर दंगे के मुख्य आरोपी कामेश्वर यादव को संरक्षण दिया था और उस पर कार्यवाही नहीं होने दी थी। उस कामेश्वर यादव को नीतीश ने निचली अदालत से भाजपा के साथ गठबंधन सरकार के दौरान सजा दिलवाई थी। जबकि भाजपा की भी उससे सहानुभूति थी। हाईकोर्ट ने कामेश्वर यादव को रिहा कर दिया है। आज की जानकारी यह है कि नीतीश कुमार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। संयोग देखिए आज फिर नीतीश भाजपा के साथ हैं।

मोदी को बिहार आने से रोककर नीतीश ने मुस्लिमों के कुछ तबके का वोट हासिल कर लिया था। खासकर पसमांदा मुस्लिमों का। अब क्या उन्हें मुस्लिम वोट मिलेगा\

मुस्लिम वोट मिलेगा या नहीं यह अभी नहीं कह सकते। देश में आज कल जिस तरह का माहौल है] उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम भाजपा के विरोध में वोट डालेंगे। इस ध्रुवीकरण में पसमांदा मुस्लिम भी शामिल हो सकते हैं। मुझे लगता है] नीतीश कुमार यादव और मुस्लिम वोट को माइनस करके ही चलरहे होंगे। क्योंकि लालू यादव का वोट बैंक मजबूत है। पर माइनस यादव&मुस्लिम पूरे वोट पर नीतीश&भाजपा की पकड़ होगी।

लालू यादव अब उपेंद्र कुशवाहा] मांझी को एक साथ लाकर नया महागठबंधन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। क्या २०१९ तक ऐसा कोई महागठबंधन संभव है\

पहले तो लालू&नीतीश से अलग कोई भी गठबंधन महागठबंधन नहीं हो सकता। दूसरी बात उपेंद्र कुशवाहा ने आज ही लालू के साथ जाने पर मना कर दिया है। मांझी की भी नीतीश कुमार से मुलाकात हो चुकी है। राजनीति में भ्रष्टाचार जिस तरह से हावी है। उसमें कोई भी नेता सत्ता से हटना नहीं चाहता है। कोई भी नेता हारने वाले के साथ नहीं जाता। आज विपक्ष के सामने मजबूत और ईमानदार नेतृत्व का सबसे बड़ा संकट है। विपक्ष में वही नेता हैं] जिन पर भ्रष्टाचार के बड़े&बड़े आरोप हैं। जनता भी भ्रष्ट नेताओं के साथ क्यों जाएगी। इसलिए मुझे लगता है कि नीतीश के एनडीए के साथ जाने के बाद विपक्षी एकता २०१९ आते&आते और दरकेगी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
         
 
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