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vad 18 21-10-2017
 
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आवरण कथा
 
अब आगे की राह

  • प्रेम भारद्वाज

लालू&नीतीश के टकराव और अलगाव ने बिहार की राजनीति के साथ इन दोनों राजनेताओं के भविष्य पर भी एक सवाल खड़ा किया है। जो सतही तौर पर दिखाई दे रहा है] वह यह कि लालू प्रसाद कमजोर हुए हैं। नीतीश ताकतवर होकर सत्ता में बने हुए हैं] मगर उनकी छवि की चमक अब पहले जैसी नहीं रही। अवसरवादी होने और विपक्षी एकता को कमजोर करने का दाग भी लगा है। बावजूद इसके बिहार में नीतीश कुमार को शायद ही किसी किस्म का राजनीतिक नुकसान हो। इन सवालों के पीछे नदी के भीतर नदी की तरह लालू&नीतीश के अलावा देश&प्रदेश की जनता के मन में क्या बह रहा है यह तो अगला चुनाव ही बताएगा चिराग हमेशा अंधेरे में ही रोशनी देता है। बिहार के भीतर और बाहर बसर करने वाले लोग&बाग नीतीश कुमार को रोशनी के रूप में नहीं देखते अगर उनके शासनकाल के ठीक पहले लालू&राबड़ी के स्याह शासन से वहां की जनता शव आसन में नहीं पहुंच गई होती। बिहार में नीतीश&लालू के बीच छिड़ी मौजूदा सियासी जंग को सिर्फ तत्कालिक तौर पर देखने से दोनों के बारे में सही निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा जा सकता। वह निष्कर्ष निष्पक्ष और पूरा भी नहीं माना जाएगा।

लालू&नीतीश की राजनीतिक लड़ाई सिर्फ बड़े&भाई छोटे भाई का झगड़ा नहीं है। इन दोनों के राजनीतिक सफर और उसमें आए पड़ावों से बिहार की तस्वीर से भी बावस्ता हुआ जा सकता है। अभी बिहार के हाई वोल्टेज सियासी ड्रामे का सारांश यह रहा कि लालू पुत्र तेजस्वी भ्रष्टाचार में फंसे] जो उनके ही पिता की देन थी। मुख्यमंत्री नीतीश ने अपनी भ्रष्टाचार विरोधी&छवि बचाने के लिए तेजस्वी यादव को उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को कहा। फिर तीन दिन का अल्टीमेटम दिया। तेजस्वी नहीं माने। नतीजतन नीतीश कुमार ने खुद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लोगों को उम्मीद थी कि बिहार राजनीतिक अनिश्चय के भंवर में कुछ दिनों तक डोलता रहेगा। मगर कुछ \kaVksa के भीतर ही नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। उन्होंने छठी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह थोड़ा अप्रत्याशित था। जदयू&भाजपा साथ। राजद तनहा। लालू प्रसाद के शब्दों में नीतीश कुमार भाजपा की गोद में हैं। अब राजनीतिक पंडित आगे की सियासी स्थितियों और समीकरणों की अटकलें लगा रहे हैं। लेकिन आगे बढ़ने से पहले इन दोनों दिग्गजों के कंधों पर सवार होकर पीछे लौटा जाए और बिहार के राजनीतिक मंजर को थोड़ा जानने&समझने की कोशिश की जाए।

यह सही है कि लालू प्रसाद यादव नीतीश कुमार से उम्र और सियासत में बड़े हैं। यह भी सही है कि दोनों ही जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में सक्रिय थे। यह भी सही है कि दोनों इस समय बिहार की राजनीति के दो खास चेहरे हैं। मगर इसके साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लालू प्रसाद विकास विरोधी] जातीय la?k"kZ को बढ़ाने] और भ्रष्टाचार के रथ की सवारी करने और गुंड़ाराज को शह देने वाले राजनेता हैं। यह बात जरूर है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महामौन अख्तियार करने वाले लालू प्रसाद साम्प्रदायिकता के मामले पर हमेशा मुखर रहे हैं। वे पिछड़े& दलितों की बड़ी बातें करते हैं। मगर जमीनी स्तर पर उन्होंने कभी कुछ नहीं किया। 

इसके विपरीत नीतीश कुमार की छवि एक सख्त शासक की रही है। बिहार में उनकी छवि गुंडा&विरोधी विकास पुरुष की है। जो बिहार को जानते हैं] वे यह भी जानते हैं कि लालू&राबड़ी राज में रात दस बजे के बाद अपने मोहल्ले में निकलना मुहाल था। गुंडाराज में भय था। रंगदारी का कारोबार था। अपराध&हत्या] जातीय जनसंहार चरम पर था। विकास एक गड्ढे के रूप में तब्दील हो गया था। बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकना बनाने का दावा करने वाले लालू प्रसाद भ्रष्टाचार और अपने कुनबे को ही पार्टी एवं सरकार मान लेने वाली सोच के दलदल में लगातार धंसते चले गए। चारा ?kksVkyk उनके लिए नाभि में लगा जानलेवा बाण साबित हुआ। हजार करोड़ रुपए के चारा ?kksVkyk के ४८ मामलों में लालू प्रसाद लगभग १८ मामलों में मुख्य अभियुक्त बनाए गए। इसी चारा द्घोटाले में अभियुक्त बनाए जाने पर जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की नौबत आई तो अपनी अनपढ़ पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। खुद मुख्यमंत्री पति बनकर सत्ता को हांकते रहे।

लालू &राबड़ी शासन ने बिहार में एक ऐसा स्याह रचा जिसने वहां की जनता के बीच भय] असुरक्षा और नाउम्मीदी को जन्म दिया। रंगदारी] सियासी हत्याएं और रणवीर सेना नक्सली संगठनों के बीच जनसंहार जारी रहा। लालू प्रसाद पर बतौर मुख्यमंत्री दोनों की ही पीठ ठोकने के आरोप लगते रहे। जिस जदयू ने लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ी जाति की राजनीति को हवा दी] वह जदयू लालू प्रसाद के दंभ के कारण बिहार में बिखने लगा। पार्टी के तमाम बड़े नेता लालू प्रसाद का एक&एक कर साथ छोड़ते गए। सबसे पहले जार्ज फर्नांडीज ने छोड़ा था और ^समता पार्टी^ का गठन किया। जिसकी जड़ें बिहार में ही रही। उसी ^समता पार्टी^ के साथ नीतीश कुमार ने भी लालू प्रसाद यादव का साथ छोड़ा। आज राजद सिर्फ लालू परिवार की पार्टी बनकर रह गई है। 

लालू&नीतीश ने एक ही जगह से एक ही नेता जेपी की छत्रछाया में राजनीति शुरू की। दोनों साथ भी रहे। अलग हुए। फिर साथ हुए। अब वे फिर अलग हो गए हैं। असल में दोनों का डीएनए ही अलग है। लालू प्रसाद जहां वाचाल हैं वहीं नीतीश कुमार नपे&तुले शब्दों में बोलते हैं। लालू प्रसाद ने कहा था कि नीतीश के पेट में दांत हैं। दोनों के शासनकाल की खामियां& खूबियां भी जुदा रहीं। लालू&राबड़ी के शासन ने बिहार को एक अंधेरे में तब्दील कर दिया। इसीलिए जब वहां नीतीश का शासन आया तो हल्का चिराग भी लोगों को सूरज मालूम हुआ। सूबे में गुंडाराज खत्म हुआ। जनसंहार थमा। लोगों को गड्ढे की जगह चौड़ी चिकनी सड़क दिखी। उनके भीतर आशा जगी कि बिहार में भी विकास हो सकता है। लड़कियों को साइकिल बांटी गई जिन पर सवार होकर बड़ी तादाद में वे स्कूल गई और शिक्षित बनीं। नीतीश की इस योजना को यूनिसेफ ने भी काफी सराहा।

वह नीतीश ही थे कि बिहार की सत्ता संभालते ही बड़े अपराधियों को फास्ट ट्रेक ट्रायल के जरिए जल्दी सुनवाई कर सबको जेल भेज दिया। जिसकी सबसे बड़ी बानगी सिवान के साहेब मो ़ शहाबुद्दीन हैं। राजद की सत्ता में वापसी के साथ ही शहाबुद्दीन जेल से बाहर आ गए। तब शहाबुद्दीन ने नीतीश के खिलाफ अंट&शंट भी बोला। लेकिन जिद्दी नीतीश ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया और उन्हें वापस जेल पहुंचा कर ही दम लिया। नीतीश अक्खड़ और जिद्दी हैं। वरना बिहार में शराबबंदी का सख्ती से पालन करना किसी दूसरे के वश की बात नहीं थी। वह भी तब जब एक पिछड़े राज्य में शराब के जरिये रेवेन्यू वसूली की बात भी अहम थी।

राजद&जद¼यू½ के बीच ताजा टकराव और फिर उसके अलगाव के पीछे दो कारण बताए जा रहे हैं। पहला यह कि लालू प्रसाद फितरतन निचले सतह पर अपने गुंडा टाइप समर्थकों को लगातार शह दे रहे थे। इससे शासन चलाने में नीतीश को दिक्कत हो रही थी। लालू प्रसाद फोन कर प्रशासनिक दखल देने में बाज नहीं आ रहे थे। वे फिर से बिहार में लालू&राबड़ी शासन का अंधेरा लाने पर आमादा थे। दूसरी बात जो बिहार से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारे तक चर्चा है वह यह कि लालू प्रसाद जद¼यू½ के मुसलमान&यादव विधायकों को तोड़कर अपने पुत्र तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने के मिशन में बड़ी तेजी के साथ जुट गए थे। लेकिन नीतीश ने आनन&फानन में सियासी चाल से लालू प्रसाद को ऐसी मात दी कि वह चारोंखाने चित हो गए।

अब नीतीश पर आरोप लगाया जा रहा वाया लालू प्रसाद वह यह कि इन्होंने विपक्षी एकता को कमजोर किया है। इसको इंकार भी नहीं किया जा सकता कि नीतीश ने विपक्षी एकता को बेजान कर २०१९ के लोकसभा चुनाव के लिए मोदी की राह को बेहद आसान कर दिया है। अब तक लालू की तरह नीतीश की भी  धर्मनिरपेक्ष वाली छवि रही थी। जबकि उनकी पिछली सरकार भी भाजपा के साथ थी। लेकिन वे भाजपा के साथ सरकार चलाते हुए भी मोदी के विरोधी बने रहे। अब इसमें थोड़ा बदलाव आया है। अब नीतीश&मोदीमय हो गए हैं जो पिछले छह&सात महीनों से लगातार दिख भी रहा है। अब तो उन्होंने ऐलान भी कर दिया है कि वे मोदी के मुकाबले कोई नहीं।

सवाल है अब इन दोनों के साथ&साथ बिहार का राजनीतिक भविष्य क्या है। जहां तक लालू&नीतीश कुमार का सवाल है तो उनकी छवि में अवसरवदिता की हल्की किरचें आई हैं। मगर इसका उनको वोटों का राजनीतिक नुकसान नहीं होने जा रहा। अगर नीतीश लालू प्रसाद के साथ ज्यादा समय तक बने रहते तो शायद ही अगले विधानसभा चुनाव में वापस आ पाते। नीतीश ने राजग को आगे कर मोदी के साथ&साथ खुद को भी मजबूत किया है। रही बात लालू प्रसाद की अब उनका व्यक्तिगत तौर पर कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है] वे इस स्थिति में अभी नहीं हैं कि भाजपा&जदयू को मात दे सकें। अगले लोकसभा विधानसभा में भी मात देना मुश्किल दिखाई देता है। हां इतना जरूर है कि मौजूदा प्रकरण ने उनके बेटे तेजस्वी को अपने तंज दिखाने का मौका जरूर दिया है। तेजस्वी में लालू प्रसाद का राजनीतिक अक्स एक खास तबके को बिहार में दिखाई देने लगा है। मगर तेजस्वी खुद को कैसे बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार के बरक्स खड़ा कर पाते हैं] यह एक सवाल है जिसका जवाब आने वाला वक्त देगा।

  • नीतीश सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि बिहार में पूर्ण शराबबंदी है। 
  • महिला सशक्तिकरण और सात निश्चय के तहत विकास कार्यक्रम भी सरकार की उपलब्धियों में शामिल।
  • महिला सशक्तिकरण के तहत बिहार की सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए ३५ प्रतिशत आरक्षण लागू किया।

  • स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं के लिए ५० फीसदी आरक्षण लागू करने वाला बिहार पहला राज्य है।
  • कृषि में सुधार के अंतर्गत बिहार सरकार अब किसानों से धान] गेहूं] दलहन और तिलहन खरीद रही है। किसानों को बिचौलिए एवं दलालों से मिली मुक्ति।
  • वर्ष २००६ में लाखों अध्यापकों को दूसरे राज्यों की तरह नियमित किया गया और उनका वेतन बढ़ाया गया।
  • भागलपुर दंगे की फिर से जांच।
  • वर्ष २०१५ में पत्रकारों के लिए पेंशन योजना।
  • सात निश्चय पर काम प्रगति पर है।
  • लोक शिकायत कानून के तहत ६० हजार मामले निष्पादित किए गए हैं।
  • लोकहित में सरकार की नीतियों] कार्यक्रमों एवं योजनाओं के संबंध में लोगों के सुझाव प्राप्त करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा ^लोकसंवाद कार्यक्रम^ प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है।
  • ढांचागत विकास के अंतर्गत पूरे प्रदेश में सड़कों का विस्तार।
  • ऊर्जा के क्षेत्र में २००५ के बाद बिहार का अभूतपूर्व प्रदर्शन।
  • २००५ से पहले कानून व्यवस्था के नाम पर जंगलराज के नाम से बदनाम बिहार में आज कानून व्यवस्था बेहतर हुई है।
  • शिक्षा में सुधार के अंतर्गत बिहार में दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना। भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान ¼आईआईटी½ की स्थापना।
  • स्वास्थ के क्षेत्र में सुधार के अंतर्गत बिहार में अखिल भारतीय अयुर्विज्ञान संस्थान ¼एम्स½ की स्थापना।
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