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सरगोशियां
 
राजीव से नाराजगी

संसद भवन में प्रणब मुखर्जी के लिए आयोजित फेयरवेल समारोह में एक बात हर किसी ने नोटिस की। मुखर्जी ने अपने भाषण में हरेक उस शख्स का जिक्र किया जिसने उनके सैंतीस बरस की संसदीय यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रशंसा में कोई कमी नहीं छोड़ी। पीवी नरसिम्हा राव को सराहा] अटल बिहारी वाजपेयी को भावपूर्ण शब्दों में याद किया। लालकूष्ण आडवाणी के मार्गदर्शन का जिक्र किया। मनमोहन सिंह की शालीनता पर प्रणबदा बोले। सोनिया गांधी के जनसरोकारों की जमकर सराहना की। लेकिन अपने लंबे संबोधन में उन्होंने एक बार भी राजीव गांधी का जिक्र नहीं किया। शायद वे अब तक नहीं भूले कि कैसे प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने उन्हें साइड लाइन कर दिया था। वरिष्ठ होने के बावजूद वे राजीव मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बन पाए थे। जानकारों का यह भी कहना है कि प्रणब मुखर्जी के लिखित भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का भी जिक्र नहीं था। बाद में शायद प्रणबदा ने सोनिया गांधी को संसद के केंद्रीय कक्ष में देख उनकी बाबत भी बोलने का निर्णय लिया हो। प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की हत्या पश्चात प्रधानमंत्री बनने को लालायित हो उठे थे लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने यह होने नहीं दिया। राजीव ने भी इसी के चलते प्रणबदा को साइड लाइन कर दिया था। यही कारण है कि बतौर राष्ट्रपति संसद में दिए अपने अंतिम भाषण में प्रणबदा ने पूर्व प्रधानमंत्री का उल्लेख करना उचित नहीं समझा।

शाह का दबदबा

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का पार्टी में दबदबा देखते बनता है। उनके नेतृत्व में लगातार जीतती आ रही पार्टी में अब उनसे नाखुश नेता भी द्घुटने टेकने पर मजबूर हो गए नजर आ रहे हैं। ताजा उदाहरण पार्टी की दो कद्दावर महिला नेत्रियों का है। दिल्ली दरबार की खबरों के अनुसार केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे ने भी अपना अमित शाह विरोधी रुख त्याग दिया है। शाह जब भाजपा अध्यक्ष बने थे तब बड़ी चर्चा थी कि इन दोनों नेताओं ने उनसे मिलने तक का शिष्टाचार नहीं निभाया था। जब गोवा में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तब स्मृति ईरानी ने एक कपड़े की दुकान में खुफिया कैमरे होने की बात कह इतनी सुर्खियां बटोरी थीं कि अमित शाह की अध्यक्षता वाली कार्यकारिणी की खबरें कहीं गुम सी हो गई थीं। इसके बाद यकायक ही ईरानी को मानव संसाधन मंत्रालय से हटाकर अपेक्षाकूत कम महत्व के कपड़ा मंत्रालय भेज दिया गया। यही हाल वसुंधरा राजे का हुआ। ललित मोदी प्रकरण में पार्टी उनके बचाव में उतरती नहीं दिखी। उन्हें सीएम पद से हटाए जाने की चर्चा भी चलती रहती है। अपने ऊपर मंडरा रहे खतरे को भांपकर वसुंधरा राजे ने पिछले दिनों पार्टी अध्यक्ष के राजस्थान दौरे के दौरान उनका शानदार स्वागत किया। वे अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ शाह की अगुवाई के लिए एयरपोर्ट में मौजूद दिखीं। राजा खानदान की राजे ने एक दलित कार्यकर्ता के ?kj में शाह के संग जमीन में बैठ भोजन भी किया। खबर है कि राजे को इसका ईनाम भी मिला है। अगला विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में होगा। स्मृति ईरानी भी उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिए जमकर काम करती दिख रही हैं। शायद इसी के चलते उन्हें सूचना प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

 

नाराज शरद] बेपरवाह नीतीश

जदयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव इन दिनों बेहद आहत बताए जा रहे हैं। कारण है बगैर सलाह-मशविरा किए नीतीश कुमार का भाजपा खेमे में चले जाना। एनडीए के पूर्व संयोजक शरद यादव की नाराजगी का असल कारण विपक्षी एकता को नीतीश के इस कदम के चलते लगा धक्का नहीं] बल्कि उनकी उपेक्षा करना है। जानकारों की मानें तो बिहार के सीएम और पार्टी के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने शरद यादव को अपने इस निर्णय की बाबत मात्र सूचित भर किया। अब खबर है कि शरद यादव बगावत करने का मन बना रहे हैं। भाजपा ऐसा नहीं होने देना चाहती। पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली को शरद से बात करने के लिए कहा गया। सूत्रों की मानें तो जेटली शरद यादव के ?kj जा उन्हें मनाना चाहते थे] लेकिन मीडिया के शरद के यहां जमावड़े ने उन्हें रोक दिया। दूसरी तरफ नीतीश कुमार शरद को भाव देने के मूड में कतई नहीं बताए जा रहे हैं। खबर है कि शरद जल्द ही कोई बड़ी ?kks"k.kk कर सकते हैं।

तलव] सेक्स और धोखा

^लव] सेक्स और धोखा^ उत्तराखण्ड की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। राजनीति में विचार और प्रतिबद्धता देवभूमि से बहुत पहले ही विदा ले चुकी है। ^जैनी प्रकरण^ हो या फिर एक आईएएस अफसर की सेक्स स्कैंडल में गिरफ्तारी] उत्तराखण्ड में ऐसे प्रकरण अब सामान्य हो चले हैं। इन दिनों त्रिवेंद्र रावत सरकार में एक मंत्री के जनसंपर्क अधिकारी के कारनामों की गूंज सुनने को मिल रही है। यह महाशय कभी स्वयं को सपा नेता तो कभी मीडिया से जुड़ा बताते हैं। खबर है कि मुरादाबाद में यह फर्जी लालबत्ती लगाए कुछ बरस पहले पकड़े गए थे। तब इन्होंने हवालात की सैर भी की थी। यह भी सुनने में आया है कि यह रंगीन तबियत के हैं। दो शादियां कर चुके हैं। कुछ अर्सा पहले दिल्ली में सैर-सपाटे करते इनकी शानदार-जानदार तस्वीरें भी देखने को मिल रही हैं। यह भी खबर है कि जल्द ही इनकी कारगुजारियों का भंडाफोड़ सोशल मीडिया में इनके ही कुछ पुराने साथी करने जा रहे हैं। जिन मंत्री के ये जनसंपर्क अधिकारी होने का दावा कर रहे हैं उनकी छवि पर इस सबका प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तो तय है। सवाल उठता है कि पहले ही अपनी बदलती रही राजनीतिक निष्ठा के चलते मीडिया के फोकस में उक्त मंत्री अपने पीआरओ की कारगुजारियों से वाकिफ हैं या फिर उन्हें भी भरमाकर यह महाशय उत्तराखण्ड की सत्ता का सुख भोगने में जुटे हैं।

 

 

 

 

 

 
         
 
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  • दिनेश पंत

प्रदेश में निगमों] परिषदों के विलय को लेकर कर्मचारी संगठन एकमत नहीं हैं। जल संस्थान और पेयजल निगम के कर्मचारी शुरू से ही सरकार के इस फैसले का

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