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vad 26 16-12-2017
 
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अब अलग होंगे शरद!

शरद यादव जमीनी और सरोकार वाले नेता माने जाते रहे हैं जो लोहिया स्कूल से प्रभावित हैं। जब से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा का दामन थामा तब से शरद यादव नाराज चल रहे हैं। राजनीति में रिश्ते किस कदर बदलते हैं] यह शरद के साथ देखा जा सकता है। शरद यादव पहले लालू प्रसाद के साथ थे। लेकिन वह अपनी उपेक्षा के कारण उनसे अलग हो गए। सिर्फ अलग ही नहीं हुए बिहार के मधेपुरा लोकसभा सीट से दोनों एक दूसरे के खिलाफ चुनाव भी लड़े। इसमें लालू प्रसाद को शिकस्त मिली। वे एनडीए के संयोजक भी रहे। नीतीश कुमार के साथ आए। उन्हें नीतीश के बेहद करीबी माना जाता था। लेकिन नीतीश ने इस बार लालू प्रसाद के साथ-साथ शरद यादव को झटका दिया है। शरद यादव नहीं चाहते थे कि जद(यू)] भाजपा के साथ मिलकर बिहार में सरकार चलाए। नीतीश के इस कदम से शरद यादव खफा हैं। उन्होंने इसे दिल पर ले लिया है। खबरें आ रही हैं कि शरद यादव नीतीश से अलग होकर नयी पार्टी बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। जो शरद यादव और नीतीश कुमार दोनों को जानते हैं] वे कुछ और ही सोच रहे हैं। शरद यादव जॉर्ज फर्नांडीज की तरह ही बाहर के नेता हैं जो बिहार से चुनाव लड़ते रहे हैं। कहीं नीतीश कुमार शरद यादव को भी जार्ज वाली परिणति में ना पहुंचा दें। अंत में चुनाव जीतने के लिए जार्ज को नीतीश को भरोसा था। आज शरद भी नीतीश भरोसा ही है।

मदन बनाम यतीश्वरानंद

हरिद्वार इन दिनों दो भाजपा नेताओं के बीच अखाड़ा सा बनता जा रहा है। यहां से दो पार्टी विधायकों के बीच कोल्ड वार चल रहा है। हरिद्वार शहर से विधायक मदन कौशिक की छवि वैसे भी एक दबंग राजनेता की रही है। कुछ लोगों को लगता है कि भाजपा सरकार में मदन कौशिक को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। यहां तक कि उनकी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद नंबर दो की हैसियत पर लाने की कवायद चल रही है। मदन की इस तरक्की से हरिद्वार ग्रामीण के विधायक यतीश्वरानंद काफी आहत हैं। यतीश्वरानंद ने पिछले चुनाव में तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत को मात दी थी। कहा जा रहा है कि स्वामी यतीश्वरानंद को हरीश रावत को हराने की कीमत नहीं मिली। इसलिए वे मदन कौशिक के साथ-साथ मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से भी नाराज चल रहे हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सरकार की तरफ से चलाए जा रहे 

बेचारे अहमद पटेल

केंद्र की मनमोहन सरकार के दौरान कांग्रेसी नेता अहमद पटेल की तूती बोलती थी। मनमोहन सरकार को अप्रत्येक्ष रूप से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चलाती थी और सोनिया गांधी हर फैसले के लिए अपने विशेष सलाहकार अहमद पटेल पर आश्रित थीं। आज कांग्रेस का वह दिग्गज अपने ही ?kj गुजरात में फंसता हुआ दिखाई दे रहा है। अहमद पटेल को गुजरात से राज्यसभा आना है। मगर भाजपा ने उनके खिलाफ ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि राज्यसभा के लिए अहमद पटेल का चुना जाना मुश्किल लग रहा है। इस बीच भाजपा ने कांग्रेस के भीतर काफी तोड़फाड़ करते हुए उसके लोगों को अपने दल में शामिल कर लिया है। जिससे अहमद पटेल की स्थिति और अधिक कमजोर हो गई है। कहा जाता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अहमद पटेल के साथ अपना पुराना हिसाब चुकता कर रहे हैं। दरअसल अमित शाह को गुजरात सरकार में गृहमंत्री रहते एक इनकाउंटर के मामले में महीनों तक जेल की हवा खानी पड़ी थी। शाह को यकीनी तौर पर ऐसा लगता है कि उनको जेल भिजवाने में कांग्रेस के इस दिग्गज नेता अहमद पटेल की अहम भूमिका रही थी। वे इस बात को भूल नहीं पाए हैं] बल्कि इसकी गांठ बांध ली है। इसलिए प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त शाह ने पटेल को राज्यसभा न भेजने के सवाल को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। देखना यह है कि वह अपनी मुहिम में कामयाब होते हैं या नहीं।

 

 

 

 
         
 
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क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

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  • गुंजन कुमार

भाजपा बेशक गंगा को जीवदायिनी मानती हो। लेकिन सच यही है कि हाईकोर्ट ने जब इसे जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया तो उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत

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