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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
नीतीश होने के मायने
  • अपूर्व जोशी

नीतीश २०१९ के आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से एक विश्वसनीय चेहरा बन उभर रहे थे। उनकी स्वच्छ छवि और बिहार में सुशासन के उनके प्रयास उन्हें मोदी के बरक्स एक विकल्प के तौर पर प्रोजेक्ट करने का काम कर रहे थे। हालांकि यह कहना कठिन है कि कांग्रेस नीतीश कुमार को xBca/ku का नेता बनाने को राजी होती या नहीं] इतना अवश्य कहा जा सकता है कि फिलहाल उनके कद का अन्य कोई नेता विपक्षी खेमे में नहीं था। अब जबकि वे स्वयं एनडीए में शामिल हो यह कहने से नहीं चूक रहे कि २०१९ में मोदी को टक्कर देने वाला कोई नहीं] तब विपक्षी दल कैसे अपने खिसकते कुनबे को समेटने का काम करेंगे] यह भविष्य के गर्भ में छिपा है

 

विश्व विख्यात कवि] नाटककार विलियम शेक्सपीयर का नाटक ^दि टेम्पेस्ट^ १६१०&१६११ में लिखा गया माना जाता है। नाटक के एक पात्र का कथन है "Misery acquaints a man with strange bedfellows." अर्थात गरीबी आदमी को मजबूर करती है अजनबियों के साथ सोने को। बाद के दशकों में इस कथन का प्रयोग राजनीति के संदर्भ में किया जाने लगा। बिहार में पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह इस कथन को चरितार्थ करता है। हालांकि आज बहुत से राजनीतिक विश्लेषक कहते&लिखते] सुने&पढ़े जा रहे हैं कि नीतीश कुमार का भाजपा में जाना पहले से ही तय था] मैं इससे इत्तेफाक नहीं रखता। यही कारण है लाख मगजमारी करने के बाद भी समझ नहीं पा रहा हूं कि नीतीश कुमार के भाजपा में जाने का असल कारण क्या रहा होगा। क्या प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी रहे नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से इतने द्घबरा गए कि उन्होंने विपक्षी एकता के अपने प्रयासों को धता बताते हुए मात्र बिहार की राजनीति तक ही अपने को सीमित करने का निर्णय ले डाला या फिर उनके इस निर्णय के पीछे का असल कारण कुछ और ही है। इस प्रश्न का असल उत्तर जिनके पास है वे इस पर कुछ बोलने से रहे। हम मात्र कयासबाजी कर सकते हैं] राजनीतिक विश्लेषण कर सकते हैं। तो चलिए नीतीश बाबू के इस निर्णय का राजनीतिक पक्ष थोड़ा टटोला जाए। 

पहली महत्वपूर्ण बात है नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री से निजी संबंध। दूसरी महत्व की बात बिहार की राजनीति की जमीनी हकीकत है। तीसरी सबसे महत्व की बात देश के राजनीतिक हालात हैं जहां कांग्रेस का तेजी से हाशिए में सिमटना भाजपा विरोधी क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए वजूद का संकट बनने का काम कर रहा है। मोदी और नीतीश के आपसी संबंधों के दृष्टिगत यह लगभग असंभव था कि भाजपा और जदयू एक पाले में खड़े नजर आएं। लंबे समय तक भाजपा के सहयोगी रहे नीतीश कुमार ने अपनी सेक्युलर छवि को बनाने के विशेष प्रयास किए। अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार हालांकि २००२ के गुजरात दंगों के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में बने रहे लेकिन उन्होंने नरेंद्र मोदी से दूरी बनाए रखी थी। २००५ में भाजपा संग मिलकर बिहार में सीएम पद संभालने वाले कुमार ने २०१० के विधानसभा चुनावों में जबरदस्त सफलता हासिल की थी। जदयू भाजपा गठबंधन को तीन चौथाई से ज्यादा सीटैं मिलीं। लेकिन २०१३ आते&आते गठबंधन में दरार पड़नी शुरू हो गई। कारण रहे नरेंद्र मोदी। भाजपा द्वारा मोदी के चेहरे को आगे रख २०१४ के आम चुनाव में जाने की बात उठने के साथ ही नीतीश कुमार असहज हो उठे। उन्हें अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि की चिंता थी। बिहार में आई प्राकूतिक आपदा के दौरान गुजरात सरकार की पांच करोड़ की सहायता राशि को इसी के चलते नीतीश कुमार ने ठुकरा दिया। जून २०१३ में यह गठबंधन भाजपा कोटे के ग्यारह मंत्रियों की बर्खास्तगी के साथ टूट गया। इससे पहले  भाजपा की पटना में हो रही राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान नीतीश कुमार ने एक भोज का आयोजन भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के लिए किया था। लेकिन यह भोज हो न सका। नरेंद्र मोदी की उपस्थिति इस भोज को नीतीश द्वारा ही रद्द किए जाने का कारण बन गई। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जहां मोदी के प्रति नीतीश कुमार का परहेज चरम पर पहुंचता सभी ने देखा। विपक्षी महागठबंधन के लिए नीतीश लगातार सक्रिय रहे। वे २०१९ में भाजपा को इस महागठबंधन के जरिए कड़ी टक्कर देने का प्रयास कर रहे थे। २०१४ में मिली करारी शिकस्त के बाद नीतीश कुमार ने स्वतः ही सीएम पद छोड़ एक महादलित नेता जीतनराम मांझी को बिहार की गद्दी सौंप दी। उनका यह राजनीतिक दांव लेकिन उल्टा पड़ गया। जीतनराम मांझी ने सीएम बनने के साथ ही नीतीश कुमार पर आंखें तर्रानी शुरू कर दी थी। मांझी मात्र नौ माह के लिए सीएम रहे। फरवरी २०१५ में उन्हें हटा नीतीश फिर से गद्दी पर काबिज हो गए। २०१५ में बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने मांझी को हटाए जाने पर चुटकी लेते हुए कहा था ^एक महादलित के बेटे का सबकुछ छीन लिया तब मुझे लगा कि शायद डीएनए में ही गड़बड़ है।^ डीएनए पर उठे प्रश्न को नीतीश कुमार ने बड़ा मुद्दा बना डाला। उन्होंने भाजपा] संद्घ और मोदी पर पलटवार करते हुए कहा था& ^ये किसके डीएनए की बात कर रहे हैं मैं कौन हूं मैं कहां से आया हूं मैं आपका हूं। ये बिहार के डीएनए पर उंगली उठाई गई है जिनके पूर्वजों का देश की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था वो हमारे डीएनए पर उंगली उठा रहे हैं।^ इसके बाद पीएम पर सीधे प्रहार करते हुए नीतीश कुमार ने ^थ्री इडियट^ फिल्म के एक गाने की पैरोडी बना डाली। पत्रकारों से बात करते हए उन्होंने कहा& ^बहती हवा सा था वो + + +गुजरात से आया था 

वो + + + कालाधन लाने वाला था वो + + + कहां गया उसे ढूंढ़ो + + +हमको बढ़ती महंगाई सताती + + +वो बस मन की बात सुनाता + + +हर वक्त अपनी सेल्फी खींचता था वो। कहां गया उसे ढूंढ़ो + + +।^ बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन को शासन करने का जनादेश दिया। निश्चित ही भाजपा के लिए यह चुनावी हार बड़ा झटका था। गठबंधन की सरकार ठीक&ठाक काम कर रही थी। अपने चुनावी वादे को अमल में लाते हुए नीतीश कुमार ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी कर डाली। यह एक बड़ा राजनीतिक साहस वाला निर्णय था। जहां एक तरफ सरकारें शराब के जरिए राजस्व बढ़ाने में जुटी दिखाई देती हैं] नीतीश कुमार ने ठीक विपरीत कर अपनी छवि में चार चांद लगा डाले। लेकिन नीतीश राजद यानी लालू संग अपने गठबंधन को लेकर असहज रहने लगे थे। बिहार के पत्रकार बताते हैं कि जमीनी हकीकत यह थी कि राजद का आम कार्यकर्ता फिर से गुंडागर्दी में उतर आया था। कानून व्यवस्था चरमराने लगी थी। अपने सुशासन के लिए जाने&जाते रहे नीतीश की बेचैनी तेजी से बढ़ रही थी। इस बीच भाजपा का ग्राफ ऊपर उठता जा रहा है। मोदी सरकार के तीन बरस भले ही किसी बड़ी सफलता के रहे हों] इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आर्थिक भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया है। प्रधानमंत्री की पकड़ केंद्र सरकार के हरेक मंत्रालय में है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की सुनामी नुमा जीत ने विपक्ष को पूरी तरह हताश करने का काम किया है। नीतीश कुमार इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के मामले दर्ज होने] राजद कार्यकर्ताओं की दबंगई एवं विपक्ष का पूरी तरह थक&हार जाना नीतीश बाबू के एनडीए में वापसी का कारण बन गया।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि नीतीश कुमार विपक्षी महागठबंधन की तरफ से पीएम पद की उनकी उम्मीदवारी का आश्वासन चाह रहे थे। कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी क्योंकि इससे राहुल गांधी की पॉजीशन कम्प्रोमाइज हो जाती। वैसे भी जनता दल ¼यू½ कांग्रेस की तुलना में एक छोटा राजनीतिक संगठन है। महागठबंधन का नेता कांग्रेस का न होना लगातार कमजोर हो रही पार्टी को राजनीतिक दृष्टि से और कमजोर करने का काम करता। नीतीश कुमार भी इसे भलीभांति समझ रहे थे। यही कारण है कि उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को समर्थन दे अपनी राजनीति को सुरक्षित करने का पहला कदम उठाया। उन्होंने सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई बैठक में भाग न लेकर स्पष्ट संकेत दिया कि वे कुछ बड़ा कदम उठा सकते हैं। लालू यादव एवं उनके परिजनों पर भ्रष्टाचार के मामलों ने उन्हें मौका दे दिया कि वे सुशासन के नाम पर विपक्ष से किनारा कर एनडीए में अपनी वापसी कर लें।

निश्चित ही यह विपक्षी एकता के प्रयासों को लगा बड़ा झटका है। नीतीश २०१९ के आम चुनाव में विपक्ष की तरफ से एक विश्वसनीय चेहरा बन उभर रहे थे। उनकी स्वच्छ छवि और बिहार में सुशासन के उनके प्रयास उन्हें मोदी के बरक्स एक विकल्प के तौर पर प्रोजेक्ट करने का काम कर रहे थे। हालांकि यह कहना कठिन है कि कांग्रेस नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता बनाने को राजी होती या नहीं] इतना अवश्य कहा जा सकता है कि फिलहाल उनके कद का अन्य कोई नेता विपक्षी खेमे में नहीं था। अब जबकि वे स्वयं एनडीए में शामिल हो यह कहने से नहीं चूक रहे कि २०१९ में मोदी को टक्कर देने वाला कोई नहीं] तब विपक्षी दल कैसे अपने खिसकते कुनबे को समेटने का काम करेंगे] यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। नीतीश कुमार के यकायक मोदी प्रेम पर इतना मैं अवश्य दावे के साथ कह सकता हूं कि इसके मूल में कोई न कोई ऐसा कारण जरूर है जो वक्ती तौर पर हमें नजर नहीं आ रहा है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मात्र दो माह पूर्व एक मई के दिन बिहार सीएम निवास एक अणे मार्ग में मेरी उनसे लंबी वार्ता देश की वर्तमान राजनीतिक दशा और दिशा पर हुई थी। उस वार्ता के आधार पर मैं कह सकता हूं कि नीतीश कुमार का तब भाजपा के संग जाने का कोई इरादा नहीं था। हालांकि यह भी सत्य है कि इतना बड़ा राजनीतिक कदम यकायक तो उठाया नहीं जा सकता। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के बत्तीसवें राष्ट्रपति फैंक्रलीन रूजवेल्ट का कथन प्रासंगिक जान पड़ता है& 'In politics, nothing happens by accident. If it happens, you can bet it was planned that way' 

¼राजनीति में कुछ भी दुर्द्घटना चलते नहीं होता] यदि ऐसा कुछ होता है तो शर्त लगाई जा सकती है कि ऐसा सुनियोजित था½

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