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vad 7 05-08-2017
 
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देश
 
गठबंधन के बीच में + + +

  • सिराज माही

मोदी सरकार के तीन साल बाद भी लोगों में सरकार के प्रति पहला जैसा मोह बरकरार है। आज जिस तरह यह सरकार लगातार अपनी लोकप्रियता बनाए हुए है ऐसे में देश में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत है। इसी लिहाज से बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की तर्ज पर २०१९ के चुनाव को देखते हुए देश की सभी विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर एक महागठबंधन बनाने पर विचार किया। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव से पहले इस महागठबंधन को झटका लगा]क्योंकि विपक्षी पार्टियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली जनता दल यूनाइटेड ¼जदयू½ के प्रमुख नीतीश कुमार ने सत्तापक्ष के उम्मीदवार यानी रामनाथ कोविंद को समर्थन दिया। दूसरी बार महागठबंधन को तब झटका लगा जब अगले लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने अपने आपको विपक्ष का चेहरा बनने से इनकार कर दिया। अब बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ¼राजद½ परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से राजद की तो किरकिरी हो ही रही है]साथ ही जदयू पर भी उंगलियां उठ रही हैं। इसलिए बिहार में विधानसभा चुनाव में बने गठबंधन में भी दरारें दिखने लगीं हैं। लेकिन इस बार नीतीश कुमार ने विपक्षी पार्टियों की तरफ से उपराष्ट्रपति पद के लिए द्घोषित किए गए उम्मीदवार का समर्थन किया है। इससे विपक्षी पार्टियों का गठबंधन मजबूत होता नजर आ रहा है।  

गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू प्रमुख नीतीश कुमार की छवि पहले से ही साफ सुथरी रही है। वह अपनी छवि को लेकर किसी भी हालत में समझौता नहीं करते हैं। इस लिहाज से अगर देखें तो पिछले साल बना बिहार में महागठबंधन खतरे में नजर आ रहा है। दरअसल पिछले दिनों राजद अध्यक्ष लालू यादव के ठिकानों पर सीबीआई के छापों और लालू समेत राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी बनाए जाने के बाद से विरोधियों के निशाने पर लालू परिवार के साथ- साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आ गए हैं। भाजपा की तरफ से लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि नीतीश मंत्रिमंडल से जल्द ही उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बर्खास्त करें। 

हालांकि नीतीश कुमार के लिए तेजस्वी को बर्खास्त करने की कोई मजबूरी नहीं है क्योंकि सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल नहीं की है। यह कयास लगाए जा रहे थे कि अब नीतीश शायद राजद से नाता तोड़ने की कोशिश में हैं। लेकिन नीतीश पूरी सूझ-बूझ के साथ काम कर रहे हैं। हाल ही में जद ¼एकी½ की बैठक के बाद नीतीश के रुख के साथ ऐसी खबरें आईं कि तेजस्वी को चार दिन का वक्त दिया गया है। लेकिन जद ¼एकी½ की तरफ से कहा गया कि तेजस्वी से इस्तीफा नहीं मांगा है और न इसके लिए कोई अल्टीमेटम जारी किया है। हां]नीतीश कुमार ने तेजस्वी को तथ्यों के साथ जनता के बीच जाने की सलाह दी। दूसरी ओर]राजद की ओर से तेजस्वी के इस्तीफे की मांग को खारिज किया गया]साथ ही महागठबंधन पर इसका कोई असर नहीं पड़ने की बात कही गई। जाहिर है]देश में राजनीतिक तस्वीर और उसमें भाजपा की चुनौती के मद्देनजर फिलहाल राजद और जद ¼एकी½ को मिल कर ही साथ चलना जरूरी लग रहा है। 

इसी उथल पुथल के बीच भाजपा की ओर से जिस तरह नीतीश कुमार को समर्थन देने की बात कही गई]उससे राजद-जद ¼एकी½ और कांग्रेस महागठबंधन के भविष्य को लेकर आशंका जरूर खड़ी हुई। नीतीश कुमार के सामने समस्या यह है कि फिलहाल वे जिस सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं]उसका मुख्य राजनीतिक आधार ही भाजपा की चुनौती का सामना करना है। हालांकि अतीत में भाजपा के साथ नीतीश की लंबी साझेदारी रही और उसके साथ मिल कर वे बिहार में सरकार चला चुके हैं। यही वजह है कि मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर राजग में जद ¼एकी½ की वापसी के कयास लगाए जा रहे हैं। बहरहाल]भ्रष्टाचार के मुद्दे पर महागठबंधन टूटता है तो इस मसले पर नीतीश कुमार की सख्त छवि शायद और मजबूत हो। लेकिन अगर वे भाजपा के समर्थन से अगली सरकार बनाते हैं तो इससे उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर जरूर सवाल उठेंगे।फिलहाल बिहार में बने महागठबंधन का भविष्य क्या होगा यह कुछ समय बाद पता चलेगा]लेकिन फिलहाल २०१९ के लोकसभा चुनाव के लिए बना गठबंधन मोदी सरकार के खिलाफ एक बार फिर से एकजुट होता नजर आ रहा है। नीतीश कुमार जिसने विपक्षी पार्टियों के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया था वह अब विपक्षी पार्टियों की तरफ से उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार महत्मा गांधी के प्रपौत्र गोपाल कूष्ण गांधी का समर्थन कर रहे हैं। उनका यह रुख राष्ट्रपति चुनाव की बाबत उनके फैसले से उलट है। राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्होंने राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की द्घोषणा कर रखी है। उन्होंने कोविंद को समर्थन देने का तर्क बताया कि राज्यपाल रहते कोविंद ने उनके हर फैसले की सराहना की थी। जानकारों ने यह अनुमान लगाया कि कोविंद के बहाने नीतीश दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाना चाहते रहे हों। बहरहाल]नीतीश कुमार के महागठबंधन के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के समर्थन न करने से जहां विपक्षी पार्टियों का गठबंधन टूटता नजर आ रहा था वहीं अब उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का समर्थन करने से मजबूत होता नजर आ रहा है।

 

 
         
 
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