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vad 7 05-08-2017
 
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श्वेत पत्र / दाताराम चमोली
 
कड़े कदम उठाने होंगे

  • दाताराम चमोली

मेडिकल का जो छात्र ऋण लेकर एमबीबीएस पास कर सकता है] वह इसी तरीके से एमडी या एमएस भी कर लेगा। फिर सरकार की उसको जरूरत क्या है\ क्यों वह सरकार के कहने पर उत्तराखण्ड में सेवाएं देगा\ पहाड़ पर डॉक्टर तभी पहुंच पाएंगे जब सरकार कड़े फैसले लेगी

उत्तराखण्ड के अस्पताल डॉक्टरों की कमी झेल रहे हैं। खासकर पर्वतीय क्षेत्र के अस्पताल डॉक्टरविहीन हैं। खबर है कि राज्य की त्रिवेंद्र रावत सरकार इस समस्या से निपटने के लिए अब एमबीबीएस कोर्स में अनुबंध की जगह एजुकेशन लोन की ईएमआई देने की व्यवस्था कर रही है। यानी एजुकेशन लोन लेकर डॉक्टर बना कोई छात्र अगर १५ साल तक सरकारी अस्पताल में सेवा करता है तो उसके बैंक लोन की किस्त सरकार चुकाएगी। सरकार की यह रणनीति अपने हिसाब से उचित हो सकती है। लेकिन समझने वाली बात यह भी है कि पूर्व में जब हम १५ हजार की मामूली फीस पर तैयार डॉक्टरों को अनुबंध के बावजूद पहाड़ पर नहीं पहुंचा पाए तो कल अभाव में पढ़कर एमबीबीएस बनने वाले किसी युवा को कैसे पहाड़ पर सेवाएं देने के लिए राजी कर सकते हैं\ जो होनहार युवा लोन लेकर एमबीबीएस बन सकता है वह इसी तरीके से एमडी या एमएस भी कर लेगा। फिर उसकी प्राथमिकता में अपना भविष्य होगा या फिर बैंक किस्त\ कल जब बेहतर भविष्य उसका स्वागत कर रहा होगा तो वह बैंक किस्त भी आसानी से चुका देगा। लिहाजा राज्य के सरकारी अस्पतालों खासकर पहाड़ के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की जो कमी है उसे अहम चुनौती के तौर पर लेना होगा। जानकारी के मुताबिक त्रिवेंद्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए सेवानिवृत डॉक्टरों की सेवाएं लेना चाहती है। जाहिर है कि सेवानिवृत डॉक्टर अनुभवी भी होंगे। यह अच्छी पहल है। लेकिन देखना यह भी होगा कि आखिर मैदानों के सुविधाजनक माहौल को छोड़कर कितने डॉक्टर अपने परिजनों से दूर पहाड़ पहुंच पाते हैं\

आज हमें इस दिशा में सोचना होगा कि जब सुविधाओं के अभाव में पहाड़ पर कोई कर्मचारी नहीं रहना चाहता है] तो वह एमबीबीएस डॉक्टर भी क्यों वहां जाए जिसके सामने एमडी करने का लक्ष्य हो। इस लक्ष्य को हासिल करने की सुविधाएं या माहौल क्या उसे पहाड़ पर कोई सरकार ईमानदारी से मुहैया करा सकती है\ हालांकि ऐसा संभव है बशर्ते कि राजनीतिक लाभ के लिए गुमराह करने की नीयत छोड़कर दृढ़ इच्छा शक्ति से काम किया जाए। पूर्व में राज्य में यही होता रहा है। किसी भी डॉक्टर या सरकारी कर्मचारी को पहाड़ पर मैदान जैसी शिक्षा] संचार एवं अन्य जीवन उपयोगी सुविधाएं मिल जाएं या सम्माजनक वेतन मिल जाए तो वह क्यों यहां की आबोहवा में रहना पसंद नहीं करेगा\ एमबीबीएस करने के बाद संविदा पर कोई क्यों पहाड़ जाना चाहेगा\ हाल ही में कर्नाटक सरकार ने अपने यहां डॉक्टरों की कमी को देखते हुए एमबीबीएस को एक लाख १० हजार रुपए और विशेषज्ञ डॉक्टरों को एक लाख ३० हजार रुपए का वेतन देने की बात कही है। जो डॉक्टर इससे भी ज्यादा चाहें वे अपने आवेदन में अवगत करा सकते हैं। क्या उत्तराखण्ड में भी इस तरह का फॉर्मूला नहीं निकाला जा सकता है\

करीब तीन साल पहले पहाड़ में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के मकसद से मैंने कुछ ऐसे सुझाव दिए थे जिन पर मौजूदा की सरकार चाहे तो अमल कर सकती है। लेकिन इसके लिए उसे कड़े फैसले लेने होंगे। मसलन सरकार अभी राज्य के स्थाई डॉक्टरों की सेवाओं की समीक्षा करते हुए उन्हें अनिवार्य रूप से पहाड़ों में भेज सकती है। चार-चार साल के दो टर्म में यानी कुल आठ साल इन डॉक्टरों से पहाड़ों में सेवाएं करवाई जाए। पहाड़ में आठ साल सेवा करने वाले डॉक्टरों को सेवानिवृति के बाद पांच साल का सेवा विस्तार दिया जाए। सेवाकाल में उन्हें प्रमोशन में पांच साल की वरिष्ठता मिले। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और सुविधाओं में ज्यादा लाभ दिया जाएं। उनके बच्चों को आरक्षण की सुविधा भी मिले। यही नहीं सरकार कुछ कस्बों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित ऐसे छोटे नगरों के तौर पर विकसित कर सकती है जहां अस्पतालों के अलावा सुनहरे भविष्य की हर संभावनाएं मौजूद हों। इन नगरों में 'मिनी सचिवालय' भी खोले जा सकते हैं ताकि शासन से छोटे- मोटे काम करवाने के लिए देहरादून का सफर न करना पड़े। इन प्रयासों से जनता को भी फायदा होगा और पहाड़ आबाद रह सकेंगे। अनुबंध को भी बरकरार रखा जा सकता है। लेकिन इसका कड़ाई से पालन हों। राज्य से निकलने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों को पहाड़ में चार साल तक सेवा देने के बाद ही एमडी या एमएस करने की अनुभूति दी जाए। पहाड़ में सेवाएं देने के लिए डॉक्टरों से बॉन्ड भराए जाएं और उनका सख्ती से पालन किया जाए। इसमें हम दूसरे राज्यों से भी सीख सकते हैं। अभी तक मध्य प्रदेश में सरल सर्विस बॉन्ड के तहत एक साल तक ग्रामीण क्षेत्र में सेवा नहीं देने वाले डॉक्टर को १० लाख रुपए के जुर्माने की सजा थी। डॉक्टरों की कमी को देखते हुए अब यह सजा २० लाख रुपए कर दी गई है। कठोर कदम उठाने के लिए हमें भी तैयार रहना पड़ेगा।

chamoli@thesundaypost.in


 
         
 
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  • अरुण कश्यप

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