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आवरण कथा ४
 
बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं

  • कृष्ण कुमार

राज्य में खास लोग निजी अस्पतालों में इलाज करवा लेते हैं। सरकार भी उनके इलाज का खर्च वहन करने में तत्परता दिखाती है। लेकिन आम लोग आज भी सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे ही हैं

 

आखिरकार लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी पूर्णतः स्वस्थ होकर अपने ?kj वापस लौट चुके हैं। देहरादून के एक निजी अस्पताल में उपचार के चलते उन्हें नया जीवन मिल पाया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत खुद उन्हें अपने साथ देहरादून के मैक्स अस्पताल में लेकर गए। नरेंद्र सिंह नेगी के हृदयद्घात के चलते अचानक उनकी पत्नी का स्वास्थ्य भी खराब हो गया। उनको भी मुख्यमंत्री अपनी कार से अस्पताल ले गए। लोकगायक नेगी और उनकी पत्नी का उचित उपचार करवाने में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी। निजी अस्पताल में उनका पूरा इलाज सरकारी खर्च पर हुआ। इससे पूर्व राज्य आंदोलनकारी सुशीला बलूनी का उपचार भी अब सरकार ने निजी अस्पताल मैक्स में ही करवाया। श्रीमती बलूनी भी अब स्वस्थ्य हैं।

अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या राज्य के आम निवासियों के लिए भी सरकार उतनी ही तत्परता से काम करेगी जितनी कि नरेंद्र सिंह नेगी के इलाज में स्वयं मुख्यमंत्री और पूरे सरकारी अमले ने दिखाई? क्या आज राज्य के निवासियों को उतनी बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मयस्सर हो रही हैं जितना कि सरकारें दावा करती रही हैं? हकीकत में आम आदमी आज भी राज्य की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के चलते अपना उपचार करवाने में असमर्थ है। वास्तव में राज्य में केवल निजी क्षेत्र में ही बेहतर और अति आध्ुानिक चिकित्सीय सुविधाएं मिल पा रही हैं जबकि सरकारी स्तर पर हालात बद से बदतर हो रहे हैं। सरकार दावों के अलावा धरातल पर कुछ नहीं कर पा रही है।

नरेंद्र सिंह नेगी के हृदयद्घात से दो बातें सामने आईं। एक तो सरकार खास लोगों के लिए ही तत्परता दिखाती है और दूसरे सरकारी चिकित्सा की हालत बेहद खराब है। यहां तक कि राजधानी देहरादून स्थित दून मेडिकल कॉलेज आज भी केवल नाम का ही मेडिकल कॉलेज है। यहां मरीजों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं नहीं हैं। शायद इसी बात को भांपकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी नरेंद्र सिंह नेगी को अपने साथ मैक्स अस्पताल में ले जाना उचित समझा। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि आखिर राज्य के उन लाखों आम नागरिकों का क्या होगा जो सरकारी अस्पतालों में उपचार करवाने को मजबूर हैं? अस्पतालों में उपचार करवाने के लिए उनके पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं। लेकिन इस सब के बावजूद वे अपना उपचार सरकारी अस्पतालों में करवा रहे हैं। जहां कोई गारंटी नहीं है कि उनका सही और समय पर उपचार हो पायेगा। सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की पोल देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज को ही देख कर खुल जाती है। राज्य बनने के बाद आज तक राज्य सरकार एक भी अति आधुनिक सुविधाओं से संपन्न अस्पताल नहीं खुलवा पाई है जहां आम आदमी को बेहतर और सस्ता इलाज मिल सके।

दून मेडिकल कालेज की बात करें तो अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय देहरादून का यह प्रसिद्ध अस्पताल बेहतर और सस्ती चिकित्सा सुविधाएं देने में अव्वल रहा करता था। राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि अब इसमें और भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त हो सकेंगी। लेकिन इसके उलट यह अस्पताल दिन पर दिन अपनी साख खोता रहा और हालात बद से बदतर होते चले गए। सरकार के दून अस्पताल को दून मेडिकल कॉलेज में तब्दील करवाने के फैसले से रही सही उम्मीद भी समाप्त हो गई। आज तक इस मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकों के पद रिक्त हैं। मशीनें खराब हैं। हालात यहां तक हैं कि  अस्पताल के सीएमएस डॉ टम्टा को अस्पताल परिसर में अपने वेतन से सफाई और पेयजल की व्यवस्था करवानी पड़ी। भीषण गरमी में मरीजों को अपने द्घरों से पंखे आदि स्वयं लाने पड़ते रहे हैं। नालियों में गंदगी और बदहाली का अंबार कई बार लग चुका है। एक्सरे, इएमआर मशीनें कई बार खराब हो जाती हैं। मरम्मत के नाम पर महीनों तक इंतजार करना पड़ता है। पैथौलॉजी के भी यही हालात रहते हैं। मरीजों को दवाइयां नहीं मिल पाती।

विगत माह मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने देहरादून के सरकारी अस्पताल कोरोनेशन में पेचिस और दस्त की बीमारी के बचाव के लिए अपने हाथों से ओआरएस के पैकेट बांटने का कार्यक्रम किया। इस कार्यक्रम को स्वास्थ्य विभाग ने जमकर प्रचारित किया और विज्ञापन तक समाचार पत्रों में छपवाए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जहां कोरोनेशन अस्पताल में १५ हजार ओआरएस के पैकेट बांटे गए वहीं दून अस्पताल में ओआरएस के पैकेट तक नहीं थे। पूरे माह किसी भी मरीज को ओआरएस के पैकेट दिए ही नहीं गए। जबकि सैकड़ों की तादात में प्रतिदिन पेचिस और दस्त के मरीज दून अस्पताल में आ रहे थे और वे बाहर से ओआरएस के पैकेट खरीदने को मजबूर थे। सूत्रों की मानें तो दून अस्पताल का पूरा का पूरा ओआरएस का स्टॉक मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के लिए दे दिया गया था। जिसके चलते मरीजों को परेशानी हुई।

दून अस्पताल राजधानी देहरादून का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है। राजधानी होने के बावजूद इस अस्पताल के हालत सुधारने में सरकार और शासन-प्रशासन की कोई रुचि नहीं है। शायद इसका कारण यही माना जा रहा है कि देहरादून में निजि अस्पतालों की भरमार है। जो मरीज साधन संपन्न हैं वे अपना उपचार आसानी से करवा सकते हैं लेकिन जो मरीज निर्धन हैं उनके लिए सरकार के पास कोई सोच या नीति तक नहीं है।

सरकार पर निजी अस्पतालों के दबाब में रहने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। पूर्व में इनके लिए कानून बनाने की बात समाने आई थी लेकिन पूर्ववर्ती किसी सरकार ने इस पर गंभीरता से प्रयास नहीं किया। अब जाकर सरकार ने एक कानून बनाया है लेकिन उस पर कब अमल होगा यह अभी स्पष्ट नहीं है। डोईवाला के सामुदायिक चिकित्सालय के मामले को निजी अस्पतालों के प्रति सरकारी रुचि के तौर पर भी देखा जा सकता है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय डोईवाला के सामुदायिक चिकित्सालय के उच्चीकरण की सरकार ने द्घोषणा की थी। तत्कालीन विधायक हीरा सिंह बिष्ट ने इसके लिए शासन में दबाव तक बनाया और शासन ने फाईल तक चलाई। लेकिन हैरानी इस बात की है कि स्वास्थ्य सचिव ने उसी फाईल पर अपनी नोटिंग में यह लिखा कि चूंकि डोईवाला के समीप प्रसिद्ध और अति आधुनिक चिकित्सा संपन्न हिमालय अस्पताल है इस कारण से डोईवाला के सामुदायिक चिकित्सालय का उच्चीकरण सही प्रतीत नहीं होता है। इससे भी गंभीर बात यह है कि कांग्रेस सरकार ने भी इस मामले को समाप्त कर दिया। हांलाकि तत्कालीन विधायक हीरा सिंह बिष्ट ने इसका भारी विरोध किया। लेकिन उनका विरोध शासन में काम नहीं आया। चुनाव के समय मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जनता से वादा कि डोईवाला के सामुदायिक चिकित्सालय का उच्चीकरण भाजपा सरकार के आने पर किया जााएगा। लेकिन अब इस अस्पताल को हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट को दे दिया गया है। इससे यह बात भी साफ हो जाती है कि सरकार राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को चलाने में पूरी तरह से असमर्थ है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग का पूरा जोर चिकित्सकों के स्थानांतरण में ही सिमटा हुआ है। सरकारी तंत्र पूरी तरह से नाकाम हो चला है। जिसके चलते राज्य का श्रीनगर मेडिकल कॉलेज भरतीय सेना को दिया जा चुका है। कुमाऊं मेडिकल कॉलेज को भी सेना को सौंपने की तैयारी हो चुकी है।

सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को राज्य में बेहतर करने में नाकाम दिखाई देती है। अपनी नाकामी को छुपाने के लिए सरकार अब भारतीय सेना का सहारा ले रही है। सेना से रिटायर्ड चिकित्सकों को राज्य के अस्पतलों में सेवाएं देने के लिए सरकार ने नीति बना दी है। सौ से भी अधिक सेना से रिटायर्ड चिकित्सक अपनी इच्छा से राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं देने जा रहे हैं। इससे जनता को तो बहुत फायदा होगा ओैर सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी से बचने का सहारा आसानी से मिल सकेगा। यह तय है कि सेना में जिस तरह से समय और अनुशासन होता है उसका असर स्वास्थ्य सेवाओं पर जरूर पड़ेगा और समय पर चिकित्सक अस्पतालों में काम करेंगे जो कि सिविल चिकित्सक नहीं करते हैं।

चारधाम यात्रा का मुख्य आरंभ ऋषिकेश से होता है। यहां शांति प्रपन्न शर्मा राजकीय चिकित्साय में सेना के चार चिकित्सकों को यहां सेवाएं देने का अवसर मिला है। लेकिन सरकार की नाकामी इस चिकित्सालय में साफ दिखाई देती रही है। चिकित्सकों के पद रिक्त हैं और तकनीकी स्टाफ के पद तक रिक्त हैं। हाल ही में इस अस्पताल की बदहाली पर नगर के कई लोगों ने सर्वदलीय धरना देकर सरकार को चेताने का प्रयास किया है। यह हालत तब है जब सरकार चारधाम यात्रा में लाखों तीर्थयात्रियों के आने से उत्सहित है। इसे अपनी उपलब्धि बता रही है। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के हालात जिस कदर हैं उससे सरकार पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। राज्य बनने के सोलह वर्षों में भी सरकारें जनता को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देने में नाकाम ही रही हैं। 

krishan.kumar@thesundaypost.in


तबादलों से चरमाराई स्थिति

  • सुमित जोशी

 

^हमारे यहां से ४ डॉक्टरों का तबादला किया गया है। जिसमें से सिर्फ २ डॉक्टर ही यहां भेजे गए हैं। उनमें से सिर्फ १ ही डॉक्टर ने चार्ज लिया है। इसके अलावा ब्लड बैंक में डॉक्टर अटैच करने को लेकर हमने शासन से बात की है।डॉ. बी.डी. जोशी, प्रभारी सीएमएस

 

अपनी अव्यवस्थाओं और सुविधा के अभाव में रेफर सेंटर के रूप में चर्चित रहने वाला राम दत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय रामनगर एक बार फिर सरकार के लचर रवैये का खामियाजा भुगत रहा है। प्रदेश की त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर किये गए डॉक्टरों के तबादलों के बाद यहां की व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा गई है।

गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य विभाग में बड़े स्तर में फेरबदल किया। लेकिन डॉक्टरों के पहाड़ों में तबादले होने के बाद अब सुगम मैदानी क्षेत्रों के अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी हो गई है। ऐसा ही हाल रामनगर के रामदत्त जोशी संयुक्त चिकित्सालय का है। तबादलों में यहां के १ सर्जन, सीएमएस, १ महिला चिकित्सक और १ फिजिसियन समेत कुल ४ डॉक्टरों का तबादला किया गया। जिसके बदले यहां सिर्फ २ दो डॉक्टर भेजे गए जिसमें से सिर्फ १ रेडियोलॉजिस्ट ने ही अभी तक कार्यभार ग्रहण किया है। जबकि वर्तमान में सर्जन का पद खाली चल रहा है। रामनगर कुमाऊं और गढ़वाल का प्रवेश द्वार होने के साथ ही आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों का एक मात्र नजदीकी शहर है। जहां तक पहाड़ी क्षेत्रों के लोग विषम परिस्थितियों में स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेने के लिए कम समय में पहुंच सकते हैं। यहां नैनीताल जनपद के भलौन, पाटकोट, अमगढ़ी के साथ ही अल्मोड़ा जिले के भतरोजखान, टोटाम, सल्ट, बेतालद्घाट आदि क्षेत्रों से लोग आते हैं। लेकिन फेरबदल से रामनगर की चिकित्सा व्यवस्था लड़खड़ा गई है। इसके अलावा यहां आपातकाल चिकित्साधिकारी का पद भी काफी लंबे समय से रिक्त चल रहा है। महिला रोग विशेषज्ञ का पद स्वीकूत नहीं हो सका है। इसके अलावा रामनगर में ब्लड बैंक को प्रारंभ करने की मांग पुरानी है लेकिन भवन तैयार हो जाने के बाद अभी तक इसे प्रारंभ नहीं किया जा सका है। ब्लड बैंक प्रारंभ करने को लेकर विभागीय कार्यवाही चल रही थी लेकिन बड़ी बात यह है कि जिस डॉक्टर के नाम पर ब्लड बैंक का लाईसेंस जारी होना था उस डॉक्टर का तबादला कर दिया गया।

 

 
         
 
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