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आवरण कथा ३
 
खतरे में मातृत्व स्वास्थ्य
  • दिनेश पंत

 

प्रदेश की करीब पचास लाख महिलाओं का इलाज सिर्फ १९० डॉक्टरों के हवाले है

 

प्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य खतरे में है। पिछले कुछ दशकों में सरकारें इसकी दशा सुधारने के दावे करती रही हैं पर सच यह है कि सुविधाओं के अभाव में गर्भवती माताएं दम तोड़ने को विवश हैं। डाक्टर और नर्सों की कमी के कारण महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा नहीं मिल पा रही है। संस्थागत प्रसव पर जोर देने के बाद भी आज दाइयों और मिडवाइफ के सहारे प्रसव हो रहे हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को एक हद तक इसमें सफलता मिली तो है लेकिन ग्रामीण&शहरी क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं की हो रही मौत आज भी चिंताजनक बनी हुई है। गर्भवती महिलाओं की जो भी मौतें हो रही हैं उनका कारण खून की कमी] प्रसव से जुड़ी जटिलताएं] प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद समय पर सुविधाएं न मिलना मुख्य वजह रही हैं। 

आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में मातृत्व मृत्यु दर प्रति लाख १६५ है जबकि शिशु मृत्यु दर ४० प्रति हजार है। राज्य की ४५ .१ प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। प्रदेश में कुल महिला मृत्यु दर ६ .४ प्रतिशत है। इसमें से ग्रामीण ग्रामीण ६ .८ प्रतिशत है।  प्रदेश का कम जन्म दर वाले राज्यों में १६ वां स्थान है। प्रदेश में कुल जन्म दर १७ .८ है। इसमें ग्रामीण १८ और शहरी १७ .१ प्रतिशत है। शिशु मृत्यु दर में प्रदेश का २१ वां स्थान है। कम मृत्यु दर वाले राज्यों में प्रदेश का १७ वां स्थान है। प्रदेश में नौनिहालों की स्थिति बेहद खराब चल रही है।  भारत के महापंजीयक के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआएएस) रिपोर्ट कहती है कि प्रदेश उन टॉप टेन राज्यों में है जहां शिशु मृत्यु दर सर्वाधिक है। शिशु मृत्यु दर पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। खास बात यह है कि गांवों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर १३ अंक अधिक है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च १०४२ रुपए है। नेशनल फैमली हैल्थ सर्वे के अनुसार उत्तराखण्ड में जहां संस्थागत प्रसव ३२ .६ प्रतिशत था वहीं वर्ष २०१५&१६ में यह बढ़कर ६८ .६ प्रतिशत हो गया। प्रदेश के अस्पतालों में महिला डाक्टरों की भारी कमी है। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली मां और बच्चे पर भारी पड़ रही है।

जिन राजकीय अस्पतालों में डिलिवरी के लिए गर्भवती महिला पहुंचती भी है तो वहां पर पर्याप्त सुविधएं नहीं हैं। बैड तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। एनेमिक गर्भवती महिलाओं की संख्या १ लाख १० हजार से ऊपर पंहुच चुकी है जो कि तीन साल पूर्व तक ५० हजार के पास थी। आंगनबाड़ी केंद्रों से महिलाओं को समुचित प्रोटीन और आयरनयुक्त आहार नहीं मिल रहा है। बजट की कमी इसकी बड़ी वजह बताई जा रही है। दुग्धपान के मामले को देखें २७ .८ प्रतिशत महिलाएं ही बच्चों को जन्म के एक द्घंटे के भीतर दुग्धपान करा रही हैं। गभर्वती महिलाओं का समय पर टीकाकरण भी नहीं हो पा रहा है। आज भी सुरक्षित मातृत्व स्वास्थ्य के रास्ते में कई चुनौतियां खड़ी हैं। जच्चा व बच्चा की मौत रोकने के अभी तक ठोस प्रयास नहीं हो पाए।

कहने को प्रदेश में बाल एवं मातृत्व सम्मान दिवस मनाने का निर्णय लिया गया है। इसके तहत वॉर अगेंस्ट ल्यूकोरिया एवं एनीमिया अभियान भी चलाए जाने हैं। महिलाओं में एनीमिया की कमी को दूर करने के पीछे प्रदेश सरकार का तर्क है कि राज्य के हर आंगनबाड़ी केन्द्रों] अस्पतालों की कैंटीन] बाल गृह] नारी निकेतन में बनने वाला खाना लोहे की कढ़ाई में बनाया जा रहा है। इसके अलावा मडुवा] काला भट्ट भी किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को दिया जा रहा है लेकिन यह देखने को कम ही मिलता है। 'खिलती कलियां' एवं 'अन्नप्राशन' योजना भी लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत जन स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी तो हुई है पर गुणात्मक स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हो रही हैं। 

 पूरे प्रदेश का मातृत्व&शिशु स्वास्थ्य संकट में है। पूरे प्रदेश में २५ ग्रामीण महिला अस्पताल और १८ महिला&पुरुष अस्पताल हैं। प्रदेश भर में महिला डाक्टरों के करीब ३०० पद स्वीकृत हैं लेकिन ११० से अधिक पद खाली चल रहे हैं। अकेले कुमाऊॅ में महिला डॉक्टरों के १२९ स्वीकृत पद में से ५७ पद रिक्त चल रहे हैं। प्रदेश में बाल रोग विशेषज्ञ के १३३ पद स्वीकृत हैं लेकिन तैनाती ६६ में ही है। प्रदेश में महिला चिकित्सकों की कमी के कारण मातृ&शिशु मृत्यु दर को कम करने में भी बाधाएं आ रही हैं। जिसके चलते प्रदेश में प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रभावित हो रहा है। राज्य के कई ऐसे दुर्गम इलाके हैं जहां पर चिकित्सा केंद्रों की उपलब्ध्ता ही नहीं है। ऐसे में आज भी दूरदराज क्षेत्रों में लोग परंपरागत दाइयों के भरोसे हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य की नींव समझी जाने वाली आशा और एएनएम खुद की समस्याओं के निदान के लिए संद्घर्षरत हैं। शिशु मृत्यु दर को रोकने के लिए प्रदेश में चाइल्ड डेथ रिव्यू प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत आशा कार्यकर्तियों] एएनएम को प्रशिक्षित किया जा रहा है लेकिन जब अस्पतालों में सुविधाएं न हों तो इन प्रशिक्षणों का क्या लाभ? नैनीताल की साढे़े चार लाख की आबादी १९ महिला डाक्टरों के हवाले है। यहां ०६ पद रिक्त चल रहे हैं। अकेले राजधानी देहरादून में १५ पद खाली पडे़ हैं यहां की आठ लाख से अधिक की महिला आबादी ३५ डाक्टरों ऊपर निर्भर है। हरिद्वार की नौ लाख से अधिक की महिला आबादी दो दर्जन डाक्टरों के हवाले है। उधमसिंहनगर की आठ लाख के करीब की महिला आबादी १४ डाक्टरों के हवाले] बागेश्वर की एक लाख ३५ हजार की आबादी ०२ डॉक्टरों के हवाले है। यहां महिला अस्पताल में आठ पद रिक्त चल रहे हैं। रुद्रप्रयाग की एक लाख तीस हजार की आबादी दो डाक्टरों के हवाले है जबकि तीन पद रिक्त चल रहे हैं। टिहरी के हाल और भी खराब हैं। यहां पर महिला डाक्टरों के १९ पद रिक्त चल रहे हैं और ८ डाक्टरों के हवाले ३ लाख २० हजार की महिला आबादी निर्भर है। पौड़ी में ३१ पद रिक्त हैं जबकि १३ डाक्टरों के हवाले ३ लाख ६० हजार की आबादी है। यानी पूरे राज्य में महिलाओं की संख्या करीब ५० लाख है लेकिन इतनी बड़ी आबादी का स्वास्थ्य मात्र १९० डाक्टरों के हवाले है। 

प्रदेश में कई जगह तो जन्म के समय बच्चों का वजन नहीं लिए जाने की शिकायतें भी आती रही हैं। कई माता&पिता को तो पता ही नहीं होता कि जन्म के समय बच्चे का वजन कितना था। प्रदेश में स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सरकारी ढांचा कई ?ksj लापरवाहियों और बदइंतजामी का शिकार है। धन एवं योजनाओं की कमी भी महिला स्वास्थ्य की बिगड़ी सेहत का बड़ा कारण है। तमाम जागरुकता कार्यक्रमों के बाद भी सैंकड़ों मांए नवजात शिशु को गाढ़ा पीला दूध नहीं पिलाती। सवाल यह कि पिलाएं भी कैसे? अस्पतालों में सिजेरियन डिलिवरी को ज्यादा महत्व दिया जाता है। सिरेजियन महिलाएं पूरे महीने बच्चों को दूध पिलाने की स्थिति में ही नहीं रहती। मांओं का दूध ही नहीं बन पाता जिसके चलते मार्केट में लेक्ट्रोजन दूध बनाने वाली कंपनियों की बल्ले&बल्ले रहती है। दूसरी ओर मां का पहला दूध पिलाने के लिए चलाए जाने वाले जागरुकता कार्यक्रमों में लाखों रुपयों का बजट हर वर्ष खपाया जा रहा है।


कुमाऊं में आधे चिकित्सक भी नहीं

  • दिकदर्शन रावत

चंपावत जिले में भी डॉक्टरों और तकनीकी स्टॉफ का ?ksj अभाव है। जिले में डॉक्टरों के ९५ पद स्वीकृत है] जिनमें ४७ डॉक्टर ही सेवाएं दे रहे हैं। इनमें २७ डॉक्टर नियमित हैं]  १५ डॉक्टर बॉण्ड के अन्तर्गत काम कर रहे हैं। वहीं ५ डॉक्टर संविदा पर हैं। फार्मेसिस्ट की स्थिति यहां ठीक है। टनकपुर संयुक्त चिकित्सालय में १५ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं पर ६ डॉक्टर ही तैनात थे। हाल में ही यहां के तीन डॉक्टरों का स्थानांतरण कर दिया गया। जिस कारण अब यहां १५ डॉक्टरों के सापेक्ष मात्र तीन डॉक्टर ही रह गए हैं। यहां डॉक्टरों एवं अन्य सुविधाओं की कमी के कारण लोग तराई के अन्य कस्बों में जाकर इलाज करने को मजबूर हैं।

चंपावत जिला अस्पताल की स्थिति भी अलग नहीं है। यहां डॉक्टरों के स्वीकृत २६ पदों में से ११ डॉक्टर ही तैनात हैं। अस्पताल में डॉक्टरों की कमी के साथ&साथ वार्ड ब्वॉय] स्वीपर की भी कमी है। जिससे अस्पताल की साफ&सफाई की व्यवस्था भी चरमराई रहती है। यहां मुख्य फिजिशियन] स्किन स्पेशलिस्ट] बाल विशेषज्ञ] डेंटल सर्जन के पद पर कोई डॉक्टर नहीं है। यहां एक लेडी डॉक्टर कार्यरत हैं। मगर उनके अवकाश लेने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। एनएसथिसिया विशेषज्ञ का पद भी यहां खाली है। वार्ड ब्वॉय का पद सरकार ने अब खत्म कर दिया है। पहले से तैनात वार्ड ब्वॉय के सेवानिवृत होने पर उसकी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जाती है।

जिले में डॉक्टरों की कमी के अलावा दूरस्थ क्षेत्रों में काम करने वाली एएनएम की भी कमी है। कुछ लोगों को उपनल के माध्यम से तैनात किया गया है। पर उन्हें ६&६ माह से वेतन नहीं मिलने दूरस्थ इलाकों में भी महिलाओं को दवा एवं अन्य चीजें नहीं मिल पाती हैं। पहाड़ों पर डॉक्टरों के नहीं रुकने की मुख्य वजह वहां सुविधाओं का अभाव है। डॉक्टरों को अपने बच्चों को पढ़ाने से लेकर अन्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं।

ऊधमसिंहनगर जिले में डॉक्टरों के २०३ पद स्वीकृत हैं जिनमें ९५ डॉक्टर ही कार्यरत हैं। यानी जिले में १०८ डॉक्टर के पद खाली हैं। बाजपुर अस्पताल में ४ डॉक्टर तैनात हैं। जबकि यहां १४ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। यहां के सुपरडेंटेंट का स्थानांतरण किया गया है। स्टॉफ नर्स के ७ पद स्वीकृत हैं पर कार्यरत मात्र दो हैं। फार्मेसिस्ट के एक पद खाली हैं। यहां वार्ड ब्वॉय के ८ पदों में से दो पर वार्ड ब्वॉय कार्यरत हैं। स्वीपर का पद खाली है। ऐसे में यहां आस&पास के अस्पतालों से स्वीपर बुलाकर सफाई कराई जा रही है। बाजपुर अस्पताल में पोस्टमार्टम सेंटर है पर पोस्टमार्टम के डॉक्टर तैनात नहीं हैं। हरिपुरा हरसान में मात्र एक डॉक्टर हैं वह भी संविदा पर हैं। सुल्तानपुर पइटी में एक और कैलाखेड़ा पीएचसी में कोई डॉक्टर नहीं है। कैलाखेड़ा और हरिपुरा हरसान में अस्पताल सिर्फ भवन होकर रह गया है।

अल्मोड़ा जिला में २६७ डॉक्टर के पद स्वीकृत हैं। इनमें से १०४ पदों पर डॉक्टर तैनात हैं। जिले में १६३ डॉक्टर के पद खाली हैं। जिले में फार्मासिस्ट की स्थिति ठीक बताई जाती है। इनके १५५ पदों में से १४० पद भरे गए हैं। द्वाराहाट अस्पताल में ११ डॉक्टर के पद स्वीकृत हैं जिनमें ४ डॉक्टर ही तैनात हैं। इनमें से हड्डी रोग विशेषज्ञ का कुछ दिनों पहले स्थानांतरण हो गया है। एक अन्य डॉक्टर कुछ महीनों से छुट्टी पर है। ऐसे में यह अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गया है। अल्मोड़ा का बेस अस्पताल बड़ा हॉस्पिटल माना जाता है। यह अस्पताल भी डॉक्टरों की कमी का दंश झेल रहा है। बेस अस्पताल अल्मोड़ा में ३२ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं। इसमें १६ पद पर डॉक्टर तैनात हैं। आधे पद खाली हैं। सीएमओ] मुख्य चिकित्सा अधिकारी के तीन पद] वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी के ४ पद खाली हैं। 

एनएसथिसिया विशेषज्ञ] न्यूरो सर्जन] वरिष्ठ गाइनो का पद भी खाली है। किच्छा] रुद्रपुर से डॉक्टरों का स्थानांतरण किया गया है पर उन्होंने अभी तक यहां ज्वाइन नहीं किया है। वार्ड ब्वॉय की कमी को जिलाधिकारी ने पीआरडी जवानों को तैनाती की कार्यवाही कर कुछ दिक्कतों को दूर करने का प्रयास किया है। 

 

बात अपनी&अपनी

दूरस्थ क्षेत्रों में डॉ की कमी है। जिला अस्पताल में अभी डॉ आने से स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है।

शैलजा भट्ट] सीएमओ बागेश्वर

जिले में २६७ में से १०४ पद पर डॉक्टर हैं। क्षेत्र में डॉक्टरों की कमी तो है।

नेहा पाण्डे] सीएमओ अल्मोड़ा 

जिले में डॉक्टरों की कमी है। डॉक्टर आ जाएं तो जनता को बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी।

एमएस बोहरा] सीएमओ चंपावत

 

 
         
 
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  • जीवन सिंह टनवाल

ग्रास कोर्ट के बेताज बादशाह स्विट्जरलैंड के रोजर फेडर  ने विंबलडन टेनिस चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन करते हुए क्रोएशिया

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