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आवरण कथा
 
बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था

  • गुंजन कुमार@दिनेश पंत

जनता को स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले प्रदेश के तमाम सरकारी अस्पताल खुद बदहाल हैं। अस्पतालों में डॉक्टरों के ६२ प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं। जिला अस्पताल तक रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। पहाड़ पर डॉक्टर और स्टाफ पहुंचाना हर सरकार की तरह मौजूदा त्रिवेंद्र रावत सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती है। पहाड़ों से लोग बेहतर इलाज के लिए देहरादून का रुख करते हैं] लेकिन यहां दून मेडिकल कॉलेज में ही डॉक्टरों और सुविधाओं का अभाव है। राज्य की चरमराई स्वास्थ्य सेवाओं की परतें खोलती ^दि संडे पोस्ट^ की यह खास खबर

 

उत्तराखण्ड की स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित इस खास खबर पर आने से पहले राज्य और देश की स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जानना जरूरी है। 

  • पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम में कहा था] ^भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है।^ 
  • मेडिकल जर्नल ^द लैनसेट^ में प्रकाशित ^ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी^ के मुताबिक स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी १९५ देशों की सूची में भारत का स्थान १५४वां है।

अब उत्तराखण्ड के संदर्भ में स्वास्थ्य सेवाओं को जानते हैं।

  • ११ जुलाई को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सोशल मीडिया के जरिए जानकारी दी] ^भारतीय सेना के १०४ सेवानिवृत वरिष्ठ डॉक्टरों ने पहाड़ पर सेवा देने के लिए स्वास्थ्य निदेशालय को आवेदन किया है।^ यह पहाड़ी राज्य के लिए अच्छी खबर और सरकार का अच्छा प्रयास कहा जा सकता है।
  • पिछले महीने मुख्यमंत्री ने श्रीनगर मेडिकल कॉलेज सेना को देने की बात कही। यानी राज्य सरकार प्रदेश में स्थित मात्र दो सरकारी मेडिकल कॉलेजों का संचालन नहीं कर पा रही है। ऐसे में प्रदेश सरकार पहाड़ पर सैकड़ों डॉक्टर कैसे भेज पाएगी।

 

देश और पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल किसी से छुपा नहीं है। केंद्र सरकार के अस्पतालों में संसाधन] तकनीक तो हैं मगर यहां देश भर से मरीज पहुंचते हैं। जिस कारण मरीजों को इलाज के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में देश भला कैसे स्वास्थ्य क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है\ पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड की स्थिति और भी दयनीय है। यहां देश की औसत से बहुत कम स्वास्थ्य सुविधाएं और संसाधन उपलब्ध हैं। पहाड़ तो दूर राजधानी देहरादून और मैदानी जिले हरिद्वार] ऊधमसिंह नगर में भी सरकारी अस्पताल खुद बीमार हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद सिंह रावत स्वास्थ्य विभाग अपने पास रखकर इसमें सुधार करने के लिए प्रयासरत तो हैं] मगर अभी तक वे प्रयास में सफल नहीं हो पाए हैं। मुख्यमंत्री ने इसके लिए सेवानिवृत डॉक्टरों से लेकर दूसरे प्रदेश के एमबीबीएस डॉक्टरों तक से प्रदेश में आने का आग्रह किया है। पिछले दिनों करीब २०० डॉक्टरों को ट्रांसफर भी किया गया। जिनमें मैदान में तैनात डॉक्टरों को पहाड़ी जनपदों में भेजा गया। वर्षों से पहाड़ पर तैनात डॉक्टरों को नीचे लाया गया है।

मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री त्रिवेंद्र सिंह का यह प्रयास अभी तक इसलिए सफल नहीं दिख रहा है] क्योंकि डॉक्टरों को जब तक पहाड़ पर हरेक तरह की सुविधाएं नहीं दी जाएंगी तब तक डॉक्टर पहाड़ नहीं चढ़ पाएंगे। यही हो भी रहा है। राज्य बनने के सोलह साल बाद भी राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो पाया है। खासकर पहाड़ी जनपदों में बड़े अस्पताल ¼जिला अस्पताल½ भी केवल रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं। इन अस्पतालों के भवन तो बना दिए गए हैं लेकिन वहां डॉक्टर पहुंच नहीं पाए हैं। आंकड़े तो कम से कम यही कहते हैं।

प्रदेश में छोटे&बड़े अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र कुल मिलाकर ७६३ हैं। वर्ष २०१५ में उत्तराखण्ड में राजकीय एलोपैथिक चिकित्सालयों की संख्या इस प्रकार थी। जिला अस्पताल& १३] जिला महिला अस्पताल& ७] बेस हॉस्पिटल&३] प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र& ४३] अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र&२१५] सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र& ५९] राजकीय एलोपैथिक अस्पताल& ३२१] संयुक्त महिला अस्पताल& ४६] जिला&तहसील स्तरीय प्रसवोत्तर केन्द्र& २४] हैल्थ पोस्ट& ९] क्षय रोग अस्पताल एवं क्लीनिक&१८ और राजकीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान&१ राज्य के सरकारी अस्पतालों में करीब ९१४९ शैय्याएं हैं। ३०० के करीब स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सकों से वंचित हैं। आंकड़ों को मानें तो सरकारी डिस्पेंसरियों में १४५ डॉक्टर] प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में २९१] सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ३२०] जिला अस्पतालों और जिला महिला अस्पतालों में २०८ और अन्य अस्पतालों में २९१ चिकित्सकों के पद रिक्त हैं।

यदि जिलावार आंकड़ों को देखें तो टिहरी जिले में १८२ डॉक्टरों के पद स्वीकूत हैं] इनमें से डॉक्टरों के १५९ पद यहां खाली हैं। उत्तरकाशी जिले में १३१ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं और ९१ पदों पर डॉक्टर नहीं हैं। नैनीताल में स्वीकृत डॉक्टरों के पदाें में से १६४ पद खाली हैं। राजधानी देहरादून जिले में ३५३ स्वीकृत पद डॉक्टरों के हैं] जिनमें यहां १३० पदों पर डॉक्टर नहीं हैं।

वर्ष २००७&०८ में तत्कालीन भाजपा सरकार ने पहल करते हुए श्रीनगर में मेडिकल कॉलेज खोला। इस कॉलेज में पहाड़ के गरीब बच्चों को भी डॉक्टर बनने का सपना दिखाया। तत्कालीन खंडूड़ी सरकार ने श्रीनगर मेडिकल कॉलेज में १५ हजार रुपए सलाना के फीस पर एमबीबीएस की डिग्री देने की शुरुआत की थी। इसके बदले वहां से पास आउट एमबीबीएस डॉक्टरों को पांच साल पहाड़ पर अपनी सेवाएं देने का समझौता सरकार और छात्रों के बीच करवाया गया था। वर्ष २०१२&१३ के बाद प्रत्येक साल १०० एमबीबीएस डॉक्टर वहां से निकले मगर इक्का&दुक्का को छोड़ किसी डॉक्टर ने पहाड़ पर सेवाएं नहीं दीं। किसी भी सरकार ने छात्रों से किए गए समझौते का कड़ाई से पालन नहीं करवाया। जिस कारण उत्तराखण्ड की स्थिति बद से बदतर होती गई। यहां के सरकारी मेडिकल कॉलजों में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के लिए सौ नई सीटें मिली हैं। फिर भी सरकार यहां से डिग्री लेने वाले छात्रों को रोक नहीं पाती है।

राज्य में डॉक्टर बनाने के लिए पैसे की भी कमी नहीं है। पिछली सरकार ने अपने अंतिम बजट में चिकित्सा शिक्षा का बजट ६०० करोड़ से बढ़ाकर ४०२५ करोड़ रुपये किया था। इसके अलावा स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न योजनाओं के तहत केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से अन्य बजट भी आवंटित होता है। मसलन] राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत २११८९ करोड़ रुपए] शहरी स्वास्थ्य मिशन में ७२२ करोड़ रुपए] उच्च स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ७२५ करोड़ रुपए] राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना में १००० करोड़ रुपए] आयुष के लिए ४४१ करोड़ रुपए प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे को केंद्र और राज्य सरकार से मिलता है। इसके बावजूद राज्य सरकार अपने यहां मेडिकल कॉलेज बढ़ाने के बजाए सरकारी मेडिकल कॉलेज को सेना को सौंपने की तैयारी कर रही है। सरकार की यह नीति समझ से परे है। दरअसल] अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों की कमी पूरे देश में है। इसलिए प्रदेश सरकार राज्य में ज्यादा से ज्यादा मेडिकल कॉलेज खोलकर अपने यहां ही डॉक्टर तैयार कर उन्हें पहाड़ पर भेज सकती है। इसके लिए सरकार को गंभीरता से कदम उठाने पड़ेंगे।

राज्य में अधिक मेडिकल कॉलेज खोलने के पीछे विशेषज्ञों की राय हवा हवाई नहीं है। बल्कि इस राय के पीछे जमीनी हकीकत भी है। अभी देश के करीब ४६ फीसदी पंजीकृत डॉक्टर सिर्फ चार राज्यों कर्नाटक] तमिलनाडु] आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में तैनात हैं। इस समय सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज कर्नाटक में ही मौजूद हैं। कर्नाटक में इस समय ५० मेडिकल कॉलेज हैं] जबकि महाराष्ट्र इस मामले में ४८ मेडिकल कॉलेजों के साथ दूसरे नंबर पर है। अगर डॅाक्टरों की तैनाती को देखें तो महाराष्ट्र में इस समय सर्वाधिक १]५३]५१३ डॅाक्टर तैनात हैं] जबकि कर्नाटक इस मामले में देश में तीसरे स्थान पर है जहां १]०१]२७३ डॉक्टर तैनात हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक देश में इस समय ९]५९]१९८ डॅाक्टर हैं] जिनमें से ४]३६]९१०  चार राज्यों में तैनात हैं। उत्तर प्रदेश] राजस्थान और मध्य प्रदेश में इस समय कुल १]३१]५५४ ¼१३ .७ प्रतिशत½ डॉक्टर तैनात हैं। देश के उत्तर&पूर्व के सिर्फ तीन राज्यों में ही पंजीकृत डॉक्टर मौजूद हैं। उत्तराखण्ड में एक हजार के करीब ही सरकारी डॉक्टर हैं।

पूर्ववर्ती प्रदेश सरकार ने पहाड़ी इलाकों में डॉक्टरों को भेजने के लिए एक नया फॉर्मूला निकाला। वह फॉर्मूला है निजीकरण का। एक&दो करके करीब एक दर्जन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों को पीपीपी मोड पर चलाया जाने लगा। मध्य प्रदेश में भी सरकार ने ऐसी पहल की मगर वहां विरोध के कारण असफल हो गई। मगर उत्तराखण्ड में आज भी पीपीपी मोड पर अस्पताल चल रहे हैं। इसके बावजूद वहां स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हों] ऐसा नहीं है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीपीपी मोड पर दिए गए १२ अस्पतालों पर अभी तक सरकार ८० करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है लेकिन अस्पतालों की स्थितियां नहीं सुधरी। गैरसैंण का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कई सालों से पीपीपी मोड पर चल रहा है। फिर भी पिछले साल ही एक गर्भवती महिला ने अस्पताल के बाहर दम तोड़ दिया था। महिलाओं को अस्पताल के बाहर बच्चों को जन्म देना पड़ा। 

उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवाओं के हालात में राज्य बनने के बाद से जो बदलाव आया] वह यही है कि अस्पतालों की संख्या बढ़ी है लेकिन न तो ढांचे में कोई बदलाव आया है और न ही इस दिशा में किसी प्रकार के सचेत प्रयास दिखाई दे रहे हैं] बल्कि स्वास्थ्य तो पैसा कमाने का माध्यम बन गया है। कई अस्पतालों में डाक्टरों के पद खाली हैं। कई जगह पर संविदा डाक्टर ही अस्पतालों की सेवाएं संचालित कर रहे हैं तो कहीं अस्पताल फर्मासिस्ट के भरोसे चल रहे हैं। कुछ समय पहले प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जो जानकारी दी] वह चौंकाने वाली है। विभाग के मुताबिक उत्तराखंड में एलोपैथी चिकित्सकों के २]४६७ स्वीकृत पद हैं लेकिन इस समय महज ९४० डॉक्टर ही कार्यरत हैं। यानी राज्य भर में १]५२७ पद अर्थात करीब ६२ प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।

निजी अस्पतालों में जाने की मजबूरी

 पहाड़ एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों से रेफर मरीज राजधानी देहरादून की ओर रुख करते हैं। इस कारण राजधानी के दून अस्पताल में मरीजों का तांता लगा रहता है। देहरादून में जिला चिकित्सालय के रूप में अभी तक कोई अस्पताल डेवलप नहीं किया गया है। दून अस्पताल के मेडिकल कॉलेज बनने के बाद यहां जिला अस्पताल की जरूरत थी। पर ऐसा नहीं हुआ। 

आसपास के क्षेत्रों में कई बार अस्पतालों को जिला चिकित्सालय बनाने के लिए कोशिश की गई पर सरकार जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाई। यहां सरकारी अस्पतालों के हालात का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि शहर के पास बने प्रेमनगर अस्पताल में कई प्रकार की मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। यहां तक कि इस अस्पताल में बिजली भी नहीं है। मुख्यमंत्री बनने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस अस्पताल का दौरा किया था] उन्हें भी यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं मिली। स्वास्थ्य महकमा संभाल रहे मुख्यमंत्री के सामने पहाड़ ही नहीं राजधानी में भी स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त करना किसी चुनौती से कम नहीं है। दून के उप जिला अस्पताल कोरोनेशन हास्पिटल में भी इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर ¼ईएमओ½] फिजीशियन] सर्जन] ऑर्थोपेडिक सर्जन तक के पद खाली हैं। इस अस्पताल में ईंएमओ और फिजीशियन के दो&दो पद स्वीकृत हैं। इन पदों के सापेक्ष यहां दो ईएमओ और एकमात्र फिजीशियन डॉक्टर की तैनाती कांट्रेक्ट पर की गई है। इनमें से एक ईएमओ छुट्टी पर चल रहे हैं। कुछ माह पूर्व दूसरे ईएमओ डॉ जगदीश जोशी और फिजीशियन डॉ डीपी जोशी का कांट्रेक्ट भी खत्म हो गया। इनकी तैनाती के लिए नई सरकार को फिर से मशक्कत करनी पड़ी है। डॉक्टरों की कमी के कारण यहां आने वाले मरीजों को लंबा इंतजार या निजी डॉक्टर के पास जाना पड़ता है।

एक भी सर्जन नहीं

टिहरी जिले के हिंडोलाखाल क्षेत्र का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सरकार की उदासीनता के चलते बदहाल है। हिण्डोलाखाल में भव्य राजकीय ऐलोपैथिक चिकित्सालय बनाया गया है लेकिन यह केवल भवन के कारण ही भव्य है। सुविधाओं के नाम पर शून्य ही है। ५० हजार की आबादी और पर्वतीय भौगोलिक स्थिति के अनुरूप आज तक इसमें सर्जन] आर्थोपेडिक सर्जन] बाल रोग विशेषज्ञ और संक्रमण रोग विशेषज्ञ नहीं हैं। यहां नौ डॉक्टरों के पद स्वीकृत हैं पर केवल चार डॉक्टर कार्यरत हैं। चिकित्सा उपकरणों की भी यहां भारी कमी है।

टिहरी जिले के जौनपुर विकासखण्ड मुख्यालय में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय स्थापित ३० बेड के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के हालात किसी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से ज्यादा अच्छे नहीं हैं। १८ हजार के करीब रिकॉर्ड ओपीडी वाले इस सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के हालत बेहद दयनीय हैं। चिकित्सालय में केवल एक ही प्रभारी चिकित्सक है] जबकि चिकित्सकों के ११ पद स्वीकृत हैें। यहां आयुष विंग भी भगवान भरोसे चल रही है। जिले के दोगी क्षेत्र में २५ हजाार की आबादी के लिए एक भी ऐसा चिकित्सालय नहीं बनाया जा सका है जहां समुचित उपचार तक मयस्सर हो सके। हर वर्ष बरसात और गर्मियों में इस इलाके में बीमारियां फैलती रही हैं। कई लोग इसके चलते मौत का शिकार भी होते रहे हैं पर आज भी यहां स्थाई चिकित्सालय की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। नरेंद्र नगर में श्री देव सुमन संयुक्त चिकित्सालय भी है। पूर्व में यह जिला चिकित्सालय था लेकिन तब भी इसमें आधुनिक चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं थी। सबसे पुराना चिकित्सालय केवल रेफर सेंटर ही बना हुआ है। यहां चिकित्सकों के कुल १९ पद स्वीकृत हैं] उसके सापेक्ष केवल ९ पद पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं। वैसे पूरे टिहरी जनपद में एक भी सर्जन नहीं है। इस चिकित्सालय में भी कोई सर्जन नहीं है।

अस्पतालों के  अपने भवन तक नहीं

जनपद पिथौरागढ़ के नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधएं प्रदान करने के लिए एक जिला चिकित्सालय] एक संयुक्त चिकित्सालय] तीन महिला अस्पताल] ५ सामुदायिक केन्द्र और ८ प्राथमिक एवं १४ अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सहित ३२ ऐलोपैथिक अस्पताल] ५९ आयुर्वेदिक अस्पतालों और १५६ उपकेन्द्रों की स्थापना की गई है। मगर स्वास्थ्य सुविधाओं के हालत यह हैं कि खुद इन स्वास्थ्य केन्द्रों को बेहतर स्वास्थ्य की दरकार है। अधिकतर स्वास्थ्य केन्द्र डाक्टरों और बुनियादी सुविधओं की कमी झेल रहे हैं। जिले में डॉक्टरों के १९० पद स्वीकृत हैं जिसमें से १२१ रिक्त चल रहे हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों के ४८ पद स्वीकृत हैं पर कार्यरत १० ही हैं। श्रेणी क चिकित्सकों के २३ पद सृजित हैं जिनमें ११ पदों रिक्त हैं। साधरण गे्रड के लिए स्वीकृत ८२ पद में से केवल २७ पर डॉक्टर कार्यरत हैं। जिले में दंत चिकित्सकों के ५ पद सृजित हैं जिसमें ३ कार्यरत हैं। महिला चिकित्सकों के २३ पद सृजित हैं जिनमें ५० फीसदी से भी कम १० पर ही डॉक्टर तैनात हैं। 

जिला अस्पताल % जिला मुख्यालय स्थित बीडी पांडे जिला अस्पताल पर करीब पांच लाख की आबादी निर्भर है। यह चिकित्सकों की भारी कमी झेल रहा है। १२० बिस्तरों वाले इस अस्पताल पर नेपाली नागरिक भी निर्भर हैं। अल्मोड़ा के दन्या और चंपावत के लोहाद्घाट तक के लोग बेहतर इलाज की खातिर यहां पहुंचते हैं। वरिष्ठ विशेषज्ञों के छह पदों में से तीन पद रिक्त चल रहे हैं। ईएमओ एवं स्टॉफ नर्स के पद बर्षों से खाली चल रहे हैं। प्रयोगशाला सहायकों के १७ पद और एक्सरे तकनीशियन के पांच पद खाली चल रहे हैं।

सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र % सीएचसी की स्थितियों में सुधार के लिए मुनस्यारी स्थिति जिस केन्द्र को पीपीपी मोड में दिया गया था वह पहले की तुलना में और बदतर स्थिति में चला गया। ३० बिस्तरों वाले इस अस्पताल में आठ करोड़ से अधिक रुपया खर्च करने के बाद भी जैसे&तैसे १६ बिस्तरों की ही व्यवस्था बन पाई है। यहां एक्सरे मशीन जंग खा रही है तो ऑपरेशन थियेटर में प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। लोगों को खून के लिए १३२ किमी दूर पिथौरागढ़ जिला अस्पताल स्थित ब्लड बैंक तक की दौड़ लगानी पड़ रही है। यही हाल बेरीनाग सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र का भी है। 

बेरीनाग पीएचसी को उच्चीकृत कर सीएचसी तो बना दिया लेकिन आज तक सुविधाएं प्रदान नहीं की गई। दंत] हड्डी चिकित्सक सहित ७ पद स्वीकृत हैं। लेकिन एक पूर्णकालिक एवं दो संविदा चिकित्सकों के भरोसे यह अस्पताल चल रहा है। तीन डाक्टरों के भरोसे ५० हजार की आबादी निर्भर है। एक्सरे मशीन को १८ वर्ष से अधिक हो गए हैं लेकिन वह अब तक इस्तेमाल में नहीं आ पाई है। बागेश्वर जनपद के कई गांवों की जनता भी इस अस्पताल पर निर्भर है। गंगोलीहाट स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डाक्टरों की भारी कमी चल रही हैं। अकेले प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ कुन्दन कुमार के भरोसे ही अस्पताल की व्यवस्थाएं टिकी हुई हैं। यहां २०० से अधिक मरीज हर रोज उपचार को आते हैं। नौ साल से अल्ट्रासाउंड मशीन रेडियोलॉजिस्ट की राह देख रही है। इस सामुदायिक केन्द्र के संचालन के लिए १३ पद स्वीकृत हैं लेकिन यह दो चिकित्सकों के सहारे चल रहा है। डीडीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में डाक्टरों के ९ पद स्वीकृत हैं लेकिन यहां एक आयुष चिकित्सक व एक मेडिकल अधिकारी ही तैनात है। धारचूला स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र को अब संयुक्त चिकित्सालय का दर्जा प्रदान कर दिया गया है। लेकिन सुविधाएं वही पुरानी हैं। अस्पताल में स्वीकृत १३ चिकित्सकों के सापेक्षं पांच की ही तैनाती है। डीडीहाट सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में पैथालॉजी और अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाएं भी अब तक नहीं जुट पाई हैं। यहां नौ डाक्टरों के पद स्वीकृत हैं लेकिन अस्पताल की पूरी व्यवस्था दो डाक्टरों के हवाले है। अस्कोट स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र को सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र बनाने की द्घोषणा तो हो चुकी है लेकिन  यह अस्पताल भी डॉक्टर और दवाओं के इंतजार में है। १९६० में खोले गए इस अस्पताल में चिकित्सकों के तीन पद खाली चल रहे हैं।

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र % जनपद के गंगोलीहाट के पोखरी में बना प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र जैसे&तैसे एक फार्मासिस्ट के सहारे चल रहा है। भारत&नेपाल सीमा पर स्थित ?kwyk?kkVC प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र का भी यही हाल है। थल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र एक चिकित्सक के भरोसे है। मुवानी स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का अपना भवन तो है लेकिन डाक्टरों के अभाव में लोगों को इस स्वास्थ्य केन्द्र का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र % जनपद के नाकोट] ?kwyk?kkV] बड़ावे] गोचर] मुवानी] भागीचौरा] अस्कोट] गणाई] चौरपाल] ग्वासीकोट] चौडमुन्या] सोसा] तेजम] मदकोट यानी १४ अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र चिकित्सक और फार्मासिस्ट विहीन हैं।  

ऐलोपैथिक चिकित्सालय % जनपद पिथौरागढ़ में ३२ ऐलोपैथिक अस्पतालों को खुद ही इलाज की जरूरत है। जिला मुख्यालय से मात्र दस किमी की दूरी पर नाकोट में राजकीय ऐलोपैथिक 

चिकित्सालय एक संविदा डाक्टर के सहारे बिना दवाओं और उपकरणों के चल रहा है। सिंगाली] अस्कोट में बने राजकीय एलोपैथिक अस्पताल एक आयुर्वेदिक चिकित्सक के सहारे चल रहा है। भारत&नेपाल सीमा के तीतरी] कनालीछीना और सीमांत क्षेत्र के बनकोट गांव में स्थित एलोपैथिक अस्पताल को दशकों से डॉक्टर नहीं मिला है। गंगोलीहाट के पोखरी में खुला ऐलोपैथिक अस्पताल भी आयुर्वेदिक डाक्टर के सहारे चल रहा है। मड़मानले स्थित अस्पताल पिछले चार वर्षों से फार्मासिस्टों के हवाले है। मुनस्यारी के मदकोट के एलोपैथिक अस्पताल एक डाक्टर के भरोसे चल रहा है। 

आयुर्वेदिक अस्पताल % जनपद के ५९ आयुर्वेदिक अस्पतालों में ६१ पद सृजित हैं जिसके सापेक्ष ४६ पद ही भरे गए हैं। वार्ड ब्वॉय और स्वच्छकों के ४३ पद रिक्त चल रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी एवं प्रवर सहायकों के पद वर्षों से खाली पड़े हुए हैं। जनपद के अधिकांश आयुर्वेदिक अस्पताल और पंचकर्म यूनिटों के पास अपना भवन नहीं है। जिला मुख्यालय में १९७७ में स्थापित आयुर्वेदिक विभाग का भवन भी ३६ वर्षों से किराए के भवन में चल रहा है। जिले में स्थापित १५ अस्पतालों के पास ही अपने भवन हैं।

महिला अस्पताल % जनपद पिथौरागढ़ की ढाई लाख की महिला आबादी ०९ महिला चिकित्सकों के हवाले है। जिले के थल स्थित महिला अस्पताल पर  करीब २० हजार की आबादी का भार है। इस महिला अस्पताल में महिला चिकित्सक ही नहीं हैं न ही फार्मासिस्ट है। प्रसव कराने की जिम्मेदारी एएनएम और स्टॉफ नर्सों को है। वहीं जिला महिला अस्पताल में निश्चेतक] महिला चिकित्साधिकारी] सिस्टर और सहायक मातृका आदि के पद खाली हैं। यहां ६२ बिस्तर स्वीकृत हैं लेकिन ४२ बिस्तर ही संचालित हो पा रहे हैं।

१०८ वाहन % पूरे जनपद में १०८ के नौ वाहन हैं। ये वाहन गंगोलीहाट] बेरीनाग] मुनाकोट] थल] डीडीहाट] मुनस्यारी] धारचूला] कनालीछीना] पिथौरागढ़ में तैनात हैं। २००८ में इन वाहनों की तैनाती हुई थी तब से यह तीन लाख किलोमीटर से अधिक चल चुके हैं। जबकि मानकों के अनुसार दो लाख से अधिक किमी चल चुकी गाड़ियों को विराम दे दिया जाता है।  

बेस अस्पताल % जिले में बेस अस्पताल बना तो नहीं लेकिन सियासी राजनीति का अखाड़ा अवश्य बना हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के शासनकाल में इसे स्वीकृति मिली। इसे पिथौरागढ़ जिला अस्पताल में संचालित होना था। लेकिन भाजपा ने बेस और जिला अस्पताल को अलग&अलग बताते हुए इसका विरोध किया। वर्ष २००७ में भाजपा की सरकार बनने पर फिर से बेस अस्पताल को स्वीकृति मिली। जिला मुख्यालय से ७ किलोमीटर दूर चंडाक के निकट मोस्टामानू में बेस अस्पताल की प्रक्रिया शुरू इसमें दो करोड़ रुपए खर्च किए गए। लेकिन कांगे्रस ने दूरी का हवाला देते हुए इसका विरोध किया। २०१२ में कांगे्रस सत्ता में आई तो मोस्टामानू में बेस का काम रोक दिया गया। कांग्रेस ने रेशम विभाग के पास भूमि पर इसका भवन बनाने का काम शुरू किया। इसमें में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए हैं। अब एक बार फिर भाजपा सत्तासीन है ऐसे में रेशम विभाग की जिस जमीन पर अस्पताल बन रहा है वहां बेस अस्पताल का ढांचा बन पाएगा यह कह पाना आसान नहीं है।

जनसंख्या बढ़ी] फार्मासिस्ट नहीं

राज्य बना] मरीज बढ़े] जनसंख्या बढ़ी लेकिन फार्मासिस्टों की संख्या जस की तस है। आज भी राज्य में १९८० के मानक के अनुसार ही फार्मासिस्ट कार्यरत हैं। जहां १० साल बाद नया वेतन आयोग का गठन होता है। ५ साल में संसद और ५ साल में विधानसभा के चुनाव होते हैं वहीं सूबे के अस्पतालों में आज भी ३७ साल पुराने मानकों के आधार पर ही फार्मासिस्टों के पद सृजित हैं। राज्य को अलग हुए १७ साल बीत जाने को हैं लेकिन फार्मासिस्ट संवर्ग का पुनर्गठन तक नहीं हुआ है। फार्मासिस्टों के पुनर्गठन की फाईल विगत १० बरसों से विभाग और शासन में धूल फांक रही है। पुनर्गठन में २२७ नए पदों का सृजन होना है। वहीं बैकलॉग के ४५ पद भी नहीं भरे गए हैं। जबकि वर्तमान में नये मानकों के तहत सूबे के अस्पतालों में १००० से अधिक फार्मासिस्टों की आवश्यकता है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित १८९८ स्वास्थ्य उपकेन्द्र के सापेक्ष केवल ५३६ उपकेन्द्रों पर ही फार्मासिस्ट नियुक्त हैं। वर्तमान में पूरे प्रदेश में १५ हजार से अधिक बेरोजगार फार्मासिस्ट पंजीकृत हैं जो विगत १८ बरसों से रोजगार की आस लगाये बैठे हैं। लेकिन सरकार इन्हें नियुक्ति नहीं दे रही है। 

इससे बड़ा दुर्र्र्भाग्य और क्या हो सकता है। जहां त्रिवेंद्र सिंह रावत ७ साल में पशुपालन मंत्री से सूबे के मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन पशुपालन विभाग में फार्मासिस्टों की आवश्यकता २०१० से पहले १०३ पद से २०१२ में बढ़कर १२० हो गए थे] वह अभी तक नहीं भरे गए हैं। ये मामला पहले न्यायालय में लंबित था। अक्टूबर २०१६ में न्यायालय ने १२० पदों पर वर्षवार श्रेष्ठता के क्रम में नियुक्ति के लिए विभाग को आदेशित किया था। परंतु विभाग नें कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुये १२० के सापेक्ष महज ३१ पदों पर नियुक्तियां कीं। बाकी पदों पर नियुक्ति देने की बजाय दिसम्बर २०१६ में दुबारा विज्ञप्ति निकाल दी। विभाग की मनमानी के खिलाफ बेरोजगारों ने फिर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। गौरतलब है कि वर्तमान समय में पशुपालन विभाग में फार्मासिस्टों के ३२५ पद स्वीकृत हैं जिसके सापेक्ष १२० पद रिक्त हैं।


देहरादून ही बैठना चाहते हैं डॉक्टर

जिले में डॉक्टर कम हैं लेकिन स्वास्थ्य सेवाएं ठीक&ठाक हैं। 

ओपी आर्य] अपर मुख्य चिकित्साधिकारी रुद्रप्रयाग

जिले में डॉक्टरों की कमी है। स्थानांतरण के बाद कई डॉक्टरों को इस जिले में भेजा गया है। उनके आने पर स्थिति में और सुधार होगा।

रमेश सिंह राणा] सीएमओ पौड़ी

 

पौड़ी के चिकित्सालयों में बेड़ों की स्थिति

अस्पताल बेड

बेस चिकित्सालय श्रीनगर ५०६ 

संयुक्त चिकित्सालय श्रीनगर ५४

जिला चिकित्सालय पौड़ी १३२ 

जिला महिला चिकित्सालय पौड़ी ३२

बेस चिकित्सालय कोटद्वार १०४  

पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र १५०

दस प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ४०

बाइस अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र ८८

उप स्वास्थ्य केंद्र २६८

 

रुद्रप्रयाग के अस्पतालों में बेड़ों की स्थिति

अस्पताल बेड

जिला चिकित्सालय रुद्रप्रयाग ७० 

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जखोली ३०

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अगस्तमुनी ३०

सोलह अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र ६४ 

बाइस उप स्वास्थ्य केंद्र ८८

 


डॉक्टर का पहाड़ प्रेम

डॉ राजीव शर्मा % चमोली के कर्णप्रयाग में स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात सर्जन डॉक्टर राजीव शर्मा विगत २५ सालों से लोगों का इलाज कर रहे हैं। चमोली ही नहीं बल्कि वे बागेश्वर] अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग जनपद के मरीजों के लिए भी किसी भगवान से कम नहीं हैं। वे २५ सालों में हजारों लोगों को जीवनदान दे चुके हैं। डॉक्टर राजीव शर्मा मूलरूप से मेरठ जनपद के द्घसौली गोविंदपुरी के रहने वाले हैं। इन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कालेज झांसी से एमबीबीएस और एमएस की डिग्री प्राप्त की। १९९१ में डिग्री करने के बाद वे बद्रीनाथ भ्रमण पर आए तो यहां की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देख और यहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण उन्होंने पहाड़ों में सेवा देने का फैसला किया। १९९२ में इन्हें पहली तैनाती कर्णप्रयाग में मिली तब से लेकर आज २५ बरस बीत जाने के बाद भी वे यहीं पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यही नहीं वे अपने साथ अपनी डॉक्टर उमा रानी शर्मा को भी रामपुर उत्तर प्रदेश से यही ले आए। तब से लेकर आज तक दोनों पहाड़ की सेवा कर रहे हैं। कर्णप्रयाग जैसे छोटे जगह पर डॉक्टर शर्मा सीमित संसाधनों के बाबजूद बड़े&बड़े ऑपरेशन करते रहे हैं।

पहाड़ के ^भगवान^

डॉ रा?kqवेंद्र पाठक % डॉक्टर पाठक चमोली के पीपलकोटी में पिछले ३३ सालों से लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते आ रहे हैं। डॉक्टर पाठक] मूल रूप से पूना महाराष्ट्र के रहने वाले हैं। पूना से एमबीबीएस करने के बाद वे भारतीय सेना में चले गए। १९७८ से १९८३ तक उन्होनें भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी हैं। बतौर डॉक्टर उन्होंने देहरादून कैंट] बैग्लुरू] पुणे में सेवाएं दी हैं। वे पहाड़ों में रहकर लोगों की सेवाएं करना चाहते थे। जिस कारण वे १९८४ में सेना की नौकरी को छोड़कर पीपलकोटी आ गए। तब से लेकर आज ३३ साल बाद भी वे लोगों के लिए किसी भगवान से कम नहीं है। उन्होंने सैकड़ों लोगों की जान बचायी है। जरूरत पड़ने पर वे लोगों की आर्थिक रूप से मदद भी करते रहते हैं। वे गरीबों को निशुल्क दवाइयां भी देते हैं। डॉ पाठक उन लोगों के लिए नजीर हैं जो डाक्टरी पेशे को महज पैसा कमाने का साधन मात्र समझ चुके हैं। साथ ही उन लाोगों के लिए भी नजीर हैं जो पहाड़ को आज भी पहाड़ समझते हैं। डॉ पाठक कहते हैं कि वास्तव में अगर दुनिया में कहीं सेवा करनी है तो पहाड़ों में आकर यहां के लोगों की सेवा करना ही जिन्दगी का मुख्य उद्देश्य होना चाहिये तभी जाकर हमारा जीवन सफल हो पाएगा।

 

  • ब्राजील जैसे विकासशील देश में प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेडों की उपलब्धता 

२.३ है पर भारत में यह आंकड़ा केवल ० .७ को छू पाता है। पड़ोसी देश श्रीलंका में यह आंकड़ा ३.६ और चीन में ३.८ है।

  • डॉक्टरों की उपलब्धता का वैश्विक औसत प्रति एक हजार व्यक्तियों पर १.३ है] जबकि भारत में यह केवल ०.७ है।

         
 
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