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vad 23 25-11-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
एक धर्म का नहीं] सबका है हिंदुस्तान
  • अपूर्व जोशी

याद रहे इस देश को आजादी दिलाने के लिए हरेक भारतवासी ने जाति] धर्म] संप्रदाय से ऊपर उठकर बलिदान दिया। भगत सिंह सिख थे। तब क्या १९८४ से इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनकी देशभक्ति पर सवाल उठ सकता है अशफाक उल्ला मुस्लिम थे। तो क्या उनकी शहादत को हम भुला दें सवर्ण हिंदू आरक्षण का विरोध करते हैं। हमने १९९१ का मंडल आंदोलन देखा। इसके चलते क्या डॉ. साहब भीमराव अंबेडकर के योगदान को तुच्छ मान लें इस देश की बुनियाद में जिनकी शहादत दफन हैं उनके किए पर पानी न फिर जाए इसलिए किसी जुनैद के मारे जाने पर हम सहम जाते हैं। रही बात कश्मीरी पंडितों की तो यह समझा जाना जरूरी है कि उनके विस्थापन के लिए भारत का मुसलमान जिम्मेदार नहीं] बल्कि वे दहशतगर्द जिम्मेदार हैं जो देश के खिलाफ द्घाटी में जंग छेड़े हुए हैं। ऐसों से हमारी सेना हर रोज मोर्चा ले रही है। वहां होने वाले शहीदों में हर धर्म का खून शामिल है

 

^जुनैद] मेरे भाई^ को पढ़ मेरे कई मित्र मुझसे नाराज हो गए हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में त्वरित टिप्पणिंया हमें आगाह करने का काम करती हैं कि देश का बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक किस दिशा में सोच रहा है। फेसबुक वॉल पर मुझसे पूछा जा रहा है कि कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा पर मैं क्यों नहीं लिखता। पूछा जा रहा है कि सिख दंगों पर मेरे विचार क्या हैं। पश्चिम बंगाल में हो रहे दंगों पर मेरी प्रतिक्रिया एक शुभेच्छु ने चाही है। धूर्त] बुद्धिजीवी तथाकथित बुद्धजीवी आदि विश्लेषणों से नवाजा गया है। मुझे ऐसी ही प्रतिक्रियाओं की संभावना थी। तो चलिए इन प्रश्नों का उत्तर इस बार दिया जाए ताकि कौन कहां खड़ा है यह स्पष्ट रहे।

पहले बात अपनी जन्मभूमि से पलायन करने को मजबूर हुए कश्मीरियों की। आजादी से पहले जम्मू& कश्मीर एक रियासत हुआ करती थी। इस रियासत के प्रमुख हिंदू थे। १९४७ में जब देश आजाद हुआ तब सदरे रियासत जम्मू&कश्मीर राजा हरि सिंह थे। वे भारत अथवा पाकिस्तान के साथ अपनी रियासत का विलय नहीं चाहते थे। उनकी रियासत का बहुसंख्यक नागरिक भी अपने स्वतंत्र अस्तित्व के पक्ष में था। हरि सिंह को भय था कि यदि वे भारत के साथ विलय स्वीकारते हैं तो बहुसंख्यक मुस्लिम बगावत पर उतर आएगा। सरदार बल्लभ भाई पटेल गृहमंत्री के साथ&साथ नेहरू मंत्रिमंडल में उपप्रधानमंत्री भी थे। हैदराबाद] जूनागढ़ और कश्मीर को लेकर विवाद पंद्रह अगस्त १९४७ के बाद यानी आजादी के बाद भी बरकरार था। जूनागढ़ हिंदू बाहुल्य था लेकिन वहां शासक मुस्लिम था। इसी प्रकार हैदराबाद में निजाम का राज था। इतिहास जिन्होंने पढ़ा है] वे जानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना हैदराबाद और जूनागढ़ पर अपना अधिकार नहीं छोड़ना चाहते थे। उनका तर्क था कि दोनों रियासतों के हुकमरान पाकिस्तान संग रहना चाहते हैं। कश्मीर में लेकिन राजा हरि सिंह हिंदू होते हुए भी दोनों में से किसी भी देश के साथ विलय के पक्षधर नहीं थे। सरदार पटेल को श्रेय जाता है कि उन्होंने सैकड़ों छोटे&बड़े राजे&रजवाड़ों को भारत में विलय कराने के लिए तैयार किया। पटेल किसी भी सूरत में जूनागढ़ और हैदराबाद को छोड़ना नहीं चाहते थे। यदि मोहम्मद अली जिन्ना हैदराबाद और जूनागढ़ को लेकर अपनी जिद छोड़ देते तो पूरी संभावना थी कि पटेल का कश्मीर को लेकर दूसरा ही रुख रहता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंततः हैदराबाद और जूनागढ़ के साथ& साथ कश्मीर भी भारत का हिस्सा बना। वहां की बहुसंख्यक आबादी क्या चाहती थी] अब न तो बहस] न ही किसी प्रकार के जनमत का कारण बन सकता है। यह स्थापित सत्य है कि कश्मीर हमारे देश का हिस्सा है और हिस्सा बना रहेगा। सच लेकिन यह भी है कि अलगाव की आग वहां धधकती रही है जिसका नतीजा है द्घाटी से हिंदू आबादी का पलायन। १९९० से पहले हालात इतने खराब नहीं थे जैसे आज हैं। नब्बे के बाद से वहां निश्चित ही हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की शह और खुली मदद के चलते वातावरण दूषित होता गया। कश्मीर द्घाटी में सदियों से रह रहे हिंदू] विशेषकर पंडित समाज के लोगों पर भीषण अत्याचार हुए। एक नहीं दसियों ऐसी दास्तान हैं जहां आजादी के नाम पर निर्दोष हिंदुओं को मौत के द्घाट उतार दिया गया। जून १९९० की उस द्घटना को कौन भूल सकता है जब एक बाइस वर्षीय कश्मीरी पंडित गिरजा कुमारी टिक्कू का आतंकियों ने अपहरण किया] कई दिनों तक उसके संग सामूहिक बलात्कार हुआ फिर ग्यारह जून को एक आरा मिल में उसके दो टुकड़े कर दिए गए। कश्मीरी पंडितों का संगठन ^पनुन कश्मीर^ जो आंकड़े देता है वह दिल दहला देने वाले हैं। १९९० तक द्घाटी में ३२०० के करीब कश्मीरी पंडित रहते थे। पिछले २७ बरसों से ये सभी जलावतनी में हैं। यानी अपना द्घर& बार सब छोड़ दिल्ली व देश के अन्य हिस्सों में शरणार्थी बन रह रहे हैं। बारह सौ के करीब को आतंकियों ने मार डाला जिसके चलते ये लोग अपनी जन्मभूमि को छोड़ने पर मजबूर हुए। निश्चित ही उनकी इस जलवातनी का दर्द हर उस व्यक्ति को होना चाहिए जिसमें थोड़ी सी भी मानवीय संवेदना बाकी हो। यह भी सच है कि हमारे मुल्क का बुद्धिजीवी जिस अंदाज में] जिन तेवरों और तल्खी के साथ अल्पसंख्यक समाज पर हो रहे हमलों पर अपनी प्रतिक्रिया देता है] वैसा कभी भी कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर नहीं देखा गया। इसका एक बड़ा कारण है किसी भी समाज का बुद्धिजीवी सत्ता के द्घोषित&अद्घोषित हर उस एजेंडे का विरोध करता है जो मानवीय गरिमा के खिलाफ हो। यह समझने वाली बड़ी महत्वपूर्ण बात है कि जब&जब हमारे देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ दंगे होते हैं] उनको प्रताड़ित किया जाता है] स्पष्टतः सत्ता का दंगाइयों को संरक्षण होता है। यही कारण है कि चैतन्य समाज अपनी आवाज सत्ता के खिलाफ उठाता आया है। उदाहरण के लिए जून १९८७ में उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ कत्लेआम। १९९२ में बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के बाद से ही उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक सौहार्द तेजी से द्घटने लगा था। मेरठ में एक मामूली जमीन विवाद को सियासी ताकतों ने धार्मिक उन्माद में बदल डाला। एक मुस्लिम मरीज को देखने जा रहे डॉ प्रभात सिंह को मुस्लिम दंगाइयों ने जिंदा जला डाला। लगभग ३५० इस दंगे की भेंट चढ़ गए। तत्कालीन कांगे्रसी मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की भूमिका को लेकर बहुत सवाल उठे। मानवता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि जिंदा जलाए गए डॉ ़प्रभात सिंह के पिता हरपाल सिंह ने इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद कई निर्दोष मुसलमानों को हिंदू दंगाइयों से बचाया। तब उत्तर प्रदेश में सरकार कांगे्रस की थी। समय रहते एक्शन होता तो शायद बहुत सी जानें बच जातीं। १९८४ में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की राजधानी समेत देश भर] विशेषकर उत्तर भारत में जो अत्याचार सिखों के साथ हुआ उसे भला कौन भुला सकता है। हर बुद्धिजीवी ने] हर चैतन्य नागरिक ने इस नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाई थी। जुनैद के प्रति सहानुभूति दिखाने पर कई ^देशभक्तों^ ने मुझसे सवाल किया कि सिखों के मारे जाने पर तो आपको दर्द नहीं हुआ। कैसा बेहूदा प्रश्न है यह हर उस शख्स ने आगे बढ़कर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था] जो भारतीय होने का महत्व समझता था। कांगे्रस ने अक्षम्य अपराध तब तो किया ही किया] बाद के वर्षों में भी वह इन दंगों के आरोपियों को संरक्षण देने का काम करती रही। एचकेएल भगत] सज्जन कुमार] जगदीश टाइटलर आदि कांग्रेसियों को लगातार बचाने का प्रयास किया जाता रहा। मैं समझता हूं कांग्रेस अपने दामन से कभी भी निरपराध सिखों के खून का दाग नहीं मिटा सकती है। पर हमें यह भी याद रखना होगा कि तब दिल्ली समेत देश की सड़कों पर जो खूनी तांडव खेला गया] उसे खेलने वाले बहुसंख्यक हिंदू समाज के ही लोग थे। वे ही चेहरे थे जो तब की पूर्ण बहुमत पाई सरकार के गुण गाते थे। जिन्हें इंदिरा जी की शहादत तो दिखती थी लेकिन इमरजेंसी में हुए अत्याचार नहीं नजर आते थे। आज भी हालात बदले नहीं हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब सरकार किसी और की थी आज किसी और की है। सत्ता ने तब भी एक धर्म विशेष के खिलाफ आतंक का माहौल पैदा किया था] आज भी ऐसा ही होने के भय से मुझ जैसे भयभीत हैं। इसलिए जुनैद के मारे जाने पर हम खुद को शर्मिंदा पा रहे हैं। सत्तर के दशक में एक फिल्म सुपरहिट हुई थी। नाम था ^दीवार^। उसका एक डायलॉग मुझे आज यह सब लिखते समय याद आ रहा है। अपने स्मगलर भाई ¼अमिताभ बच्चन½ से पुलिस अफसर भाई ¼शशि कपूर½ कहता है ^दूसरों के पाप गिनाने से अपने पाप कम नहीं हो जाते भाई।^ जो मित्र सिख दंगों की बात याद दिला रहे हैं] वह क्या कांग्रेस के महापाप की आड़ में अपने आज के दुष्कर्मों को छिपाना चाहते हैं कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा का जिम्मेदार क्यों वे देश के मुस्लिमों को मान रहे हैं। कौन तय कर सकता है कि वक्त आने पर देशभक्ति के तराजू में किसका पलड़ा भारी रहेगा। क्या उनका जिन्हें स्वयं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गौरक्षक मानने से मना कर दिया है। स्मरण रहे पांच अगस्त २०१६ को मोदी ने कहा था ^कुछ लोग गौरक्षक के नाम पर दुकान खोलकर बैठ गए हैं] मुझे इन पर बहुत गुस्सा आता है।^ उन्होंने कहा ^ऐसे गौरक्षक में से अस्सी फीसदी लोग गोरखधंधे में लिप्त हैं।^ मैं इसे विस्तार देते हुए अपने ^देशभक्त^ मित्रों को याद दिलाना चाहता हूं पीएम उस मानकिसता का जिक्र कर रहे थे जिसके चलते यकायक ही सिखों को देशद्रोही मान दिल्ली समेत देशभर में मारा&काटा गया। जिन्होंने १९८४ में यह सब किया] वे हम ही थे दोस्तों। आज हमने चोला बदला गौरक्षक का चोला पहन लिया है। इसलिए डर लगाता है कि जो अपराध सत्ता में रहते पूर्ण बहुमत वाली राजीव गांधी की सरकार ने किया] आज पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार से न हो जाए। रही बात पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा की तो उस पर अपना स्टैंड बिल्कुल स्पष्ट है। ममता बनर्जी सरकार को दंगाइयों से कठोरता से निपटना चाहिए। यदि वहां पर मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार किया जा रहा है और ममता सरकार खामोश है तो इससे निंदनीय कुछ नहीं हो सकता। 

याद रहे इस देश को आजादी दिलाने के लिए हरेक भारतवासी ने जाति] धर्म] संप्रदाय से ऊपर उठकर बलिदान दिया। भगत सिंह सिख थे। तब क्या १९८४ से इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनकी देशभक्ति पर सवाल उठ सकता है अशफाक उल्ला मुस्लिम थे। तो क्या उनकी शहादत को हम भुला दें सवर्ण हिंदू आरक्षण का विरोध करते हैं। हमने १९९१ का मंडल आंदोलन देखा। इसके चलते क्या डॉ ़साहब भीमराव अंबेडकर के योगदान को तुच्छ मान लें इस देश की बुनियाद में जिनकी शहादत दफन हैं उनके किए पर पानी न फिर जाए इसलिए किसी जुनैद के मारे जाने पर हम सहम जाते हैं। रही बात कश्मीरी पंडितों की तो यह समझा जाना जरूरी है कि उनके विस्थापन के लिए भारत का मुसलमान जिम्मेदार नहीं] बल्कि वे दहशतगर्द जिम्मेदार हैं जो देश के खिलाफ द्घाटी में जंग छेड़े हुए हैं। ऐसों से हमारी सेना हर रोज मोर्चा ले रही है। वहां होने वाले शहीदों में हर धर्म का खून शामिल है। अपने हर बुद्धिजीवी दोस्तों से भी मेरा आग्रह है कि वे कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की अनदेखी करने की भूल न करें। उनका दर्द भी महसूसें। ^पनुन कश्मीर^ के संस्थापकों में से एक कवि मित्र अग्नि शेखर का एक पत्र इन दिनों खासा चर्चा में है जो उन्होंने वामपंथी विचारक कवि मंगलेश डबराल को लिखा है। अपनी पीड़ा को उन्होंने एक शेर के जरिए व्यक्त किया है कि ^जैसे माहौल में जिए हम लोग/आप होते तो खुदकुशी कर लेते।^

यह दायित्व हम सबका है कि हमारी आने वाली नस्लें ^खुदकेुंशी करने को मजबूर न हों। इसलिए एक बार फिर कहता हूं हिंदुस्तान सबका मुल्क है। किसी एक कौम का नहीं। हमें इस सच को स्वीकारना होगा और धर्म के नाम पर हो रही सियासत के खिलाफ उठ खड़ा होना होगा। 

editor@thesundaypost.in

 

 

 

 

 

 

 
         
 
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