fnYyh uks,Mk nsgjknwu ls izdkf'kr
चौदह o"kksZa ls izdkf'kr jk"Vªh; lkIrkfgd lekpkj i=
vad 37 05-03-2017
 
rktk [kcj  
 
 
अपराध

 

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के दौरान जनता पर बेइंतहा जुल्म हुए। आंदोलन को दबाने के लिए शासन-प्रशासन ने हर साजिश अपनाई। महिलाओं पर अमानवीय जुल्म हुए और ४२ लोगों ने शहादत दी। जनता को उत्तर प्रदेश में दूर की जेलों में ठूंसा गया। २ अक्टूबर १९९४ को अपनी न्यायोचित मांग को लेकर राष्ट्रीय राजमार्ग से दिल्ली आ रही जनता पर जो अत्याचार हुए उसकी देश भर में सर्वत्र निंदा हुई।

 

सरकारी जुल्मों को रोकने के लिए उत्तराखण्ड मानवाधिकार संरक्षण संघर्ष समिति ने संसद से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी। मानवाधिकार संगठनों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। समिति की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई जनहित याचिका ३२२/९४ पर न्यायालय ने मुजफ्फरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार को हैसियत में रहने की हिदायत की। दोषी अधिकारी अनंत कुमार ने कहा था कि खेत में महिलाओं से बलात्कार नहीं तो और क्या होगा। इसकी देश भर में निंदा हुई थी।

 

इसी तरह उत्तराखण्ड मानवाधिकार संरक्षण संघर्ष समिति की याचिका ३९९१९/९४ को संविधान की धारा २२६ (भारतीय संविधान के अनुच्छेद २२६ के अंतर्गत इलाहाबाद उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर दी गई। इसे स्वीकार करते हुए माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि एस धवन और न्यायमूर्ति एबी श्रीवास्तव की विशेष खंडपीठ ने मानवाधिकारों के व्यापक पैमाने पर हुए हनन पर संज्ञान लेते हुए ९ फरवरी १९९६ को ऐतिहासिक निर्णय दिया। न्यायालय में लेखक ने इस याचिका की पैरवी अधिवक्ता न होते हुए खुद की थी।

 

मेरा स्पष्ट मानना है कि मुजफ्फरनगर कांड प्रायोजित था और केंद्र और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकारों के इशारे पर ही आंदोलनकारी जनता पर जुल्म हुए। मानवाधिकारों का उल्लंघन किस व्यापक पैमाने पर किया गया इसका खुलासा उच्च न्यायालय के निर्णय से स्पष्ट हो जाता है। न्यायालय ने मुजफ्फरनगर कांड के पीड़ितों को मुआवजा देने का फैसला दिया था।  न्यायालय ने घटना में मारे गए २४ (ये संख्या सीबीआई ने बताई थी।आंदोलनकारियों को दस-दस लाख रुपये दिये जाने का आदेश दिया था। जिसमें मसूरी के तत्कालीन पुलिस अधिकारी डीएसपी उमाकांत त्रिपाठी व पौड़ी जिले के अग्निशमन ड्राइवर जीत बहादुर भी शामिल थे। इसके अतिरिक्त घटना में गुमशुदा राजेश नेगी को भी दस लाख का मुआवजा दिया गया। उच्च न्यायालय ने बलात्कार की शिकार बनी ७ महिला आंदोलनकारियों के लिए दस-दस लाख और अमानवीयता और अभद्रता की शिकार हुई महिलाओं को पांच-पांच लाख का मुआवजा देने का फैसला किया।

 

इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने गंभीर रुप से घायल हर आंदोलनकारी को २५ हजार रूपये और मामूली रूप से घायल आंदोलनकारियों को पांच-पांच हजार रुपये का मुआवजा देने का फैसला किया था। गिरफ्तार कर दूर की जेलों में डाले गए ३९८ आंदोलनकारियों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ। पहाड़ के इन लोगों के लिए उत्तर प्रदेश में दूर की जेलों में बंद होने के कारण जमानत काफी कठिन हो गई। न्यायालय ने इन लोगों को भी ५०-५० हजार का मुआवजा देने का आदेश दिया। गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के तत्कालीन कमिशनरों को कमेटी गठित करने के आदेश दिए उन्हें कहा गया कि वे दो माह के भीतर ही पीड़ितों की सूची उत्तर प्रदेश सरकार को भेज दें। इसकी जानकारी उच्च न्यायालय को भी उपलब्ध कराएं। कमेटी को निर्देश दिये गए कि पीड़ित आंदोलनकारी महिलाओं की पहचान सार्वजनिक न होने पाए। इसलिए उनके नाम गोपनीय रखे जाएं। उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिए कि उपरोक्त सूची की प्राप्ति के एक माह के भीतर ही मुआवजे की धनराशि दोनों मंडलों के कमिशनरों को अदा करें। एक माह के भीतर ही पीड़ितों को मुआवजे की राशि मिल जाए।

 

उच्च न्यायालय ने इस फैसले में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया कि क्या मुआवजे की राशि या उसका कुछ हिस्सा उन अधिकािरयों से वसूला जाएगा जिनके विरुद्ध न्यायिक कार्यवाही या विभागीय कार्यवाही होगी। माननीय न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा कि संवैधानिक गलतियों के कारण गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है।

 

न्यायालय ने इसके लिए गढ़वाल और कुमाऊं की तत्कालीन जनसंख्या (कुमाऊं-२४४३१९९ और गढ़वाल-२९८२९४७ यानी कुल ५९२६१४६ को प्रति व्यक्ति प्रति माह के हिसाब से पांच साल तक एक रुपये का मुआवजा देने  के आदेश दिये। इसमें ५० पैसे उत्तर प्रदेश और ५० पैसे भारत सरकार को अदा करने के आदेश दिये गये। यह धनराशि प्लान बजट के अतिरिक्त थी। न्यायालय ने उपरोक्त धनराशि को गढ़वाल और कुमाऊं में महिला उत्थान कार्यक्रमों पर खर्च करने के आदेश दोनों मंडलों के कमीशन को दिये थे। 

 

उच्च न्यायालय ने सीबीआई को निर्देशित करते हुए कहा कि जिन महिलाओं की जांच पूरी नहीं हुई उनकी जांच बिना किसी देरी के दो माह अंदर पूरी करें। जिन अधिकारियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है उनके खिलाफ संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई करें।

 

न्यायालय ने खासकर मूसरी खटीमा और मुजफ्फरनगर में गोली चलाने जानबूझकर हत्या करने जो जिंदा थे उन्हें बाद में गुमशुदा बनाए जाने जैसे आरोपों-प्रत्यारोप की जांच के अंतर्गत दो माह में करने के निर्देश दिये। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के जिन अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संज्ञान लिया उनके विरुद्ध लगे आरोपों व चार्जशीट के गुण-दोष के आधार पर जांच व कार्रवाई के निर्देश संक्षम अधिकारियों को दिये गये।

 

उत्तर प्रदेश सरकार को गढ़वाल और कुमाऊं के जिलों में अपराधों का संज्ञान लेने के लिए न्यायालय ने एक माह के भीतर ही विशेष अदालतें गठित करने के भी निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार को दिये। सरकार को उच्च न्यायालय की सलाह से यह भी सुनिश्चित करने के आदेश दिये कि जांच कर रहे पीठासीन व दंडाधिकारियों को उचित सुरक्षा दी गई है या नहीं। महिलाओं से बंद कमरे में जांच के आदेश दिये गये। इसके अलावा भी माननीय उच्च न्यायालय ने मानवाधिकारों के उल्लंघन पर जनहित में कई अहम फैसले दिये थे। माननीय उच्च न्यायालय ने तब उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया था कि देश की संसद की भावनाओं के अनुरूप राज्य में मानवाधिकार अधिनियम १९९२ के अंतर्गत मानवाधिकार आयोग का गठन किया जाए।

 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों पर तब हुए अमानवीय अत्याचारों को बहुत गंभीरता से लिया। न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों की पूरे देश में सराहना हुई। लेकिन राजनीतिक घटनक्रमों में उलझे उत्तराखण्ड राज्य के सत्ताधारियों को मानवाधिकारों के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है। जनता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस राज्य में मुख्यमंत्री की गद्दी पर आज एक पूर्व न्यायाधीश विराजमान है वहां अब तक मानवाधिकार आयोग पूर्ण रूप से अस्तित्व में नहीं आ पाया है। इसके गठन की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री विधानसभा अध्यक्ष राज्य के गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष की होती है। राज्य में घटिया राजनीति के चलते मानवाधिकारों की सुरक्षा की चिंता हाशिए पर चली गई है। यही वजह है कि राज्य में पिछले १२ वर्षों के दौरान निरंतर मानवाधिकारों का हनन होता आया है। लोग चिल्लाते रहे लेकिन सुनेगा कौन?

 

लगभग ६४ वर्ष पहले १० दिसंबर १९९८ (मानवाधिकार दिवस को संयुक्त राष्ट्र महासभा में मानवाधिकारों को लेकर व्यापक घोषणा की गई थी। जिसे भारत सहित दुनिया के ४८ देशों ने अपनाया। इस घोषणा में ३० धाराएं हैं जो दुनिया के सभी देशों के लोगों को राष्ट्रीयता धर्म भाषा से ऊपर उठकर बिना किसी भेदभाव के बराबर के मानव मूल्यों व बराबर का अधिकार प्रदान करते हैं। प्रदत्त सभी अधिकार एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक-दूसरे पर आधारित हैं। जिनको विभाजित नहीं किया जा सकता है। इनमें नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार जीने का अधिकार कानून के समक्ष समानता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार जैसे काम करने का अधिकार सामाजिक सुरक्षा और शिक्षा या सामूहिक अधिकार जैसे विकास का अधिकार आत्मनिर्णय इत्यादि शामिल है।

 

लोगों की जनभावनाओं के अनुरूप क्षेत्रीय विकास भी उनका मूल अधिकार है। जब वहां के लोगों की भावनाओं के अनुरूप विकास नहीं हुआ तो पृथक राज्य की मांग उठी। इस क्षेत्र के नेता और यहां से मुख्यमंत्री रहे लोगों ने जब उनकी भावनाओं को नहीं सुना तो उनका गुस्सा आंदोलन में तब्दील हुआ।

 

मानवाधिकारों की सुरक्षा भारत की प्राचीन परंपरा रही है। जिसका उदघोष समय-समय पर हमारे ऋषि-मुनियों और धर्मगुरुओं ने देवभूमि उत्तराखण्ड से किया है। दुर्भाग्य ही है कि भारत और उत्तराखण्ड के लोग अपनी प्राचीन संस्कृति को भूल गए। राज्य आंदोलन के दौरान २ अक्टूबर १९९४ को मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ लेकिन उत्तर प्रदेश और भारत की सरकारें दोषियों को बचाने में लगी रहीं। पृथक राज्य बनने के बाद भी दोषी स्वछन्द द्घूम रहे हैं। १८ साल बीत जाने के बावजूद मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु संगठन लड़ाई लड़ रहे हैं। प्रतिबद्ध आंदोलनकारी नारे लगाने को विवश हैं कि 'शहीदों हम शर्मिंदा हैं तुम्हारे कातिल जिंदा है।'

 

उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान राज्य आंदोलनकारियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिका भी असंवेदनशील रही। उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मानवाधिकारों के हनन को लेकर चल रहे मुकदमे में शामिल न होकर सिद्ध कर दिया कि वह तभी होश में आता है जब कश्मीर में सेना की गोली से कोई आतंकी मरता है। या फिर किसी दुराचारी के खिलाफ देश की जनता व पुलिस कार्रवाई करती है। ऐसा लगता है कि उत्तराखण्ड के मानवाधिकारों के मामले में इस आयोग ने सिर्फ सरकारी पिट्ठू की भूमिका निभाई। यह सरकारी तंत्र बनकर रह गया। नारी जगत की सुरक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय महिला आयोग की भूमिका भी औपचारिकता निभाने तक सीमित रही।

 

मानव मूल्यों व अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारत सरकार अगर १९८४ में सिख मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती तो शायद १९९४ में मुजफ्फरनगर कांड नहीं होता। दोषी पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी गलत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। मेरा मानना हैं कि मुजफ्फरनगर कांड के दोषी अधिकारियों को १८ साल बाद भी सजा न होना तत्कालीन डीआईजी बुआ सिंह को पदोन्नत करना उत्तराखण्ड सरकार द्वारा उसका रेड कार्पेट वेलकम करना और तत्कालीन जिलाधिकारी मुजफ्फरनगर अनंत कुमार सिंह को उत्तराखण्ड हाई कोर्ट द्वारा बरी किया जाना दर्शाता है कि इन अधिकारियों को सजा देने के बजाए बचाया जा रहा है। यह उन अधिकारियों को प्रोत्साहन देना भी है जो मानवाधिकारों को रौंदने को तत्पर रहते है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री अधिवक्ता और जज रहे हैं उन्हें कम से कम इस दिशा में गौर करना चाहिए।

 

राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड की जनता को लगा था कि उसे न्याय मिलेगा उसके मानवाधिकारों  का हनन करने वाले सलाखों के पीछे होंगे। विकास की गंगा बहेगी लेकिन हुआ एकदम विपरीत। जनता के सपने बहुत जल्द ही टूट गए। जिस राज्य के लिए उन्होंने वर्षों संघर्ष किया अपमान झेला प्रताड़ना सही वह कुछ मुट्ठी भर लोगों के लिए ऐशगाह बनकर रह गया। उनकी चिंता पीड़ित आंदोलनकारियों के घावों पर मरहम लगाने से कहीं अधिक अपने परिजनों को विधायक सांसद और मंत्री बनाने की रही है। ऐसे में नवोदित राज्य में मानवाधिकारों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।

 

(लेखक राज्य आंदोलनकारियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा को लेकर सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्षरत रहे हैं। फिलहाल उत्तराखण्ड मानवाधिकार संगठन के अध्यक्ष हैं।

 

 

 
         
 
ges tkus | vkids lq>ko | lEidZ djsa | foKkiu
 
fn laMs iksLV fo'ks"k
 
 
fiNyk vad pquss
o"kZ  
 
 
 
vkidk er

क्या मुख्यमंत्री हरीश रावत के सचिव के स्टिंग आॅपरेशन की खबर से कांग्रेस की छवि प्रभावित हुई है?

gkW uk
 
 
vc rd er ifj.kke
gkW & 57%
uk & 13%
 
 
fiNyk vad

 

  • गुंजन कुमार

इस बार का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री हरीश रावत के बीच केंद्रित रहा। मोदी ने जहां चार रैलियां की वहीं रावत

foLrkkj ls
 
 
vkidh jkf'k
foLrkkj ls
 
 
U;wtysVj
Enter your Email Address
 
 
osclkbV ns[kh xbZ
1532015
ckj