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उत्तराखण्ड में आज तक कहीं भी नक्सली हिंसा नहीं हुई। जिन लोगों को माओवादी होने के नाम पर गिरफ्तार किया गया उनके खिलाफ पुलिस न्यायालय में सबूत पेश करने में विफल रही है। हैरानी की बात है कि जनांदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले लोगों की आवाज अक्सर उन्हें माओवादी ठहराकर दबाई जाती रही है। जिस भूमिधारी अधिकार को जरिया बनाकर विजय बहुगुणा सितारगंज से चुनाव जीते उसके लिए संघर्ष करने पर आम लोगों को माओवादी ठहराया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या माओवाद राज्य में जनांदोलनों को दबाने का बहाना तो नहीं बन गया है

 

 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले दो सालों में करीब तीन-चार बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि नक्सलवाद इस देश के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा है। इसके अलावा पूर्व गृहमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी नक्सलियों के खतरे के मद्देनजर उनकी धर- पकड़ के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया जिसे बाद में मीडिया जनित अभियान कहकर नकार दिया गया। 

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूड़ी ने कुछ समय पहले दि संडे पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में स्वीकारा कि माओवादी उत्तराखंड को अपना अगला निशाना बनाने की योजनाएं बना रहे हैं। गृह मंत्रालय से जनवरी २०११ में जारी एक रिपोर्ट में भी उत्तराखंड के नेपाल से सटे इलाकों खासकर ऊधमसिंह नगरचंपावत और पिथौरागढ़ में माओवादी गतिविधियों के बढ़ने की बात स्वीकारी गई। लेकिन अभी तक उत्तराखंड में माओवादी गतिविधियों से संबधित गिरफ्तारियों पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि जिस तरह की बातें की गर्ईं हैं उसके मुकाबले किसी तरह की कोई बड़ी घटना या इससे संबंधित कोई पुख्ता सबूत आज तक पुलिस के हाथ नहीं लगे हैं। दरअसल उत्तराखंड में माओवादी या नक्सली हिंसा के खिलाफ तो एक भी मुकदमा अभी तक दर्ज नहीं किया गया है बल्कि माओवाद के नाम पर ही कुल छह मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इस संदर्भ में सूचना के अधिकार के माध्यम से उत्तराखंड सरकार के गृह सचिव से जानकारी मांगने पर पता चला है कि माओवाद संबंधी कोई मामला तीन साल पहले आखिरी बार चार फरवरी २००९ को सामने आया था जब पत्रकार प्रशांत राही की पत्नी चन्द्रकला तिवारी को काशीपुर रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तार किया गया था। राज्य में माओवाद संबंधी मामलों में अभी तक कुल १४ लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 

 

 

पुलिसिया दबिश की फेहरिस्त

क्र.सं.                 अभियुक्त            गिरफ्तारी           स्थिति

१.                 अनिल चौड़ाकोटि     २८/९/०५           २४ फरवरी २०१२ को जमानत पर रिहा।

२.                 नीलू बल्लभ             २८/९/०५           २५ अक्ूबर २००८ को जमानत पर रिहा।

३.                 जीवन चन्द्र आर्या     २८/९/०५           ३० अप्रैल २००८ को जमानत पर रिहा।

४.                 गोपाल दत्त भट्ट     २९/२/०८           ११ दिसंबर २०११ को जमानत पर रिहा।

५.                 राजेन्द्र फुलारा             ८/२/१०           तिहाड़ जेल दिल्ली में बंद। 

६.                 प्रशांत राही             २२/१२/०७           २१ अक्टूबर २०११ को जमानत पर रिहा। 

७.                 चन्द्रकला तिवारी     ४/२/०९           ७ मई २०१० को जमानत पर रिहा।

८.                  हयातराम             ३०/८/२००४            ४ जून २००५ को जमानत पर रिहा।

९.                  राम लाल             ३०/८/०४            २८ दिसंबर २००४ को जमानत पर रिहा।

१०.                  प्रकाशराम             ३०/८/०४            २० नवंबर २००५ को जमानत पर रिहा।

११.                  कल्याण सिंह कार्की     ३०/८/९४             २८ दिसंबर २०० को रिहा।

१२.                  दिनेश पांडे              २८/२/०८              २६ सितंबर २००९ को जमानत पर रिहा।

१३.                  जीवन सिंह कार्की   कोई सूचना नहीं      जमानत पर रिहा।

१४.                   कैलाशराम              ३०/८/०४              २३ दिसंबर २००४ को जमानत पर रिहा।

१५.                  शंकर राम            वांछित

१६.                  चन्दन वांछित

१७.                  ईश्वर चन्द फुलारा      २०/९/०४               २७ अक्टूबर २००४ को जमानत पर रिहा। 

१८.                  संतोष राम.              /९/०४                १५ नवंबर २०१० को जमानत पर रिहा।

१९.                  कमल दा              वांछित 

२०.                  हरीश              १८/९/०४                १५ अक्टूबर २०१० को जमानत पर रिहा।

२१.                  पावेल                      वांछित

२२.                  मोहन              वांछित

२३.                  ललित मोहन              १९/४/०७                ५ अक्टूबर २००७ को जमानत पर रिहा।

२४.                  देवेन्द्र चमियाल      वांछित                रेंज पुलिस कुंमाऊ द्वारा १० हजार रुपए 

का इनाम घोषित।

२५.                  ज्योति                        वांछित

२६.                  रुचि                वांछित

२७.                  शिवराज सिंह बगड़वाल ८/२/१०                 जिला जेल कानपुर में बंद। 

२८.                  गौरंगचौड़               कोई रिकॉर्ड नहीं               रिहा

२९.                  खीम सिंह                 वांछित                   रेंज पुलिस कुंमाऊ द्वारा १० हजार 

का इनाम घोषित।

 

राज्य में माओवाद संबंधी पहला मामला २९ अगस्त २००४ का है जब पुलिस ने ऊधमसिंह नगर के हसपुर वन रेंज की पहाड़ियों से पांच कथित माओवादियों को गिरफ्तार करने का दावा किया। इन लोगों में हयातराम उसका बेटा प्रकाश रमेश कल्याण सिंह कार्की और कैलाश राम शामिल थे। इस मामले में पुलिस ने इन पांच लोगों के अलावा २१ अन्य व्यक्तियों के खिलाफ भी आर्म्स एक्ट और देशद्रोह के तहत मुकदमा दर्ज किया था। इसके बाद दूसरा मामला ६ सितंबर २००४ का है। पुलिस का कहना है कि चंपावत के व्याधुरा जंगलों में माओवादी कथित रूप से अपना प्रशिक्षण शिविर चला रहे थे। पुलिस को इसकी सूचना मिली और उन्होंने छह सितंबर को उपरोक्त जगह पर छापा मारा लेकिन तब सभी माओवादी शिविर छोड़कर भाग गए थे। घटनास्थल पर माओवादी शिविर आयोजित होने संबंधी भी कोई सबूत नहीं मिला। लेकिन पुलिस ने शंका के आधार पर अनाम लोगों के विरुद्ध देशद्रोह और आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। इसके बाद और किसी तरह की कोई माओवादी गतिविधि चंपावत में पुलिस को देखने में नहीं आई।

 

अगला मामला १० सितंबर २००४ का है। तहसील जैती शहर फाटक के पास डामर गांव में रहने वाले बचीराम की झोपड़ी में कुछ लोगों ने आग लगा दी। इस घटना में अल्मोड़ा निवासी ललित मोहन और हरेन्द्र नैनीताल निवासी संतोष और हरीश चंपावत निवासी अनिल चौड़ाकोटि और एक अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई। इन सभी पर आर्म्स एक्ट देशद्रोह आदि धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया और बताया गया कि झोपड़ी में आग लगाने वाले ये सभी लोग माओवादी विचारधारा में विश्वास रखते हैं। ललित मोहन को २० सितंबर को अल्मोड़ा से हरीश और संतोष को १९ सितंबर को नैनीताल से गिरफ्तार कर लिया गया। संतोष और हरीश को पुलिस ने कैसे पकड़ा इसकी कहानी भी कुछ अटपटी सी लगती है। पुलिस का कहना है कि हरीश और संतोष को शहर में संदिग्ध अवस्था में द्घूमते हुए पाया गया। पुलिस ने पूछताछ की तो इन दोनों ने सौफुटिया में आयोजित किए गए 

 

माओवादी कैंप में प्रशिक्षण लेने की बात स्वीकार की और इनकी निशानदेही पर पुलिस ने पांच देसी कट्टे और १४ कारतूस बरामद किए। इसके एक साल बाद पुलिस फिर हरकत में आई और २८ सितंबर २००५ को ऊधमसिंहनगर के गदरपुर क्षेत्र के गांव राधाकांतपुर से माओवादियों के जोनल कमांडर बताए जाने वाले अनिल चौड़ाकोटि नीलू बल्लभ और पत्रकार जीवन चन्द्र आर्य को गिरफ्तार कर लिया। 

 

माओवाद के नाम पर गिरफ्तारी का उत्तराखंड में सबसे चर्चित मामला पत्रकार और एक्टिविस्ट प्रशांत राही का रहा। २२ दिसंबर २००७ को प्रशांत की गिरफ्तारी हसपुर खत्ता के पास से दिखाई गई। पुलिस ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने अपने माओवादी साथियों के साथ मिलकर हसपुर खत्ता में माओवादी प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया था। इसी मामले में फरवरी २००८ में गोपाल भट्ट और दिनेश पांडे को भी गिरफ्तार किया गया। एक साल बाद  चार फरवरी २००९ को प्रशांत की पत्नी चन्द्रकला तिवारी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। चन्द्रकला को सात मई २००७ और प्रशांत को कोई ठोस सबूत न मिलने पर २१ अगस्त २०११ को जमानत पर रिहा कर दिया गया। गौर करने लायक बात है कि प्रशांत ने उत्तराखंड में प्रशासन के खिलाफ हुए कई जनआंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। यूपी एसटीएफ द्वारा ८ फरवरी २०१० को गिरफ्तार किए गए राजेन्द्र फुलारा और शिवराज सिंह बगड़वाल को छोड़ दें तो सभी मामलों के ज्यादातर अभियुक्त फिलहाल जमानत पर रिहा हैं। राजेन्द्र और शिवराज फिलहाल दिल्ली के तिहाड़ और कानपुर की जेल में बंद हैं। 

 

  उत्तराखंड के नेपाल से सटा होने के कारण नेपाल में माओवादी शासन के सत्ता संघर्ष के दिनों में पुलिस ने इधर भी हलचल बढ़ने का तर्क दिया था। सभी घटनाओं की तरफ ध्यान दें तो ज्यादातर की जमीन २००४-०५ में ही तैयार की गई। लेकिन इनमें से ज्यादातर मामलों में पुलिस को कोर्ट में शर्मिंदगी ही उठानी पड़ी। जिन लोगों को माओवादी गतिविधियों में संलिप्त बताया गया उनमें से आठ तो भूमिहीन कृषक मजदूर साबित हुए। पुलिस की सबसे ज्यादा किरकिरी हसपुर खत्ता मामले में हुई। ईश्वर सिंह फुलेरा उर्फ जूनियर नाम के व्यक्ति की गिरफ्तारी पुलिस ने हसपुर खत्ता में दिखाई और चार्जशीट में लिखा कि इसके पास से माओवादी साहित्य बरामद हुआ है। लेकिन जब २५ सितंबर को चार्जशीट दायर की गई तो अदालत ने पाया कि जूनियर के खिलाफ दिए गए सबूतों को उसी दिन के अखबार में लपेट कर सील किया गया था। इसके अलावा हसपुर में जिस जगह पुलिस कांबिग करना दिखा रही है वहां तक तो पुलिस का कोई वाहन ही नहीं पहुंच सकता। इसी तरह राधाकांतपुर में हुई मुठभेड़ और फायरिंग के बारे में आस-पास के लोगों को कुछ नहीं पता है। १४ जून २०१२ को हसपुर खत्ता मामले में पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बताते हुए ऊधमसिंह नगर की एक फास्ट टै्रैक कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई और हयात राम रामलाल प्रकाश राम और कल्याण सिंह कार्की को बाइज्जत बरी कर दिया। 

 

दरअसल नीलू प्र शांत राही चन्द्रकला तिवारी गोपाल भट्ट दिनेश पांडे और जीवन चन्द्र सभी मामलों में एक ही बात समान नजर आती है कि इन सभी लोगों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जारी लूट और प्रशासन के गैरजिम्मेदार रवैये के खिलाफ आवाज उठाई थी। जिस भूमिधरी अधिकार को जरिया बना आज विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं उसके लिए नीलूबल्लभ पिछले दस सालों से लड़ाई लड़ रहे थे। इसके अलावा जीवन चन्द्र पुलिस और प्रशासन के काले कारनामों को जनता के सामने लाने के लिए अखबार निकालते थे। गिरफ्तारी से पहले भी उन्होंने क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बढ़ते चलन पर अपने अखबार का एक विशेषांक निकाला था। उनके जमानत पर छूटने के बाद दोबारा अखबार निकालने की बात को सुनकर पुलिस ने हाईकोर्ट में उनकी जमानत निरस्त करने के लिए अपील भी दायर कर दी है। फिलहाल तो इन सभी मामलों में पुलिस की संदिग्ध भूमिका को लेकर बार-बार प्रश्न उठे हैं और अदालत ने उन्हें खुद अपनी पीठ थपथपाने की जगह ठोस सबूत पेश करने के लिए कहा है। लेकिन इन सभी मामलों से एक सवाल तो निकलकर सामने आ ही रहा है कि जिन लोगों को अपने जीवन के कई-कई वर्ष जेल में बिना कोई जुर्म किए बिताने पड़े हैं उनकी भरपाई सरकार या पुलिस किस तरह कर पायेगी। 

(लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

 
         
 
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