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पलायन प्रवास

 

देश के महानगरों से लेकर सात समुंदर पार विदेशों में रह रहे उत्तराखण्ड के प्रवासियों का पहाड़ के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अपनी जड़ों से जुड़े ये प्रवासी परंपरागत त्योहारों को बड़े उल्लास से मनाते हैं। दिल्ली मुंबई आदि नगरों में आज भी पहाड़ी रामलीलाओं के सैकड़ों मंचन होते हैं। शिक्षा के विकास के साथ ही अब कई प्रवासी संगठन पहाड़ के स्कूल-कॉलेजों में कॅरियर काउंसलिंग के कार्यक्रम आयोजित कर उज्ज्वल भविष्य के लिए बच्चों का मार्गदर्शन भी कर रहे हैं

 

उत्तराखण्ड समाज के लोगों ने आजीविका और विकास के लिए समय- समय पर अपनी पैतृक जगहो से पलायन किया है। प्राचीन भारत में उज्जयनि (उज्जैन के दरबार में उत्तराखण्ड की नृत्यांगना चकौड़ी ने अपनी कला की गहरी छाप छोड़ी थी। कुछ विद्वानों का मत है कि उज्जयनि के दरबार के प्रतिष्ठित महाकवि कालिदास भी उत्तराखण्ड के अंतर्गत रुद्रप्रयाग जिले के एक गांव क्वीलठा में जन्मे और वे राज्य से पलायन करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। कालिदास ही क्यों देखा जाए तो जिन महाराज भरत के नाम से हमारे देश का नाम भारत पड़ा वह खुद उत्तराखण्ड से पलायन करने वाले पहले व्यक्ति थे। अगर वह वहां से बाहर नहीं निकलते तो भारत वर्ष का निर्माण नहीं कर पाते। भरत का जन्म शिक्षा-दीक्षा लालन-पालन सब कुछ उत्तराखण्ड स्थित कण्वाश्रम में हुआ था। इतिहासकारों के मुताबिक उनकी मां शकुंतला उत्तराखण्ड की ही थीं। भरत को अपनी जन्मभूमि और ननिहाल से प्रेम था लेकिन विकास के लिए उन्हें वहां से बाहर निकलना पड़ा।

 

देश की आजादी से पूर्व उत्तराखण्ड के लोग लाहौर पेशावर रंगून आदि जगहों तक गये। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जब आजाद हिंद फौज की स्थापना की तो रंगून (बर्मा में रहने वाले अधिकांश उत्तराखण्डी इसमें शामिल हुए। लोगों में अपनी पैतृक जड़ों से जुड़े रहने की इतनी तीव्र इच्छा थी कि देश की आजादी से पूर्व लाहौर में रह रहे प्रवासियों ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते रहने के साथ ही अपने क्षेत्र के विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया। गढ़वाल हितैषिणी सभा वहीं अस्तित्व में आई थी। आज इस सभा के हजारों सदस्य हैं और देश विभाजन के बाद इसका संचालन निरंतर दिल्ली से हो रहा है। दिल्ली में गढ़वाल और कुमाऊं भवन अस्तित्व में हैं। देश के अन्य शहरों में भी प्रवासियों ने ऐसे भवन बनाए हैं। फरीदाबाद स्थित गढ़वाल भवन से बाकायदा शिक्षण प्रशिक्षण की गतिविधियां संचालित हो रही हैं। उत्तराखण्ड समाज में लोग शिक्षा में भी पीछे नहीं है। नोएडा में उत्तराखण्ड पब्लिक स्कूल अपनी अच्छी पहचान बना चुका है।

 

देश विभाजन के बाद दिल्ली मुंबई लखनऊ इलाहाबाद जयपुर चंडीगढ़ आदि कई शहरों के लिए उत्तराखण्ड के लोगों ने पलायन किया। लाहौर में जो लोग रह रहे थे वे भी इन्हीं शहरों में आए। अब चिंता अपने समाज के विकास को लेकर हुई। प्रवास में रहते हुए भी वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहे। इसलिए जहां एक ओर उन्होंने सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया वहीं अपने-अपने क्षेत्रों के चुने हुए प्रतिनिधियों से संपर्क साधकर उन्हें जन समस्याओं से अवगत कराने का काम किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधि भी बड़े उत्साह से शामिल होते थे। यहां तक कि भारत रत्न स्वर्गीय पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने लाल किले के पीछे के मैदान में प्रवासियों के लिए होली मिलन कार्यक्रम की शुरुआत करवाई थी। कुछ साल पहले तक इसमें पर्वतीय समाज के लोग बड़े उल्लास से जुटते थे। पंत के प्रयासों से ही उत्तराखण्डवासियों को यमुना नदी के किनारे स्थित निगम बोध घाट पर अपनी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार मिला। आज भी पहाड़ के लोग अन्य समाजों से हटकर यमुना के किनारे अपने शवों का अंतिम संस्कार करते हैं। पंत जी के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा नारायण दत्त तिवारी केसी पंत मुरली मनोहर जोशी हरीश रावत भुवन चन्द्र खण्डूड़ी भगत सिंह कोश्यारी सहित तमाम उत्तराखण्डी राजनेता अपने क्षेत्र के प्रवासियों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं। कुछ साल पहले दिल्ली में उत्तराखण्ड के पहले विधायक मुरारी सिंह पंवार ने भी यमुना पार में होली मिलन कार्यक्रम की शुरुआत की थी। 

 

प्रवास में अपने त्योहारों और उत्सवों को मनाने की ललक इस कदर हावी रही कि कुछ साल पहले तक बंबई में उत्तराखण्ड की रामलीलाओं के करीब सौ मंचन हुए थे। यही स्थिति दिल्ली में रही। प्रवास में हर जगह उत्तराखण्ड की रामलीलाएं आयोजित होती हैं। दिल्ली में पर्वतीय कला केंद्र की रामलीला ने अपनी खास पहचान बनाई है। उत्तराखण्ड आंदोलन जिन दिनों चरम पर था तो उस वक्त मुजफ्फनगर कांड से दुखी दिल्ली में प्रवासियों की करीब १०० रामलीला कमेटियों ने रामलीलाओं का मंचन नहीं करने का फैसला लेकर अपनी सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता का परिचय दिया था। दीपावली के अवसर पर सभी प्रवासी संगठनों ने अपने समाज के लोगों से राज्य के शहीद आंदोलनकारियों के सम्मान में दो मिनट का ब्लैक आउट करने की अपील की थी। मुजफ्फरनगर कांड से दुखी प्रवासियों में इस अपील का इतना असर हुआ कि उन्होंने उस वर्ष दीवाली नहीं मनाई और रात को दो मिनट के लिए अपने घरों की बत्तियां बुझा दी थी। दीपावली पर उत्तराखण्ड के प्रवासी अपने घरों में परंपरागत ऐपण और तोरण द्वार बनाते हैं। सभी परंपरागत पर्व लोग बड़े हर्षोंल्लास से मनाते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में देश की आजादी से पूर्व भी कुमाऊंनी होली का आयोजन होता था। लखनऊ में जब गोविंद बल्लभ पंत मुख्यमंत्री थे तो उनके घर पर भी कुमाऊंनी होली का आयोजन होता था। हरिद्वार के भीमगौड़ा में आज भी १०-१५ दिन तक बैठकी होली गायी जाती है। १९८८ ८९ से नोएडा में उत्तराखण्ड विचार मंच के बैनर तले ५ दिन बैठकी होली का आयोजन होता।

 

प्रवासी न सिर्फ अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रहे बल्कि उन्होंने अपनी क्षेत्र की जनसमस्याओं की तरफ भी जनप्रतिनिधियों का ध्यान दिलाया। जिले और पट्टी स्तर की कई संस्थाएं वर्षों से यह काम कर रही हैं। प्रवास में इन संस्थाओं की सक्रियता इस कदर रही कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ ़ शिवानंद नौटियाल के लिए संगठित होकर काम कर उन्हें कर्णप्रयाग क्षेत्र से चुनाव लड़वाया था। प्रवास में पर्वतीय लोगों की बड़ी संख्या होने के चलते यह शुरू से उत्तराखण्ड की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी रहा। टिहरी की आजादी के आंदोलन में ८४ दिनों का ऐतिहासिक अनशन करने वाले श्रीदेव सुमन ने दिल्ली में ही हिमालय सेवा संघ का गठन किया था। ७० के दशक में उत्तराखण्ड आंदोलन के स्तंभ स्वर्गीय ऋषि बल्लभ सुंदरियाल और टिहरी गढ़वाल के तत्कालीन सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में बोट क्लब पर हुए विशाल प्रदर्शन को सफल बनाने में प्रवासियों की बड़ी भूमिका रही। क्षेत्रीय पार्टी उक्रांद ने भी शुरू से ही प्रवास में अपनी गतिविधियां संचालित करने पर ध्यान दिया। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से भाजपा के टिकट पर सांसद बनने से पहले जीवन शर्मा दिल्ली में उक्रांद के अध्यक्ष रह चुके थे। बंबई के प्रवासी और हिलांस के संपादक अर्जुन सिंह गुंसाईं ने भी १९८९ में उक्रांद के टिकट पर गढ़वाल क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इसके अलावा बहुत से आंदोलनकारी संगठनों का उदय भी प्रवास में हुआ। फिल्मों के निर्माण का सिलसिला प्रवास से ही शुरू हुआ। खेल के क्षेत्र में गढ़वाल हीरोज जैसी संस्थाओं की अच्छी साख है।

 

वर्ष १९९४ में जब उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन चरम पर था तो उस समय प्रवासियों ने दिल्ली बंबई इलाहाबाद लखनऊ चंडीगढ़ जयपुर आदि तमाम जगहों पर धरने-प्रदर्शन और रैलियों का आयोजन किया। २ अक्टूबर को लालकिले पर आयोजित विशाल रैली में भाग लेने के लिए विभिन्न शहरों में रह रहे पर्वतीय लोग दिल्ली पहुंचे। जंतर-मंतर आंदोलनकारी गतिविधियों के संचालन का केंद्र होता था। दिल्ली और एनसीआर के प्रवासियों ने दूर-दूर से आये आंदोलनकारियों के लिए भोजन आदि की व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

 

प्रवासियों ने जनजागरूकता और प्रतिभा विकास की दिशा में भी सराहनीय काम किये हैं। एक समय बंबई से निकलने वाला हिलांस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों का लोकप्रिय अखबार होता था। बाद के वर्षों में दिल्ली से पर्वतीय टाइम्स आदि अखबार निकले। पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र दि संडे पोस्ट का उत्तराखण्ड संस्करण पहाड़ की समस्याओं को प्रमुखता से प्रकाशित कर रहा हूं। इसी कड़ी में दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक प्यारा उत्तराखण्ड और मुंबई से प्रकाशित पत्रिका डांडी-कांठी भी शामिल है। अलकनंदा पत्रिका का भी कई वर्षों तक दिल्ली से प्रकाशन हुआ। आज दिल्ली बंबई और तमाम अन्य शहरों से पर्वतीय सरोकारों को लेकर कई अखबार व पत्रिकाएं निकल रहीं हैं। भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के उद्देश्य से ८० के दशक में जब कनकटा बैल पहाड़ से दिल्ली पहुंचा तो वह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया। अब जैसे-जैसे शिक्षा का विकास हो रहा है तो प्रवास में रह रहे शिक्षित युवाओं ने पहाड़ के स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों का मार्गदर्शन करना भी शुरू कर दिया है। पढ़े-लिखे इन युवाओं की संस्थाएं पहाड़ों के स्कूलों में जाकर वहां कॅरियर काउंसलिंग के जरिये बच्चों का मार्ग दर्शन कर रही हैं। संचार के आज के युग में विदेशों में काम कर रही प्रवासी संस्थाओं की गतिविधियों से भी पहाड़ के लोग अवगत हो पा रहे हैं। खाड़ी उत्तरी अमेरिका कनाड़ा ब्रिटेन आदि तमाम जगहों पर रह रहे प्रवासी पहाड़ के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं। इन कार्यक्रमों में वह पहाड़ के लोक गायकों और संस्कृतिकर्मियों को भी आमंत्रित करते हैं। 

 

राज्य निर्माण के बाद जनभावनाओं के अनुकूल विकास कार्य न होने और राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार ने प्रवासियों को भी बेहद आहत किया है। आंदोलन के दौरान वे सोचते थे कि पलायन पर अंकुश लगेगा और उनकी घर वापसी के भी रास्ते बनेंगे लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। इसके लिए वे समय-समय पर धरने-प्रदर्शन कर राज्य की सरकार को झिंझोड़ते रहते हैं। मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा दिलाने के लिए वह हर साल जंतर-मंतर पर एकत्रित होकर काला दिवस मनाते हैं।

(लेखक उत्तराखण्ड जनता संघर्ष मोर्चा के महासचिव हैं।

 

 

 
         
 
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