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पलायन प्रवास
 
मार्तभूमि लौटने को बेताब प्रवासी

 

पलायन उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी समस्या है। यह इतना गंभीर रूप ले चुकी है कि पलायन को लेकर कहावतें भी बनी हैं। एक ऐसी ही कहावत चर्चित है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी दोनों उसके काम नहीं आये। इसका सीधा सा अर्थ युवाओं के पलायन को लेकर है।

 

उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना के १२ साल बाद भी राज्य को छोड़कर बाहर बसने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। पलायन को रोकने के लिए सरकार की हर कोशिश विफल रही है यह स्थिति तब है जब प्रदेश छोड़कर बाहर बसने वाले अधिकतर लोगों ने बातचीत के दौरान इस बात को कहा कि वह वापस जाना चाहते हैं। लेकिन सभी उत्तराखण्ड में आय के संसाधनों की कमी का हवाला देकर कहते हैं कि वहां गए तो खाएंगे क्या। राज्य गठन के १२ साल बाद भी किसी सरकार ने लगातार बाहर जा रही युवा शक्ति को रोकने और वापस बुलाने के लिए कोई ठोस कदम और योजनाएं नहीं बनाई हैं।

 

इन्हीं सब कारणों से लाखों पहाड़ी लोग प्रदेश से बाहर महानगरों में जाकर बस चुके हैं। जिन्होंने बड़ी कोशिश और जतन से अपने अंदर के उस पहाड़ी को जिंदा रखा है जो कई दशकों पहले विभिन्न कारणों से अपनी जन्म भूमि को छोड़ चुका है। इसलिए वर्ष २००० को उत्तर प्रदेश से अलग हुए भौगोलिक टुकड़े ही सिर्फ उत्तराखण्ड मान लेना काफी नहीं हैं। आज देश के लगभग हर बड़े शहर में जाकर बस चुके उत्तराखण्डियों ने वहां भी एक मिनी उत्तराखण्ड बना दिया है।

दि संडे पोस्ट ने उत्तराखण्ड विशेषांक के लिए प्रदेश से बाहर जाकर बसे उत्तराखण्ड को टटोलने की कोशिश की है। जिसके लिए हमने कई प्रवासी उत्तराखण्डियों से बात की और यह जानने की कोशिश की है कि ऐसे कौन से कारण थे जिससे उन्हें अपने प्रदेश को छोड़कर दूसरे प्रदेश जाना पड़ा। इसके अलावा यह भी कि कैसे उन्होंने देवभूमि की संस्कृति को अभी तक अपने पास बचा कर रखा है और अपने प्रदेश के लिए वह आज भी क्यों चिंतित हैं।  

 

उत्तराखण्ड से बाहर उत्तराखण्ड

रोजगार पाने और बेहतर पढ़ाई की चाह ने उत्तराखण्ड से कई युवाओं को दिल्ली मुंबई और लखनऊ जैसे दूसरे शहरों की ओर खींचा। इन शहरों में पहाड़ के लोगों की अच्छी खासी आबादी है। सबसे पहले बात करें दिल्ली की। देश की इस राजधानी की ओर उत्तराखण्ड के लोगों ने अलग राज्य बनने से काफी पहले ही आना शुरू कर दिया था। वर्तमान में दिल्ली में कई संगठन सक्रिय हैं। इन संगठनों में से अधिकतर का गठन उत्तराखण्ड को अलग प्रदेश बनाने की मांग को लेकर हुआ था। पहाड़ियों को एक साथ करने और एकजुट रखने के लिए दिल्ली में दर्जनों संगठन सक्रिय हैं जोकि राजनीतिक सांस्कृतिक और कई आयोजन कर अपने लोगों को एकजुट करने की कोशिश में लगे हैं। उत्तराखण्ड परिषद उत्तराखण्ड चिंतन उत्तराखण्ड जनता संद्घर्ष मोर्चा रुद्रप्रयाग जन विकास समिति टिहरी उत्तरकाशी जन विकास परिषद गढ़वाल हितैषिणी सभा आदि इनके कुछ उदहारण हैं। ये संगठन न सिर्फ उत्तराखण्ड की समस्याओं से खुद को जोड़ कर रखते है बल्कि प्रदेश से बाहर रह रहे उत्तराखंडियों को एकजुट करने की कोशिश भी करते हैं।

 

अब बात मुंबई की। जान कर हैरानी होगी कि वर्तमान में मुंबई में ६५ से ज्यादा संस्थाएं काम कर रही हैं। यहां भी हजारों की संख्या में उत्तराखण्डी रहते हैं। पहाड़ से मुंबई का रास्ता तय करने वाले अधिकतर पहाड़ी देश की आर्थिक राजधानी की तरफ रोजगार के लिए गए। कुछ ने वहां जाकर नौकरी ढूंढ़ी तो कुछ को वहीं नौकरी मिली। जाने- माने साहित्यकार हरि मृदुल जो पिछले १९ सालों से मुंबई शहर में हैं। मृदुल की रचनाओं में दूरियों के बाद भी पहाड़ साफ नजर आता है। पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्हें मुंबई में ही नौकरी मिली और तब से वह मुंबई में हैं। मृदुल बताते हैं कि वह कई संस्थाओं से जुड़े हैं और लगातार मुंबई में रह रहे पहाड़ियों के हित के लिए काम करते हैं। 

 

लखनऊ भी एक महत्वपूर्ण जगह है। अविभाजित उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के कारण यहां भी बड़ी संख्या में उत्तराखण्ड के लोग आकर बसे हैं बेहतर शिक्षण संस्थान होने के कारण यहां ज्यादातर युवा पढ़ाई के लिए आए। लेकिन वर्ष २००१ से पहले पूरे प्रदेश का सचिवालय इसी शहर में था। जिस कारण सरकारी नौकरियां मिलने पर कई परिवार लखनऊ के ही होकर रह गए। सिर्फ इतना ही नहीं बड़े और महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों ने कई उत्तराखण्डियों को नौकरी दी और उन्हें लखनऊ का ही बना दिया। लखनऊ में भी कई मंच तैयार हुए हैं जो सांस्कृतिक समारोहों और होली मिलन के नाम पर पहाड़ के लोगों को एकजुट किए हुए हैं।

 

उत्तराखण्ड की संस्कृति और प्रवासी

उत्तराखण्ड की पहचान वहां की पहाड़ी संस्कृति से है। दशकों से बाहर रह रहे प्रवासियों ने बहुत जतन से बेडू पाको बारो मासा की इस उत्तराखण्डी संस्कृति को सहेज कर रखा है। सौ से भी अधिक सक्रिय संस्थाएं इन बड़े शहरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम करती हैं। जिससे कुछ और हो न हो लेकिन उत्तराखण्ड से बाहर के लोग वहां के लोक संगीत और लोक नृत्य से परिचित होते रहे हैं। लेकिन इस विषय के जानकार इस तरह के नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों का विरोध भी करते हैं। दिल्ली के एक संगठन उत्तराखण्ड परिषद के अध्यक्ष मोहन बिष्ट कहते हैं कि सिर्फ कार्यक्रमों से सांस्कूतिक को बचाया नहीं जा सकता। सिर्फ संस्कूतिक कार्यक्रमों का आयोजन पहाड़ी सांस्कूति को बचाने के लिए न तो महत्वपूर्ण है और न ही आवश्यक। बिष्ट कहते हैं कि संस्कूति बचाने के लिए उस जगह को बचाना होगा जहां से वह पनपी है। उत्तराखण्ड के मामले में हमें अपने गांवों को बचाना होगा। कार्यक्रम तो अमेरिका इंग्लैंड और यूगांडा जैसे देशों में भी होते हैं। उत्तराखण्ड संद्घर्ष के दौरान बने संगठन उत्तराखण्ड लोकमंच के महासचिव दिनेश ध्यानी के अनुसार बाहर रहने वाले उत्तराखंडियों को बाहर अपनी बोली-भाषा और संस्कृति को बचा कर रखने के लिए छोटे-छोटे आयोजनों में अपने तौर तरीकों से काम करना चाहिए। त्योहारों तथा शादी आदि में अपनी संस्कूति का अनुसरण करना चाहिए। मुंबई से रचनाकार हरि मृदुल लगातार उत्तराखण्ड की संस्कूति के पतन के लिए सरकार को दोषी मानते हैं। उनके अनुसार सरकार महत्वपूर्ण तिथियों पर पैसा खर्च कर संस्कूति के नाम पर जो आयोजन प्रदेश से बाहर करवाती है वह कोई ठोस कदम नहीं मात्र खानापूर्ति है। उत्तराखण्ड के कई लोक वाद्ययंत्र ऐसे हैं जो अब कहीं सुनाई नहीं देते। इसके अलावा दिल्ली मुंबई और दूसरे शहरों में उत्तराखण्ड लोक संगीत के नाम पर जो चीजें परोसी जा रही हैं उनमें से ९० प्रतिशत अश्लीलता परोस रहे हैं।

अगर वाकई अप्रवासियों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने हिस्से का उत्तराखण्ड अपने अंदर जिंदा रखें तो उन्हें इसके लिए सरकारी मदद की जरूरत होगी। मृदुल भी गांवों की रक्षा पर जोर देते हैं। वह कहते हैं कि उत्तराखण्ड चंद पर्यटन स्थल नहीं बल्कि वह दुर्गम गांव हैं जहां तक आम आदमी पहुंच ही नहीं पाता। उसे जानना तो बहुत दूर की बात है।

 

उत्तराखण्ड से बाहर रहने वालों की अपने प्रदेश के प्रति चिंताएं उत्तराखण्ड से दूर होने के बाद भी प्रदेश को लेकर कई ऐसी बातें हैं जो प्रवासियों को चिंतित करती हैं। लेकिन बाहर रह रहे लोगों की सबसे बड़ी चिंता प्रदेश में बढ़ते भ्रष्टाचार की है। 

 

देवभूमि में बढ़ रहा भ्रष्टाचार देश और विदेश में रहने वाले उत्तराखंडियों की प्रदेश के प्रति चिंता का सबसे बड़ा कारण है। अपने राज्य को लेकर दिल्ली के दिनेश ध्यानी बताते हैं कि उन्हें और उनके संगठन से जुड़े सैकड़ों उत्तराखण्डियों को सबसे बड़ी चिंता बंटते पहाड़ की है। कभी कुमाऊं बनाम गढ़वाल और अब पहाड़ बनाम मैदान के नाम पर उत्तराखण्ड को बांटा जा रहा है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि राजनेता इस मतभेद को दूर करने की कोशिश करने के बजाए इसका राजनीतिक लाभ लेने की जुगत में लगे रहते हैं। इसके अलावा दूसरी सबसे बड़ी समस्या पहाड़ में रोजगार की कमी (जोकि पलायन का सबसे बड़ा कारण है) तथा पहाड़ी इलाकों के विकास के लिए अलग योजनाओं का न होना हैं। तीसरे नंबर पर अप्रवासियों की सबसे बड़ी चिंता उत्तराखण्ड में जल जंगल और जमीन के बेहिसाब हो रहे दोहन की है। हरि मृदुल अपने साहित्यिक अंदाज में कहते हैं कि अगर इन चीजों पर काबू कर लिया जाए तो पहाड़ की खूबसूरती का मुकाबला पूरी दुनिया में कोई दूसरी जगह नहीं कर सकेगी।

 

पहाड़ों से लगातार कम होते युवाओं और खाली होते सीमांत प्रदेश भी कुछ लोगों की चिंता का विषय हैं। कुछ लोगों का कहना है कि अब उत्तराखण्ड रिटायर्ड अधिकारियों और अध्यापकों के रहने की जगह बनती जा रही है। लगातार पतन की ओर जा रही पहाड़ की संस्कृति भी बाहर रह रहे लोगों के लिए चिंता का विषय है।

 

राजनीति और प्रवासी उत्तराखण्डी

प्रदेश से बाहर रह रहे उत्तराखंडियों की तादार इतनी है कि इनका राजनीति में महत्व सभी जानते और समझते हैं। यही कारण है कि उत्तराखण्ड में चुनावों के दौरान नेता इन्हें यहां से ले जाने और वापस छोड़ने की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं। लेकिन बाहर रह रहे ये उत्तराखण्डी प्रदेश से जुड़े चुनावों के खत्म होने के बाद उपेक्षित किए जाते हैं। दिल्ली मुंबई जैसे बड़े शहरों की राजनीति में इनकी पकड़ न के बराबर है। छोटे- छोटे चुनावों में इन्हें मौका नहीं दिया जाता कि वह अपनी कम्युनिटी का नेतृत्व कर सकें।

 

प्रवासी उत्तराखण्डियों की इस राजनीतिक स्थिति का कारण पहाड़ियों के बीच एकता का अभाव है। उत्तराखण्ड की सीमाओं से बाहर बसा बुद्धिजीवी वर्ग भी यह मानता है कि आपसी ईर्ष्या ने इन प्रवासियों को बहुत नुकसान पहुंचाया है। लखनऊ में पिछले कई सालों से रह रहे आनंद कहते हैं कि बड़े शहरों में हम इतनी बड़ी संख्या में हैं इसके बाद भी हम अपनी कोई राजनीतिक जमीन नहीं बना पाए। कारण साफ है कि हम खुद को एक मंच पर खड़ा कर नहीं पाए और इसी वजह से पहाड़ के बड़े नेताओं ने अपनी पार्टी स्तर पर दूसरे देशों में हमें अलग राजनीतिक जमीन देने की कोशिश भी नहीं की।

 

उत्तराखण्ड से कई सालों से बाहर रहने के बाद भी ऐसा कोई भी नहीं है जो वहां वापस न जाना चाहता हो। मजबूरी के कारण अपने प्रदेश से बाहर रहने वाले सभी लोग किसी न किसी तरीके से खुद को उत्तराखण्ड की संस्कृति और समाज से जोड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं। 

 

प्रदेश में आपदाओं के दौर में प्रवासियों की कोशिश साफ दिखाई देती है। लेकिन प्रवासियों के बीच एक कमी है जिसका जिक्र बातचीत के दौरान हर प्रवासी ने किया। प्रदेश से बाहर रह रहे प्रवासियों में बुद्धिजीवी वर्ग में एकता का अभाव एक बड़ी चिंता है। उत्तराखण्ड छोड़कर बाहर बसे लोगों ने पत्रकारिता कला एवं संस्कृति खेल और राजनीति में बहुत नाम कमाया और प्रदेश का नाम भी रोशन किया। लेकिन प्रवासियों की ये ताकत अगर मिलकर एक दूसरे के लिए काम करती है तो कई समस्याएं खुद ब खुद खत्म हो जाएं। इतना ही नहीं उत्तराखण्ड की प्रवासी आबादी अगर एकजुट हो जाए तो उत्तराखण्ड की कई समस्याओं को इसी एकता से खत्म किया जा सकेगा।

 

(लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

 

 
         
 
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