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पलायन प्रवास

 

गावों में अब न तो बच्चों का शोर है और न ही खेतों में लहलहाती फसल। इसकी जगह काला बांस और गाजर द्घास उग आयी है। गांव के रास्तेगलियारे और चौबारे वीरान और सुनसान हैं। पलायन से वर्तमान में गढ़वाल मंडल के ८०१ गांव खाली हो चुके हैं और कुल ७ सौ से अधिक गांव ऐसे हैं जहां पलायन के चलते जनसंख्या ८ से १० के बीच रह गई है। 

 

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांव में बसती है लेकिन यहां तो गांव सुनसान और वीरान हैं। गांव में लोग रहना ही नहीं चाहते वजह भी साफ है। गांव के लिए पेयजल की लाइन बनी तो घपले सड़क बनी तो घपले यहां तक की गांव की टूटी बटिया और टूटी स्कूल के निर्माण तक में भ्रष्टाचार व्याप्त रहा। महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना चल रही है। हर परिवार को सौ दिन के रोजगार का वादा। लेकिन बहुत देर हो गई है खाली गांवों में कैसी मनरेगा। आप स्वयं यह समझ सकते हैं। तेजी से पलायन के प्रभाव को गंभीरता से देखें तो पलायन से गांव के लद्घु कुटीर उद्योग जैसे लोहारगिरी बढ़ईगिरी समेत अन्य छोटे उद्योग खत्म हो गए हैं। बचे खुचे गांव के लोग दाथी तेज करने के लिए शहरों में पहुंचते हैं और यहीं से दाथी थमाली कुदाल समेत अन्य उपकरण ले जाते हैं। आखिर ग्रामीण लद्घु उद्योग क्यों बंद हुए इसकी समीक्षा करें तो इसके लिए भी सीधे तौर पर सरकार ही जिम्मेदार नजर आती है। गांव का लोहार जो कुदाल और दाथी मात्र सवा किलो गेंहू में तैयार करता था वह सरकार ने अनुदान पर एक मुट्ठी गेंहू में उपलब्ध करवा दी और जो गेहूं अथक मेहनत के बाद खेतों में उगता था उसकी कीमत २ रूपए कर दी। अब गांव क्यों मेहनत करेगा जब अनाज मामूली दामों पर मिल रहा है। अब वह बीपीएल कार्ड बनाने में धन खर्च कर रहा है। कार्ड मिलते ही वह ऐसा महसूस कर रहा है जैसे लॉटरी लग गई। काश्तकारी को लोग अलविदा कर चुके हैं और सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर काश्तकार आश्रित हो चुका है। 

 

इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कोटद्वार और भाबर क्षे़त्र की कूषि योग्य भूमि पर सीमेंट और कंकरीट के पहाड़ विकसित हो चुके हैं। काश्तकार अपनी जमीनों का जमकर सौदा कर रहा है और बदले में मिली रकम से शहरों में भवन तैयार कर रहा है। पहाड़ पलायन से जूझ रहा है यह खबर राष्ट्रीय चर्चाओं का अहम हिस्सा है। इस पर सिर्फ चर्चाएं होती हैं। समाधान किसी के पास नजर नहीं आता। अभी हालात वहीं हैं। इंटरमीडिएट के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में डिग्री में कॉलेजों का अभाव है। कॉलेज हैं भी तो उनमें प्राध्यापक ही तैनात नहीं किए गए। ऐसे में ये कालेज भी मात्र खानापूर्ति के लिए ही खोले गए। सांख्यकी विभाग के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो अब तक ८०१ गांव खाली हो चुके हैं और सात सौ ऐसे गांव हैं जिनकी जनसंख्या अब ८ से १० के बीच रह गई है। 

 

चौपट हुई खेती

पलायन के बाद खेती की स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो मात्र जनपद पौड़ी में घटती कूषि भूमि के आंकड़े ही स्पष्ट कर देंगे कि पलायन के बाद कूषि लगभग चौपट हो गयी है। कूषि विभाग के आंकड़ों पर ही नजर दौड़ाएं तो जनपद में ४३ हजार ८ सौ ३९ हेक्टेयर पर वर्तमान में कूषि कार्य हो रहा है। जबकि ३७ हजार ६ सौ हेक्टेयर कूषि योग्य भूमि बंजर हो चुकी है। बंजर हो चुके खेतों को आबाद करने को लेकर कूषि विभाग वर्तमान में कई योजनाएं संचालित कर रहा है लेकिन ये योजनाएं सिर्फ कागजों पर ही चल रही हैं। इन कार्यक्रमों पर वर्ष २०११-१२ में अब तक २ करोड़ की धनराशि खर्च हो चुकी है। लेकिन इस धनराशि के खर्च होने के बाद भी खेत का एक टुकड़ा तक आबाद नहीं हो पाया। 

 

पलायन न सिर्फ खेती लद्घु उद्योगों को निगल गया बल्कि गांवों के रीति-रिवाज और पंरपराएं भी खत्म हो रही हैं। मंदिर मठ पूजा और अन्य परंपराएं भी गांवों के साथ ही विदा हो रही हैं और पलायन यदि इसी तर्ज पर बढ़ता रहा तो निश्चित तौर सामाजिक व्यवस्थाएं व सामाजिक ताना-बाना तार-तार हो जाएगा।

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

 

जनपद          आबाद गैर आबाद 

उत्तरकाशी   ६६८         ०५

चमोली           ११६६         ७८

टिहरी           १७६८         ४२

देहरादून           ७३८         २१

पौड़ी           ३१३७         ३१३

रुद्रप्रयाग   ६५२         ३३

हरिद्वार           ५०५         ११७

 

 

 
         
 
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