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पलायन प्रवास

 

उत्तराखण्ड में पलायन १९३० में ही शुरू हो गया था। आज भी बुनियादी सुविधाओं रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए गांव के गांव खाली हो रहे हैं। राज्य निर्माण के बावजूद महानगरों में पलायन करने का सिलसिला थमा नहीं बल्कि बढ़ा है। हालात ये हैं कि आज पहाड़ के सैकड़ों गांव उजड़ चुके हैं और कई उजड़ने की कगार पर हैं। बहुत से गांव गिनती के ८-१० लोगों पर ही जिंदा हैं। पलायन की यह पीड़ा प्रवासियों को भी सालती रही है। वे अपनी मातृभूमि पर वापस लौटने को आतुर हैं। लेकिन समस्या यही है कि पहाड़ में विकास योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं



 

जनपदवार जनसंख्या जनगणना २०११

जिला                  जनसंख्या

अल्मोड़ा                 ६२१९७२

बागेश्वर                  २५९८४०

चंपावत                  २५९३१५

पिथौरागढ़                 ४८५९९३

ऊआँामसिंह नगर      १६४८३६७

नैनीताल                 ९५५१२८

 

खेती के लिए भरपूर जमीन न हो खेतों में उचित पैदावार न हो उत्पादित चीजों को बेचने के लिए बाजार न हो। उत्पादित वस्तुओं का वाजिब मूल्य न मिले परंपरागत ज्ञान की अवहेलना हो। परिवार के भरण-पोषण शिक्षा स्वास्थ्य की जरूरतों की पूर्ति के लिए जेब में पैसा न होमन में पैसा कमाने की ललक हो लेकिन आस-पास आजीविका का कोई विकल्प न हो तो आदमी के पास अपना प्यारार-बार पास-पड़ोस गांव छोड़ने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचता। विकल्पों और मौकों के अभावों के चलते कुमाऊं के जिलों पिथौरागढ़ चंपावत बागेश्वर अल्मोड़ा नैनीताल ऊधमसिंहनगर के दूरदराज के इलाकों के लोग अपनी माटी से पलायन कर मैदानों की भीड़- भाड़ और शोरगुल में गुम हो जाने के लिए विवश हो रहे हैं। यह सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। 

 

बेरोजगारी गरीबी कमजोर विकेन्द्रीकूत ढांचा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव कुमाऊं से पलायन की एक बड़ी वजह रही है। प्राकूतिक संसाधानों का उचित प्रयोग न हो पाने के कारण पहाड़ की जवानी यानी नौजवान तेजी से मैदान की ओर पलायन कर रहे हैं। बेरोजगारी व पलायन की समस्या ने उत्तराखण्ड में विकराल रूप धारण कर लिया है। सेवायोजन कार्यालयों में पढ़े-लिखे युवाओं की पंजीकूत संख्या इस और इशारा करती है। सेवायोजन कार्यालय बेराजगार युवाओं को रोजगार देने में तो फिसड्डी साबित हुए हैं लेकिन यहां पंजीकूत बेरोजगारों की संख्या बेरोजगारी की विकराल समस्या पलायन की एक बड़ी त्रासदी को सामने लाती है। 

 

कुमांऊ के सभी छह जिलों के सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकूत बेरोजगारों की संख्या को देखें तो पिथौरागढ़ में ४६०४१ चंपावत में १६९९० अल्मोड़ा में ५८९८३ बागेश्वर में २८९८६ नैनीताल में ६४०८५ ऊधमसिंहनगर में ६२३३६ बेरोजगार  पंजीकूत हैं। बेरोजगारों की यह संख्या बताती है कि पढ़ने-लिखने के बाद पहाड़ों में रोजगार के विकल्प नहीं के बराबर हैं। अंततः मजबूर होकर इन पढ़े लिखे लोगों को अपना घर छोड़कर निकलना पड़ता है। इतने युवाओं की निकासी से गांव-घर थके-हारे बीमार वृद्वाजनों के सहारे रह जाते हैं। कुमाऊं के सैकड़ों गांव इसी वजह से वीरान हो गए हैं। गांवों में भरपेट रोटी देने की ताकत अब नहीं रह गई है। 

 

 

उत्तराखण्ड से यूं तो आजीविका और विकास के लिए पलायन करने के उदाहरण प्राचीन भारत में भी मिलते हैं। लेकिन सन् १९२०-३० से इसमें तेजी आई। ९० के दशक तक स्थिति भयंकर हो गई। राज्य निर्माण के बावजूद पलायन की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई बल्कि नवोदित राज्य की सरकारों ने लोगों को इतना हताश और निराश किया कि गांव के गांव खाली हो गए। सैकड़ों गांव उजड़ चुके हैं और लाखों घरों पर ताले लटक रहे हैं। लाखों लोग स्थाई तौर पर पहाड़ छोड़ चुके हैं। वे प्रवास में अपनी संस्कृति से जुड़े रहने की हर संभव कोशिश करते हैं। उनमें अपने पैतृक घरों को लौटने की तीव्र इच्छा है। लेकिन पहाड़ के कठोर जीवन को याद कर वे छटपटा कर रह जाते हैं। उनमें गहरी टीस है कि राजनेताओं और नौकरशाहों ने उत्तराखण्ड को अपनी ऐशगाह समझ लिया है। जिन सपनों को लेकर उन्होंने पृथक राज्य की लड़ाई लड़ी थी वे बहुत जल्द ही टूट गए

 

कुमाऊं मंडल का कोई जिला ऐसा नहीं जहां बुनियादी सुविधाओं का अकाल न हो। यहां से पलायन सिर्फ रोजगार की खातिर नहीं हो रहा बल्कि शिक्षास्वास्थ्य व अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव लोगों को शहरों से कस्बों विकास मुख्यालयों और जिला मुख्यालयों व फिर वहां से छोटे-बड़े शहरों की ओर निकलने के लिए बाध्य कर रहा है। गांव के लोगों को लगता है कि यहां गांवों में किस्मत संवारने के लिए कुछ नहीं रह गया है। गांवों के विकास के लिए दर्जनों विकास योजनाएं बन रही हैं। अपर करोड़ों रुपया खर्च हो रहा है लेकिन पलायन की समस्या रुकने का नाम नहीं ले रही। कुमाऊं के इन सुदूर अंचलों में उपभोक्ता और बाजार स्थापित करने के लिए सभी चीजें पहुंच गई हैं। शराब गुटखा अंकल चिप्स टाटा स्काई सब कुछ मौजूद है। अगर इन अंचलों में किसी चीज का अभाव है तो वह है स्वास्थ्य शिक्षा बिजली पानी सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों की साथ ही आजीविका के विकल्पों का अभाव इन पहाड़ों से लोगों को मैदानों में उतरने के लिए बाध्य कर रहा है। आधुनिक जीवन शैली की चाह भी लोगों को पलायन करने के लिए बाध्य कर रही है। शिक्षा की चेतना ने भेड़पालन लोहारगीरी मिस्त्री का काम ऊन कारोबार खेती-बाड़ी पशुपालन जैसे परम्परागत आजीविका के साधानों से लोगों का मोहभंग किया है। हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यास मैला आंचल में ग्रामीण जीवन की जो पीड़ा दिखती हैं वे सब कुछ आज ज्यों की त्यों मौजूद हैं। 

 

आज से एक दशक पूर्व तक रोजगार की खातिर यहां के गांवों से पलायन होता था। परिवार के पुरुष रोजगार की खातिर पलायन करते थे। महिलाएं गांव में खेती-बाड़ी के साथ-साथ पशुपालन का काम करती थी। इस तरह से एक और मनीऑर्डर-इकॉनामी तो दूसरी और कूषि व कूषि आधाारित उद्योगों के जरिए गांव की व्यवस्था चलती थी और गांव आबाद थे। इधर एक दशक से शिक्षा की चेतना के चलते पलायन शुरू हुआ है। पूरा परिवार शिक्षा की खातिर गांव छोड़कर शहरों में जा बसा है और गैर आबाद गांवों की संख्या में इजाफा हो रहा है। युवा महिला बच्चे शिक्षा की खातिर बाहर हैं तो पुरुष दो जून की रोटी जुटाने की खातिर। एक और खेती करने लायक हाथ नहीं तो दूसरी ओर बंदर भालू सुअर ने खेती बर्बाद कर दी है। इस तरह आजीविका का यह साधन भी धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। 

 

विकास को गति देने के लिए नई प्रशासनिक इकाइयों का गठन कर विकास की रोशनी को सुदूरवर्ती क्षेत्रें में पहुंचाने की मुहिम भी सफल नहीं हो पाई है। १८९२ में जब अल्मोड़ा जनपद का गठन हुआ तो विकास को गति देने के लिए ताकुला धाौला देवी भैंसियाछाना हवालबाग चौखुटिया ताड़ीखेत द्वाराहाट भिक्यिासैंण स्याल्दे सल्ट आदि विकासखंड़ों का गठन किया गया। लेकिन आज भी यहां के २२४८ राजस्व गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए छटपटा रहे हैं। यही हाल अल्मोड़ा से अलग होकर वर्ष १९६० में बने पिथौरागढ़ जनपद का है। यहां भी आठ विकासखंडों मुनस्यारी धारचूला डीडीहाट गंगोलीहाट विण मूनाकोट कनालीछीना के माध्यम से चल रही तमाम योजनाएं भी यहां के १६३५ गांवों से पलायन को रोक पाने में विफल रही हैं। इस जनपद से अलग होकर वर्ष १९९७ में चंपावत जिले का गठन हुआ तो प्रशासनिक दृष्टि से इसे चार विकासखंडों चम्पावत बाराकोट पाटी लोहाघाट में बांटा गया ताकि जिले के हर क्षेत्र का समेकित विकास हो सके। लेकिन १५ साल बाद भी यहां के ६८८ गांवों का समेकित विकास नहीं हो सका। यही हाल अल्मोड़ा से अलग होकर वर्ष १९९७ में बने बागेश्वर जनपद का भी है। उत्तर का वाराणसी नाम से प्रसिद्ध इस जनपद के तीन विकासखंडों बागेश्वर गरुड़ कांडा के ९१० गांव विकास की बाट जोह रहे हैं। यही हाल वर्ष १८९१ मे बने नैनीताल जनपद का भी है।

 

लालकुंआ कालाढूंगी बेतालघाट हल्द्वानीमुक्तेश्वर भवाली भीमताल रामनगर में विभाजित इस जिले के ११२१ गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए छटपटा रहे हैं। अन्य जनपदों के सापेक्ष प्रगतिशील कहे जाने वाले ऊधमसिंहनगर के ग्रामीण इलाकों में विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाई है। वर्ष १९९५ में यह नैनीताल से अलग  हुआ था। सात विकासखंडों रुद्रपुर किच्छा गदरपुर खटीमा जसपुर सितारगंज पंतनगर बाजपुर काशीपुर के ६५६ गांवों की कहानी अन्य जनपदों से अलग नहीं है। ये सभी गांव हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यास मैला आंचल के ग्रामीण जीवन की पीड़ाओं और विडम्बनाओं से अलग नहीं हैं। विकास की पीड़ा इस बात से भी समझी जा सकती है कि तमाम प्रशासनिक इकाइयों के गठन के बाद भी अलग प्रशासनिक इकाइयों की मांगों को लेकर लोग आंदोलित हैं। 

 

 

वर्ष २००१ से २०११ के बीच की दशकीय जनसंख्या वृद्धि को देखें तो पिथौरागढ़ में ५.१३ बागेश्वर में ५.१३ अल्मोड़ा में -१.३३ चंपावत में १५.४९ तो नैनीताल में २५.२० और ऊधामसिंहनगर में ३३.४० रही है। जहां पहाड़ी जिलों में जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है तो मैदानी इलाकों में यह वृद्धि दर अधिक रही है। जो इस बात को दर्शाता है कि पहाड़ी इलाकों की अपेक्षा मैदानी इलाकों में रोजगार की संभावनाएं ज्यादा हैं और पहाड़ से मैदान की और पलायन जारी है। गांवों की कायाकल्प करने में सरकार के साथ ही गैर सरकारी संगठनों की भी कमी नहीं है। आंकड़े कहते हैं पिथौरागढ़ में ३२०३ चंपावत में ८०६ अल्मोड़ा में ४१६६ नैनीताल में ५३५१ बागेश्वर में ९४० ऊधमसिंहनगर में ४६५४ गैर सरकारी संगठन जल जंगल जमीन महिला विकास पर्यावरण शिक्षा स्वास्थ्य जैसे एक दर्जन विकास के क्षेत्रों में काम कर रहे हैं लेकिन न तो विकास दिखता है न ही पलायन थमने का नाम ले रहा है। पंचायती राज व्यवस्था के तहत सत्ता का विकेन्द्रीकरण कर गांव के लोगों की अपनी सरकारें बनीं। इस विकेन्द्रीकरण का आशय यही था कि गांव में न सिर्फ स्वशासन होगा बल्कि पंचायतें ग्राम विकास में सहायक होंगी। लेकिन कुमाऊं मंडल के छह जिलों के ३२७१ ग्राम प्रधान १४८२ क्षेत्र पंचायत सदस्य १७५ जिला पंचायत सदस्य व २१९१९ ग्राम पंचायत सदस्य भी ग्राम स्वराज के सपने को पूरा नहीं कर पाए। इसकी वजह कमजोर विकेन्द्रित ढांचा रहा है। बीपीएल परिवारों की सूची बताती है कि गरीबी पलायन की एक बड़ी वजह रही है। अल्मोड़ा में ६०६५९ बागेश्वर में २६२३८ चंपावत में २०१९८ ऊधमसिंहनगर में ७०५१५ नैनीताल में ४४३९४ पिथौरागढ़ में ४४१२९ परिवार गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। यह संख्या इससे भी अधिक है अभी कई बीपीएल परिवार इस सूची में स्थान नहीं बना पाए हैं। गरीबी की यह कहानी बताती है कि कुमाऊं मंडल गरीबी की भयंकर चपेट में है। यह गरीबी पलायन का एक बहुत बड़ा कारण रही है। पलायन की सबसे मुख्य वजह यह रही है कि यहां के जनप्रतिनिधियों विशेषकर कांगे्रस व भाजपा ने कभी भी पलायन के मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। गांवों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अब गांव के लोगों को शहरों की और पलायन करना सबसे बेहतर विकल्प लग रहा है। 

 

अर्थशास्त्री डॉ. मृगेश पांडेय कहते हैं कुमाऊं से १९३० मे नौकरी के लिए पलायन शुरू हुआ। फौज में भर्ती के लिए लोग बाहर जाने लगे। बाद में शिक्षा के लिए पलायन होना शुरू हुआ। उस समय इंटरमीडिएट तक की शैक्षणिक संस्थाएं अल्मोड़ा नैनीताल में थी। यहां से शिक्षा प्राप्ति के बाद उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ और इलाहाबाद के लिए पलायन शुरू हुआ। देखादेखी सामर्थ्यवान लोगों ने भी पलायन करना शुरू कर दिया। अब कुमाऊं में स्कूल कॉलेजों की संख्या बढ़ी है लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न होने के चलते पलायन में तेजी आई है। वह कहते हैं पलायन की मुख्य समस्या बुनियादी सुविधाओं का न होना है। यही वजह है कि गैर आबाद गांवों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पहाड़ में सर्विस सेक्टर का ढांचा काफी कमजोर है। प्राकूतिक आपदाओं ने तो स्थिति और गंभीर कर दी है। अगर यहां से पलायन रोकना है तो अवस्थापना विकास को मजबूत करना होगा। 

 

शिक्षक व साहित्यकार महेश पुनेठा कहते हैं गांवों से पलायन के पीछे अच्छी शिक्षा एक बड़ी वजह बन रही है। पिछले एक दशक से शिक्षा को लेकर अभिभावक जागरूक हुए हैं। दूसरा अर्थव्यवस्था भी एक बड़ा सवाल है। जब तक गांवों को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जाएगा तब तक इस पलायन समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। पलायन की समस्या का सबसे बेहतर विकल्प यह है कि गांवों में शिक्षा की उचित व्यवस्था के साथ ही रोजगर सृजित करने की रणनीति बने।

 

वाणिज्य से स्नात्तकोतर युवा मनोज चन्द्र जोशी कहते हैं कि आगे बढ़ने की चाह जीवन स्तर को बेहतर बनाने आधाुनिक जीवन शैली जीने की चाह ने गांवों से युवाओं को पलायन के लिए बाध्य किया है। 

(लेखक दि संडे पोस्ट से संबद्ध हैं।

 

कुमाऊं के विभिन्न व्यवसायों में लगी कामगार आबादी

जिला               कामकाजी आबादी            खेतिहर कामगार   कृषि कामगार             घरेलू कामगार   अन्य कामगार    महिला कामगार

पिथौरागढ़          ४२.९८                      ६७.६९             १.१७               ३.८६             २७.२८        ५०.७५

चंपावत                  ४०.१८                      ६९.९१             २.०१               १.६१              २६.४७        ५०.५९

अल्मोड़ा          ६६.५२              ७४.७७             १.३८               १.८८              २२.६७        ५५.२५

बागेश्वर                  ४७.६७              ७४.६७             ३.०७               १.८८              २०.३८        ५४.७२<

 
         
 
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