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vad 50 04-06-2017
 
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चुनौतियों का पहाड़ छोड़ गए धस्माना जी
  • दाताराम चमोली
राजेन्द्र धस्माना जी भावी पीढ़ियों के लिए चुनौतियां का पहाड़ छोड़ गए हैं कि तमाम विपरीत हालात के बावजूद वे जीवन में कैसे ऊंचे मुकाम हासिल कर पाते हैं? कैसे परिवारिक और सामाजिक दायित्वों का बखूबी निर्वाह कर सकते हैं? कैसे अपनी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं?

प्रकृति के चितरे कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल को मृत्यु की जितनी तीव्र अनुभूति हुई थी राजेंद्र धस्माना की जीने की इच्छा शक्ति (विल पावर) उतनी ही दृढ़ थी। मैं करीब 25 साल तक धस्माना जी के बहुत ही करीब रहा। मुलाकातों में कई बार वे कहते थे कि मैं 125 साल जीऊंगा। मुलाकात का वह दौर अब नहीं मिल सकेगा जिसमें गंभीर विषयों पर चर्चा के साथ ही उनसे नई जानकारियां हासिल होती थीं। चंद्र कुंवर बर्त्वाल के प्रति गहरी दिलचस्पी धस्माना जी को स्वर्गीय बर्त्वाल के गांव तक खींच ले गई थी। करीब डेढ़ दशक पहले एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि चंद्र कुंवर बर्त्वाल का एक लड़की से गहरा स्नेह था जो कि उनकी कविताओ में भी झलकता है। ... नामक वह लड़की अब बूढ़ी हो चुकी है। प्लीज कहीं उसका नाम डिस्कलोज मत कर देना। उन्होंने मुझसे जो वचन लिया था उसका मैंने हमेशा पालन किया।

कहते हैं कि जिन लोगों की अच्छी बनती है, उनकी बिगड़ती भी खूब है। धस्माना जी और मेरे बीच भी यह सिलसिला लगातार चलता रहा। राज्य आंदोलन के दौर में जब वे उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद के अध्यक्ष और मैं महासचिव हुआ करता था तब कई मित्र जो कि उनके और मेरे प्रति समान रूप से स्नेह रखते थे, मजाक में हम दोनों के बीच के मतभेदों की चर्चा कर दिया करते थे। एक शादी समारोह में उस दौरान जब वे और मैं साथ बैठे थे तो कुछ मित्रों ने हमारी फोटो ली और मजाक भी किया कि ऐतिहासिक फोटो होगा यह तो ? कई बार तो उनके और मेरे बीच विषयों पर बातचीत करते हुए इस कदर गर्मागर्मी हुई कि एक बार मैंने यहां तक कह दिया था कि आज के बाद आपसे बात नहीं करूंगा। सचमुच करीब डेढ़-दो माह तक मैं उनके घर भी नहीं गया। वेस्ट विनोद नगर में अखबार बेचने वाले एक भाई जिन्हें हम प्यार से ‘दादा’ कहते हैं, एक दिन उनकी दुकान पर गया तो पता चला कि धस्माना जी उनसे पूछ रह थे कि चमोली जी कहीं दिखाए दिए आपको? कहां होंगे? गांव तो नहीं गए होंगे? दादा ने मुझसे अनुरोध किया कि एक बार उनसे जरूर मिल लें। वे कई बार आपकी खोज में आ चुके हैं। इसके बाद मुझे लगा कि पहाड़ के संस्कारों से दूर नहीं हुआ जा सकता। किसी बुजुर्ग की भावनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक दिन शाम को मैं उन्हें मिलने पहुंचा तो वे गदगद हो गए। अपनी धर्मपत्नी को जोर से आवाज लगाई ‘हे भई, चमोली जी आयां छन।’ कई मौकों पर उनके और मेरे बीच मतभेद होते रहे, लेकिन एक-दूसरे के प्रति स्नेह और आदर का भाव अंत तक बना रहा। मृत्यु के कुछ दिन पहले ही मैं उनका हालचाल लेने गया था।

उनकी एक खासियत यह थी कि वे न सिर्फ प्रभावशाली ढ़ंग से अपनी बात रखते थे, बल्कि अपने से छोटों की बातों को भी बड़ा महत्व देते थे। जब कभी भी हम लोग उनसे मिलने उनके आॅफिस में जाते थे तो वहां स्टाफ से बड़ी आत्मीयता से परिचय कराते थे कि ‘मेरा फ्रैंड’ आया हुआ है। अपने से छोटों को सिगरेट आॅफर करते और जब अपने पास की खत्म हो जाए तो निसंकोच उनसे उपलब्ध कराने को भी कहते। वे कहा करते थे कि वैचारिक स्तर पर हम सब दोस्त हैं। ऐसे इंसान विरले होते हैं जो वैचारिक स्तर पर अपने से छोटों को सम्मान देते हों। उनके भीतर दूसरे का सहयोग करने की भावना भी बड़े गजब की थी।

साहित्य ही नहीं बल्कि संस्कृति और संगीत की दुनिया के लोगों से उनके मधुर और करीबी संबंध थे। झूसिया दमाई को मिलने वे सीमांत पिथौरागढ़ जा पहुंचे। बड़े भावुक होकर बताते थे कि जीवन के अंतिम दिनों में जब झूसिया का शरीर ज्यादा ही अस्वस्थ्य हो गया और वह ढोल- नगाड़े को पहले की तरह बजाने में असमर्थ हो गए तो उनके मुंह से मां भगवती के लिए करूण पुकार निकली कि ‘हे मां मुझे माफ करना अब मैं नहीं बजा पाऊंगा।’ जाने माने कलाकार नैनराम भी पिथौरागढ़ के इसी सीमांत क्षेत्र से थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्र सिंह गढ़वाली के व्यक्तित्व और कृतित्व से जुड़े कई संस्मरण वे सुनाते थे। राष्ट्रपिता गांधी के बारे में उनका मानना था कि ‘गांधी कोई छोटा-मोटा कंसेप्ट नहीं है, इसे गांधी ही फाॅलो कर सकता है।’

योग एवं अध्यात्म की दुनिया की शख्सियत स्वामी राम से उनके यूं ही करीबी संबंध नहीं थे। वे खुद भी योग एवं आयुर्वेद के बारे में इस तरह बातें किया करते थे कि जैसे कोई योगी या प्राकृतिक चिकित्सक बोल रहा हो। अध्यात्म में उनकी गहरी रुचि अध्ययन तक सीमित नहीं थी। करीब एक दशक पहले की बात है। उन दिनों मैं जगद्गुरू शंकाचार्य स्वामी माधवाश्रम जी महाराज के दिल्ली स्थित आश्रम में बराबर जाया करता था। एक बार ज्यादा दिनों तक नहीं जा पाया तो महाराज का फोन आ गया। उस वक्त मैं धस्माना जी के पास ही बैठा हुआ था। धस्माना जी ने जिद पकड़ ली कि मैं एक दिन उन्हें भी महाराज के आश्रम ले जाऊं। उन्होंने इस तरह मुझ पर दबाव डाला जैसे कि वे पहले महाराज से कभी मिले ही न हों। लेकिन जब मैं उन्हें लेकर आश्रम पहुंचा तो महाराज और उनके बीच की आत्मीयता को देखकर हैरान रह गया। करीब चार-पांच घंटे के उस राम-भरत मिलाप जैसे दृश्य को देखकर मैं समझ गया कि दोनों के बीच कितने गहरे संबंध हैं। मैं समझ गया कि धस्माना  जी को सिर्फ आश्रम तक पहुंचने में मेरा साथ चाहिए था। मुझे याद है कि रात का भोजन हमने आश्रम में ही किया था। महाराज ने अपने वाहन चालक को धस्माना जी को घर छोड़ने के निर्देश दिए और खुद गेट तक उन्हें छोड़ने भी आए। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि धस्माना जी उससे भी बड़ी शख्सियत हैं जितना कि हम उन्हें समझते हैं।

दुनिया जानती है कि पत्रकारिता और साहित्य में उन्होंने ऊंचे मुकाम हासिल किए, लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले इस शख्स को बचपन और जवानी में कितने संघर्ष करने पड़े। संघर्ष के पथ पर पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वाह भी उन्होंने बखूबी किया। संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताते थे कि रात को कई बार जब बीड़ी पीने को पैसे नहीं होते थे तो उस वक्त बड़ी बेचैनी होती थी। वास्तव में उनका चिंतन भी अध्ययन के साथ ही संघर्ष और अनुभव से विकसित था। उनके लिखे नाटकों, लेखों और कविताओं से भी ऐसा ही लगता है। वे न सिर्फ एक पत्रकार और साहित्यकार थे, बल्कि समाज को दिशा देने वाले चिंतक भी थे। उत्तराखण्ड समाज के लिए तो उनका योगदान हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। आखिर क्या नहीं किया उन्होंने उत्तराखण्ड समाज के लिए? दूदर्शन के समाचार संपादक और संपूर्ण गांधी वांगमय के चीफ एडिटर के तौर पर देश भर में उन्हें सम्मान प्राप्त था। वे चाहते तो अपनी इन्हीं उपलब्धियों में आनंदित रह जाते। लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहने की छटपटाहट ने उन्हें हमेेशा अपने समाज से जोड़े रखा। निंतर उत्तराखण्ड के जन आंदोलनों में सक्रिय रहने के साथ ही वे राज्य के विकास को दिशा देने में प्रयासरत रहे।

धस्माना जी 125 साल तो नहीं जी पाए लेकिन संघर्ष के जो थपेड़े उन्होंने झेले, उनके बीच सामाजिक दायित्व का जो निर्वाह किया, उस विपरीत हालात में यदि वे 81 वर्ष भी जी गए तो निश्चित ही यह उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति से ही संभव हो पाया। उनका जीवन जितना संघर्षमय रहा, उतनी ही सुखद उनकी मृत्यु भी हुई। सुखद इसलिए कि निगम बोध घाट पर राजनीति, समाज सेवा, आंदोलन आदि तमाम क्षेत्रों से जुड़ी शख्सितों के साथ ही बड़ी संख्या में आम लोग भी उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचे। जिस इंसान को इस कदर सामाजिक स्वीकार्यता मिल जाए उसकी मृत्यु सुखद ही कही जाएगी। राजेन्द्र धस्माना जी भावी पीढ़ियों के लिए चुनौतियां का पहाड़ छोड़ गए हैं कि तमाम विपरीत हालात के बावजूद वे जीवन में कैसे ऊंचे मुकाम हासिल कर पाते हैं? कैसे परिवारिक और सामाजिक दायित्वों का बखूबी निर्वाह कर सकते हैं? कैसे अपनी जड़ों से जुड़े रह सकते हैं? धस्माना जी को सादर श्रद्धासुमन 
 
         
 
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