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vad 50 04-06-2017
 
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विविध
 
एक स्त्री की la?k"kZ गाथा

हिंदी के एक नए प्रकाशक जगरनॉट ने साहित्य के ढांचे को तोड़ा है। वह ऑन लाइन और प्रिंट दोनों में एक साथ दखल दे रहा है। वहां से तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के जीवन पर ^अम्मा^ नाम से  किताब आई है। इसकी लेखिका हैं वासंती। इस पुस्तक में तमिल फिल्मों की ग्लैमर गर्ल से लेकर सियासत की सरताज बनने तक जयललिता की दिलचस्प मगर तथ्यपरक कहानी है। इसमें एक स्त्री का संद्घर्ष] उसकी संवेदना और सियासत की चालों के बीच उसके बनने की यात्रा है

^एमजीआर नहीं रहे।^

यह उनके लिए एक बड़ा आद्घात था। वह जयललिता को मंझधार में छोड़कर चल बसे। सदमे की हालत में उन्होंने ड्राइवर को बुलाया और एमजीआर के निवास रामवरम गार्डन्स जा पहुंचीं। लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें अंदर जाने से मना कर दिया गया। वह कार से उतरीं और दरवाजे पर मुक्के मारे। अंत में जब दरवाजा खुला कोई उन्हें बता नहीं रहा था कि नेता का पार्थिव शरीर कहां रखा है। वह ऊपर&नीचे और आगे&पीछे भागती रहीं लेकिन उनके लिए सारे दरवाजे बंद थे ताकि वह उस व्यक्ति के पार्थिव शरीर को नहीं देख सकें। जो न सिर्फ उसके प्रतिपालक थे] बल्कि जिसके साथ उनका इतना नजदीकी और भावनात्मक जुड़ाव था।

अंततः जयललिता को बताया गया कि एमजीआर के पार्थिव शरीर को पीछे के दरवाजे से निकालकर राजाजी हॉल ले जाया जा चुका है। वो हांफते हुए भागकर अपने कार में बैठीं और ड्राइवर को तेजी से वहां पहुंचने का निर्देश दिया। राजाजी हॉल पहुंचने पर वह दौड़ते हुए पार्थिव शरीर तक पहुंची और कसकर सिर से चिपक गई। एमजीआर अपने टे्रडमार्क पहनावे& पूरी बांह की शर्ट] रोएंदार टोपी और काले चश्मे&में बेजान पड़े थे। सिनेस्टार रहे उस व्यक्ति] जिसने उनकी मां को उनकी प्यारी अम्मू का ध्यान रखने का वचन दिया था] के बेजान शरीर को देखकर जयललिता को क्या अहसास हुआ होगा ये समझा जा सकता है। पर उन्होंने आंसू नहीं गिराए। वह रोई नहीं। एमजीआर के शव के पास दो दिनों तक& पहले दिन १३ द्घंटे और दूसरे दिन ८ द्घंटे& खड़े रहकर उन्होंने वहां आ रहे शोकाकुल लोगों को स्तब्ध कर दिया। उन्होंने खुद को तैयार किया कि वह शारीरिक थकान को हावी होने नहीं देंगी।

लेकिन मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना अन्य दिशाओं से आई। जानकी की कई समर्थक महिलाएं उनकी बगल में जा खड़ी हुईं और उन्होंने जयललिता के पैरों को कुचला] उनके शरीर में नाखून चुभाए और चूंटियां भरीं ताकि वह वहां से हट जाएं। लेकिन वो अपमान के द्घूंट पीते हुए] अपने अभियान को छोड़ते हुए अविचलित वहां तैनात रहीं] उस जगह से नहीं हिलने की जिद्द पर कायम रहीं। वह अपने इर्दगिर्द के माहौल से मानो बेपरवाह थीं। लेकिन एक सवाल जरूर ही उनके दिमाग पर चोट कर रहा होगा& अब आगे क्या? वह ३८ साल की और अविवाहित थीं] और उस व्यक्ति द्वारा अनिश्चितता के भंवर में छोड़ दी गई थीं] जो अब बेजान पड़ा था] जो उज्ज्वल भविष्य के वायदों के साथ उन्हें राजनीति में लेकर आया था। जयललिता] जो पार्टी कार्यकर्ताओं की नजरों में एमजीआर की सहज उत्तराधिकारी रही थीं] आज किसी काम की नहीं मानी जा रही थीं] और दिवंगत नेता के दर्शन के लिए भी उन्हें विशेष प्रयास करने पड़ रहे थे। लेकिन पराजय को सिर झुकाकर स्वीकार करना उनकी प्रकूति में नहीं था।

जब एमजीआर के पार्थिव शरीर को तोपगाड़ी में रखा गया तो जयललिता उसके पीछे&पीछे चल रही थीं। वो अपने नेता के पार्थिव शरीर में पुष्पचक्र चढ़ाना और शव यात्रा में शरीक होना चाहती थी। ड्यूटी पर तैनात सैनिकों ने हाथ बढ़ाकर उन्हें गाड़ी पर ऊपर खींचा। एक बार पीछे से किसी के गुस्से में चिल्लाने की आवाज आई] तो उन्होंने देखा विधायक डॉ ़ केपी रामालिंगम खतरनाक ढंग से उनकी तरफ बढ़ रहे थे। अचानक उन पर हमला हुआ। जानकी के भतीजे दीपन ने उनके ललाट पर चोट की। उसने उन्हें तोपगाड़ी से धक्के देकर उतार दिया। उन्हें चोट और खरोंचें आईं और वो भौंचक्की थीं। दीपन और रामालिंगम के अपशब्दों (उन्होंने जयललिता को कुलटा कहा) से आहत होकर उन्होंने अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने का फैसला किया। उन्हें उनकी कॉन्टेसा कार में द्घर पहुंचा दिया गया। सैनिकों का दल उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा था।

यह बात जंगल की आग की तरह फैली और पार्टी कार्यकर्ताओं में सदमे की लहर दौड़ गई। अपमानित जयललिता को उनसे मिलने आ रहे कार्यकर्ताओं की भीड़ से] जिसमें कई सांसद और विधायक भी शामिल थे] जरूर ही उत्साह बंधा होगा। उनसे मिलने आ रहे पार्टीजन एमजीआर के उत्तराधिकार पर उनके दावे को समर्थन देने की कसमें खा रहे थे। कई तो खुल के बोल रहे थे] ^हमें एक करिश्माई नेता चाहिए। करिश्मा वाली एकमात्र व्यक्ति जयललिता हैं।^

जयललिता को भरोसा हो गया है कि भले ही एमजीआर ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी ?kksf"kr नहीं किया हो] जनता के बीच उनका असर कम नहीं हुआ है] और आम पार्टीजन उनके पक्ष में ही राय देंगे। लेकिन तुरंत चुनाव की कोई आवश्यकता नहीं थी। अन्नाद्रमुक ने भारी बहुमत से चुनाव जीता था और अगला चुनाव अभी दो वर्ष दूर था।

अन्नाद्रमुक के ९७ विधायकों ने जानकी को अपना समर्थन देते हुए राज्यपाल एसएल खुराना को एक विज्ञप्ति सौंपी। राज्यपाल ने जानकी को सरकार कठित करने का न्योता दे दिया। और ७ जनवरी १९८८ जानकी तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बन गईं। उन्हें २८ जनवरी तक सदन में अपना बहुमत साबित करना था। उस दिन सदन में खूब शोर&शराबा हो रहा था क्योंकि स्पीकर खुलकर जानकी का पक्ष ले रहे थे। कई विधायकों ने इस तरह नियमों का उल्लंद्घन किए जाने का विरोध किया। अचानक कुछ गुंडे सदन में आ धमके और उन्होंने जयललिता समर्थकों और कांग्रेस के विधायकों की पिटाई शुरू कर दी। इस मार&पिटाई के बीच किसी ने पुलिस को खबर कर दी। तमिलनाडु के इतिहास में पहली बार पुलिस ने सदन में प्रवेश किया और विधायकों पर लाठियां बरसाईं। अव्यवस्था के इस आलम में स्पीकर ने सरकार के विश्वास मत जीतने की द्घोषणा कर दी।

जब जयललिता को सदन के द्घटनाक्रम की पूरी जानकारी दी गई उन्होंने समझ लिया कि समय बर्बाद करने का मौका नहीं है। उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि तमिलनाडु में लोकतंत्र की हत्या हुई है और राज्यपाल से जानकी मंत्रिमंडल को तुरंत सत्ता से बेदखल करने की अपील की। सरकार विरोधी खेमे के 

अन्नाद्रमुक विधायक स्थानीय कांग्रेस सदस्यों के साथ राज्यपाल से मिले और उन्हें द्घटनाक्रम की पूरी जानकारी दी। इसके बाद राज्यपाल ने केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेजी और राज्य की राजनीतिक स्थिति को देखते हुए सरकार को बर्खास्त करके वहां आपातस्थिति ?kksf"kr करने की अनुशंसा की। केंद्र सरकार ने राज्यपाल की अनुशंसा को स्वीकार कर लिया। जयललिता अपने लिए जिस नए अवसर की उम्मीद कर रही थी] वह उम्मीद से भी पहले आ चुका था।


 

 
         
 
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