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जनपदों से 
 
सड़क निर्माण की कुछुआ चाल

  • दिनेश पंत

चीन सीमा पर सड़कों का जाल बिछा चुका है। लेकिन अपने यहां हालत यह है कि बीआरओ २० साल में सात किलोमीटर सड़क ही बना पाया

 

पिथौरागढ़। केंद्र सरकार उत्तराखण्ड में हर मौसम में सड़क संपर्क ¼वेदर रोड½ बनाने का हो&हल्ला तो खूब मचा रही है। लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण चीन सीमा पर सड़क पहुंचा पाने में पूरी तरह नाकाम रही है। एक तरफ चीन ने चुपचाप सीमा तक रेल के साथ ही सड़कों का जाल भी बिछा दिया है और दूसरी तरफ भारत सुस्त पड़ा हुआ है। हालांकि अब भारत की ओर से सीमा तक सड़क पहुंचाने की कोशिशें एक बार फिर तेज हुई हैं। 

हेलीकॉप्टर से गुंजी तक निर्माण सामग्री भेजी जा चुकी है। धारचूला के गर्बाधार से चीन सीमा लिपूलेख तक हेलीकॉप्टर से मशीनें पहुंचा दी गई हैं। हेलीकॉप्टर से जनरेटर] कंपे्रशर एवं पुल की सामग्री सीमावर्ती क्षेत्र गुंजी और बूंदी पहुंच चुकी हैं। लेकिन काम अभी भी कछुवा गति से ही हो रहा है। 

नेपाल&चीन सीमा पर सड़क परियोजनाओं में लेटलतीफी को देखते हुए केंद्रीय सीमा प्रबंधन] गृह विभाग के सचिव एवं मुख्य सचिव उत्तराखंड की कई बार बैठकें भी हो चुकी हैं। बीआरओ] आईटीबीपी] सीपीडब्ल्यूडी और जिलाधिकारियों को कई दफे निर्देश भी दिए जा चुके हैं। लेकिन धारचूला के गर्बाधार से चीन सीमा लिपूलेख तक ६५ किमी. सड़क का निर्माण आठ वर्षों के बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। बीआरओ कठोर चट्टानों का आसानी से न कट पाना सड़क निर्माण की गति धीमी होने का कारण मानता है। हालात यह हैं कि अभी गर्बाधार से लखनपुर तक चार किमी ही सड़क बनी है जबकि लखनपुर से बूंदी तक १५ किमी सड़क बननी बाकी है। सात किमी सड़क काटने में ही बीआरओ को २० वर्ष लग गए हैं। अब नया दावा यह किया जा रहा है कि वर्ष  २०२२ तक तिब्बत बार्डर लिपुलेख तक सड़क पहुंचा दी जाएगी। यानी सीमा के आखिरी छोर तक सड़क पहुंचाने में अभी पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा। 

वर्ष १९९१ में जब rok?kkV से लिपुलेख मार्ग का काम सीमा सड़क संगठन ¼बीआरओ½ ने अपने हाथ में लिया तो २०१२ में इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन गर्बाधार से लखनपुर तक सात किलोमीटर सड़क काटने में ही २० वर्ष से अधिक का समय लग गया ऐसे में अगले पांच वर्षों में जो लक्ष्य रखा गया है वह तय सीमा पर पूरा हो पाएगा] यह कह पाना अभी मुश्किल है। दूसरी तरफ अभी तक प्रदेश में जितने भी मुख्य सचिव बने हैं वे सभी सड़क निर्माण की धीमी गति पर नाराजगी जता चुके हैं। लेकिन हालत जस के तस हैं। पूर्व में जब केंद्रीय गृह राज्यमंत्री सीमावर्ती क्षेत्र गुंजी आए थे तो लोगों ने सड़क निर्माण में देरी का मामला उनके समक्ष रखा था। वे भी शीद्घ्र सड़क निर्माण का आश्वासन देकर चलता बने। बीच&बीच में सड़क निर्माण को लेकर हलचल तो होती रही] लेकिन सड़क निर्माण कार्य में गति नहीं आ पाई। बीआरओ पर भी इस मामले में उदासीनता बरतने के आरोप लगते रहे हैं।

सीमावर्ती क्षेत्रों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति को देखें तो ककराली गेट से ठुलीगाड़ तक १२ किमी सड़क का निर्माण बेहद धीमी गति से हो रहा है। टनकपुर&जौलजीवी मार्ग का फॉरेस्ट क्लियरेंस नहीं हो पाया है। १३५ किमी इस मार्ग में १२ किमी चौड़ीकरण भी होना है। टनकपुर&रूपालीगाड़ ४३ किमी मार्ग को स्वीकूति तो मिल गई लेकिन इसका ७५ किमी मार्ग प्रस्तावित पंचेश्वर बांध की वजह से बाधित चल रहा था। अब पंचेश्वर डैम बनने की हलचलों के बीच इस सड़क का अस्तित्व एक बार फिर संकट में है। द्घटियाबगड़&लिपूलेख मार्ग का निर्माण भी मार्च तक पूरा करने का दावा किया गया था लेकिन वह लक्ष्य भी कहीं पीछे रह गया है। सीमा से सटे  सोबला &सेला&तेढ़ाग मार्ग  में १० हेक्टेयर जमीन का अभी अधिग्रहण नहीं हो पाया है। भारत&चीन सीमा पर नीति गैलुंग] सोनम&मैंडी रोड का निर्माण भी पूरा नहीं हो पाया है। नागा&जड़ांग] छासतोली&छत्रा] सुमन&टिमखिम] मुनस्यारी& बडियार बगड़ मार्गों का निर्माण भी बेहद धीमी गति से चल रहा है।

सीमा से जुड़े उच्च हिमालयी क्षेत्र में सड़कों का हाल यह है कि मशहूर पर्यटन स्थल मुनस्यारी से आगे को सड़क की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। मिलम] लीलम] बोगडयार] बुर्फू जैसे दूरस्थ क्षेत्र आज भी सड़क सुविधाओं से वंचित हैं। क्षेत्र को जोड़ने वाले एक मात्र थल& मुनस्यारी मार्ग की हालत भी बेहद खस्ता है। मलवा एवं हिमपात के कारण आए दिन यह मार्ग बंद रहता है। मुनस्यारी से तिब्बत सीमा पर स्थित मिलम गांव तक ६५ किमी सड़क का निर्माण भी पूरा नहीं हो पाया है। पिछले ९ वर्षों से यह सड़क मात्र ३४ किमी ही बन पाई है। अगर यह सड़क बनती तो सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण होती और मिलम ग्लेशियर तक आसानी से पर्यटकों की पहुंच बन जाती। सीमावर्ती गांवों का विकास भी तेजी के साथ होता।

 

सड़क मार्ग को गति देने के लिए लास्पा एवं बोगड्यार में कैंप स्थापित किए किए जा रहे हैं। हेलीकॉप्टर से निर्माण सामग्री पहुंच रही है। सड़क निर्माण में तेजी लाई जा रही है।

आरके शर्मा] कमांडिग ऑफिसर सीमा सड़क संगठन

 


गुलजार होगा नंदादेवी पार्क

  • संजय कुंवर

जोशीमठ ¼चमोली½। यूनेस्को की विश्व धरोहर नंदादेवी नेशनल पार्क इस वर्ष प्रकूति प्रेमियों के लिए पहली जून से खुल रहा है। दुर्लभ जैव विविधता एवं वन्य जीवों के लिए विश्व प्रसिद्ध इस राष्ट्रीय पार्क में दुर्लभ कीट पतंगों] तितलियों की अनगिनत प्रजातियां हैं। दुर्लभ हिम तेंदुआ] भूरा भालू] कस्तूरी मृग] स्नो काक] कोकिलाज पीजेंट] स्नो पैट्रेज] सहित सैकड़ों प्रजाति के वन्य जीव पार्क के प्राकूतिक वातावरण में सुरक्षित विचरण करते हैं। 

सीमांत चमोली जिले में स्थित यह पार्क ब्रिटिश शासन के पूर्व भी जैव विविधता के लिए चर्चित रहा है। सबसे पहले इस पार्क के ईनर बेसिन लाईन तक सन १८८२में डब्लूएच ग्राहम पहुंचे। उन्हीं को फॉलो करते हुए वर्ष १९०७ में प्रसिद्ध पर्वतारोही टीजी लोंगस्टेफ और ह्यूज रटलेज] १९२६]२७ और १९३२ में यहां पहुंचे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पार्क तब ज्यादा प्रसिद्ध हुआ था जब टिलमेंन एवं एनई ओडिल नें १९३६ में नंदादेवी पीक पर पहला आरोहण किया। १९३९ के दौरान ही १८२.६३ स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र के नंदादेवी बेसिन को नंदादेवी वाईल्ड लाईफ सेंचुरी ?kksf"kr कर दिया गया। 

वर्ष १९८२ में संरक्षण के चलते पार्क को अपग्रेड करने की कयावदें तेज हुईं और इसे नेशनल पार्क बना दिया गया। इसके साथ ही पार्क को पर्वतारोहण पथारोहण के चलते हो रहे नुकसान एवं हिमालयन ईकोसिस्टम को बचाने के लिए वर्ष १९८८ में पार्क के संवेदनशील कोर जोन २२३६.७४ स्क्वायर किलोमीटर को बायोस्पियर रिजर्व ?kksf"kr कर दिया गया। 

१६१२.१२ स्क्वायर किलोमीटर पार्क के क्षेत्र को बफर जोन बनाया गया। १९८२ से पूर्व नंदादेवी पीक ७८१७ मी के आरोहण के लिए अनगिनत देशी&विदेशी एक्सपिडीसन और ट्रैकिंग दलों के अभियान संचालित हुए थे। भारत सरकार ने बाद में नंदादेवी पीक पर आरोहण बंद कर दिया था] तब से अब तक सिर्फ बफर जोन तक ही पर्यटकों की 

आवाजाही सीमित हो गई है। फिलहाल प्रकूति पर्यटन के लिए पार्क प्रशासन जोशीमठ मुख्यालय से परमिट लेकर लाता&लाताखर्क&धरांसी पास&डिबरुगेठा ३६०० मीटर तक ही पथारोहण कर सकता है।

विश्व धरोहर के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा सीमित संख्या में ही बफर जोन में आवाजाही करने की अनुमति दी जाती है। इस वर्ष भी एक जून को पार्क खुल रहा है] जिसको देखते हुए पार्क प्रबंधन ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। पार्क के डीएफओ चंद्रशेखर जोशी कहते हैं कि 

नंदादेवी नेशनल पार्क में पार्क प्रशासन की अनुमति से ही पर्यटकों को प्रकूति पर्यटन के लिए जाना पड़ता है। पार्क के नियमों और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम को ध्यान में रखकर ही हर वर्ष की तरह निश्चित शुल्क जमा करने के बाद ही ट्रैकिंग करने की अनुमति दी जाएगी। वन विभाग ने पार्क के मार्गों पर पड़ने वाली कैंप साइटों पर व्यवस्थाएं दुरुस्त करने की तैयारियां शुरू कर दी हैं।


गड़बड़ी की जांच करेंगे एसडीएम

  • जसपाल नेगी

श्रीनगर ¼पौड़ी½। प्रदेश में कुंभ के बाद अब छोटे नगरों में आयोजित किए जाने वाले मेले भी वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर चर्चा में आ रहे हैं। पौड़ी जिले के श्रीनगर में हर साल बैकुंठ चतुर्दशी का भव्य मेला लगता है। यह मेला दुनियाभर में प्रसिद्ध है। लेकिन अब इसमें अनियमितताएं होने की खबरें सुर्खियों में हैं। बैकुंठ चतुर्दशी मेला एवं विकास प्रदर्शनी में वित्तीय अनियमितता मामले की जांच एसडीएम पौड़ी करेंगे। सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल ने जिलाधिकारी सुशील कुमार से मुलाकात कर इस मामले को उजागर किया था। कुमार का आरोप है कि पालिका ने बैकुंठ चतुर्दशी मेला एवं विकास प्रदर्शनी वर्ष २०१४&१५ में १५० स्मृति चिह्व मैसर्स बहुखंडी आर्ट्स देहरादून से खरीदे। प्रति स्मृति चिह्न १३०७ रुपए के हिसाब से खरीदा गया] जबकि वास्तविक मूल्य ८०० रुपए मात्र था। इसी तरह वर्ष २०१५&१६ में भी पालिका ने १५० स्मृति चिह्व मैसर्स बहुखंडी आर्ट्स देहरादून से ही खरीदे। प्रति चिह्व १४७५ रुपए के हिसाब से खरीदा गया] जबकि वास्तविक मूल्य ११०० रुपये था। इस तरह फर्म एवं पालिका की मिलीभगत से ५६२५० रुपए  ठिकाने लगाए गए। फर्म ने जो बिल भुगतान के लिए पालिका को दिए और जो हमें दिए उनमें टिन नंबर अलग&अलग हैं। जो फर्म के फर्जी होने का पुख्ता सबूत भी हैं। इसलिए फर्म की जांच भी होनी चाहिए। वर्ष २०१४&१५ में पालिका ने स्टार नाइट के आयोजन में कुमार प्रिस एंड पार्टी को बुलाया। फर्म को ६ लाख ५० हजार का भुगतान चेक व तीन लाख का भुगतान सादे कागज पर किया गया। वर्ष २०१५&१६ में भी पालिका ने स्टार नाइट में कुमार प्रिस एंड पार्टी को बुलाया। फर्म को ५ लाख चेक और ३ लाख्ा ५० हजार रुपए सादे कागज पर दिए गए। इस तरह सादे कागज पर ६ लाख ५० हजार का लेनदेन पालिका के भ्रष्टाचार में डूबे होने का प्रमाण दे रहा है। इस पर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश जारी किए।


 
         
 
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  • अरुण कश्यप

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