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vad 14 23-09-2017
 
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खास खबर 
 
विवाद का ब्रेक

  • आकाश नागर

नेशनल हाईवे १२५ के विस्तार पर विवादों का ऐसा ग्रहण लगा है जो हिंसा का माहौल बनाने को भी आतुर है। जमीनों के मुआवजे को लेकर थारुओं और उनसे जमीनें खरीदने वालों के बीच जबर्दस्त टकराव चल रहा है। दोनों पक्ष दावा कर रहे हैं कि हाईवे के लिए अधिग्रहित जमीनों का मुआवजा उन्हें मिलना चाहिए। नियमानुसार मुआवजा थारुओं को ही मिल सकता है। लेकिन खरीददार उन्हें मुआवजा नहीं उठाने दे रहे हैं। ऐसे में टकराव और हिंसा की आशंकाएं बराबर बनी हुई हैं। अब तक की कोई भी सरकार इस समस्या का समाधान नहीं कर पाई है। मौजूदा सरकार के लिए भी यह आसान काम नहीं है। ऐसे में हाईवे का विस्तार काफी चुनौतीपूर्ण हो चुका है 

जमीन हमारी मां है] आखिर हम इसे कैसे बेच सकते हैं\ हमारे पिताजी ने एक साहूकार से कुछ पैसा उधार लिया था। उस वक्त साहूकार ने एक ५० रुपए के स्टांप पेपर पर उनसे साईन करा लिए थे। उनसे लिखा लिया गया कि पैसा चुकता न करने तक जमीन गिरवी रखी मानी जाएगी। उस दिन के बाद साहूकार ने हमारी जमीन पर बाकायदा खेतीबाड़ी भी शुरू कर दी। अब हमारी जमीन नेशनल हाईवे ¼एनएच½ १२५ के विस्तारीकरण में अधिग्रहित की जा रही है। नियमानुसार हमें जमीन का मुआवजा मिलना चाहिए। लेकिन साहूकार हमें मुआवजा नहीं उठाने दे रहा है। वह कहता है कि जमीन मेरी है। मैंने उसे तुम्हारे पिताजी से खरीद लिया था। इस तरह आज हम अपनी ही जमीन का मुआवजा नहीं उठा सकते हैं। अगर हम हिम्मत कर मुआवजा लेने की कोशिश करेंगे तो हमारे परिवार के साथ कुछ भी अनहोनी हो सकती है। खटीमा तहसील के कुटली गांव निवासी विरेंद्र सिंह राणा का यह दर्द उस समाज की दास्ता बयां करता है जहां आम लोग आज भी साहूकारों के आगे विवश हैं। जहां साहूकार कायदे कानून को अपनी जेब में समझते हैं और गरीब लोगों पर मनमानी करते हैं। 

विरेंद्र सिंह राणा की जमीन सितारगंज से खटीमा टनकपुर तक नेशनल हाईवे १२५ के विस्तार में अधिग्रहित की जा रही है। लेकिन कई महीनों की मशक्कत के बाद राणा हाईवे का नवनिर्माण और चौड़ीकरण किया जाना है। वीरेंद्र सिंह तय नहीं कर पाए हैं कि जमीन का मुआवजा उठाएं या नहीं\ कारण कि जमीन दस्तावेजों ¼खसरा और खतौनी½ में तो उनके पिता रामचरण सिंह राणा का नाम अवश्य है। लेकिन उस पर काबिज तरमेंद्र सिंह हैं। तरमेंद्र सिंह का यह दावा है कि विरेंद्र के पिता से यह खरीद ली थी। लेकिन जिस ५० रुपए के स्टांप पर वह जमीन खरीदने की बात कह रहे हैं उसे कानून सही नहीं मानता है। नियम&कानून के मुताबिक थारू और बुक्सा जनजाति के लोगों की जमीनों की बिक्री नहीं हो सकती है। जब उनकी जमीनें बिक ही नहीं सकती तो कोई उन्हें कैसे खरीद सकता है। इसके बावजूद सितारगंज से लेकर नानकमत्ता] खटीमा] बनबसा और टनकपुर तक उनकी जमीनें नियम विरुद्ध स्टांप पेपर पर बिकी हैं। अब जमीनों के मूल मालिकों को मुआवजा मिल रहा है तो खरीददार आडे़ आ रहे हैं। इस तरह के करीब ३०० विवाद बताए जाते हैं। आगामी दिनों में इन विवादों के कारण स्थिति विकराल रूप धारण कर सकती है। यहां तक कि हिंसा की आशंकाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। विवादों के चलते विस्तार का काम बाधित हो रहा है। हालात यह है कि सितारगंज तक फोर लेन एनएच ७४ का निर्माण लगभग पूरा होने  को है। लेकिन इसके आगे स्थिति ठीक नहीं है।

सितारगंज से नानकमत्ता] खटीमा बनबसा टनकपुर तक करीब ३६२ ऐसे मामले प्रशासन के पास लंबित हैं। जिनमें मुआवजे को लेकर दो पक्ष आमन&सामने हैं दोनों पक्षों के अपने&अपने स्वार्थ और हित हैं। ऐसे में हाईवे निर्माण अधर में है। इस समस्या को देखते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधि  और समाज सेवियों के कई जत्थे विवाद को सुलझाने में सक्रिय हैं। लेकिन उन्हें उम्मीद के अनुरूप सफलता नहीं मिल पा रही है। आज स्थिति यह है कि जो खटीमा बाईपास का निर्माण होना था उस पर एक किलोमीटर भी काम नहीं हो सका है] जबकि गल्फार कंसट्रक्शन कंपनी को यह काम सितंबर २०१६ तक पूरा कर देना था। 

नानकमता] बनबसा टनकपुर और खटीमा में जमीनों को लेकर जो विवादास्पद मामले हैं। उनमें सबसे खराब स्थिति खटीमा तहसील की है। यहां के गांव सुजिया मोहिल्ला] कुटली पहेनिया] खिचई उमरूकला] गोहरवाटिया] डिगराबाद] नदनना] डमरूपुर में इस तरह के कई विवाद देखे जा सकते हैं। पहेनिया निवासी राम सिंह कहते हैं कि थारू और बुक्सा समाज के लोगों ने कई बार प्रदेश के पिछले मुख्यमंत्रियों के दरबार में जाकर उन्हें अपनी समस्या से अवगत कराया। हर मुख्यमंत्री से यही आश्वासन मिला कि जल्द ही दोनों पक्षों को लेकर आपसी रजामंदी बनाएंगे। जब एनएन १२५ का सर्वे चल रहा था उस वक्त मुआवजे के लिए गजट नोटिफिकेशन होते ही पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से भी इस बाबत कोई समाध्ाान निकालने की मांग की गई थी। दो साल तक वह कहते रहे कि समाधान करा रहे हैं। लेकिन आज भी समस्या जस की तस है। तब से कई मामलों में स्थिति काफी विस्फोटक हो चली है। इस मामले की गंभीरता को न तो कभी भाजपा ने समझा और न ही कांग्रेस ने। उत्तराखण्ड के गठन से लेकर अब तक जमीनी विवाद के चलते कई लोग अपनी जान तक गंवा बैठे हैं। 

बताया जाता है कि खटीमा और बनबसा क्षेत्र में साहूकारों का जाल फैला हुआ है जो लोगों को पहले ब्याज पर पैसे देते हैं और बाद में उनकी जमीनों पर अनाधिकूत कब्जे कर लेते हैं। खटीमा थाने में ही अब तक ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं। थानाध्यक्ष चंचल शर्मा की मानें तो हर तीसरे दिन जमीनों के विवाद का कोई न कोई केस थाने में आता रहता है। जब से नेशनल हाईवे १२५ के चौड़ीकरण और विस्तार का सिलसिला शुरू हुआ तबसे इन मामलों में वृद्धि हुई है। क्षेत्र के बुद्धिजीवी और भूतपूर्व सैनिक संगठन के कर्ताधर्ता विवादों को सुलझाने के लिए आए दिन पंचायतें करते रहते हैं। लेकिन स्थिति बिगड़ती ही रही है। आज थारू समाज के कुछ लोग कहते हैं कि वे मुआवजे का ४० प्रतिशत लेंगे तो कुछ ५० प्रतिशत पर हठ कर जाते हैं। जबकि दूसरा पक्ष थारुओं को मुआवजे का सिर्फ १० प्रतिशत ही देना चाहता है।


बात अपनी&अपनी

राज्य की पूर्व कांग्रेस सरकार चाहती तो विवाद को खत्म करने के लिए कोई रास्ता निकाल सकती थी। हम इस संबंध में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से मिले हैं। उन्होंने आश्वस्त किया है कि बीच का कोई रास्ता जरूर निकालेंगे। कुछ लोग दोनों पक्षों को भड़काकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। 

पुष्कर सिंह धामी] विधायक खटीमा

हम दोनों पक्षों को साथ लेकर कई बार बैठक कर चुके हैं। आम सहमति बनती दिख रही है। जल्द ही हाईवे निर्माण का रास्ता खुल जाएगा।

प्रेम सिंह राणा] विधायक नानकमत्ता

हम जनप्रतिनिधियों और किसानों के माध्यम से विवाद  को सुलझा रहे हैं। जल्द ही विवाद सुलझ जाएगा।

डॉ नीरज खैरवाल] जिलाधकारी ऊधमसिंहनगर

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में हमने कई बार दोनों पक्षों के बीच बैठकें कराई। लेकिन तब विपक्षी पार्टी के कुछ नेता नहीं चाहते थे कि रजामंदी बने। 

भुवन कापड़ी] प्रदेश अध्यक्ष युवक कांग्रेस 

हमने २०&२५ साल तक सेना में नौकरी की। वहां से जो पैसा कमाया उससे जमीन खरीदी। आज अचानक उसका वारिस पैदा हो जाए और वह कहे कि मुआवजा हमें ही मिलना चाहिए तो यह कैसे संभव है। आज सितारगंज से बनबसा खटीमा तक कई मामले ऐसे हैं जिनमें पूर्व सैनिकों की जमीनों का मुआवजा विवादों में है। हम विवाद को खत्म करने के मकसद से थारुओं को मुआवजे का १० प्रतिशत देने को तैयार हैं। अगर अब भी मामला नहीं सुलझा तो हाईवे हमारे खून से बनेगा।

कुंवर सिंह खनका] अध्यक्ष भूतपूर्व सैनिक संगठन] खटीमा

ब्याजखोरों ने अनपढ़ थारुओं के साथ चालाकी की है। अब उनकी नई पीढ़ी इसे समझ रही है। हम चाहते हैं कि विवाद समाप्त हो और हाईवे निर्माण शुरू हो।

रमेश राणा] पूर्व जिला पंचायत सदस्य

यह पूरा मामला दिन प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। शासन&प्रशासन इस मामले की गंभीरता को समझ नहीं पा रहा है। जिसके चलते स्थिति कभी भी विस्फोटक हो सकती है।

डॉ राजू महर] सामाजिक कार्यकर्ता खटीमा


 
         
 
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  • सिराज माही

मोदी मंत्रिमंडल विस्तार ने कई संकेत दिए। कुछ भ्रम टूटे तो कुछ नए भ्रम रचे गए। इस विस्तार में कुछ तारों को काटकर अलग कर दिया

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