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आवरण कथा
 
कुनबे की करवट

  • गुंजन कुमार

मात्र दो माह की त्रिवेंद्र सरकार में बगावत के सुर दिखने लगे हैं। हालांकि अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि भविष्य में इससे सरकार के लिए कोई बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। लेकिन वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत के तेवर भीतर ही भीतर सुलग रहे भाजपा के असंतुष्ट विधायकों के लिए आग में
?kh डालने वाले साबित हो सकते हैं। 

कैबिनेट मंत्री हरक सिंह के एक हालिया बयान से राज्य की राजनीति गरमाई हुई है। मंत्री का यह बयान न सिर्फ राज्य सरकार बल्कि केंद्र पर भी निशाना साधता प्रतीत होता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या हरक की मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत से पटरी नहीं बैठ पा रही है। चर्चा इसलिए भी स्वाभाविक है कि हरक ने त्रिवेंद्र पर निशाना साधने के लिए उनके दो दो धुर विरोधी पूर्व मुख्यमंत्रियों के नामों का इस्तेमाल किया है। हरक मानते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और रमेश पोखरियाल निशंक विकास करने में सक्षम थे। उनके बयान से साफ है कि वे त्रिवेन्द्र से इस कदर खफा हैं कि उन्हें नीचा दिखाने के लिए उन्होंने कांग्रेस के अपने कट्टर पुराने राजनीतिक शत्रु हरीश रावत का भी सहारा लिया है। भाजपा में त्रिवेंद्र सिंह रावत के धुर विरोधी समझे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का भी उन्होंने इस्तेमाल किया है। हरक के अलावा इन दिनों एक और मंत्री और कुछ विधायक इन दिनों अपनी उपेक्षा को लेकर अंदरखाने नाराज बताए जाते हैं।

राजनीतिक पंडितों के मुताबिक वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह के बगावती तेवर प्रदेश सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। खासकर ऐसे समय में जबकि प्रदेश सरकार का कार्यकाल महज दो माह का ही हुआ है। ऐसे में सरकार के मंत्री ही सरकार विरोधी राग अलापने लगें तो इसके निहितार्थ निकाले जाने स्वाभाविक हैं। कोई भी सोच सकता है कि कल तक जो हरीश रावत कांग्रेस में रहते हरक के सबसे बड़े विरोधी थे। जिन्हें वे पानी पी पीकर कोसते रहे] जिनकी हार देखने के लिए वे लालायित थे आखिर आज अचानक हरक उनकी क्षमताओं के कैसे मुरीद हो गए। हरक आज कैसे उनके सबसे बड़े प्रशंसक और पैरोकार के रूप में दिख रहे हैं। हरक के ये बदले तेवर अनायास नहीं हो सकते हैं] इनके पीछे कोई बहुत बड़ा अर्थ छुपा हो सकता है। उन्होंने कहा कि हरीश रावत से उनके लाख राजनीतिक मतभेद रहे हों लेकिन वे जमीन से जुड़े नेता थे। उनमें कई खूबियां थीं] पर अफसरशाही ने उन्हें एक नाकाम मुख्यमंत्री बना दिया।

इसी तरह भाजपा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक की तारीफ करते हुए हरक ने कहा कि निशंक काफी कम उम्र में मुख्यमंत्री बन गए थे। वह भी राज्य का विकास कर सकते थे। लेकिन उन्हें बीच में ही हटा दिया गया। नौकरशाही ने उन्हें भी नाकाम बना दिया। हरक सिंह ने अपने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के काम की तारीफ करने के बजाए हरीश रावत और निशंक की तारीफ कर सबको चौंका दिया है। वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर निशाना भी साधा। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही व्यक्ति की मनोदशा बदल जाती है। अपने बयान में वे उत्तराखण्ड तक ही सीमित नहीं रहे। सूबे से बाहर उन्होंने केंद्र पर भी हमला बोला। हरक सिंह ने कहा] चुनाव के दौरान बीजेपी ने डबल इंजन मांगा। उत्तराखंड की जनता ने एक मजबूत इंजन दिया लेकिन आज केंद्र का इंजन कमजोर दिखाई दे रहा है।^

कुछ दिन पहले तक हरक सिंह केंद्र सरकार खासकर प्रधानमंत्री मोदी के गुण गाते थे। साथ में हरीश रावत को सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी बताने पर तुले हुए थे। लेकिन अचानक हरक सिंह के सुर बदलने से सभी सकते में हैं। केंद्र पर हमले का सीधा अर्थ प्रधामंत्री मोदी पर हमला है। इससे लोगों को लग रहा है कि दो माह में ही हरक सिंह रावत का त्रिवेंद्र सरकार से मोहभंग होने लगा है। मोह भंग सिर्फ त्रिवेंद्र सरकार से ही नहीं] बल्कि भाजपा से भी है। यही वजह है कि उन्होंने केंद्र पर भी हमला बोला। सच तो यह है कि उन्होंने ऐसा कर कांग्रेस के हाथ भी भाजपा और राज्य सरकार पर हमला करने का अस्त्र थमा दिया है। सूत्रों के  मुताबिक उनके डबल इंजन वाले बयान को कांग्रेस मुद्दा बनाने पर विचार कर रही है। यदि कांग्रेस से जोरशोर से इसे उठाती है तो स्थिति राज्य सरकार को असहज करने वाली हो सकती है।

हरक सिंह रावत को उत्तराखण्ड की राजनीति का माहिर और ?kk?k नेता माना जाता है। वे बड़ी से बड़ी बातों को सधे हुए शब्दों में कह देते हैं। हरक के इस बयान के बाद चर्चा है कीे उनकी और मुख्यमंत्री की पटरी नहीं बैठ रही है। वे सरकार में खुद को उपेक्षित और असहज महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि उन्होंने बड़े ही सधे हुए शब्दों में हरीश रावत एवं निशंक की तारीफ कर और नौकरशाही के बहाने मुख्यमंत्री को चेतावनी दी है।

दरअसल] हरक सिंह की सबसे बड़ी परेशानी यह बताई जा रही है कि उन्हें मंत्रालय में पूरी स्वतत्रंता नहीं मिल रही है। यहां तक कि अपने ओएसडी और पीए रखने की भी नहीं। बताया जाता है कि प्रदेश के अधिकतर मंत्री आरएसएस की निगहबानी में हैं। एक तरह से कहा जाए तो आरएसएस ने मंत्रियों को बेड़ियों में डाल दिया है। हर मंत्री पर नजर रखने के लिए उनके साथ एक&एक la?k प्रचारक को तैनात किया गया है। वैसे तो la?k प्रचारक सभी मंत्रियों के साथ हैं मगर बताया जाता है कि कांग्रेस को छोड़ भाजपा में आने वाले नेताओं पर इनकी खास नजर है। कांग्रेस के बागी नेता सरकार विरोधी रणनीति न बना पाएं] इसलिए ऐसा किया गया है। la?k की इस रणनीति से अन्य मंत्रियों पर कोई फर्क पड़े या न पड़े लेकिन हरक सिंह रावत जैसे मंत्रियों पर बहुत फर्क पड़ता है।

हरक सिंह किसी भी तरह के अंकुश लगने पर शांत नहीं रह पाते हैं। वह अपने चहेतों को मनपसंद के महकमों में समायोजित कराने के लिए किसी भी हद पर चले जाते हैं। विजय बहुगुणा सरकार में हरक सिंह अपनी एक चहेती महिला अधिकारी को समायोजित कराने के लिए तत्कालीन शिक्षा मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी से भी भिड़ गए थे। हरीश रावत सरकार में उन्हें स्वतंत्रता नहीं मिली तो वे धीरे&धीरे बगावत तक पहुंच गए। त्रिवेंद्र सरकार में भी हरक सिंह सहित किसी मंत्री को वह स्वतंत्रता अभी तक प्राप्त नहीं हुई है। संभव है कि हरक सिंह ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए यह बयान दिया हो।

हालांकि प्रदेश में इस समय प्रचंड बहुमत की सरकार है। लेकिन जानकारों की मानें तो विरोध का एक हल्का सा स्वर भी किसी सरकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। फिलहाल ७०  सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास दो तिहाई से भी अधिक विधायक हैं। लेकिन देखने वाली बात यह भी है कि इनमें कांग्रेस से बागवत कर भाजपा में आने वाले ११ विधायक भी हैं। जिनमें पांच मंत्री भी हैं। यदि ये मंत्री त्रिवेंद्र सरकार से नाराज या फिर अपनी उपेक्षा के शिकार होते हैं तो इनमें फिर से कांग्रेस प्रेम जाग सकता है। ऐसे भी कहा जाता है कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। परिस्थिति के मुताबिक राजनीति में दोस्त और दुश्मन बनाए जाते हैं। यदि कांग्रेस के बागी सभी पांचों मंत्री अपने साथ कांग्रेस से आ गए विधायकों को साथ लेकर बगावत कर दें तो त्रिवेंद्र सरकार के लिए अच्छा नहीं होगा। ऐसे ११ विधायकों के बगावत से सरकार के बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा] लेकिन सरकार की सेहत के लिए कोई इसे ठीक भी नहीं कहेगा। उनकी देखा&देखी भाजपा में पले&बढ़े विधायक भी अपनी आवाज ऊंची कर सकते हैं।        

हरक सिंह रावत के राजनीतिक सफर को देखें तो वे शुरू से ही स्वतंत्र और खुलकर नेतागीरी करने वाले नेता रहे हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की बंदिश मंजूर नहीं है। इसके अलावा वे हमेशा से शीर्ष की कुर्सी पर नजर गड़ाए रखते हैं। इस कारण अपने राजनीतिक सफर में उनको कई बार बगावत करनी पड़ी। उन्होंने मुख्यधारा के राजनीतिक कैरियर की शुरूआत भाजपा से ही की थी। भाजपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने और उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार में मंत्री भी बने। कल्याण सिंह सरकार में वे पर्यटन राज्य मंत्री रहे। लेकिन भाजपा को उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत होने के बावजूद उन्होंने १९९६ में बगावत कर दी। तब उनके और भुवन चंद्र खंडूड़ी के बीच मतभेद हो गए थे। उन्होंने खंडूड़ी पर हमला बोलते हुए भाजपा को बाय&बाय बोल दिया। उस बगावत के बाद उन्होंने गढ़वाल लोकसभा सीट से खंडूड़ी को हराने के लिए सपताल महाराज से हाथ मिला लिया। उस चुनाव में खंडूड़ी महाराज से हार भी गए। इसके बाद हरक सिंह ने बसपा को ज्वाइन कर लिया। लेकिन बसपा में अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा पूरी होती न देख वे बसपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए।

कांग्रेस में वे लंबे समय तक रहे। पहली निर्वाचित सरकार में वे राजस्व मंत्री रहे। २००७ में कांग्रेस की हार के बाद वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे। २०१२ के विधानसभा चुनाव के बाद बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर उन्होंने हरीश रावत का साथ देकर विरोध जताया। मगर तब आलाकमान ने सबको समझ लिया और वे बहुगुणा सरकार में कूषि मंत्री बने। बहुगुणा सरकार में उन्हें पूरी स्वतंत्रता मिली हुई थी। लेकिन हरीश सरकार बनने के बाद उन्हें फिर से अपने कामों में बंदिशें लगी। जिसकी परिणति कांग्रेस से बगावत के रूप में हुई। अब एक बार फिर वे भाजपा में मंत्री रहते बगावती तेवर दिखाने लगे हैं। भविष्य में यह बागी तेवर क्या गुल खिलाते हैं] यह अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन किसी भी रूप में यह त्रिवेंद्र सरकार के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता।

gunjan@thesundaypost.in

केंद्र का इंजन ठप होने वाले बयान पर मैंने हरक सिंह रावत जी से बात की है। उन्होंने साफ कहा कि मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। जब वह मना कर रहे हैं तो इस पर क्या बोलूं।

अजय भट्ट] प्रदेश अध्यक्ष भाजपा

मीडिया ने मेरी बातों को तोड़&मरोड़ कर पेश किया है। मैंने किसी की तारीफ नहीं की है। केंद्र सरकार पर भी मैंने ऐसा कुछ नहीं बोला है।

हरक सिंह रावत] वन एवं पर्यावरण मंत्री

 
         
 
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