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vad 7 05-08-2017
 
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सरगोशियां
 
संकट राजे का

केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के काबिज होते ही गैर भाजपाई सरकारों पर खतरा मंडराता सभी को नजर आ रहा है। भाजपा नेतृत्व येनकेन प्रकारेण इन राज्यों में अपना शासन चाहता है। इसके लिए बड़े पैमाने पर दलबदल कराया जा रहा है। लेकिन सबकुछ भाजपा शासित राज्यों में भी ठीक नहीं है। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ वरिष्ठ भाजपा नेता द्घनश्याम तिवाड़ी ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है। कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए केंद्रीय नेतृत्व से मिले नोटिस का जवाब तिवाड़ी ने जिस अंदाज में दिया है उससे स्पष्ट होता है कि वे भाजपा ने निकाले जाने का इंतजार कर रहे हैं। तिवाड़ी से अपने उत्तर में लिखा है ^मुख्यमंत्री ने राजस्थान में चोरी और सीनाजोरी का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। क्या इस मुख्यमंत्री को आपने पार्टी गिरवी रख दी है?^ जाहिर है ऐसे उत्तर के बाद तिवाड़ी के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होने के पूरे आसार हैं। पार्टी नेतृत्व को चुनौती देने वाले अंदाज में लिखे अपने जवाब में वे कहते हैं। ^राजा रूठे] नगरी राखे^ यानी राजा नाराज हो भी गया तो प्रजा रक्षा करती है। खबर है कि कांग्रेसी नेता और पूर्व सीएम अशोक गहलौत ने तिवाड़ी को अपने खेमे में लाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं।

भयभीत नेता

राजनेताओं को सबसे ज्यादा डर अपनी सत्ता के छिन जाने का होता है। इस डर के चलते वे हर प्रकार की अफवाहों का शिकार तक हो जाने को तैयार रहते हैं। उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर के बारे में यह कहा जाता है कि जो भी सीएम रहते यहां आता है उसकी गद्दी छिन जाती है। यही कारण है कि सीएम रहते राजनाथ सिंह] मुलायम सिंह] अखिलेश यादव कभी नोएडा नहीं आए। हालांकि यहां न आने पर भी वे सीएम नहीं रहे। लेकिन कोई भी इस अंधविश्वास की मुखालफत करने का रिज्क नहीं उठाता है। मायावती ने अवश्य इसके खिलाफ जाने का साहस किया था। पिछले दिनों अमरकंटक की यात्रा के दौरान पीएम मोदी भी ऐसे ही एक मिथक के शिकार हुए। मध्य प्रदेश स्थित इस हिन्दू धार्मिक स्थान के बारे में मान्यता है कि जो भी अमरकंटक के ऊपर से हवाई यात्रा करता है उसकी सत्ता खत्म हो जाती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा सौ दिन के नर्मदा बचाव अभियान समापन कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचे पीएम ने अपनी यात्रा का आखिरी पड़ाव रोड से तय किया। उन्होंने सौ किलोमीटर की सड़क यात्रा कर अमरकंटक में दर्शन किए। स्थानीय जनता का कहना है कि इंदिरा गांधी] मोरारजी देसाई और उमा भारती ने अमरकंटक के ऊपर से उड़ान भरी थी। जिसके बाद उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी। अब भला पीएम कोई रिस्क लेकर इतनी मेहनत से मिली सत्ता के लिए संकट क्यों उठाते। उन्होंने सड़क मार्ग से यात्रा करना बेहतर समझा।

गवर्नर की बेचारगी

केरल की कम्प्युनिस्ट सरकार भाजपा नेतृत्व की आंखों में बहुत खटकती है। अपना आधार मजबूत करने का प्रयास वहां भाजपा लंबे अर्से से कर तो रही है लेकिन कुछ खास सफलता उसे अभी तक हासिल नहीं हुई है। २०१६ में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को मात्र एक सीट पर विजय हासिल हुई। भाजपा एनडीए गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ी थी। उसने ९८ सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए जिसमें से केवल एक सीट पर ओ ़ राजगोपाल विजयी रहे। ?kVd दलों ने बाकी ४२ सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। जिसमें से मात्र एक विजयी रहा। कुल मिलाकर एनडीए गठबंधन को दो सीटों पर सफलता मिली। इस करारी हार के बाद से ही भाजपा का स्थानीय नेतृत्व केरल की कम्युनिस्ट सरकार को ?ksjus में जुटा है। पिछले दिनों आरएसएस के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई। इस कार्यकर्ता पर सीपीएम के एक नेता की हत्या का आरोप था। भाजपा ने इस मुद्दे पर भारी हायतौबा मचाई। उसका एक प्रतिनिधि मंडल गवर्नर पी सदाशिवम से मिला। प्रतिनिधि मंडल ने राज्य के कन्नूर इलाके को अति संवेदनशील क्षेत्र ?kksf"kr किए जाने की मांग राज्यपाल से की। राज्यपाल ने उनका मांग पत्र सीएम पिनरई विजयन को सौंप दिया है। इससे भाजपा खासी नाराज है। गवर्नर पर आरोपों की बौछार की गई है। राज्य भाजपा का मानना है कि गवर्नर मात्र मध्यस्थ नहीं होता है। यदि राज्यपाल राज्य सरकार से भयभीत हैं तो इस्तीफा दे दें। बेचारे पी सदाशिवम भारत के मुख्य न्यायाधीश रहते कभी सोच भी सकते थे कि उन पर इस प्रकार का आरोप लगाने का कोई साहस भी कर सकेगा। गवर्नर अपनी न्यायिक बिरादरी की आलोचना का तो शिकार हुए ही] अब राजनेताओं के रोष को भी झेलने को मजबूर हैं।

प्रकाश पंत की हैरानी

उत्तराखण्ड सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले मंत्री प्रकाश पंत सरल स्वभाव के बताए जाते हैं। कड़ी मेहनत कर राजनीति में अपना मुकाम बनाने वाले पंत की गिनती उन नेताओं में होती है जो वक्त के अनुसार अपनी निष्ठा नहीं बदलते। वह डॉ मुरली मनोहर जोशी और भगत सिंह कोश्यारी के करीबी रहे हैं। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में आखिरी समय में कोश्यारी ने अपना समर्थन त्रिवेंद्र रावत को दे प्रकाश पंत को भारी झटका देने का काम किया। बेचारे पंत पूरी उम्मीद में रहे कि भगत दा का आशीर्वाद उन्हें अवश्य मिलेगा लेकिन बाह्मण&ठाकुर राजनीति में पलड़ा अंततः त्रिवेंद का भारी रहा। पिछले दिनों दिल्ली पहुंचे पंत को दूसरा झटका तब लगा जब वे अपने राजनीतिक गुरु डॉ जोशी से मुलाकात करने उनके निवास गए। दिल्ली दरबार के नए समीकरणों को न समझने का खामियाजा उन्हें तुरंत भुगतना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि पंत जैसे ही डॉ जोशी के ?kj से बाहर निकले उन्हें पार्टी के एक बड़े नेता का फोन आ गया।  इन नेता इशारों&इशारों में पंत को समझा दिया कि दिल्ली में वे किससे मुलाकात करते हैं] कहां उठते&बैठते हैं] इसकी जानकारी रखी जा रही है। बेचारे पंत हक्के&बक्के हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने डॉ जोशी से भेंटकर अच्छा किया या फिर गलत।


 
         
 
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कई बार बहुत अच्छे नंबर पाने और पढ़ने की ललक होने के बावजूद आर्थिक तंगी के चलते कई लोग पढ़ने से महरूम रह जाते हैं। ऐसी ही कहानी है उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में रहने वाली करिश्मा की] जिसने

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