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vad 7 05-08-2017
 
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मेरी बात अपूर्व जोशी
 
मुस्लिम औरतों का दर्द

  • अपूर्व जोशी

मैं समझता हूं तीन तलाक] हलाला निकाह और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर कानूनी रोक लगाने का समय अब आ गया है। ये ऐसी कुरीतियां हैं जिन्हें /keZ की आड़ में बढ़ावा देने का काम वह शक्तियां कर रही हैं जो मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हैं। चूंकि वर्तमान में एक ऐसे दल की सरकार केंद्र में स्थापित है जो कट्टर हिंदुत्व की पैरोकार मानी जाती है] इसलिए ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि मुस्लिम पर्सनल कानून से छेड़छाड़ हमारे /keZ निरपेक्ष स्वरूप के विपरीत है। जरूरत इस बात की है कि इसे राजनीति के संकीर्ण दायरे से बाहर रख मुस्लिम समाज के व्यापक हित के नजरिए से देखा जाना चाहिए

 

देश की सबसे बड़ी अदालत गर्मियों की छुट्टियों में भी काम कर रही है। यह मामूली बात नहीं है। पांच न्यायाधीशों की पीठ ने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई करने के लिए अवकाश के दिनों में काम करने का निर्णय लिया। मुद्दा मुस्लिम महिलाओं के अधिकार और धर्म के नाम पर हो रहे उनके शारीरिक और मानसिक शोषण से ताल्लुक रखता है। मसला मुस्लिम समाज की उस व्यवस्था से जुड़ा है जिसे आम भाषा में ट्रिपल तलाक यानी तीन बार तलाक&तलाक और तलाक कहा जाता है। इन दिनों इस मुद्दे पर खबरिया चैनल गरमागरम बहस आयोजित कर रहे हैं। इन बहसों में तर्क का कोई स्थान नहीं होता। चैनलों का उद्देश्य भी अपनी टीआरपी रेटिंग से जुड़ा रहा है। अधिकांशतः ऐसी बहसों में शिरकत करने वाले स्वयं भी अधकचरा ज्ञान लिए होते हैं। असल में यह पूरा मुद्दा है क्या इसको समझा जाना न केवल मुस्लिम महिलाओं या फिर मुस्लिम समाज बल्कि हम सभी के लिए बेहद जरूरी है।

तीन तलाक वह प्रथा है जिसके चलते मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन बार तलाक कह छोड़ देता है। यह महिला अधिकारों का खुला उल्लंद्घन तो है ही] मुस्लिम महिलाओं के लिए यह शोषण का सबसे बड़ा कारण भी है। समाज के भीतर से ही इसके खिलाफ आवाज मुखर होने लगी है। भारतीय महिला मुस्लिम आंदोलन की संस्थापक जाकिया सोमन का मानना है कि कुरान में कहीं भी इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है। वे उन याचिकाकर्ताओं में से हैं जिन्होंने इस प्रथा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी है। दूसरी तरफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नामक संस्था है जो मानती है कि धार्मिक मुद्दों पर राज्य यानी कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यदि इसे मानवाधिकारों के बरक्स देखा जाए तो पहली नजर में इसे कुप्रथा कहा जा सकता है। हमारा संविधान ऐसी किसी भी प्रथा को] चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़ी क्यों न हो] मान्यता नहीं देता। मामला लेकिन बेहद पेचीदा है। हमारी अदालतें इस मुद्दे पर समय&समय पर व्यवस्था देती आई हैं। कुरान में मुख्यतः दो प्रकार के तलाक की बात कही गई है। पहला तलाक ^तलाक&ए&एहसन^ है जिसमें व्यवस्था है कि तीन बार तलाक कहने के बाद नब्बे दिन का समय दिया जाता है। यदि इन नब्बे दिनों में पति&पत्नी के बीच सुलह नहीं होती तो तलाक पूरा मान लिया जाता है। दूसरा है ^तलाक&ए&हसन^ जिसमें तलाक कहने के बाद एक माह का अंतराल होता है] फिर दूसरी बार तलाक कहा जाए तो फिर तीस दिन का अंतराल रखा जाता है। यदि एक बार फिर पति तलाक कहे तो उसे पूरा मान लिया जाता है। कट्टर मुसलमान ^तलाक&ए&बिदत^ को भी कुरान के अनुसार मानते हैं जिसमें एक ही बार में तलाक&तलाक&तलाक कह शादी को तोड़ देने की बात है। मुस्लिम विद्वानों का एक वर्ग ^तलाक&ए&बिदत^ को मान्यता नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट इसी पर सुनवाई कर रहा है। ऐसे विद्वानों का कहना है कि हमारा संविधान उन्हीं धार्मिक व्यवस्थाओं को संरक्षण देता है जिनका वास्ता संबंधित धर्म ग्रंथों से सीधे जुड़ा हो। ऐसों का मानना है कि कुरान में कहीं भी ^तलाक&ए&बिदत^ की बाबत कुछ नहीं कहा गया है। दूसरी तरफ कट्टरपंथी मुस्लिम उलेमाओं का मानना है कि तीन तलाक मुस्लिम आस्था से जुड़ा प्रश्न है। जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप संभव नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के सामने इसी से जुड़े दो अन्य मुद्दों पर और भी है जिन पर भी बहस होने की संभावना है। एक मुद्दा हलाला निकाह का तो दूसरा बहुविवाह का है। हलाला निकाह को भी सीधे तौर पर मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों से जोड़कर देखा जाए तो साफ नजर आता है कि यह मुस्लिम महिलाओं का धर्म के नाम पर द्घोर शोषण है जिसकी जड़ में तीन तलाक है। होता यूं है कि तीन तलाक कहने के बाद यदि पति वापस अपनी पत्नी के पास लौटना चाहे तो पहले पत्नी को किसी दूसरे व्यक्ति के संग शादी कर शारीरिक संबंध बनाने होते हैं। इसके बाद उस दूसरे पति से तलाक ले वह अपने पहले पति से निकाह कर सकती है। एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जहां इस हलाला निकाह के नाम पर मुस्लिम महिलाओं का जमकर शोषण किया जाता है। बहुविवाह प्रथा के अनुसार मुस्लिम पुरुष चार शादियां करने के लिए स्वतंत्र है। सुप्रीम कोर्ट की खण्डपीठ ने पहले तो केवल तीन तलाक मुद्दे पर लगातार सुनवाई की बात कही लेकिन अब कोर्ट संभवतः इन दो मुद्दों पर भी सुनवाई करने को तैयार है।

जैसा मैंने पहले कहा] यह मुद्दा हालांकि सीधे&सीधे मानवाधिकारों से जुड़ा है और हमारे देश का संविधान ऐसे मामलों में बहुत स्पष्ट है। लेकिन इसमें पेचीदगियां बहुत हैं। कोर्ट के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या तीन तलाक के मुद्दे को धार्मिक आधार पर न देख सीधे व्यक्ति  के मौलिक अधिकारों से जोड़ अपना फैसला सुनाए या फिर कोर्ट पहले यह तय करे कि यदि धार्मिक आस्था से जुड़ा कोई प्रश्न उठता है और वह प्रश्न संविधान की किसी व्यवस्था के विपरीत है तो क्या धार्मिक आस्था या धार्मिक कानून वैद्य होगा या फिर किसी भी प्रकार की धार्मिक आस्था से ऊपर संविधान रहेगा। यदि सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक व्यवस्था को सबसे ऊपर मानते हुए अपना फैसला देता है तो पहले उन मुद्दों पर भी कोर्ट को अपना रुख स्पष्ट करना पड़ेगा जिनमें पूर्व में फैसले दिए जा चुके हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण १९५१ में मुंबई हाईकोर्ट का एक फैसला है जो कहता है कि निजी कानूनों (धार्मिक कानूनों) की व्यवस्था अदालत नहीं कर सकती है। ^स्टेट ऑफ मुंबई बनाम नरासु अप्पा माली^ केस में मुंबई हाईकोर्ट के न्यााधीश छागला और गजेंद्रगडकर ने फैसला दिया था कि संविधान के अनुच्छेद १४ के अनुसार केवल उन्हीं पर अदालत फैसला दे सकती है जो स्थापित कानून हो जिनके चलते मौलिक अधिकारों का हनन होता है। चूंकि धार्मिक निजी कानून न तो स्थापित होते हैं] न ही उनकी कानूनी व्यवस्था होती है। इसलिए कोर्ट उन पर अपनी व्यवस्था नहीं दे सकता। यदि अब सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को सीधे मौलिक अधिकारों के हनन से जोड़ता है तो निश्चित ही उसे पूर्व में दिए गए फैसलों की भी समीक्षा करनी होगी। जाकिया सोमन का मानना है कि वे और उनकी जैसी लाखों मुस्लिम महिलाएं केवल इतना चाहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट कुरान में तय की गई ^तलाक ए एहसन^ व्यवस्था को मान्यता दे। वे कहती हैं ट्रिपल तलाक जैसी कोई बात कुरान में कहीं नहीं कही गई है। कुरान में स्त्री और पुरुष को एक बराबर का दर्जा दिया गया है। सोमन का यह भी कहना है कि समान अचार संहिता सभी के लिए लागू की जानी चाहिए। उनके अनुसार जो अधिकार हिंदू और ईसाई समाज की महिलाओं को हैं] मुस्लिम महिलाओं का भी उन्हें पाने का पूरा हक है। हमारा संविधान विश्व के श्रेष्ठ संविधानों में से एक माना जाता है। इसके अनुच्छेद १४ से १८ में समता के अधिकार की पूरी व्याख्या है जिसके अनुसार धर्म] वंश] जाति] लिंग और जन्म स्थान  के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जा सकता है। 

मैं समझता हूं तीन तलाक] हलाला निकाह और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर कानूनी रोक लगाने का समय अब आ गया है। ये ऐसी कुरीतियां हैं जिन्हें धर्म की आड़ में बढ़ावा देने का काम वह शक्तियां कर रही हैं जो मुस्लिम समाज के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हैं। चूंकि वर्तमान में एक ऐसे दल की सरकार केंद्र में स्थापित है जो कट्टर हिंदुत्व की पैरोकार मानी जाती है] इसलिए ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि मुस्लिम पर्सनल कानून से छेड़छाड़ हमारे धर्म निरपेक्ष स्वरूप के विपरीत है। चूंकि हमारी आदत हरेक चीज को राजनीति के चश्मे से देखने की आदी हो चली है] इसलिए कई प्रगतिशील सोच वाले मित्र इस मुद्दे पर मुस्लिम उलेमाओं के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि इसे राजनीति के संकीर्ण दायरे से बाहर रख मुस्लिम समाज के व्यापक हित के नजरिए से देखा जाना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि उच्चतम न्यायालय इस पर ऐसा फैसला देगा जो सदियों से शोषण का शिकार हो रही मुस्लिम महिलाओं के जीवन में आमूल&चूल परिवर्तन लाने का काम करेगा। 

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