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vad 37 05-03-2017
 
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सूखी नदियां ही बची रह जाएंगी

 

 

  • वर्ष २०१० में भागीरथी नदी पर बनने वाली लोहारी नागपाला परियोजना बंद करने का फैसला केंद्र ने लिया।
  • इसमें ६७५ करोड़ रुपए से ज्यादा निवेश हो चुका था।
  • पाला मनेरी में बनने वाली ४८० मेगावाट तथा ३८१ मेगावाट की भैरो घाटी परियोजना को राज्य सरकार ने बंद करने का फैसला लिया था। 

 

 

उत्तराखण्ड के नेता जल विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से राज्य का विकास हासिल करना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि जो लोग बांध परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं वे विकास के विरोधी हैं। ये सच है कि परियोजनाएं बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार दे रही हैं और देश के लिए बिजली का उत्पादन हो रहा है। लेकिन यह भुला दिया जा रहा है कि ये रोजगार कन्स्ट्रक्शन के दौरान मात्र पांच वर्षों तक ही उत्पन्न होते हैं। लेकिन इससे दीर्घकालीन रोजगार का हनन होता है। कृषि एवं जंगल भूमि का बड़ा भाग डूब क्षेत्र में आ जाता है और इससे इस भूमि पर उत्पन्न हो सकने वाले रोजगार का हनन होता है। उत्तराखण्ड की बहती नदियों के नैसर्गिक सौंदर्य के मध्य अस्पताल यूनिवर्सिटी एवं सॉफ्टवेयर पार्क बनाये जा सकते हैं जो हजारों स्थाई रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं। क्षेत्र के सौंदर्य एवं पर्यावरण के नष्ट होने से विकास की इस संभावना पर ब्रेक लग जायेगा। उत्तराखण्ड की पहचान चारधाम यात्रा से है। तमाम होटल एवं टैक्सी चालक इस देवत्व की रोटी खाते हैं। गंगा को बांधने सुखाने एवं सड़े हुए पानी की झीलों में तब्दील करने से उत्तराखण्ड का यह देवत्व समाप्त हो जायेगा और चार धाम यात्रा प्रभावित होगी।

 

दूसरी आपत्ति है कि बाहरी लोग उत्तराखण्ड में दखलंदाजी कर रहे हैं। ध्यान दें कि परियोजना बनाने वाली अधिकतर कंपनियां बाहरी हैं। यदि बाहरी लोगों से शिकायत है तो पहले इन बाहरी कंपनियों को निकालना चाहिये। दिल्ली में बसे लाखों उत्तराखण्डियों को भी दिल्ली से निकाल दिया जाना चाहिये।

 

तीसरी आपत्ति है कि उत्तराखण्ड के आर्थिक विकास के लिये जल विद्युत अति उपयुक्त स्रोत है। मेरा विरोध जल विद्युत का नहीं है। मेरा सुझाव है कि जल विद्युत बनाने के दूसरे तरीके अपनाने चाहिए। नदी को तालाब में तब्दील करने अथवा सुखाकर सुरंग में बहाने के स्थान पर नदी के पानी के एक अंश को ठोकर बना कर निकाल लेना चाहिये। नदी के शेष पानी को स्वच्छन्द प्राकृतिक स्थिति में बहने देना चाहिये। इससे नदियों का स्वच्छन्द बहाव कायम रहेगा और इनके पर्यावरणीय आर्थिक एवं सांस्कृतिक दुष्प्रभाव बहुत कम हो जायेंगे। मैंने जल विद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का आर्थिक आकलन किया है। मैंने पाया कि झील में पनपते मलेरिया के कीटाणु मछली एवं बालू के नुकसान आदि की गणना की जाये तो सिर्फ कोटलीभेल १बी परियोजना के कारण देश को ७०० करोड़ की हानि होगी जबकि लाभ १५५ करोड़ का ही होगा। फिर भी इस परियोजना को बनाया जा रहा है चूंकि हानि आम आदमी वहन करता है जबकि लाभ दिल्ली और देहरादून के नागरिकों एवं नौकरशाहों को होता है।

 

इस पृष्ठ भूमि में उत्तराखण्ड के आर्थिक विकास के दूसरे फार्मूले पर विचार करना चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था को मुख्यतः तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है-कृषि मैन्युफैक्चरिंग एवं सेवा। मैन्युफैक्चरिंग में उद्योग आते हैं जैसे कागज सीमेंट कार एवं टेलीविजन उत्पादन। सेवा क्षेत्र में किसी वस्तु का उत्पादन नहीं होता है। इसके अन्तर्गत होटल संगीत यातायात हेल्थ सेन्टर पर्यटन ब्यूटीशियन शिक्षा स्वास्थ बैंक आदि शामिल हैं।

 

१९५१ में देश की आय में कृषि का हिस्सा ५६ प्रतिशत था। २००७ में यह २० प्रतिशत रह गया था। मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा १४ प्रतिशत से बढ़कर २५ प्रतिशत हो गया है। लेकिन प्रमुख वृद्धि सेवा क्षेत्र में हुई है। इस क्षेत्र का हिस्सा ३० प्रतिशत से बढ़कर ५५ प्रतिशत हो गया है। जाहिर है कि देश के आर्थिक विकास में सेवा क्षेत्र का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। यह प्रक्रिया स्वाभाविक है। व्यक्ति की आय बढ़ने के साथ-साथ उसके द्वारा वस्तुओं की खपत में कम ही वृद्धि होती है। कार फ्रिज और आलीशान मकान खरीद लेने के बाद उनके द्वारा वस्तुओं की खपत में विशेष वृद्धि नहीं होती है। जैसे अमीर लोग गर्मी में शिमला या ऊटी या फिर विदेश घूमने जाते हैं। यही कारण है कि अमीर देशों में सेवा क्षेत्र का हिस्सा लगभग ८० प्रतिशत है मैन्युफैक्चरिंग का १९ प्रतिशत और कृषि का मात्र १ प्रतिशत।

 

हम भी उसी दिशा में चल रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग में फिलहाल कुछ वृद्धि हो रही है लेकिन भविष्य में इसमें भी संकुचन की प्रबल संभावना है। जैसे बच्चे दूध पीते हैं युवक अन्न खाते हैं और वृद्ध-साग सब्जी ज्यादा खाते हैं उसी प्रकार अर्थव्यवस्था की बाल्यावस्था में कृषि युवावस्था में मैन्युफैक्चरिंग और प्रौढ़ावस्था में सेवा क्षेत्र प्रमुख होते हैं। इस व्याख्या के अनुरूप भारत में इस समय मैन्युफैक्चरिंग में मंद गति से वृद्धि हो रही है और सेवा क्षेत्र में तीव्र गति से। पाठक को यह बात सहज ही समझ आयेगी कि राज्यों को सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना चाहिये। जो राज्य वर्तमान में कृषि पर ज्यादा ध्यान देंगे वे भविष्य में संकट में पड़ेंगे जैसा कि बंगाल में देखा जा रहा है।

 

उत्तराखण्ड हिमाचल एवं कश्मीर के लिए यह परिस्थिति विशेष चुनौती उपस्थित करती है। इन राज्यों के सामने आर्थिक विकास के दो अलग-अलग रास्ते उपलब्ध हैं। एक रास्ता मैन्युफैक्चरिंग का है। ये राज्य अपनी नदियों पर जल विद्युत के उत्पादन के लिए बांध बना सकते हैं। उत्पादित बिजली को वे उद्योगों को उपलब्ध करा सकते हैं जैसा कि पंत नगर में हो रहा है। इस रणनीति में मैन्युफैक्चरिंग को राज्य की समृद्धि का इंजन माना जा रहा है। दूसरा विकल्प सेवा क्षेत्र में विकास का है जैसे देहरादून शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया है। बद्रीनाथ एवं नैनीताल पर्यटन के प्रमुख केन्द्र हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य लाभ की भी अनेक संभावनाएं है जैसे भवाली में किसी समय में टीबी के मरीजों के लिये संस्थाएं बनायी गयी थीं। यहां की शुद्ध हवाओं और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्वास्थ्य लाभ जल्दी होता है। उत्तराखण्ड की सरकार को चयन करना है कि भविष्य में वे मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देंगे अथवा सेवा क्षेत्र को।

 

ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तराखण्ड के नेता दोनों क्षेत्रों का साथ-साथ विकास हासिल करना चाहते हैं। उन्हें मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र के बीच अंतरविरोध नहीं दिखता है। लेकिन यह उनका भ्रम है। दूसरे देशों में इस अंतरविरोध को स्पष्ट रूप से स्वीकारा गया है। श्रीलंका स्थित कैंडी के पादरियों ने कहा है कि अपर कोटमाले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से जंगल समाप्त होंगे भू-स्खलन बढ़ेगा और जल प्रपात सूख जायेंगे जो पर्यटन के मुख्य आकर्षण हैं। लाओस के डोंग सोहोंग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से डाल्फिन मछलियों को हानि पहुंचने की संभावना है। इन देशों में चर्चा है कि हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से जो लाभ होगा उसकी तुलना में पर्यटन आदि का नुकसान ज्यादा हो सकता है। यहां के लोग मैन्युफैक्चरिंग आधारित विकास नीति का विरोध कर रहे हैं चूंकि उन्हें सेवा क्षेत्र में ज्यादा संभावनाएं दिख रही हैं। अतः उत्तराखण्ड को ठीक से समझ लेना चाहिए कि मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र साथ-साथ नहीं चलेंगे। मैन्युफैक्चरिंग को पकड़ेंगे तो सेवा क्षेत्र हाथ से फिसलेगा। दीर्घकालीन लाभ को पकड़ने में जीत ही होगी।

 

मैन्युफैक्चरिंग के सहारे आगे बढ़ने में और भी खतरे हैं। पहला जल विद्युत झीलों में मच्छर पनपते हैं। कुछ वर्ष पूर्व आंकड़ों का अवलोकन करने पर मैंने पाया था कि शेष जिलों में मलेरिया का प्रकोप घटा था लेकिन टिहरी में बढ़ा था। अब तो मलेरिया के साथ-साथ डेंगू के प्रकोप का खतरा भी सामने आ गया है। जलविद्युत परियोजनाओं से मछलियों एवं पक्षियों पर दुष्प्रभाव पड़ता है जिसके कारण पूरे राज्य का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है ग्लेशियर पिघल सकते हैं जंगल लुप्त हो सकते हैं गाड-गदेरे भी कम हो सकते हैं इत्यादि। दूसरा खतरा है कि मैदानी क्षेत्र में लगने वाले उद्योग मुख्यतः टैक्स की छूट का लाभ उठाने के लिये आ रहे हैं। टैक्स में छूट की मियाद समाप्त होने के बाद इनमें से अनेकों इकाइयां अपने कारखाने बंद करके चली जायेंगी। उत्तराखण्ड के पास बचेगी सूखी नदियां और वीरान इंडस्ट्रियल एस्टेट। उस दृश्य की कल्पना आज ही करके सचेत होना चाहिये।

 

मेरा मानना है कि उत्तराखण्ड को भारत का स्विट्जरलैण्ड बनाने का अद्भुत लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिये। टूरिज्म सॉफ्टवेयर शिक्षा एवं स्वास्थ्य आदि के सहारे आगे बढ़ना चाहिये। इन क्षेत्रों में राज्य के लोगों को उच्च श्रेणी के स्थाई रोजगार मिलेंगे और इसी से राज्य का स्थाई विकास होगा।

 

(लेखक जाने-माने अर्थशास्त्री हैं। पिछले कई वर्षों से हिमालय में बड़े बांधों के खिलाफ मुखर हैं।

 

 

 
         
 
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  • आकाश नागर

उत्तराखण्ड में हर साल कृषि उपकरणों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते रहे हैं। लेकिन अब किसानों में लकड़ी की जगह लोहे का हल लोकप्रिय हो रहा

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