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vad 50 04-06-2017
 
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पर्यावरण परियोजनाएं

 

उत्तराखण्ड में पिछले कई वर्षों से दो धाराओं के बीच जबर्दस्त टकराव चल रहा है। एक मोर्चे पर पर्यावरण गंगा की अविरलता और आस्था खड़ी है तो दूसरे मोर्चे पर विकास और रोजगार के पक्षधर डटे हुए हैं। पीछे हटने को कोई भी राजी नहीं। बांध समर्थन और विरोध के अपने-अपने तर्क भी हैं। अर्थशास्त्री और पर्यावरणविद् डॉ भरत झुनझुनवाला का मत है कि राज्य के आर्थिक विकास के लिए मैन्युफैक्चरिंग के बजाए सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देने की जरूरत है। बांध परियोजनाएं हर दृष्टि से घातक हैं। जबकि उत्तराखण्ड जन मंच के संस्थापक महासचिव एस राजेन टोडरिया दो टूक कहते रहे कि परियोजनाओं का विरोध करने वाले विकास विरोधी हैं। जल संसाधनों के उपयोग से राज्य को अरबों रुपये की आय और लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा

 

 

इक्कीसवीं सदी के मध्य तक शुरू होने वाले जल युद्ध की पदचापें उत्तराखण्ड में साफ सुनी जा सकती हैं। धर्म और पर्यावरण के नाम पर तलवारें खनकाने वाली सेनाओं के पीछे भी जल युद्ध के शातिर सेनापतियों की चालें ही हैं। धर्म और पर्यावरण के इस अचूक ब्रह्मास्त्र को भी इन्ही सेनापतियों के वार रूम में तैयार किया गया है। इसीलिए उमा भारती से लेकर मोहन भागवत तक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती से लेकर राजेंद्र सिंह तक फैला अर्द्ध धार्मिक और अर्द्ध पर्यावरणीय शंखनाद पनबिजली परियोजनाओं के ही खिलाफ नहीं है बल्कि यह आंतरिक नदियों पर एक राज्य के रूप में उत्तराखण्ड को उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने की साजिश है। यह साजिश इतनी गहरी है कि इसके एक छोर पर धुर दक्षिणपंथी प्रवीण तोग्ड़ियाउमा भारती मेनका गांधी हैं तो बीच में समाजवादी पार्टी के सांसद रेवतीरमण सिंह समेत मध्यमार्गी दल हैं तो दूसरे छोर पर एनजीओ और धुर वामपंथी और सर्वोदयी हैं। इन सबका मानना है कि उत्तराखण्ड में बन रही पनबिजली परियोजनायें धर्म और पर्यावरण के खिलाफ हैं। यह पनबिजली विरोध का अद्भुत संगम है जहां माकपा भाकपा माले से लेकर गांधीवादी और गोडसेवादी सब हर-हर गंगे कर डुबकियां लग रहे हैं। हैरत भरी बात यह भी है कि इन सबके लिए गंगा का पर्यावरण और पवित्रता मात्र ऋषिकेश के ऊपर पहाड़ों तक ही सीमित है। हरिद्वार में समूची गंगे को ४१ नहरों में डालकर खत्म कर दिया गया पर ये सब चुप हैं। इनमें से कोई नहीं बोलता कि गंगा की पवित्रता अविरलता और पर्यावरण को बचाने के लिए गंगा नहर का तोड़ा जाना जरूरी है। जो उमा भारती टिहरी बांध से रुकी गंगा की अविरलता को बनाए रखने के लिए ५००० करोड़ रुपये खर्च कर धरासू से कोटेश्वर तक साठ किमी लंबी सुरंग बनाए जाने की वकालत कर रही हैं। उन्होंने एक बार भी नहीं कहा कि हरिद्वार में गंगा की मूलधारा में कम से कम ३५ प्रतिशत पानी छोड़ा जाना चाहिए। क्या गंगा को ऋषिकेश से ऊपर ही अविरल रहना चाहिए और मैदान में नहीं? यह पर्यावरण और धर्म की पैकेजिंग में मैदानी राज्यों का क्षेत्रवाद है।

 

बाबरी ध्वंस के शिल्पकारों में शामिल रहीं उमा भारती की गंगा समग्र यात्रा पर आरएसएस ने एक छोटी सी पुस्तिका निकाली। जिसमें कहा गया है कि गंगा अपने आपमें संपूर्ण नदी नहीं है बल्कि विभिन्न गाड गधेरों और सहायक नदियों से गंगा बनती है। क्योंकि आरएसएस का मानना है कि गंगाजल में आने वाले औषधीय गुण इन्हीं गाड-गधेरों और सहायक नदियों से आते हैं। इन्हीं गाड़-गधेरों और सहायक नदियों की मिट्टी से मैदान उर्वर होते हैं। जीडी अग्रवालभरत झुनझुनवाला समेत गंगा की अविरलता के सभी वकील यही मानते हैं। इन सारे व्यक्तियों की दुष्टता और उत्तराखण्ड विरोधी षड्यंत्र धारावाहिक हैं। इसमें धीरे-धीरे पहाड़ की सारी नदियों को गंगा के भीतर समाहित करना है। गंगा की अविरलता का पहला कदम टिहरी बांध से शुरु हुआ। विहिप इस आंदोलन में शामिल हुई और चुपके से बाहर भी निकल गई। ऐसा क्यों? दरअसल टिहरी बांध यूपी और केंद्र सरकार का बांध है। इससे उत्तराखण्ड को भारी नुकसान हुआ है और लाभ इतना कम है कि यह राज्य सरकार के लिए स्थाई सरदर्द बन गया है। चूंकि टिहरी बांध मैदानी राज्यों के हितों की पूर्ति करता है इसलिए टिहरी बांध को तोड़ने की बात गंगा की अविरलता का कोई ठेकेदार नहीं करता। आरएसएस की भगवा ब्रिग्रेडों और पर्यावरणवादियों की जमात ने भागीरथी को गंगा बताते हुए उस पर बन रहे प्रोजेक्टों का विरोध करना शुरू कर दिया। भागीरथी को गंगा घोषित करना इस साजिश का पहला कदम था। भागीरथी राज्य की आंतरिक नदी है और वह पूरी तरह से राज्य के अधिकार क्षेत्र में है लेकिन आरएसएस ने भाजपा मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी पर दबाव डालकर पाला मनेरी प्रोजेक्ट बंद करवा दिया उसके बाद केंद्र सरकार में दो केंद्रीय मंत्रियों अल्मोड़ा के सांसद और यूपी के सांसदों के जरिये प्रधानमंत्री कार्यालय पर दबाव डालकर लोहारीनाग पाला प्रोजेक्ट बंद करा दिया। यही नहीं संघीय ढांचे की धज्जियां उड़ाकर उत्तरकाशी से गोमुख को इको सेंसटिव जोन घोषित करा दिया। इसके बाद इस पहाड़ विरोधी अर्द्ध धार्मिक और अर्द्ध पर्यावरणवादी गैंग ने अलकनंदा पर हमला बोल दिया अब गंगा में अलकनंदा भी शामिल कर दी गई। इस गैंग ने विष्णु प्रयाग में जेपी की पनबिजली प्रोजेक्ट पर एक शब्द नहीं कहा जबकि जेपी कंपनी ने नदी की पूरी धारा ही टनल में डाल दी है। इस पूरे विवाद के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके कार्यालय दो कांग्रेसी केंद्रीय मंत्रियों ने पूरी तरह से आरएसएस की भगवा पलटनों के गुप्त एजेंडे के हिसाब से काम किया। भगीरथी और अलकनंदा में सारे बिजली प्रोजेक्टों को बंद करने के बाद कांग्रेस और भगवा पलटनों के इस साझा मोर्चे के निशाने पर अब वे आंतरिक नदियां और गाड-गधेरे हैं जो अलकनंदा और भगीरथी की सहायक नदियां हैं। संघ भाजपा जीडी अग्रवाल और स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने गढ़वाल की सारे गाड-गधेरों और सहायक नदियों में किसी भी प्रकार की विकासात्मक गतिविधि न किए जाने की मांग को लेकर खम ठोक दिया है। उनकी इस मुहिम को प्रधानमंत्री कार्यालय का सीधा समर्थन प्राप्त है। क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय के इशारे पर ही उत्तराखण्ड के सारे पनबिजली प्रोजेक्टों की क्लीयरेंस रोक दी ग्ई है। उत्तराखण्ड के हितों को प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने जितना नुकसान पहुंचाया है उतना कभी किसी प्रधानमंत्री ने नहीं पहुंचाया। सारे प्रोजेक्टों को रोककर एक तरह से प्रधानमंत्री ने आरएसएस की यह मांग स्वीकार कर ली है कि उत्तराखण्ड को अपनी आंतरिक नदियों पर किसी भी प्रकार की कोई परियोजना बनाने का अधिकार नहीं है। यह साफ तौर पर संघीय ढांचे का उल्लंघन है। लेकिन केंद्र सरकार इसे कानून बनाकर नहीं कर रही बल्कि चुपके से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के जरिये कुछ आपत्तियां लगकर एक कमेटी बना दे रही हैं। इस तरह की कमेटियां उत्तराखण्ड के पनबिजली प्रोजेक्टों को बेमियादी समय तक लटका रही हैं। इस समय २२०० मेगवाट के निर्माणाधीन प्रोजेक्ट बंद हैं और सारे प्रस्तावित प्रोजेक्ट वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में लटके पड़े हैं।

 

जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पिछले तीन-चार सालों से उत्तराखण्ड की घेराबंदी करने की कोशिशें कामयाब रही हैं। क्योंकि पहले भाजपा सरकार और अब कांग्रेस की सरकार में एक भी मुख्यमंत्री ऐसा नहीं आया जिसने प्रधानमंत्री और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पहाड़ विरोधी रुख का विरोध किया है। राज्य के भीतर बहने वाली आंतरिक नदियों के मामले में केंद्र के दखल के विरोध में कोई मुख्यमंत्री नहीं बोला। कांग्रेस-भाजपा और यूकेडी समेत सारे दल उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था को तबाह करने वाले केंद्र सरकार के निर्णयों पर चुप हैं। 

 

अभी हाल ही में दुनिया में एक खबर बड़े पैमाने पर चर्चित हुई है कि रूस ने अपने जल भंडार को आय के सबसे बड़े स्रोत के रूप में उपयोग करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। खबर में कहा गया है कि २१वीं सदी के मध्य तक पानी भी पेट्रोलियम पदार्थों की तरह देशों की आय का सबसे बड़ा स्रोत बनने वाला है। इस समय रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा जल भंडार है। इसके बाद हिमालय दुनिया का सबसे बड़ा जल भंडार है। यूरोप और अमेरिका की नजर इस जल भंडार पर है। अरब जगत में पेट्रोल के लिए कई युद्ध लड़ने वाले अमेरिका और यूरोप ने इस जल भंडार पर कब्जे के लिए उत्तराखण्ड में अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। दरअसल पहाड़ के लोगों के जल संसाधनों पर कब्जे की इस साजिश के तार इतनी जगह फैले हैं कि आम लोग अभी समझ ही नहीं पा रहे हैं कि पनबिजली परियोजनाओं का विरोध करने वाले असली चेहरे कौन हैं और उनकी मंशा क्या है। इस पूरी बहुराष्ट्रीय साजिश को समझने के लिए जरूरी है कि पहले पनबिजली परियोजनाओं के पूरे परिदृश्य को समझा जाय। उत्तराखण्ड की नदियों गाड-गधेरों में कुल तीस हजार मेगावाट पनबिजली उत्पादन करने की क्षमता है। इस समय बिजली का कुल उत्पादन १३०० मेगवाट है। जिसकी कुल क्षमता ४-३ प्रतिशत ही है। यानी उत्तराखण्ड अपने पास मौजूद अथाह जलराशि के पांच प्रतिशत हिस्से का उपयोग भी प्रदेश और जनता के हित में नहीं कर रहा। गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक के लगभग १६० किमी के इस इलाके में भगीरथी पर इस समय एक भी प्रोजेक्ट पर काम नहीं चल रहा है। अलकनंदा में विष्णु प्रयाग प्रोजेक्ट बन चुका है।विष्णुगाड पीपलकोटी पर काम रोक दिया गया है। श्रीनगर जल विद्युत प्रोजेक्ट पर काम बंद है। यानी जोशीमठ से लेकर ऋषिकेश तक के २००-२५० किमी के अलकनंदा गंगा के इलाके में एक भी प्रोजेक्ट पर काम नहीं चल रहा है। क्या यह उत्तराखण्ड के खिलाफ एक बड़ी साजिश नहीं है? जब गंगा के ४०० किमी इलाके में केवल एक ही प्रोजेक्ट बनाया गया तब कैसे गंगा में पानी कम हो ग्या है और कैसे गंगा प्रदूषित हो गई है कैसे गंगा की अविरलता भंग हो गई है? क्या यह मात्र अज्ञान है या एक सोची-समझी रणनीति?

 

इतना तो तय है कि यह अज्ञान नहीं है क्योंकि जो लोग गंगा की अविरलता की बात कर रहे हैं उनकी जानकारियां बहुत ज्यादा हैं। उनके पास सरकारी जानकारियों तक पहुंचने के हजारों चोर दरवाजे हैं। वन पोषित नदियों में सन् १९८० से बेहद धीरे-धीरे पानी कम होता रहा है पर तीस साल बाद अब गंगा में पानी कम होता नजर आ रहा है। इसका सीधा असर गंगा नहर में पानी की मात्रा पर पड़ रहा है। गंगा नहर पश्चिमी और मध्य यूपी के खेतों को सींचती है। दरअसल पहाड़ से जो गंगा आती है उसका हरिद्वार के बाद यूपी को जाने वाली गंगा से कोई रिश्ता नहीं है। क्योंकि हरिद्वार में पूरी गंगा नहर के जरिये यूपी की ४१ नहरों में बांट दी जाती है और गंगा की मूलधारा जिसे हरिद्वार में गंगा के नाम से नहीं बल्कि नीलधारा के नाम से जाना जाता है में मात्र दो प्रतिशत पानी ही छोड़ा जाता है। जो गंगा हर की पैड़ी में दिखाई देती है वह दरअसल गंगा नहीं बल्कि गंगा नहर है जो सिंचाई के लिए उपयोग में लाई जाती है। इस सच्चाई को धर्म के ठेकेदार बनने वाले संत और महंत शंकराचार्य पूरे देश के श्रद्धालुओं को नहीं बताते। दरअसल गंगा का ९० प्रतिशत पानी यूपी के खेतों में जज्ब हो जाता है। मात्र दस प्रतिशत पानी ही हिंडन नहर के जरिये कानपुर में गंगा के मूल रास्ते में मिलता है। इस पानी में भी खेतों के कीटाणुनाशक और खाद के अवशेष होते हैं। पहला सवाल यह है कि देश की जनता को यह क्यों नहीं बताया जाता कि गंगा की असली मूलधारा तो नीलधारा है। दरअसल यदि यह सच उजागर हो गया तो हरिद्वार के पंडे और संत-महंत जिस गंगा नहर को गंगा बताकर कमाई कर रहे हैं उस पर संकट खड़ा हो जाएगा। दूसरा कारण यह है कि यदि देश के लोगों के सामने यह सच्चाई आ गई कि वे इलाहाबाद और बनारस समेत पूरे देश में गंगा में पिंडदान तर्पण समेत जो सारे धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं वे बेकार हैं जिस गंगे में वे डुबकी लगाकर पुण्य कमा रहे हैं वह दरअसल नजीबाबाद और बिजनौर के नाले हैं तो इससे हरिद्वार से नीचे गंगा से धार्मिक धंधा कर रहे पंडे-पुजारी और संत-महंतों का कारोबार चौपट हो जाएगा। आखिर धर्मपरायण हिंदू यह कभी बर्दाश्त नहीं करेगा कि उसके प्रियजनों के धर्मिक अनुष्ठान किसी नाले के पानी में हों। यह देश की सबसे बड़ी धर्मिक ठगी है।

 

जब गंगा है ही नहीं तब पर्यावरणवादी और संत-महंत उत्तराखण्ड के पहाड़ों के खिलाफ क्यों आसमान सिर पर उठाए हुए हैं? दरअसल गंगा के मैदान दो तरह के संकटों से दो चार हैं। भूमि की घटती गुणवत्ता से खेतों में ज्यादा खाद और रसायनिकों का उपयोग करना पड़ रहा है। इसे जज्ब करने के लिए यूपी के किसानों को ज्यादा पानी चाहिए। लेकिन वन पोषित नदियों और जल स्रोतों में जल कम होने के कारण जल गंगा में भी पानी घट रहा है। इससे यूपी के एक बड़े हिस्से के रेगिस्तान हो जाने का खतरा है। दूसरा बड़ा कारण यह है कि गंगा और उसकी सहायक नदियां पहाड़ की ३६ करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी मैदान में ले जाती हैं और जिससे मैदान के खेत सरसब्ज होते हैं। मैदानी लॉबी चाहती है कि पहाड़ से यह बेशकीमती मिट्टी निर्बाध रूप से मैदान में पहुंचती रहे। ऐसा नहीं है कि प्रोजेक्ट विरोधी मैदानी लॉबी नहीं जानती कि रन ऑफ द रिवर प्रोजेक्टों से गंगा का पानी कम नहीं होगा। दरअसल गंगा में जो पानी कम होने वाला है वह पहाड़ में जल स्रोतों के सूखने के चलते बनने वाली पंपिंग योजनाओं और गंगा की सहायक नदियों में बनने वाली सिंचाई परियोजना से कम होगा। यह पूरी लड़ाई इन्हीं दो मुद्दों के कारण हो रही है। बिजली प्रोजेक्टों पर पर्यावरण का हल्ला दरअसल मैदानी हितों को छुपाने का नाटक है। क्योंकि गंगा व उसकी सहायक नदियों पर पेयजल व सिंचाई प्रोजेक्टों का सीधा विरोध करने के बजाय गंगा और उसकी सहायक नदियों पर धर्म और पर्यावरण के नाम पर क

 
         
 
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