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पर्यावरण परियोजनाएं

टिहरी झील

 

जिस उत्तरकाशी में बादल फटने से भागीरथी उफान में आ गई थी यहां मनेरी भाली बांध परियोजना (फेज-१ और फेज-२ की दो झीलें हैं (एक तो बिल्कुल शहर में और दूसरी इसी नदी मैं शहर से कुछ ऊपर। इसी नदी के सहारे आप तकरीबन २५-३० किमी नीचे उतरें तो चिन्यालीसौड़ में विकास की महान प्रतीक ४० किमी लम्बी टिहरी झील भी शुरू हो जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले समय में इस पूरे इलाके में बरसात काफी बढ़ी है। और ऐसे ही अनुभव हर उस इलाके के हैं जहां विद्युत परियोजनाओं के लिए कृतिम झीलें बनाई गई हैं।

 

पिछले वर्षों में पर्यावरण को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ी हैं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विविध सम्मेलनों में पर्यावरणीय चिंताएं ही केंद्र में रही हैं। इन सम्मेलनों में मुख्य फोकस अलग-अलग देशों द्वारा कॉर्बन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने को लेकर दबाव बनाने का रहा है। खासकर कम औद्योगीकृत और विकास तीसरी दुनिया के देशों पर यह दबाव ज्यादा है। क्योंकि ये देश इन गैसों का उत्सर्जन अपने औद्यौगिक विकास के लिए अधिक करते हैं। इन्हीं देशों के क्रम में भारत भी है। भारत सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जित करने वाले देशों में पांचवें स्थान पर है और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में यह स्थान सातवां है।

 

जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में माना जाता है कि इसमें कार्बन का उत्सर्जन कम होता है और प्राकृतिक जलचक्र के चलते पानी की बरबादी किए बगैर ही इससे विद्युत ऊर्जा उपलब्ध हो जाती है। वहीं कोयले या अन्य ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा में मूल प्राकृतिक संसाधन बरबाद हो जाता है और कार्बन का उत्सर्जन भी अधिक होता है। इस कारण विश्व भर के पर्यावरणविद् ऊर्जा प्राप्त करने की सारी ही तकनीकों में से हाइड्रो पावर की वकालत करते हैं। यही कारण है कि भारत भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन और ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित करने के मामले अपनी साख सुधारने के लिए हाइड्रो पावर की ओर खासा ध्यान दे रहा है। पिछले समय में ऊर्जा आपूर्ति की कमी ही भारत की विकास दर को तेजी से बढ़ाने के लिए सबसे बड़ी रुकावट रही है। एक अनुमान के अनुसार पिछले दो दशकों में भारत की ऊर्जा जरूरत ३५० प्रतिशत बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि भारत को अपनी ऊर्जा उत्पादन की वर्तमान क्षमता से तीन गुना अधिक ऊर्जा की आवश्यकता है। सवाल यह है कि यह कहां से पूरी होगी? जबकि यह आवश्यकता यहीं पर स्थिर नहीं है बल्कि लगातार बढ़ती जा रही है।

 

कार्बन के उत्सर्जन के मामले में यह हाइड्रो पावर परियोजनाएं चाहे पर्यावरण पक्षधर दिखती हों लेकिन अनुभव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए कई सर्वेक्षण बताते हैं कि इन बांध परियोजनाओं ने किस तरह से मानवीय त्रासदियों को तो जन्म दिया ही है साथ ही प्रकृति के साथ भी बड़ी छेड़छाड़ की है। इससे मानव सभ्यता के इतिहास में अहम रही कई नदियों के जलागम पर्यावरण और जैव विविधताओं पर भी गहरा असर पड़ा है। इन नदियों के किनारे बसा इन्हीं पर निर्भर समाज भी अपने पूरे अस्तित्व के साथ संकट में द्घिर गया है। वर्ल्ड कमीशन ऑफ डैम्स (डब्ल्यूसीडी की एक रिपोर्ट कहती है कि बांध जरूर कुछ वास्तविक लाभ तो देते हैं लेकिन समग्रता में इन बांधों के नकारात्मक प्रभाव ज्यादा हैं जो कि नदी के स्वास्थ्य प्रकति पर्यावरण और लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इसी से प्रभावित करोड़ों लोगों की पीड़ा और तबाही के प्रतिरोध में बांधों के खिलाफ दुनिया भर में आंदोलन उभरे हैं। भारत में भी यह प्रतिरोध है। खासकर पूरे हिमालय में जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक जनता इन बांधों के खिलाफ आंदोलित है। सरकारी दमन चक्र प्रतिरोध की तीक्ष्णता के आधार पर अलग-अलग राज्यों में अलग- अलग तीव्रता से दमन चलाए हुए है। फिर भी अपने अस्तित्व संकट से जूझ रही जनता का आंदोलन अनवरत्जा री है।

 

सरकार द्वारा भारत में बांध परियोजनाओं को महत्ता देने की उपरोक्त वजह के अलावा पावर प्रोजेक्टों का बेहिसाब मुनाफा वह दूसरी महत्वपूर्ण वजह है जिसके लिए पहाड़ी समाज की अनदेखी कर सरकारें और बांध बनाने वाली कंपनियां बांधों को लेकर इतनी लालायित हैं। विद्युत ऊर्जा की मांग असीम है और पूर्ति सीमित। मांग और पूर्ति के सिद्धांत के अनुसार विद्युत ऊर्जा की मांग अधिक और पूर्ति कम होने के चलते इसका मूल्य अधिक है। और यह स्थिति स्थाई भी है। ऐसा कभी नहीं होने जा रहा कि विद्युत ऊर्जा की पूर्ति ज्यादा हो जाए और मांग कम रहे। यानी विद्युत उत्पादन उद्योग में निवेश बाजार की स्थितियों के अनुरूप बिना किसी जोखिम के मुनाफे का सौदा है। यही वजह है कि कंपनियां इसमें निवेश को लालायित हैं और दलाल सरकारें उन्हें भरपूर मदद पहुंचा रही हैं।

 

भारत में शुरुआती दौर में बनी बांध परियोजनाओं का उद्देश्य सिर्फ विद्युत उत्पादन नहीं था। यह बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाएं थीं जिनका मकसद नदी के समग्र जलागम को बाढ़ से बचाव सिंचाई मत्स्य पालन और जल पर्यटन आदि के लिए विकसित करना हुआ करता था। विद्युत उत्पादन इसका महज एक हिस्सा था। लेकिन पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में उदारीकरण के बाद से जिस तरह सभी क्षेत्रों में जनकल्याण की जगह मुनाफाखोरी ने ले ली है उसी तरह बांध परियोजनाएं भी इसकी ही भेंट चढ़ गई हैं। विद्युत उत्पादन ही बांध परियोजनाओं का एकमात्र मकसद हो गया है। बिना सरोकारों और सिर्फ मुनाफाखोरी के लिए बन रही इन परियोजनाओं का एक दूसरा संकट पर्यावरण संबंधी मानकों की अनदेखी कर काम की गुणवत्ता और सावधानियों के प्रति लापरवाही बरतना भी है। जिसके चलते कम जोखिम वाली मझोले और छोटे आकार की बांध परियोजनाएं भी खतरनाक हो गई हैं। क्योंकि सरकार और विपक्ष दोनों की ही ओर से इन परियोजनाओं को जैसा प्रश्रय मिला हुआ है उससे इस संदर्भ में किसी भी जांच और कार्यवाही का कोई सवाल ही नहीं उठता। रही बात कॉरपोरटमीडिया की तो उसका चरित्र किससे छुपा है? इन कंपनियों के विज्ञापनों की बाढ़ में उसकी जुबान पहले से ही बंद है। लेकिन इधर हिमाचल हाईकोर्ट के जेपी ग्रुप (जेपी एसोसिएट्स के खिलाफ १०० करोड़ के हर्जाने के लिए गए एक फैसले का संदर्भ इन कंपनियों की मुनाफा बटोरने के लालच की हद और धूर्तता को समझने के लिए काफी है।

 

इस फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा है कि इतनी बड़ी अनियमितता बिना प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकती। कोर्ट ने इसकी जांच के लिए एक विशिष्ट जांच दल (एसआईटी भी बिठाया है। देश भर में बांध परियोजनाएं ऐसी ही धोखेबाज कंपनियों के हाथों में हैं जो शासन और प्रशासन के लोगों को खरीद कर बिना किसी सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों के प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ अपने मुनाफे के लिए बुरी तरह लूट रही हैं। पर्यावरणीय नुकसानों के साथ ही इसकी कीमत स्थानीय जनता को अपने पूरे सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक अस्तित्व को दांव पर लगाकर चुकानी पड़ रही है।

 

अब सवाल यह उठता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के दबावों और अपने विकास के लिए आवश्यक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की समस्या से भारत कैसे उबरे? इसके दो जवाब हैं पहला कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के कम उपभोग की। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति के पास सीमित संसाधन हैं जिनका संभल कर उपयोग करना होगा। पूंजी केंद्रित अर्थव्यवस्थाओं में मुनाफा कमाने की होड़ के चलते लगातार ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही हैं और इसके लिए दुनिया भर की सरकारें और औद्यौगिक घराने आंख मूंद कर हाथ पांव मार रहे हैं। इसकी चोट वर्तमान में प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न क्षेत्रों पर पड़ रही है जहां कि अक्सर आदिवासी या तथाकथित पिछड़ा समाज प्रकृति से साम्य बना कर बसा हुआ है। विकास की पूंजीकेंद्रित समझदारी उसे तबाह करते हुए अपनी जरूरतें पूरी कर लेना चाहती हैं। ऐसे में भारत को किसी भी कीमत पर ऊर्जा हासिल कर लेने की वैश्विक होड़ में शामिल हुए बगैर मानवकेंद्रित रवैया अपनाते हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों को सीमित करने की ओर बढ़ना होगा। दरअसल पूरे विश्व को भी यही करने की जरूरत है।

 

दूसरा जवाब यह है कि ऊर्जा जरूरतों को सीमित कर देने के बाद जिस ऊर्जा की जरूरत हमें है उसे जुटा लेना भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न देश के लिए मुश्किल नहीं होगा। वर्तमान परिदृश्य में हाइड्रो पावर के अलावा पर्यावरण सम्मत कोई विकल्प नजर नहीं आता (इसकी वजह यह भी है कि निहित स्वार्थों के चलते ऊर्जा के कई सुलभ पर्यावरणपक्षीय और कम खतरनाक स्रोतों के क्षेत्र में कोई भी शोध अध्ययन नहीं के बराबर हो रहे हैं। ऐसे में यदि हमें हाइड्रोपावर से ही ऊर्जा जुटानी होगी तो जरूरत है कि हाइड्रो पावर परियोजनाओं को अधिकतम जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत बनाया जाय। इस क्षेत्र को निजी कंपनियों को मुनाफा कमाने के लिए खुली छूट के तौर पर नहीं दिया जा सकता। यह जरूर तय करना होगा कि हाइड्रो पावर उत्पादन में नदियों के किनारे बसा स्थानीय समाज पहाड़ों का भूगोल और पर्यावरण तबाह न हो रहा हो। इसके साथ प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक उस समाज का ही होना चाहिए जिसने कि इस भूगोल को उसकी सम-विषम परिस्थितियों के साथ अपने जीने के लिए चुना है। ऐसे में पहाड़ों में किसी भी किस्म की जल विद्युत परियोजनाओं में पहाड़ी समाज की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। डब्ल्यूसीडी की रिपोर्ट भी यही कहती है। बांधों के निर्माण के लिए बड़ी सामाजिक कीमत न चुकानी पड़े इसके लिए डब्ल्यूसीडी की रिपोर्ट में कुछ निर्देश दिए हैं जो कि बांध निर्माण संबंधी निर्णयों को कुछ विशिष्ट जनों द्वारा लिए जाने के बजाय प्रभावित जनता के साथ भागीदारी का रवैया बनाने की वकालत करती है। इसी तरह के कुछ प्रयोग बड़ी और गैरजनपक्षीय बांध परियोजनाओं का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों ने उत्तराखंड में करने की कोशिश की है। यहां जनभागीदारी से छोटी जल विद्युत परियोजनाएं बनाने के क्षेत्र में काम किया जा रहा है। इन आंदोलनकारियों ने इन परियोजनाओं के लिए एक बजट मॉडल भी विकसित किया है। जिसके अनुसार १ मेगावाट की जल विद्युत परियोजना की लागत ४ करोड़ रुपये होगी। इस धन को आस-पास के गांवों के २०० लोगों की सहकारी समिति बनाकर बैंक लोन आदि तरीकों से जुटाया जाएगा। इस सहकारी समिति के २०० सदस्य ही इस परियोजना के शेयरधारक होंगे। बजट के अनुसार १ मेगावाट की विद्युत इकाई से यदि सिर्फ ८०० किलोवाट विद्युत का उत्पादन भी होता है तो वर्तमान बिजली के रेट ३.९० रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से एक घटे में ३१२०.०० रूपये २४ घण्टे में ७४८८०.०० रुपये और एक माह में २२४६४००.०० रुपये की इन्कम होगी। इसी तरह यह आंकड़ा सालाना २६९५६८००.०० रुपए हो जाएगा। ढाई करोड़ से ऊपर की इस सालाना कमाई से इन गांवों की आर्थिकी सुदृढ़ हो सकती है। ये गांव स्वावलम्बी बन सकते हैं। बजट के अनुसार लोन की ४ लाख प्रतिमाह की किस्तों को भरने के अलावा परियोजना के १० से १५ लोगों के स्टाफ की ३.२५ लाख प्रति माह वेतन मेंटेनेंस के २.५० लाख के साथ ही २०० शेयर धारकों को ५००० से ८००० रुपए प्रतिमाह शुद्ध लाभ भी होगा। एक बार हाइड्रो पावर परियोजनाओं का निर्माण कार्य पूरा हो जाय तो उसके बाद इससे ऊर्जा प्राप्त कर लेना बेहद सस्ता होता है। नदियों में बहता पानी इसके लिए सहज प्राप्य कच्चा माल होता है। पहाड़ी गांवों में यदि इस तरह की परियोजनाएं जनसहभागिता से स्थापित हो जाएं तो यह विकास का स्थाई टिकाऊ तरीका हो सकता है।

 

लेकिन इस तरह की परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने के कोई भी प्रयास ऊर्जा प्रदेश की सरकार नहीं कर रही है। उसके सपनों में तबाही फैलाते बड़े डैम हैं और मध्य एशिया के देशों के पैट्रो डॉलर की तर्ज पर इन डैमों से बरसता हाइड्रो डॉलर। उलटा सरकारें इन परियोजनाओं को हतोत्साहित करने में तुली हुई हैं। दो साल पहले उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सीमांत गांव रस्यूना में सरयू नदी में इसी तरह की एक मेगावाट की एक परियोजना के लिए शोध करने गए गांधीवादी आजादी बचाओ आदोलन से जुड़े इंजीनियर और एक कार्यकर्ता को पुलिस ने माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया। मारपीट पूछताछ के बाद कुछ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों की पहल पर उन्हें छोड़ा गया। यह उदाहरण है कि किस तरह कॉरपोरट के फायदे के इतर वैकल्पिक मॉडलों पर काम कर रहे लोग दमन का सीधा शिकार हो रहे हैं। इस तरह के वैकल्पिक मॉडल खड़े हो जाना सरकार और मुनाफाखोर निजी कंपनियों को मंजूर नहीं हैं।  

सरयू घाटी के आंदोलित लोग

 

बारहवी पंचवर्षीय योजना २०१२-२०१७ के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा क्षमता में एक लाख मेगावाट का अतिरिक्त इजाफा करने का लक्ष्य रखा है। यह जनपक्षीय और पर्यावरणसम्मत् दृष्टि से बिल्कुल असंभव है। और एक मेगावाट सरीखी छोटी परियोजनाएं तो इस लक्ष्य को पाने में नगण्य भूमिकाएं ही अदा करेंगी। ऐसे सरकारों का फोकस स्वाभाविक ही मझोली और बड़ी परियोजनाओं की ओर जाना तय है। ऐसे में मझोली परियोजनाएं तो बनेंगी ही साथ ही अतीत की चीज मान ली गईं बड़ी बांध परियोजनाओं की दोवारा से भयंकर शुरुआत होगी। यदि ऊर्जा उत्पादन के इस लक्ष्य को भारत को किसी भी कीमत पर पा ही लेना है तो इसका एकमात्र रास्ता प्रभावित समाजों के प्रतिरोधों का बर्बर दमन करते हुए मनमानी ऊर्जा परियोजनाओं को खड़ा करना ही होगा। भारत का विकास रथ जिस ओर बढ़ रहा है प्राकृतिक संसाधन संपन्न क्षेत्रों की ओर उसका जो रवैया है ऐसे में यह बर्बर दमन अकल्पनीय नहीं है। जनता और आंदोलनकारियों को अब कमर कस लेनी चाहिए।

 

(लेखक युवा पत्रकार हैं। पत्रकार प्रैक्सिस वेबसाइट चलाते हैं

 
         
 
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