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पर्यावरण परियोजनाएं

 

मध्य हिमालय उत्तराखण्ड में ५५८ विशाल बांध परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं। पर्यावरणवादियों की चिंता है कि इससे नदियां भयंकर संकट में हैं। बांधों की झील से पहाड़ की जलवायु और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लाखों लोगों को उनकी पैतृक जगहों से उजाड़ने के बावजूद टिहरी जैसी विशाल बांध परियोजनाएं अपने निर्धारित लक्ष्य के अनुसार बिजली पैदा नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे। नदियां और हिमालय बचे रहेंगे। इसके विपरीत वह धारा है जिससे जुड़े लोगों का तर्क है कि बांध विरोधी पहाड़ के दुश्मन हैं। वे नहीं चाहते कि बांधों के निर्माण से पहाड़ का अंधेरा छंटे और युवाओं को रोजगार मिले। समर्थन और विरोध की इन दोनों धाराओं के प्रवाह से अक्सर सीधे टकराव की स्थितियां भी पैदा होती रही हैं। अब यह जनता पर निर्भर है कि भविष्य में वह किस धारा के पक्ष में मुखर होकर खड़ी होती है

 

चलिए हम आंख मूंदकर मान लेते हैं कि इस बार उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में और पिछले कुछ सालों से पूरे उत्तराखण्ड में लगातार प्राकृतिक आपदाओं ने जिस तरह जानलेवा होकर कहर बरपाया है इनमें प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बेतहाशा बनाई जा रही झीलों का कोई योगदान नहीं है। लेकिन जिस गति से पूरे प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाएं और इनके लिए झीलें बनाई जा रही हैं इसी गति से प्राकृतिक आपदाएं भी साल दर साल खतरनाक होती जा रही हैं। ऐसे में इनके प्रभाव से हम कब तक आंखें मूंदे रह पाएंगे

 

उत्तरकाशी में उफनती भागीरथी

इस बार उत्तरकाशी से ऊपर के इलाके में बादल फटने से भागीरथी और असीगंगा का जलस्तर पांच मीटर बढ़ गया और इससे पूरे उत्तरकाशी में भयंकर तबाही हुई। इसमें ३०० से अधिक घर तबाह हो गए और ३१ लोग मारे गए। ७ मोटरपुल ध्वस्त हो गए। ज्योश्याड़ा का महत्वपूर्ण झूला पुल भी टूट गया। ३० किमी की मुख्य सड़क पूरी तरह टूट गई। बाजार पुलिस स्टेशन फॉरेस्ट का फायर स्टेशन सब तबाह हो गया। मनेरी भाली परियोजना के फेज २ में नदी के साथ बह कर आई लकड़ियों का झुंड भर गया जिससे परियोजना भी ठप पड़ गई। इसके बाद तो पूरे प्रदेश की सारी परियोजनाओं को एक दिन के लिए बंद कर देना पड़ा। और रुद्रप्रयाग के ऊखीमठ में भी यही हुआ। बादल फटने से यहां भी  लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और आठ गांवों के दर्जनों घर और खेत तबाह हो गए।

 

पहाड़ में ये प्राकृतिक आपदाएं अब कोई नई बात नहीं रहीं। पिछले सालों में पूरे प्रदेश में बादल फटने की घटनाओं और इससे हुई तबाही में इस कदर बढ़ोतरी हुई है कि बरसात का मौसम पहाड़ों में दहशत का मौसम लगने लगा है। पूरे प्रदेश में ऐसा कोई जिला नहीं बच रहा है जहां इस मौसम में कोई बड़ी तबाही न हुई हो।

 

बादल फटना और भूस्खलन आदि बेशक अप्राकृतिक नहीं हैं। लेकिन जिस तरह पिछले समय में इन प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी हुई है यह सिर्फ प्राकृतिक नहीं है। दुर्लभ मानी जाने वाली बादल फटने की घटनाएं तबाही के वीभत्स मंजर के साथ इतनी आम हो चली हैं कि इसकी वजहों की पड़ताल की ही जानी चाहिए। मानवीय दखल ने ही इन प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाया है। कई हजार सालों से सिर्फ बहते रहने की अभ्यस्त हिमालयी नदियों को जगह-जगह जबरन रोक कर जलविद्युत परियोजनाओं के लिए जब झीलें बना दी गई हों तो यहां के भूगोल और मौसम की ओर से कुछ प्रतिक्रियाएं तो स्वाभाविक ही हैं। हम ये क्यों न मान पाएं कि प्रदेश भर में बादल फटने की बढ़ी घटनाओं और इनसे हुई तबाही के पीछे इन जलविद्युत परियोजनाओं का भी बड़ा हाथ है। 

 

बरसात और बरसात से बढ़कर बादल फट जाने की स्थिति पैदा हो जाने को समझना रॉकेट साइंस की तरह जटिल नहीं है। हम बहुत शुरुआती कक्षाओं में विज्ञान की किताबों से इसे समझ सकते हैं। पानी के वाष्पन से बादल बनता है और फिर ये बादल बरस जाता है। यही बरसात है। और पहाड़ों में बादलों का भारी मात्रा में एक जगह जमा हो कर एक निश्चित इलाके में बेतहाशा बरसना बादल का फटना है। चंद मिनटों में ही २ सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है। बादल फटने की घटना पृथ्वी से तकरीबन १५ किमी की ऊंचाई पर होती है। भारी नमी से लदी हवा पहाड़ियों से टकराती है इससे बादल एक क्षेत्र विशेष में द्घिरकर भारी मात्रा में बरस जाते हैं। यही बादल का फटना है। क्या पहाड़ में अप्रत्याशित रूप से बादल फटने की बढ़ी घटनाओं में पिछले समय में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई कई कृत्रिम झीलों से हुए वाष्पन और इससे पर्यावरण में आई कृत्रिम नमी का कोई योगदान नहीं समझ आता? 

 

इस भारी तबाही से ठीक एक महीने पहले मैं उत्तरकाशी और टिहरी जिलों में द्घूम रहा था। न्यू टिहरी शहर एक सांस्कृतिक ऐतिहासिक शहर टिहरी को डुबोकर तैयार की गई कंक्रीट की द्घिच-पिच। न्यू टिहरी में जाकर समझ आता है कि एक शहर सिर्फ इमारतों का जखीरा भर नहीं होता कुछ और होता है जो उसे जिंदादिल शहर बनाता है। टिहरी झील ने इस कुछ और को डुबो दिया है। और पुरानी टिहरी का जो कुछ बच रहा है वह न्यू टिहरी की बचकानी इमारतों के भीतर कसमसाता हुआ दम तोड़ रहा है। एक ग्रामीण कस्बाई शहर या गांव को उठाकर दूसरी जगह रख देना किसी मैट्रोपोलिटन शहर में एक फ्लैट या अपार्टमेंट से दूसरे में शिफ्ट कर जाने सरीखी सामान्य घटना नहीं है। शहर-गांव को उठाने की कोशिश में उसकी चासनी वहीं निथर जाती है और नई जगह रसहीन लोथड़ा ही पहुंच पाता है। 

 

न्यू टिहरी एक सूखा शहर है।

न्यू टिहरी में बरसात बहुत होती है। पुराने लोग बताते हैं कि जब टिहरी शहर था वहां झील नहीं थी तो इस झील के बगल की पहाड़ी पर जहां अब न्यू टिहरी शहर बना दिया गया है बरसात बहुत कम होती थी। लेकिन ४० किमी की झील के बनने के बाद वहां इससे हुए वाष्पन से बादल बनता है और बहुत बरसात होती है। इस घटना को स्थानीय बोलचाल में लोकल मानसून का उठना कहते हैं। यूं ही ढेर सारी प्राकृतिक झीलों वाले जिले नैनीताल में भी इसी तरह लोकल मानसून से बारिश बहुत होती है। बेशक झीलों का पहाड़ों में बरसात को लेकर अपना रोल है। प्राकृतिक झीलों का तो अपना व्यवहार है जो अक्सर संतुलित रहता है। लेकिन कृत्रिम झीलों के साथ प्रकृति अपना व्यवहार संतुलित नहीं बना पा रही है। इसका प्रतिफल बादल फटने और बादल फटने से हुए भूस्खलनों के रूप में दिखता है जिससे हर साल भीषण तबाही हो रही है। हिमालय दुनिया के सबसे ताजा पहाड़ों में है जिसकी चट्टानें अभी मजबूत नहीं हैं। एक तो यह वजह है और दूसरी वजह जलविद्युत परियोजनाओं के लिए टनल निर्माण में पहाड़ों को विस्फोटकों के प्रयोग से जिस तरह खोखला और कमजोर कर दिया गया है इन दो वजहों से न सिर्फ बादल फटने बल्कि सामान्य बरसात में भी भू-स्खलन त्रासदी बनकर सामने आ रहा है।

 

टिहरी जैसे दानवाकार बांध के साथ ही पूरे प्रदेश की १७ नदियों में तकरीबन ५५८ बांध प्रस्तावित हैं। इनमें से कुछ बन भी चुके हैं और कुछ निर्माणाधीन हैं। ये बांध अक्सर बड़े बांधों के निर्धारित मानक में ही आते हैं। इन बांधों के लिए पहाड़ों को खोखला कर १५०० किमी की सुरंगें बनाई जाएंगी। इन सुरंगों को बनाने में विस्फोटकों का प्रयोग होगा और इससे पहाड़ कमजोर होंगे सो अलग। 

 

शेष भाग आगे....

 
         
 
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