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साहित्य संस्कृति और समाज

 

उत्तराखण्डी फिल्मों के निर्माण का सिलसिला अस्सी के दशक में शुरू हुआ। अब तक करीब तीन दर्जन फिल्में बन चुकी हैं। बॉलीवुड में भी यहां की प्रतिभाएं अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। लेकिन चिंता का विषय यह है कि आज बड़े पर्दे के लायक उत्तराखण्डी फिल्में बहुत कम बन रही हैं। इनकी जगह सीडियों ने ले ली है

 

उत्तराखण्ड की लोक भाषाओं में साहित्य सृजन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन फिल्म निर्माण की शुरुआत ८० के दशक में हुई। सबसे पहले १९८१ में पारेश्वर गौड़ ने जगवाल फिल्म का निर्माण किया। गढ़वाली भाषा की यह फिल्म प्रवास और उत्तराखण्ड में काफी चर्चित रही। इसी दशक में जीवन बिष्ट ने कुमाऊंनी भाषा की पहली फिल्म मेद्घा आ बनाई। गढ़वाली फिल्म घरजवैं का प्रिंट अच्छा था इसे देखने के लिए लोगों ने बड़ा उत्साह दिखाया। प्रवास और पहाड़ दोनों जगहों पर यह फिल्म खूब चली। दिल्ली के संगम सिनेमा में यह फिल्म २९ हफ्ते तक चली। उत्तराखण्डी फिल्मों के निर्माण का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इस बीच राजेंद्र धस्माना का नाटक जय भारत जय उत्तराखण्ड रंगमंच पर छाया रहा वहीं राज्य आंदोलन पर फिल्मों का निर्माण भी हुआ। २००३ में उत्तराखण्ड आंदोलन पर केंद्रित अनुज जोशी की फिल्म तेरी सौं पर्दे पर आई। वर्ष २००४ उत्तराखण्डी फिल्मों के निर्माण की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष ७ फिल्में बनीं। 

 

अब तक उत्तराखण्ड में कई फिल्में बन चुकी हैं। इनमें चक्रचाल सतमंगल्या कौथिग उदंकार कबि सुखकबि दुख बेटी ब्वारी बंटवारू प्यारू रूमाल रामी-बौराणी फ्यौंली ब्वारी हो त इनी रैबार औंसी की रात जीतू बगड्वाल बोइ कभी त आला दिन चेली आदि फिल्में शामिल हैं। वर्ष २०१२ में रिलीज हुई कुमाउंनी फिल्म राजुला दिल्ली इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई। प्रवास में लोग उत्तराखण्डी फिल्मों को प्रोत्साहन देने के लिए समारोहों तक का आयोजन कर रहे हैं। दिल्ली में यंग उत्तराखण्ड क्लब पिछले कुछ सालों से इस तरह के कार्यक्रम कर रहा है। 

 

गढ़वाली फिल्मों के लिए एक बड़ा झटका यह है कि अब जैसे- जैसे पहाड़ में सिनेमाघर कम हो रहे हैं वैसे-वैसे बड़े पर्दे के लायक फिल्मों की संभावनाएं कम हुई हैं। आज वीडियो टेलीविजन और केबल टीवी के आने के साथ ही बड़े पर्दे को ध्यान में रखकर फिल्म निर्माण कम हो गया है। अब फिल्में बनाई इसी उद्देश्य से जा रही हैं कि उन्हें सीडी के जरिए वितरित किया जा सके। 

 

उत्तराखण्ड के लोग न सिर्फ अपने क्षेत्र की फिल्मों के निर्माण तक सीमित हैं बल्कि हिन्दी फिल्मों में भी यहां की प्रतिभाओं ने अपनी पहचान बनाई है। अभिनेता टॉम अल्टर मूल रूप से उत्तराखण्ड के ही हैं। उनका जन्म और शिक्षा- दीक्षा उत्तराखण्ड में ही हुई। तिग्मांशु धूलिया प्रसून जोशी हिमानी शिवपुरीधर्मेश तिवारी दीपक डोबरियाल आदि कई उत्तराखण्डी प्रतिभाएं बॉलीवुड में अच्छी स्थिति में हैं। स्वर्गीय निर्मल पांडे ने भी फिल्म बैंडिट क्वीन में अपने अभिनय से प्रभावित किया था। 

 

उत्तराखण्ड में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। लेकिन उन्हें उचित माहौल दिए जाने की जरूरत है। आज उत्तराखण्ड फिल्म निर्माण की दृष्टि से बेहतर जगह है। यहां फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इस दिशा में २०१० में देहरादून में आयोजित उत्तराखण्ड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एक अच्छा प्रयास कहा जा सकता है। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद २००१ में सरकार ने उत्तराखण्ड फिल्म चैंबर्स ऑॅफ कॉमर्स बनाकर उत्तराखण्डी फिल्मों की स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश भी की लेकिन सच यही है कि आज उत्तराखण्ड में बड़े पर्दे के लिए फिल्मों का निर्माण बहुत कम हो रहा है। सच कहें तो यहां की फिल्में सिर्फ सीडी पर निर्भर हो गई हैं। ऐसे में यह कामना करना काफी कठिन है कि भविष्य में उत्तराखण्डी सिनेमा अन्य राज्यों की तरह बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान कायम कर सकेगा। 

 

उत्तराखण्ड में मीडिया

उत्तराखण्ड में पत्रकारिता की जड़ें आजादी के आंदोलन के समय ही जम चुकी थीं। स्वाधीनता आंदोलन में यहां के पत्रकारों और समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। देश की आजादी के बाद भी यहां से निकलने वाले तमाम साप्ताहिक एवं पाक्षिक अखबारों का जनजागरूकता में अहम योगदान रहा। ये साप्ताहिक व पाक्षिक अखबार गांव-गांव की समस्याओं को प्रमुखता से उठाते थे और सरकार की योजनाओं के बारे में जनता को अवगत कराते थे।

 

 ८० के दशक में दैनिक समाचार पत्रों ने भी देहरादून से क्षेत्रीय संस्करण निकालने की शुरुआत की। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन ने दैनिक अखबारों को पहाड़ में फलने-फूलने का मौका दिया। आज राज्य के गढ़वाल व कुमाऊं मंडल से तमाम दैनिक समाचार पत्र निकल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कुछ समय पहले तक दूरदर्शन की ही पहुंच थी वहां आज इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने भी अपनी जगह बना ली है।

 

 वर्तमान में राज्य की अस्थाई राजधानी देहरादून से करीब ३०० समाचार पत्र निकल रहे हैं। इनमें ३९ दैनिक अखबार हैं। तीन रेडियो स्टेशन हैं और दूरदर्शन केन्द्र हैं। मसूरी में दो हाईपॉवर ट्रांस्मीर्ट्स हैं। १६ लो पावर ट्रांस्मीर्ट्स हैं तथा इतने ही वेरी लो पावर ट्रांस्मीर्ट्स (बहुत कम क्षमता के ट्रांस्मीर्ट्स) हैं। रेडियो के तीन रिले सेंटर हैं। इसके अलावा कई जगहों में सिनेमा थियेटर्स भी हैं।

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग राज्य में जनता और सरकार के बीच सेतु का काम करता है। सरकार की जनकल्याण की योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाना इस विभाग का दायित्व है। मीडिया के माध्यम से विभाग इस काम को निभा रहा है।

 

 प्रेस पब्लिसिटी : इस विभाग से सरकार की नीतियों को जनता तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को सूचनाएं मुहैया कराने की सुविधाएं दी गई हैं।

 

फील्ड पब्लिसिटी : सरकार की योजनाओं और नीतियों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए सभी जिलों में व्यवस्थित आधारभूत ढांचा बनाया गया है। जिला सूचना अधिकारी ग्रास रूट तक लोगों को सूचनाएं उपलब्ध कराने और जागरूकता बढ़ाने का दायित्व निभा रहे हैं।

 

 पब्लिकेशन ब्यूरो : पब्लिकेशन ब्यूरो सरकार की उपलब्धियों योजनाओं और नीतियों से संबंधित जानकारियां लोगों को उपलब्ध कराते हैं। सामयिक प्रकाशनों के साथ ही किताबों छोटी छोटी पुस्तिकाओं फोल्डरों एल्बम आदि के जरिए लोगों को जानकारियां प्रदान की जाती हैं। उत्तराखण्ड दूरदर्शन के मासिक न्यूज लेटर में सरकार की नीतियों संबंधी जानकारियां होती हैं।

 

गीत एवं नाटक : सरकार की नीतियों निर्णयों और उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार लोक संस्कूति पर आधारित कार्यक्रमों के जरिये भी किया जाता है। इस उद्देश्य से जिला स्तर पर सांस्कूतिक संगठनों का चयन किया जाता है। देहरादून और नैनीताल में गीत एवं नाट्य प्रभाग भारत सरकार की दो यूनिट भी हैं।

 

फोटो फिल्म यूनिट : फिल्म यूनिट भी सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार कर रही है। फोटोग्राफ और फिल्म के माध्यम से इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। राज्य सरकार डीडी-१ पर एक न्यूज मैगजीन का भी प्रसारण करती है।

 

सामुदायिक प्रदर्शनी योजना के तहत सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए प्रदर्शनियों कठपुतली शो और अन्य सांस्कूतिक गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता है। 

 

सूचना केन्द्र : नई दिल्ली में राज्य सरकार का सूचना केंद्र है। यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को राज्य से संबंधित जानकारियां उपलब्ध कराता है। राज्य के प्रत्येक जिले में जन संपर्क कार्यालय स्थापित हैं। ये कार्यालय हर स्तर पर प्रचार-प्रसार का काम देखते हैं।

 

वेबसाइट एवं ईमेल : ीजजचरूध्ध्ूूू.नजजंतंपदवितउंजपवदण्हवअण्पद सूचना और जनसंपर्क विभाग की ऑफिशियल वेबसाइट है। जिसमें मीडिया से संबंधित तमाम जानकारियां दी गई हैं।

 

 

 
         
 
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