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vad 14 23-09-2017
 
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संवाद
 
^मुझे मुख्यमंत्री देख तड़पते थे मोदी^

उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत खांटी जमीनी नेता माने जाते रहे हैं। लेकिन चुनाव में उनकी दोनों सीटों पर हुई करारी हार की भविष्यवाणी किसी राजनीतिक पंडित ने नहीं की थी। खुद रावत राज्य में पार्टी की बुरी हार से आश्चर्यचकित हैं। उन्हें यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि राज्य के राजस्व में बढ़ोतरी करने और विकास की नई योजनाओं की नींव रखने के बावजूद वह दोषी कैसे हो गए। रणनीतिक कौशल में बेहतर माने जाते रहे रावत को अपने शासन के दौरान पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ओर से मिलती चुनौतियों से जूझना पड़ा। इसकी पीड़ा अक्सर उनकी जुबानी व्यक्त होती रही। इसके बावजूद उन्होंने अद्भुत राजनीतिक कौशल] चतुराई और धैर्य का परिचय देते हुए अपने विरोधियों के हर वार को विफल करने में सफलता पाई। वे पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनकी सरकार बर्खास्त हुई और तुरंत ही अदालती आदेश से बहाल भी हो गई। हालांकि चुनाव में उत्तराखण्ड की जनता ने उन्हें नकार दिया। पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति के केंद्र में रहे रावत अभी तक अपनी हार को नहीं पचा पाए हैं। मगर वे जनता के फैसले को स्वीकार कर चुके हैं। चुनाव में पार्टी की जबरदस्त हार के साथ&साथ स्वयं दोनों सीटों पर हार के कारण] कांग्रेस का भविष्य] नई सरकार के कामकाज] राज्य के वित्तीय हालात आदि विषयों पर पूर्व मुख्यमंत्री से हमारे विशेष संवाददाता कृष्ण कुमार ने देहरादून में विस्तृत बातचीत की

 

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार को आप किस तरह से देखते हैं

नतीजे जो ग्यारह मार्च को आए वे सर्वथा हमारे विपरीत रहे। इसीलिए मैंने कहा है कि मेरे नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया है तो केवल और केवल मैं ही हार का जिम्मेदार हूं। यह एक बड़ी हार है। मगर कारण मैं अभी तक कुछ खोज नहीं पाया हूं। मुझे लगता है कि यह मोदी क्रांति हो सकती है या ईवीएम का चमत्कार हो सकता है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री ने इसको बहुत जोर& शोर से उठाया। अब राज्यसभा&लोकसभा सब जगह पर मामला उठाया जा रहा है। कोर्ट के दरवाजे भी लोग खटखटा रहे हैं तो लगता है कि एक फैक्टर जो अभी पुष्ट तो नहीं है] वह ईवीएम का दुरुपयोग भी हो सकता है।

 

भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला है। राजनीतिक अस्थिरता के लंबे दौर के बाद इसे क्या सकारात्मक जनादेश माना जाए

सत्तावन का बहुमत अपार बहुमत है। यह राज्य के लिए वरदान है। नए मुख्यमंत्री को आज कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। मुझको तो प्रतिदिन सुबह उठ कर यह चिंता रहती कि शाम तक मेरी सरकार को बहुमत रहता भी है या नहीं। नए सीएम के सामने अब यह कोई चिंता नहीं है। वह किसी को भी नाराज करके कठोर फैसले ले सकते हैं। मुझको जो भी फैसले लेने होते थे वे सबको सहमत करवा के लेने पड़ते थे। उनके साथ एक अच्छी बात यह भी है कि उनको केंद्र सरकार का पूरा सपोर्ट है। इस समय केंद्र में एक मजबूत प्रधानमंत्री हैं और उत्तराखण्ड को उन्होंने चुनौती के तौर पर लिया है। १८ तारीख को हमारी निर्वाचित सरकार गिराने की साजिश दिल्ली से ही हुई थी। प्रत्यक्ष तौर पर उसमें प्रधानमंत्री जी की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थी। एक साल तक प्रधानमंत्री जी और दिल्ली जब उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सरकार और हरीश रावत को चीफ मिनिस्टर देखते थे तो किसी ?kk;y की तरह तड़पते थे। लेकिन आज उनके लिए सुकून है। जिस व्यक्ति को देखकर वे ?kk;y की तरह तड़पते थे वह अब मुख्यमंत्री नहीं है। वह अब चारों&खाने चित है। अब मैं समझता हूं कि इस समय राज्य को वित्त देने में केंद्र को कोई कठिनाई नहीं होगी। केंद्र सरकार अपार संसाधन दे सकती है। एक बड़ा फायदा यह भी है कि उत्तर प्रदेश में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है। यह एक पार्टी की सरकार की बात नहीं है। इस समय तो पौड़ी की माटी की सरकार है। जिस तरह से परिसंपत्तियों के लिए मुझे जूझना पड़ा] पापड़ बेलने पड़े] फिर भी सैंतीस नहरों को ही मैं ला पाया। कितने लोगों की मुझे खुशामद नहीं करनी पड़ी कि जो रोडवेज के मामले और झगड़े थे उनको सुलझाया जाए। अब नए मुख्यमंत्री के सामने ऐसा कुछ नहीं होगा] अब केवल इशारों से ही काम चल जाएगा।

 

आपकी चुनावी रणनीति बुरी तरह से फेल हुई है। खुद आप दोनों सीटों पर चुनाव हार गए

हमारी रणनीति कमजोर नहीं थी। हमें विश्वास था कि हम सरकार बना रहे हैं और उसके लिए आवश्यक था कि बीस सीटें जिन दो जिलों में हैं यानी हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर] इनके बगल में सोलह और सीटों को प्रभावित करने का फैक्टर था। इसलिए मैंने दोनों कठिन सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला किया। वोट पड़ने के बाद भी यह दिखाई दे रहा था कि मेरा फैसला कांग्रेस के लिए वरदान सिद्ध होने जा रहा है। लेकिन जिस दिन नतीजे निकले तो मैं चारों खाने चित था। जो परिणाम निकला है वही यथार्थ है। लेकिन मुझको अफसोस नहीं है। मैंने सुविचारित तरीके से निर्णय लिए। अपनी पार्टी को सहमत करवाया।

 

चुनाव के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय नेता प्रदेश में सक्रिय रहे। लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता केवल पत्रकार वार्ता करने के अलावा कोई चुनावी सक्रियता नहीं दिखा पाए

यह हमारे ऊपर निर्भर करता था। हम पीसीसी का उतना वैकल्पिक सिस्टम नहीं बना पाए। स्वयं अध्यक्ष जी चुनाव लड़ रहे थे। मैं चुनाव प्रचार में संलग्न था। मेैं सुबह से रात तक लगा हुआ था। मैं पीसीसी पर निर्भर नहीं रहना चाहता था। मुझको एक वार रूम सैट कर के वहां से चुनाव को संचालित करना था। लेकिन न हमारा कोई वार रूम था और न पीसीसी का कोई ढांचा चुनाव में नेतृत्व करने के लिए तैयार दिखाई दे रहा था। ऐसी स्थिति में हमको जो सहयोग मिल भी रहा था हम उसका उपयोग नहीं कर पा रहे थे। लेकिन मैं यह कह सकता हूं कि हमारे केंद्रीय नेतृत्व ने भरपूर सहयोग दिया। यहां तक कि राहुल गांधी जी १३ तारीख को भी रोड शो करने को तैयार थे] लेकिन हमने उनसे कहा कि आप उत्तर प्रदेश में फोकस रखें। उत्तराखण्ड में हमारी स्थिति ठीक है। लेकिन अपनी क्षमता का हमारा आकलन गलत था। इस आकलन का दोष मैं किसी को नहीं दे सकता। अगर कोई दोषी है तो मेरा ही दोष है] क्योंकि नेतृत्व मैं कर रहा था और मेरी ही जिम्मेदारी थी।

 

प्रशांत किशोर को चुनाव संचालन की जिम्मेदारी देने का निर्णय क्या सही था। कांग्रेस के अधिकांश उम्मीदवार इस निर्णय से नाराज भी रहे

बिल्कुल सही निर्णय था। केंद्रीय नेतृत्व ने मुझको और पीसीसी अध्यक्ष किशोर उपाध्याय जी को एक साथ बैठाकर हमारी सहमति ली थी। लेकिन उनके साथ हमारा कोई अनुबंध नहीं था। यह कहना कि चुनाव प्रचार के लिए हम प्रशांत किशोर जी पर निर्भर थे सही नहीं होगा। निर्भरता अगर कहीं थी तो या तो प्रदेश कांग्रेस या फिर हरीश रावत पर थी। चूंकि मैं चुनाव प्रचार में लगा हुआ था और किशोर उपाध्याय जी स्वयं चुनाव लड़ रहे थे। प्रशांत किशोर जी ने जो सहयोग दिया मैं उनका आभारी हूं।

 

सरकार&संगठन में मतभेद और तकरार पूरे पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान देखने को मिली

एक डेमोक्रेटिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक चीज है। सरकार पार्टी की है यह आभास भी होना बहुत आवश्यक है। मैंने निरंतर कोशिश की कि मैं प्रदेश कांग्रेस के साथ तालमेल रखूं। इसीलिए आपने देखा होगा कि कांग्रेस के इतिहास में सारे मुख्यमंत्री मिलकर के जितना पीसीसी कार्यालय गए हों] उनसे पचास गुना अधिक मैं कांग्रेस दफ्तर गया। मैंने यह आभास देने की कोशिश की कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है जो प्रदेश कांग्रेस की सलाह पर नीतियां तैयार करने का काम कर रही है। मगर जो एक फाईन ट्यूनिंग आनी चाहिए थी] वह राज्यसभा के चुनाव के बाद गायब हो गई। यह सब किन परिस्थितियों में हुआ] कैसे हुआ मैं नहीं कह सकता


पीडीएफ को लेकर कांग्रेस संगठन के सभी कयास चुनाव में सही साबित हुए हैं। आप पीडीएफ के मुद्दे पर अपने ही संगठन का साथ क्यों नही दे पाए आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी

देखिए] पीडीएफ मुझको बना बनाया मिला था। यह मैंने नहीं बनाया था] नंबर वन। नंबर टू इस पर पार्टी नेतृत्व को निर्णय करना था। पार्टी को चाहिए था कि इस मामले को देहरादून में उछालने की बजाय दिल्ली में तय करते कि भई पीडीएफ को हमारे साथ रहना है कि नहीं।

 

लेकिन पार्टी ने तो आपको ही इसका निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र कर दिया था

नहीं] नहीं] ऐसा कुछ नहीं था। आप एक बात बताइए] गठबंधन कहीं किसी एक व्यक्ति के साथ होता है। गठबंधन तो पार्टी के साथ होता है। सरकार के साथ कौन रहे] सरकार किसके साथ मिल कर चलाई जाए यह मामला मुख्यमंत्री पर नहीं छोड़ा जाता। ऐसे मामले पार्टी के साथ होते हैं। केंद्रीय नेतृत्व हमेशा ऐसे मामले तय करता है। पीडीएफ के साथ चलने का फैसला भी केंद्रीेय नेतृत्व का था। उसको तोड़ने का फैसला कोई मुख्यमंत्री नहीं कर सकता था। एक अनावश्यक रूप से पीडीएफ वर्सेस कांग्रेस कंट्रोवर्सी खड़ी की गई जिससे नुकसान हुआ। अंततोगत्वा हुआ ये कि हम टिहरी में कुछ कर नहीं पाए। प्रीतम सिंह हमारे साथ चलना चाहते थे] पार्टी ने उनको सपोर्ट करने का निर्णय भी किया लेकिन नहीं कर पाए। जो लोग हमारे साथ सम्मिलित हुए हम उनके साथ पार्टी कैडर को नहीं जोड़ पाए। इससे वहां हमारी हार सुनिश्चित हो गई।

 

भाजपा अब पूरी तरह से नई लीडरशिप को राजनीति में स्थान दे रही है। जबकि कांग्रेस में इसके विपरीत युवा नेतृत्व को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा हैं

युवक कांग्रेस और एनएसयूआई से आने वाले युवाओं को किस तरीके से पार्टी से जोड़ा जाए इस पर चिंतन की जरूरत है। युवक कांग्रेस और एनएसयूआई से जो नेता आए भी हैं उनमें आपस में इतने झगड़े रहे हैं कि उसका दुष्प्रभाव हमारे मूल संगठन पर भी पड़ा है। ये बातें कांग्रेस में उठी हैं और हम उम्मीद करते हैं कि राहुल गांधी इसका समाधान निकालेंगे।

 

अस्सी पार महेंद्र सिंह माहरा को आपने राज्यसभा में भेजा। क्या मात्र इसलिए कि वे आपके रिश्तेदार लगते हैं। युवा नेतृत्व को क्यों नहीं तरजीह दी।

नहीं] पहली बात को क्लीयर कर दूं कि वे मेरे रिश्तेदार नहीं हैं। मैं यदि दूसरी जनरेशन में कांग्रेस में आया हूं तो महेंद्र सिंह माहरा थर्ड जनरेशन से हैं। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार से हैं। जिस समय मैं चुनाव लड़ने के लिए पिथौरागढ़ गया था उस समय वो पिथौरागढ़ जिला कांग्रेस के कर्ताधर्ता थे। मेरा कहीं से भी दूर&दूर तक उनके साथ कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं है। हां पार्टीगत रिश्ता जरूर है। राज्यसभा के भीतर उनकी भूमिका रही। उसकी सराहना पार्टी नेतृत्व ने भी की है। वे अभी भी ऊर्जावान और बेहतर नेता हैं। इस उम्र में भी वे किसी ?kksM+s की तरह दौड़ते हैं।

 

नेता प्रतिपक्ष युवा नेता करण माहरा की बजाय इंदिरा हृदयेश का चयन किया गया जबकि कांग्रेस के ११ fo/kk;dksa में से ७ माहरा के पक्ष में थे

मैंने माहरा से पहले दिन से ही कह दिया था कि वे नहीं बन सकते। वे मेरे रिश्तेदार हैं। मेरे साले साहब हैं। उनके पिताजी मंत्री रहे हैं। उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत जी के समय कांग्रेस को चुनौती दी थी। करण माहरा की अपनी एक पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है। उनके भाई उत्तर प्रदेश में एमएलए रहे। इस समय मेरे नेतृत्व में पार्टी की बड़ी हार हुई है इसलिए पार्टी मेरे किसी रिश्तेदार को नेतृत्व सौंपेगाी यह मुझे नहीं लगता। इसीलिए मैंने उनको एडवाइज किया। मुझे पता चला कि उन्होंने प्रीतम सिंह जी का नाम भी दिया। लेकिन पार्टी नेतृत्व ने अनुभव के आधार पर नाम तय किया। गोविंद सिंह जी] प्रीतम सिंहजी सभी ने अपनी राय रखी थी। सभी की राय पर इंदिराजी का चयन नेता प्रतिपक्ष के लिए तय हुआ। युवाओं की टीम एक अनुभवी नेता के साथ मिलकर अच्छा काम करेगी।

 

कांग्रेस संगठन आप पर आरोप लगाता रहा है कि आप अपने ही लोगों को राजनीति में बढ़वा देते हैं। प्रदीप टम्टा को राज्यसभा भेजना भी इसी नीति का हिस्सा बताया जाता है। जबकि किशोर उपाध्याय के लिए पूरी कांग्रेस एक साथ समर्थन में थी

उनके लिए तो मैं भी एक मत था। मैं भी चाहता था कि किशोर जी को राज्यसभा भेजा जाए लेकिन केंद्रीय नेतृत्व का ही फैसला था कि राज्यसभा में किसी एससी को भेजा जाए। राज्यसभा में जो सात&आठ लोग थे उनमें से दो लोग निवर्तमान हो गए। एक आंध्र से थे और एक लक्ष्मीशाह थे। वे सीटिंग एमएलए थे। महाराष्ट्र से सुशील शिंदे और मुकुल वासनिक थे। पार्टी इनको नहीं ला पाई। इसलिए प्रदीप टम्टा को उत्तराखण्ड से पार्टी ने राज्यसभा भेजने का फैसला किया। पार्टी का यह राष्ट्रीय स्तर का निर्णय था इसमें गढ़वाल और कुमाऊं जैसी कोई बात नहीं थी। देखिए] उसका इतना बड़ा इम्पैक्ट रहा कि भाजपा को अपने एससी सदस्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा। अपने वरिष्ठ नेता खण्डूड़ी] भगत सिंह कोश्यारी] निशंक और माला राजलक्ष्मी को पीछे रखकर निर्णय लेना पड़ा। इसलिए राज्यसभा का निर्णय सही था। मगर कुछ कारणों से संदेह और अविश्वास के बादल छा गए और मैं उसका समुचित समाधान नहीं कर पाया। अगर राज्यसभा का श्रेय मुझको देते हैें तो मनोरमा डोबरियालजी तो गढ़वाल से थीं उनका श्रेय आप मुझको क्यों नहीं देते। राजबब्बर जी तो गढ़वाल और कुमाऊं के नहीं हैं] सबके हैं। उनका श्रेय आप मुझको क्यों नहीं दे रहे हैं। यह बड़ा दुर्भाग्य है कि लोगों ने ऐसी संकीर्ण बातों को उठाया।

 

आपका कहना था कि गैरसैंण का रोडमैप मेरे दिमाग में है। लेकिन आपकी ही सरकार ने गैरसैंण के विधानसभा सचिवालय और विधायक निवास को लेकर राज्य अतिथि गृह का शासनाादेश तक जारी कर दिया। इससे आप पर गैरसैंण को लेकर जनता की भावनाओं का राजनीतिकरण करने का आरोप सही साबित नहीं हो जाता।

नंबर एक! पहली बात तो मैं बता दूं कि जो विधायक निवास था उसको केवल सत्र विशेष के लिए विधायक आदि की सुविधाओं को मेंटेन करने के लिए राज्य अतिथि गृह का दर्जा दिया गया ताकि राज्य संपत्ति विभाग उसकी देखरेख कर सके। जैसे ही विधानसभा सत्र खत्म हुआ तो राज्य अतिथि गृह का स्टेट्स वापस ले लिया गया। वह आज भी विधानसभा भवन सचिवालय की संपत्ति है। यह तो भाजपा का दुष्प्रचार था और इस दुष्प्रचार को वे मीडिया के गले में उतारने में सफल रहे।

 

नंबर दो! जो आपने बात कही कि गैरसैंण को लेकर मैं रोडमैप पर काम कर रहा था इस सरकार को भी उसी रोडमैप पर काम करना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही यह सरकार उस रोडमैप पर बदलाव लाएगी वैसे ही सरकार कठिनाई में आ जाएगी। मैंने विधानसभा भवन बने बिना बजट सत्र पूरा किया। आप लोग कहा करते थे कि आप सत्र नहीं चला पाएंगे] मैंने किया। चारों तरफ से हम सड़कें बना रहे हैं। मैंने यह व्यवस्था बना दी कि वहां एक हजार आदमी टिक सकते हैं। राजधानी जैसे सवाल के लिए आपको चाहिए कि वहां कम से कम चार हजार आदमी टिक सकें इसकी व्यवस्था करनी होगी। मैंने इसके लिए  भराड़ीसैंण डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाई और भराड़ीसैंण को नोटिफाईड ऐरिया बनाया। वहां एक स्मार्ट टाउन बन रहा है। गैरसैंण सड़क एवं अन्य अवस्थापना विकास कॉरपोरेशन का गठन कर दिया है] वह अपना काम कर रहा है। सड़कों का निर्माण हो रहा है। दो सड़कों का निर्माण ऑलरेडी शुरू हो चुका है। मरचूला से भिकियासैंण] गैरसेैंण सड़क और पौड़ी से वीर चंद्रसिंह गढ़वाली जी के गांव के ऊपर से दूधातोली होकर के जाने वाली सड़क को गैरसैंण से जोड़ने का काम चल रहा है।

 

आपके कार्यकाल में शराब और खनन कारोबारियों पर नरमी और उनके समर्थन करने का आरोप लगता रहा है। क्या आपकी सरकार चुनिंदा ब्रांडों को ही राज्य में लाने के लिए आबकारी नीति चला रही थी

ये राज्य पलायन से जूझता रहा। जब तक हम हर्टीकल्चर को नहीं अपनाएंगे पलायन पर कोई ठोस काम नहीं हो पाएगा। जब तक आप अपने राज्य के फल&सब्जियों को यहीं नहीं खपाएंगे तक तब कुछ नहीं हो पाएगा। देखिए] हिमाचल की तरह तो हम कह नहीं सकते। इसके लिए एक ही माध्यम है कि वाईनरी उद्योग लगाए जाएं] जहां हमारे राज्य के किसानों के उत्पादों को बाजार मिल सके। मैंने इसी के तहत एक पॉलिसी में चेंज किया। यहां जो भी व्यक्ति शराब] बियर बनाते हैं वे अपने उत्पादन में १० प्रतिशत स्थानीय फलों को खपाएंगे और उनको २० प्रतिशत मार्केटिंग राईट उत्तराखण्ड के मार्केट में दिए जाएंगे। उसी के अंदर कुछ ब्रांड वाले जो राज्य में बियर बनाते थे] ने १० प्रतिशत पहाड़ के फलों को खपाया और उसके आधार पर उनको २० प्रतिशत मार्केट का राईट मिला। वो डेनिस भी हो सकता है या कोई और ब्रांड हो सकता है। मैं तो डेनिस नाम पहली बार सुन रहा हूं। यह मुख्यमंत्री का काम नहीं होता है। यह काम विभाग के लोगों का होता है। पूरी पॉलिसी को लोगों ने ब्रांड के झगड़े में डाल दिया। मैंने कहा कि मंडवे की स्कॉच बनाएं] मंडवे की बियर बनाएं] फाफर की बियर बनाएं। मैंने उस पर काम शुरू करवाया। मैंने भीमताल के पास जमीन दी। दोनों मंडियों से कहा कि लोगों के उत्पादों के लिए काम करें। हम तो बात ही करते रह गए और हिमाचल ने काम भी शुरू कर दिया। अरुणाचल अपनी रागी की बियर ले आया। हम कहते रह गए और लोगों ने ब्रांड का झगड़ा बना दिया। मैं आज कह सकता हूं कि हमने यह काम कर दिया होता तो आज यह जो पलायन का सवाल उठ रहा है उसका अपने आप ही निदान हो जाता। मैंने एक रोडमैप के आधार पर यह काम शुरू किए थे। आप ही मुझे बताएं यहां किसकी शराब बिकती है पोंटी चड्ढा की? नामधारी की शराब बिकती हैं मैंने उनसे शराब का काम छीनकर मंडी को दे दिया। मैं तो हो गया माफिया! धन्य हो उत्तराखण्ड तुम्ही बलिहारी। राष्ट्रपति शासन में केंद्र सरकार ने फिर से मंडी से काम छीनकर के पौंटी चड्ढा एंड कंपनी को दे दिया वो हो गए दूध के धुले हुए। उत्तराखण्ड के इस न्याय को मैं प्रणाम करता हूं। मैं आज भी कह रहा हूं कि जो प्लान हमने बनाया था वह पलायन को रोकने का बड़ा माध्यम बनता और जो लोग ब्रांड के शौकीन थे उन्होंने सिंडिकेट की आवाज बनकर उत्तराखण्ड का भला नहीं किया। मैंने मंडवे की ब्रांडिंग की। चौलाई को कौन जानता था आज चौलाई की कीमतों में चारगुना वृद्धि हुई है। इससे किसानों का ही फायदा हुआ। मेरे पक्ष में जो लोग थे शायद उनकी आवाज उतनी तेज नहीं थी और विरोध के पक्ष के लोगों की आवाज ज्यादा तेज रही।

 

खनन को लेकर भी आपकी सरकार लगातार निशाने पर रही

कोई मुझसे यह क्यों नहीं कहता कि शराब के ११ सौ करोड़ के राजस्व को मैं १९ सौ करोड़ छोड़ के गया। खनन का जो राजस्व ६० करोड़ था उसे सवा तीन सौ करोड़ का छोड़ के गया। जब खनन बढ़ा तो चोरियां भी हुई होगी। मैं यह नहीं कहता कि कोई चोरी नहीं बढ़ी होंगी। आज भी मुझको ?kaVk?kj के चौराहे पर टांग दीजिए। यदि मैंने एक भी क्रशर का लाइसेंस किसी को दिया हो] एक भी खनन का पट्टा किसी को दिया हो। मैं दावे के साथ कह रहा हूं कि यहां के ३० प्रतिशत नेताओं के पास खनन के पट्टे हैं या वे साझीदार हैं। इनमें कुछ हमारे पत्रकार बंधु भी हैं और कुछ नेतागण भी हैं। और इनको देने वाले इसी राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं। मुझसे पूर्व के और उनसे पूर्व के और उनसे भी पूर्व के सभी ने देने का काम किया। मैंने चार क्रशर बंद किए। सुभाष चौधरी का क्रशर भी बंद करवाया जो कि बसपा के उम्मीदवार थे। उन्होंने मेरे चुनाव में मुझे हरवाने के लिए हर काम किया क्योंकि मैंने उनका क्रशर बंद करवा दिया था। उन्होंने कहा मेरा जीतना जरूरी नहीं है जितना जरूरी हरीश रावत का हारना है। मैं तो हो गया खनन माफिया और जिन्होंने खनन के पट्टे दिए वे हो गए सदाचारी] तो मैं उत्तराखण्ड के इस न्याय को भी प्रणाम करता हूं और ^दि संडे पोस्ट^ के न्याय को भी प्रणाम करता हूं। मैं चाहता हूं कि आप इस पर शोध करें और गहराई में जाएं। यदि मैं जो कह रहा हूं वह गलत है तो मुझसे सवाल करिए।

 

क्या देवभूमि उत्तराखण्ड जैसे राज्य में शराब ही एक मात्र राजस्व प्राप्ति का माध्यम है। आपकी सरकार के समय में पहाड़ों में शराब के ठेके तो बढ़े ही साथ में बार के लाइसेंस तक आंवटित किए गए। जबकि बिहार सरकार ने अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति कर राजस्व ?kkVk पूरा करने में सफलता हासिल की है। क्या उत्तराखण्ड में ऐसा नहीं हो सकता

यह तो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाली बात होगी। और यह बात तब हो रही है जब जनता मुझको पराजित कर चुकी है। लेकिन यह हकीकत है कि मैं पहला मुख्यमंत्री हूं जिसने राज्य के सोर्सेज को बढ़ाया और अतिरिक्त राजस्व को बढ़ाया। आप मेरे समय की राजस्व वृद्धि को देख लीजिए और दूसरे के समय की राजस्व वृद्धि को भी देख लीजिए। मैंने तीन&तीन एक्ट राज्य के संसाधनों को बढ़ाने के लिए बनाए। एक तो जो जलविद्युत परियोजनाएं प्राइवेट सेक्टर की हैं] उन पर सेस लगाने का कानून बनाया जिससे हमको ९०० करोड़ रुपयों की आमदनी होगी। एंट्री टैक्स को एक वास्तविकता बनाया उसके जरिए हमको १ हजार करोड़ की आमदनी होगी। हमारे यहां ईंट मुजफ्फरनगर से आती थी] मैंने उसे इनकम का जरिया बनाया। मुजफ्फरनगर का सारा लोहा&सरिया यहां आता था] मैंने उस पर टैक्स लगाकर आमदनी को बढ़ाया। राजस्व प्राप्तियों में साढ़े तीन गुना वृद्धि की। लेकिन यह ऐसा नहीं था कि स्विच ऑन ओैर ऑफ कर दिया जाए तो तुरंत मिलेगा। जब संसाधन बढ़ेंगे और जहां से परंपरागत संसाधन आ रहे हैं उनको आप बंद कर देंगे तो फिर आपको वेतन देने के लाले पड़ जाएंगे। आपको डेवलपमेंट के लाले पड़ जाएंगे। डेवलेपमेंट न रुके। मैंने इसीलिए लोगों को वादा किया था कि आप मुझको तीन साल का वक्त दो तो मैं २०२० तक शराब को केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित कर दूंगा। ग्रामीण क्षेत्र के अंदर मैं शराब को समाप्त कर दूंगा। मैं नशामुक्त ग्रामीण उत्तराखण्ड बनाऊंगा। मैं एक बात आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि मैंने राज्य को सेस लगाने का हथियार दिया। मैंने लेबर सेक्टर पर सेस लगाकर १ लाख पचार हजार वर्करों के लिए कल्याणकारी स्कीम लागू की। ७५ हजार लोग तो उसका बेनिफिट भी उठा चुके हैं। मैं जब केंद्र सरकार में लेबर मिनिस्टर था तब मैंने स्कीम को लागू किया था। जैसे ही मैं मुख्यमंत्री बना मैंने यहां भी स्कीम को लागू किया। कई ऐसे अनटेम्ड भी थे जिनसे राज्य कोई राजस्व नहीं ले रहा था। मैंने उससे राजस्व प्राप्त किया। इसके जरिए हमको सवा सौ करोड़ राजस्व मिला। आप जानते हैं भी कि पीने के पानी के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। इससे हम कोई राजस्व नहीं लेते थे। उल्टा हम पानी की बोतलों का कूड़ा ढो रहे थे। हमने उस पर सेस लगाया और पानी का एटीएम शुरू किया। पावर के लाइन लॉस को तीन प्रतिशत तक कम करने में सफलता प्राप्त की। रोडवेज को ?kkVs से उबारने का बड़ा काम किया। मैं समझता हूं कि अगर सब ठीक तरीके से हुआ तो उत्तराखण्ड परिवहन निगम फायदा देने वाला होगा।

 

भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत के नारे से कांग्रेस के हालात ठीक नहीं दिखाई दे रहे हैं। कई बड़े नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं

देखिए] एक संगठित तरीके से सबसे पुराने राजनीतिक दल को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। लोकतंत्र में अगर विरोध नहीं होगा तो संसदीय लोकतंत्र जिंदा कैसे रहेगा। बड़ा दुर्भाग्य है कि एक पार्टी का प्रधानमंत्री कहता है कि एक पार्टी मुक्त भारत बनाएंगे। अब देश को तय करना है कि ससंदीय प्रणाली चाहिए तो विपक्ष को जिंदा रखना होगा। अगर आप संसदीय प्रणाली को खत्म करके एक दलीय प्रणाली लाना चाहते हैं तो भारत के लोगों को मुबारक हो। यह कोई कांग्रेस मुक्त भारत की बात नहीं है यह विपक्ष मुक्त भारत की बात हो रही है। आज बीजेडी को तोड़ा जा रहा है] तृणमूल को भी तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। केजरीवाल ऑलरेडी निशाने पर हैं। ऐसा नहीं है कि केवल हमको बर्बाद किया जा रहा है समाजवादी पार्टी को पहले ही तोड़ चुके हैं। विपक्ष को ही समाप्त करने का प्रयास चल रहा है।

 

हर चुनाव में हार के बाद कांग्रेस में समीक्षाओं का दौर शुरू हो जाता है। इस बार चुनाव में मिली हार पर वास्तव में समीक्षा होगी या पूर्व की ही तरह परंपरागत समीक्षा करके मामला समाप्त कर दिया जाएगा।

समीक्षा होगी और प्रयास भी होंगे] लेकिन उत्तराखण्ड के अंदर मैंने कहा न कि मैं हार के लिए जिम्मेदार हूं तो इसमें समीक्षा कैसी। मेरे नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया। पार्टी की जबर्दस्त हार हुई है तो हार के लिए केवल और केवल मैं ही जिम्मेदार हूं। मैंने यह भी कह दिया कि तीन साल में पार्टी को तैयार कर नेतृत्व तैयार करेंगे। मैं कांग्रेस को उसी स्थिति में लाऊंगा फिर से प्रदेश में खड़ा करूंगा।

 

नई सरकार का कहना है कि उसे खाली खजाना मिला है। कर्ज में डूबा प्रदेश मिला है। शायद इसीलिए सरकार शराब के राजस्व का मोह नहीं छोड़ पा रही है।

देखिए] इसमें दो बातें हैं कि एक तो यह कहा जा रहा है कि खजाना खाली छोड़ गए हैं। यह कोई एक तिजोरी नहीं है कि हरीश रावत तिजोरी की चाबी त्रिवेंद्र सिंह रावत के हाथों में दे दे और कहे कि लो खजाना ले लो। खजाना टैक्स के रूप में आता है] योजनाओं के रूप में आता है। कुछ ऋण स्वरूप में आता है। हर महीने आता है एकाउंट में चढ़ता है और खर्च में जाता है। मैं जब मुख्यमंत्री था तो एक भी दिन ऐसा बता दें कि किसी को तनखा न मिली हो। अप्रैल तक की तनखा का मैं बंदोबस्त कर चुका हूं। अगर अप्रैल तक की तनखा का कोई कष्ट आया है तो इस राज्य का कोई भी व्यक्ति मुझसे सवाल पूछ सकता है। कोई चेक बाउंस हुआ है] कोई बिल बगैर भुगतान के रहा हो तो मुझसे सवाल करें। अब अप्रैल के अंदर आपकी प्राप्तियां ?kV गई हैं] अब आपकी सरकार है आप करें। यदि टैक्शेसन नहीं हो रहा है तो यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। खजाना खाली है तो त्रिवेंद्र रावत की जिम्मेदारी है] प्रकाश पंत की जिम्मदारी है। केंद्र सरकार के पास हमारा साढे़ सात सौ करोड़ का फंड पड़ा हुआ है] यदि इन्होंने समय पर भेज दिया होगा तो वह तकरीबन एक हजार करोड़ का होना चाहिए। उसमें से मैं साढ़े तीन सौ करोड़ तो राज्य के लिए ला चुका हूं। सात सौ करोड़ रुपया मैं पीडब्ल्यूडी की सड़कों के लिए नावार्ड से ला चुका हूं। तो यह कहना सरासर झूठ है] कोरी लफाजी है कि खजाना खाली है] मैं अप्रैल तक का अपना काम कर चुका हूं।

 

दूसरा मैं कर्ज पर आता हूं। बहुत सूरमा बन रहे हैं। १२ हजार करोड़ का कर्ज हम २००७ में छोड़ के गए थे। जिसमें से उस समय के सेंट्रल फाइनेंस कमीशन का भी हिस्सा जुड़ा हुआ था। २०१२ में विजय बहुगुणाजी मुख्यमंत्री बने तो उस समय उनको ३७ हजार करोड़ का कर्ज पिछली सरकार ने छोड़ा था। अब हरीश रावत जिस समय त्रिवेद्र सिंह को सरकार सौंपकर गया तो उस समय साढ़े बत्तीस हजार करोड़ के कर्ज के साथ छोड़ के गया। इस साढ़े बत्तीस हजार करोड़ के कर्ज में लगभग पौने तीन हजार करोड़ रुपए का वह कर्ज भी शामिल है] जो केदारनाथ आपदा के समय हमको सड़क आदि के लिए एडीबी और वर्ल्ड बैंक से मिला था। अब मुझको यह तो बताओ कि यह जो पैंतालीस हजार करोड़ रुपए के कर्ज का मुझ पर आरोप लगा रहे हो कि हरीश रावत ने राज्य को कर्ज में डुबा दिया] वह कैसे लगा रहे हो। हे ईमानदार लोगों यदि कुछ भी सत्य खोजते हो तो यह बताओ कि हरीश रावत ने तुम्हारे लिए हुये कर्ज को कितना उतारा है। मैंने कितना ब्याज अदा किया है। खाता देखकर बता दें। यह सब भ्रम पैदा किया जा रहा है। जानबूझ कर ऐसा किया जा रहा है। मैं राज्य के लोगों को बताना चाहता हूं कि ये वही पार्टी है जो कहती थी चित्त है वित्त नहीं और उसी में पांच साल काट कर गए थे] तो सावधान उत्तराखण्ड। कहीं ऐसा तो नहीं कि ये उसकी बुनियाद फिर से तो नहीं बना रहे हैं। मैं खजाना भी खाली कर के नहीं गया हूं। राजस्व वसूली के लिए संभावनाएं छोड़ कर गया हूं और मैं राज्य का वह पहला मुख्यमंत्री हूं जिसने सबसे कम कर्ज लिया।

 

वर्तमान राज्य सरकार सुप्र्रीम कोर्ट के आदेश का तोड़ राज्य राजमार्गों को जिला मार्गों में बदलकर निकाल चुकी है। क्या इस नीति से आप सहमत हैं। अगर हैं तो इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं

देखिए] यह कोई फॉरवर्ड लुकिंग कदम नहीं है। लोग सड़कों को vixzsM करते हैं] आप डाउन कर रहे हैं। मेरे कार्यकाल में सर्वाधिक हाईवे बने हैं। मेैं २२ स्टेट हाईवे को नेशनल हाईवे में अपग्रेड करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार में लेकर गया था। अब आप केवल इस बात के लिए स्टेट हाईवे को डिस्ट्रिक्ट हाईवे कर रहे हैं कि आप शराब के कारोबार को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। ये थानेदार के तरीके से भी काम करना चाहते हैं और इंजीनियर के तौर पर भी काम करना चाहते हैं। डेवलपमेंटियर के तौर पर भी काम करना चाहते हैं। पहले यह तय कर लें कि इनको करना क्या है और कैसे करना हैं ये तो अभी भी चुनावी मोड में हैं। लोग आगे की तरफ देखते हैं। हमने उन हाईवे जिन को यह डिस्ट्रिक मार्ग ?kksf"kr कर रहे हैं] में १२ फ्लाईओवर स्वीकूत किए हुए हैं। इनके प्रतिनिधियों की बातों को सुनें तो मुझको बड़ा ताज्जुब होता है कि जिन लोगों ने जनता की जमीनों पर कब्जा करवा करके] चार सौ बीसी करवा करके बिल्डर के तोैर पर काम किया और जिन लोगों को जेल में होना चाहिए था वे इनके प्रवक्ता हैं।

 
         
 
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उत्तरकाशी जिले में बाड़ाहाट नगर के निकट माण्डौं गांव में स्थित शांति साधना कुटीर बारही शक्तिपीठ में गोबर से तैयार गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया गया। गंगा जल से भरे सूक्ष्म जल कुंड में

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