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खास खबर 
 
नदी का आर्तनाद
  • कृष्ण कुमार

दून की जीवन रेखा रहीं रिस्पना] बिंदाल और सुसवा जैसी प्राचीन नदियां आज गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं। हाल में एक छात्रा ने प्रधानमंत्री को रिस्पना का दर्द बताया तो इसके बाद एक&दो दिन सफाई की हलचल अवश्य हुई। लेकिन इतने भर से नदियों को पुनर्जीवन मिलना असंभव है। जानकार इसके लिए बड़े प्रोजेक्ट की दलील दे रहे हैं

 

नदियों और पर्यावरण को बचाने को लेकर उत्तराखण्ड के लोग अविभाजित उत्तर प्रदेश में भी वर्षों तक आवाज बुलंद करते रहे। राजनेता] पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता (एनजीओ) इस मुद्दे पर अपने&अपने तरीकों से सक्रिय भी रहे। लेकिन हालात पृथक राज्य गठन के सोलह साल बाद आज भी नहीं बदले। स्थिति यह है कि अकेले देहरादून में प्राचीन समय की रिस्पना] बिंदाल और सुसवा जैसी नदियां आज पूरी तरह से दम तोड़ चुकी हैं। ये नदियां अब सीवर लाइनों में तब्दील हो चुकी हैं। यह हालात तब है जब प्रदेश की सरकार देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाये जाने के प्रस्तावों पर काम कर रही है।

 

२६ मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रेडियो पर ^मन की बात^ कार्यक्रम में एक बार फिर से रिस्पना नदी का दर्द उभर कर सामने आया। ऐसा रिस्पना नदी के तट पर निवास करने वाली सत्रह वर्षीय बालिका गायत्री की वजह से संभव हो सका। गायत्री ने प्रधानमंत्री को अपना ऑडियो रिकॉर्ड करके भेजा। जिसमें रिस्पना नदी में फैली गंदगी को लेकर अपना रोष व्यक्त किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने गायत्री के रोष को गंभीरता से लिया। लेकिन नगर की दम तोड़ चुकी नदियां फिर से अपने प्रवाह में बहेंगी इसको लेकर संशय बना हुआ है।

 

दून के उत्तरी छोर पर सुंदर पहाड़ियों में बसे छोटे से कस्बे राजपुर के समीप निकलने वाली रिस्पना का प्राचीन नाम ^ऋषिपर्णा^ था। कालांतर में यह अपभ्रंश होकर रिसपर्णा और रिस्पना हो गई। रिस्पना नदी में बारह महीने निरंतर जल प्रवाह रहता था। यही कारण रहा कि इस नदी के तट पर देहरादून जैसे नगर का उदय हुआ। प्राचीन समय में रिस्पना नदी के चलते ही दून क्षेत्र में कूषि को बढ़ावा मिला। देहरादून नगर बिंदाल और रिस्पना नदियों के तटों के बीच बसा हुआ है। बिंदाल नदी जिसे प्राचीन समय में ^बिडालाक्ष^ के नाम से जाना जाता है] के मुकाबले रिस्पना में सबसे अधिक जल बहता था। इससे यह साबित हो जाता है कि देहरादून नगर की स्थापना में रिस्पना का कितना बड़ा योगदान रहा है।

 

अगर इतिहास में जाएं तो रिस्पना एक भरीपूरी नदी थी जिसकी उपयोगिता १७ वीं सदी में गढ़वाल रियासत की रानी कर्णावती ने खूब पहचानी और दून परगने में सिंचाई की व्यवस्था के लिए रिस्पना का ही उपयोग किया। तत्कालीन समय में गढ़वाल रियासत का ही अंग रहा देहरादून परगना रियासत को सबसे अधिक राजस्व देने वाला परगना माना जाता था। शायद इसी संपदा को देखते हुए दून परगने में कई बार आक्रमण भी हुए। कुख्यात तैमूर लंग ने दून और शिवालिक पर्वत की तलहटी में भारी रक्तपात करके जमकर लूट मचाई। इसी कड़ी में औंरगजेब के शासनकाल में मुगलों ने भी गढ़वाल रियासत पर आक्रमण करके इसको लूटने का प्रयास किया। लेकिन तत्कालीन रानी कर्णावती ने मुगल सेना को बुरी तरह खदेड़ा।

 

रानी कर्णावती ने देहरादून परगने की उचित देखभाल करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की और इस क्षेत्र में खेती के लिए सिंचाई की भी व्यवस्था की। इस व्यवस्था में राजपुर कस्बे के समीप dsyk?kkV में एक बैराज बनवा कर उससे एक नहर बनवाई और रिस्पना नदी का जल सिंचाई के लिए उपयोग किया। अंग्रेजों के शासन काल में भी दून में नहरें बनवाई गई। ईस्ट कैनाल और वेस्ट कैनाल रिस्पना और बिंदाल नदी से ही बनाई गई हैं। आश्चर्यजनक है कि नहर और बैराज निर्माण के बावजूद रिस्पना का जल निरंतर प्रवाह से बहता ही रहा। रिस्पना का जल पूरे वर्ष बहता था।

 

पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद राज्य की नदियों पर कुछ ज्यादा ही अवैध कब्जे होने लगे। सरकार और जनप्रतिनिधि वोटों की खतिर इन अवैध कब्जों को संरक्षण देने लगे। अगर प्रशासन कभी कोई कार्रवाई करता भी तो राजनीतिक दबाब के चलते उसे पीछे हटना पड़ता। नगर पालिका हो या नगर निगम या फिर विधानसभा चुनाव रिस्पना जैसी नदियों के किनारे बसे या बसाए गए वोटर अहम हो जाते हैं। आज रिस्पना में सबसे अधिक अवैध कब्जे हो चुके हैं। इसके तट पर बसी मलिन बस्तियों का दूषित पानी और सीवर आदि सीधे नदी में गिरता है। इसके चलते आज रिस्पना एक सीवर लाईन की तरह हो चुकी है। सरकार ने भी जमकर रिस्पना नदी की जमीन और तट का उपयोग किया। नदी&नालों की जमीनों पर भले ही उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने रोक लगाई है लेकिन सरकार ने तकरीबन हर सरकारी भव्य इमारतें नदी के तटों को काट कर ही बनाई हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो वह विधानसभा भवन है] जो कि रिस्पना नदी के तट को संकरा करके बनाया गया है। हालांकि यह इमारत अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय में निर्मित हुई थी और इसे विकास भवन बनाया गया था। लेकिन राज्य बनने के बाद इसे विधानसभा में तब्दील कर दिया गया।

 

राज्य की नारायण दत्त तिवारी सरकार के समय देहरादून और इसके आसपास के क्षेत्रों में जमकर सरकारी भवनों का निर्माण हुआ। हर भव्य इमारत नदी के तटों को काटकर बनी। उत्तराखण्ड तकनीकी विश्व विद्यालय] दून विश्वविद्यालय रिस्पना नदी की भूमि पर ही बनाए गए हैं। खादी ग्रामोद्योग और खनन विभाग के भवन भोपाल पानी स्थित नदी पर बनाए गए हैं। इसके अलावा सचिवालय कर्मचारियों के लिए आवासीय कालोनी भी रिस्पना नदी की जमीन पर ही बनायी गई है। पूर्व कांग्रेस सरकार के समय मलिन बस्ती सुधार के लिए योजना बनाई गई। लेकिन इस योजना में भी जमकर अवैध निर्माण होते रहे। सरकार पूर्व में चिह्नित मलिन बस्तियों के अलावा नई बस्तियों पर कार्यवाही से बचती रही और इससे अवैध कब्जों को बढ़ावा मिलता रहा। इसका असर बिंदाल] रिस्पना और सुसवा नदी पर सबसे अधिक पड़ा।

 

रिस्पना नदी पर किस&किस तरह से अतिक्रमण किया गया इसका प्रमाण सैटेलाइट गूगल अर्थ से साफ तोैर पर देखा जा सकता है। राज्य बनने के वक्त वर्ष २००० में रिस्पना नदी पर कब्जे बहुत कम दिखाई दे रहे हैं। लेकिन २००५ और २०१० के बीच महज पांच वर्षों में रिस्पना नदी पर हुए निर्माणों में बेहताशा तेजी आई। यही नहीं २०१० के बाद २०१६ के अंतराल में भी अवैध कब्जों और मलिन बस्तियों] आवासों में कोई कमी नहीं दिखाई दे रही है। सैटेलाइट इमेज के मुताबिक निरंतर कब्जे और निर्माण होते रहे हैं।

 

रिस्पना के तट पर एक मलिन बस्ती दीप नगर भी है जहां रिस्पना नदी एक ट्रेचिंग मैदान की तरह हो चुकी है। इसके चलते दीप नगर में कई बीमारियों का खतरा बना हुआ है। शायद इसी को महसूस कर दीप नगर में १२ वीं की छात्रा गायत्री पेगवाल पुत्री गुलाब सिंह पेगवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ^मन की बात^ कार्यक्रम में अपनी पीड़ा और रोष से अवगत कराया। जैसे ही प्रधानमंत्री ने छात्रा के भेजे ऑडियों का उल्लेख किया तो सरकारी तंत्र हरकत में आया और रिस्पना नदी को साफ करने के लिए पूर्व की ही तरह तमाम दावे होने लगे। लेकिन हकीकत में आज भी कुछ नहीं बदला है। हालात जस के तस हैं।


^पीएम हमारे हीरो^ 

 

प्रधानमंत्री जी हमारे हीरो हैं। जनता को सफाई के लिए जगरुक करना बड़ी बात है। हम जन्म से ही गंदगी देख रहे हैं। रोज गंदी नदी को पार करके स्कूल जाना पड़ता है। जब मैंने देखा कि कोई भी रिस्पना की गंदगी दूर करने की नहीं सोच रहा है तो मैंने पहले प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखा। लेकिन वह पत्र उनको नहीं मिल पाया। फिर मैंने २४ मार्च को एक ऑडियो रिकार्ड करके ^मन की बात^ कार्यक्रम के लिए भेजा। उसमें मैंने रिस्पना नदी और अपने क्षेत्र की गंदगी को लेकर गुस्सा जताया था। प्रधानमंत्री जी ने मेरी बात सुनी तो सरकार ने सफाई के लिए काम करना शुरू किया। लेकिन दो दिन के बाद ही पहले जैसी स्थिति हो गई & गायत्री पेगवाल


^बड़े प्रोजेक्ट की जरूत^ 

 

देहरादून नगर निगम के मेयर और धर्मपुर विधायक विनोद चमोली से नदियों की दुर्दशा पर बातचीत 

 

राष्ट्रीय स्वछता मिशन देहरादून में कामयाब क्यों नहीं दिखाई दे रहा है 

नगर निगम इसमें अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभा रहा है। आपको याद होगा कि जब मैं पहली बार मेयर बना था तब मैंने अहमदाबाद जाकर अपने सभी अधिकारियों के साथ साबरमती नदी परियोजना का अध्ययन किया। उसी तर्ज पर बिंदाल और रिस्पना नदी के लिए एक प्रस्ताव बनाया। भाजपा की तत्कालीन निशंक सरकार इस पर गंभीरता से काम करने का प्रयास कर रही थी। इसके लिए बकायदा साबरमती नदी परियोजना से जुड़े अधिकारियों और विशेषज्ञों को देहरादून में लाया गया। लेकिन इसके बाद राज्य में कांग्रेस की सरकार आ गई और इस पर कोई कम नहीं हो पाया।

 

क्या नगर निगम नदियों की सफाई व्यवस्था नहीं कर पा रहा है

नदियों के किनारे बस्तियों में निगम सफाई का काम कर ही रहा है। नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए जब तक कम्पलीट और बड़े प्रोजक्ट नहीं बनेंगे तब तक यह काम नहीं होगा।

 

प्रधानमंत्री के मन की बात में रिस्पना नदी का मामला आया तो सरकारी तंत्र हरकत में आया। लेकिन स्थितियां फिर भी नहीं बदली हैं 

देखिए] कुछ जनता को भी जगरूक होना पड़ेगा। हमने बस्तियों में कूड़ा ?kj लगाए हुए हैं। इसके बावजूद लोग या तो नदियों में कूड़ा डाल देते हैं या सड़कों पर Qsad देते हैं। प्रधानमंत्री जी ने यह भी तो कहा है कि भारत का हर एक नागरिक स्वच्छता के लिए जागरुक बने। अपने ?kjksa&मुहल्लों और नगर को साफ रखे।

 

क्या देहरादून शहर जो कि स्मार्ट सिटी बनने की राह में है] कभी स्वच्छ और साफ हो पाएगा

शीशमबाड़ा में हमारा सॉलिडवेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो चुका है। जुलाई से पहले यह आरंभ हो जाएगा तो सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। रही नदियों को साफ और रिवाईज करने की बात तो इसके लिए हमने वर्तमान सरकार को साबरमती नदी प्रोजेक्ट की तरह एक प्रस्ताव दिया है। मेरा मानना है कि यह कोई छोटा&मोटा काम नहीं है। कम से कम इस प्रोजेक्ट में ढाई से तीन हजार करोड़ का खर्च होना तय है। सरकार इसके लिए गंभीर है। हो सकता है कि वर्तमान सरकार इस पर काम करे। 

krishan.kumar@thesundaypostin

 
         
 
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राज्य सरकार के लिए सोचने का विषय है कि आए दिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट के वाहन ही क्यों nq?kukxzLr हो रहे हैं जबकि व्यापारिक वाहनों की तुलना में इनके रखरखाव और मरम्मत पर ज्यादा खर्च होता है

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