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साहित्य संस्कृति और समाज

 

सन् १९८८ में उमेश डोभाल शराब माफियाओं के हाथों मारे गए। इसके बाद जुलाई २०१० में हेमचंद्र पांडे सरकारों की उन्हीं नीतियों का शिकार हुए जिनके तहत हर जनतांत्रिक प्रतिरोध पर नक्सलवाद का लेबल चस्पां किया जाता है

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एक बार उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री जनाब रमेश पोखरियाल निशंक दिल्ली के कांशीट्यूशन क्लब में एक विशिष्टि आयोजन में तकरीर दे रहे थे। कार्यक्रम अपनी रवानी पर था तभी समारोह में उपस्थित पत्रकारों सामाजिक कार्यकर्ताओं के समूह ने उन पर प्रशनों की बौछार शुरू की। हरिद्वार में कुंभ के सफल आयोजनके लिए नोबेल पुरस्कार पर अपना दावा ठोंकने वाले जनाब निशंक से लोगों ने यह जानना चाहा कि क्या लोगों के स्नान के लिए नदी में सीवर के पानी को प्रवाहित किया गया था (जो बात बाद में कन्ट्रोलर एण्ड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट में पुष्ट हुई)। आयोजन में हुई मौतों पर सरकार की तरफ से की गयी पर्दादारी और शासन में नजर आने वाली अन्य अनियमितताओं पर लोग मुख्यमंत्री के श्रीमुख से कुछ सुनना चाह रहे थे।

 

सवालों की मार इतनी तीखी थी कि अपनी साहित्यिक रचनाओं को विदेशों के पाठ्यक्रमों में लगाए जाने को लेकर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाले मुख्यमंत्री महोदय ने बिल्कुल गैरसाहित्यिक अंदाज में अधबीच में ही वहां से रुखसत होना मुनासिब समझा। यह अलग बात है दूसरे दिन मुख्यमंत्री महोदय के कसीदे पढ़ता हुआ समाचार अखबारों में छपा जिसमें इस बात का भी संक्षिप्त उल्लेख था कि चन्द अराजक तत्वों ने कार्यक्रम को बाधित करने की कोशिश की थी। आयोजन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले और इसके लिए दक्षिणा से भी नवाजे गए चम्पू पत्रकारों का यह कमाल था।

 

२ जुलाई २०१० को आंध्र प्रदेश की कुख्यात पुलिस के हाथों चर्चित नक्सली नेता आजाद के साथ फर्जी मुठभेड़ का शिकार हुए हेम चन्द्र पांडे निश्चित ही उन पत्रकारों में शुमार किए जा सकते हैं जो सरकार द्वारा पेश सच से परे जाकर वास्तविक सच से रूबरू होना चाहते हैं और इसके लिए कोई भी कीमत उठाने को तैयार रहते हैं। इन दिनों विकास के नाम पर उत्तराखण्ड छत्तीसगढ़ झारखण्ड उड़ीसा जैसे राज्यों की प्राकृतिक धरोहरों को कॉरपोरेट सेक्टर को माटी के मोल सौंपा जा रहा है। उत्तराखण्ड की तमाम नदियों को पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। तराई में उद्योगों के नाम पर लोगों को छला जा रहा है। सोचने-समझने वाले लोगों द्वारा सरकारों के जालिम एवं जनविरोधी कदमों का विरोध किए जाने पर उन्हें विशिष्ट विचारधारा का बताकर निशाने पर लिये जाने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों द्वारा समय- समय पर जारी रिपोर्ट इस कड़वी हकीकत को उजागर करती है कि उत्तराखण्ड में तमाम लोगों को सरकार द्वारा इसलिए प्रताड़ित किया गया है कि वे सरकार की नीतियों के प्रतिकार की बात करते हैं। हेम चन्द्र पांडे सरकार की उन्ही नीतियों का शिकार हुए जिनके तहत हर जनतांत्रिक प्रतिरोध पर नक्सलवाद का लेबल चस्पां किया जाता है वही नक्सलवाद जिसे मुल्क के हुक्मरानों ने आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित कर दिया है और जिस मसले पर केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस एवं प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा में जबरदस्त एका दिखता है।

 

मालूम हो कि बत्तीस साल की उम्र में पुलिस की गोलियों का शिकार हुए हेमचन्द्र अपने छात्र जीवन से ही सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे। छात्र जीवन से ही उन्होंने आम लोगों के सवालों को उठाना शुरू किया था। हेम चन्द्र के जीवन के पल-पल जारी संघर्ष को इस हकीकत से भी जाना जा सकता है कि उन्हें परिवार चलाने के लिए एक संस्थान में नौकरी भी करनी पड़ती थी जहां से वह कुछ दिनों की छुट्टी लेकर किसी स्टोरी के सिलसिले में नागपुर गए थे। उनके सरोकार व्यापक थे जो हिन्दी के विभिन्न अखबारों में प्रकाशित आलेखों से भी उजागर होते है जिनमें आम लोगों की तकलीफ झलकती हैं और जैसा कि उनकी संगिनी बबीता (ओपन पत्रिका में साक्षात्कार बताती हैं कि किस तरह आठ साल के वैवाहिक जीवन में उन दोनों ने कभी छुट्टी नहीं ली थी क्योंकि वह मानते थे कि उनका जीवन इस समाज को आकार देने वाली व्यापक घटनाओं का ही हिस्सा है और भारत एवं शेष दुनिया में होने वाली घटनाओं से उन्हें अलग नहीं किया जा सकता था।

 

जहां हो

जैसे हो

फुसफुसाहटों को स्वर दो

स्वर जो संकेत हैं

बर्फ गिरते इस शहर में

 

प्रतिबद्ध पत्रकारिता के नाम पर हेम चन्द्र पांडे का यह बलिदान बरबस हमें पहाड़ की पत्रकारिता के पुरोधाओं दिवंगत भैरवदत्त धूलिया आचार्य गोपेश्वर कोठियाल की याद दिलाता है। ब्रदीदत्त पांडे विक्टर मोहन जोशी जैसों द्वारा स्थापित किए गए जनपक्षीय पत्रकारिता के मापदंडों की परंपरा को आगे बढ़ाता दिखता है। यह सभी महज पत्रकार की नहीं थे बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी बराबरी के साझीदार थे। अगर आजादी के बाद की पहाड़ की पत्रकारिता को देखें तो हेम चन्द्र पांडे शहीद उमेश डोभाल की परंपरा के वाहक दिखाई देते हैं।

 

२५ मार्च १९८८ को पौड़ी-गढ़वाल के रहने वाले उमेश डोभाल शराब माफियाओं के हाथों मारे गए थे। सिर्फ ३८ साल के पत्रकार उमेश डोभाल की लाश कभी मिल नहीं सकी और न ही उनके हत्यारों  को सजा मिल सकी। १२ अप्रैल १९९४ को सीबीआई स्पेशल मजिस्ट्रेट ने उनकी हत्या में शामिल १३ अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर बरी किया था।

 

सत्तर एवं अस्सी के दशक में उमेश बिजनौर टाइम्स (जिसके साथ २३ साल की उम्र में उन्होंने पत्रकारिता में अपने कॅरियर की शुरुआत की थी) पौड़ी टाइम्स(जिसे स्थानीय स्तर पर शुरू करने में भी उनका योगदान था)नैनीताल समाचार नवभारत टाइम्स जनसत्ता और अमर उजाला जैसे अखबारों में लिखते रहे थे। अपनी मृत्यु के समय वे अमर उजाला से जुड़े थे। याद रहे कि अस्सी के दशक के मध्य में अल्मोड़ा और नैनीताल आदि पड़ोसी जिलों में शराब के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा हुआ था जिसके केंद्र में दूर-दराज के इलाकों के रहने वाले स्त्री-पुरुष थे। और उमेश की कलम की धार इतनी तेज थी कि शराब माफियाओं के धंधे पर प्रतिकूल असर पड़ रहा था। इस बार साजिश कर उन्हें मार दिया गया।

 

कोई पूछ सकता है कि इस किस्म की पत्रकारिता जिसमें सच के लिए बलिदान भी देने की जरूरत पड़ सकती है इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? दरअसल इसके बिना अन्याय का हमारा बोध विलुप्त हो सकता है शब्दहीन हो सकता है और उससे लड़ने के लिए आवश्यक सूचनाओं से हम वंचित रह सकते हैं। अगर हम सचेत हैं अगर हम दूरदर्शी हैं अगर हम व्यवस्था के तंत्र को एक हद तक समझने की स्थिति में हैं हुक्मरानों द्वारा जो कहा जा रहा है और जो किया जा रहा है इसमें व्याप्त गहरे अंतराल से वाकिफ हैं और हम एम्बेडेड पत्रकार होने का मतलब जानते हैं तो अपने सीमित संसाधनों या पेशेगत तमाम मजबूरियों को झेलते हुए भी कुछ ऐसी बात कर सकते हैं जो जनतंत्र की सीमाओं को थोड़ा और दूर तक ले जा सकती हैं। धनबल या सत्ताबल के जरिए जनतंत्र के दायरे को सीमित करने की कोशिशों को भेदते रह सकते हैं। निश्चित ही इसमें सबसे अहम सवाल दृष्टि का है। अगर वह स्पष्ट नहीं है वह वैज्ञानिक नहीं है वह जनता के हितों को और सत्ताधारियों के हितों को एक ही तराजू पर तौलती है तो नयी भ्रांतियां पनप सकती हैं। इस सिलसिले में जान पिल्गर की एक किताब का उदाहरण देना समीचीन होगा।

 

जॉन पिल्गर ऑस्टे्रलियाई मूल के पत्रकार हैं आप इन्हें एक जनपक्षीय पत्रकार कह सकते हैं। वे मुख्यतः युद्ध संवाददाता रहे हैं लेकिन लेखक और फिल्म निर्माता के तौर पर भी मशहूर हैं। टेल मी नो लाइज अर्थात मुझे कुछ झूठ मत सुनाओ शीर्षक से प्रकाशित उनकी किताब बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध की ऐसी कुछ घटनाओं पर केन्द्रित है जिन्हें हम खोजी पत्रकारिता की कामयाबियां कह सकते हैं। इसमें हिरोशिमा के एटमी हमले के बाद वहां विल्फ्रेड बुर्शेट जैसे पत्रकार का आलेख है वर्ष १९८१ में फिलिस्तीनियों के शरणार्थी शिविरों साब्रा शातिला में हुए कत्लेआम को दुनिया को बताने वाले रॉर्बट फिस्क की रिपोर्ट है विएतनाम के माई लाई कत्लेआम को दुनिया तक पहुंचाने वाले सेम्यूर हर्ष की रिपोर्ट है या चर्चित थालिडोमाइड काण्ड का जिक्र करने वाली रिपोर्ट भी। निश्चित ही समाचारों की सूची और बढ़ायी जा सकती है। समाचारों के यह टुकड़े दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र की जहां प्रेस आजादी की रक्षा के लिए कानूनी फ्रेमवर्क भी बना हुआ है उसकी असलियत उजागर करते हैं।

 

यह बेहद सकारात्मक है कि अपनी मौत के २३ साल बाद भी उमेश डोभाल की स्मृतियों को लोगों ने जिंदा रखा है। उनकी पुण्यतिथि पर हर साल उत्तराखण्ड के अलग-अलग इलाकों में कार्यक्रम होते हैं। क्या उत्तराखण्ड की जनता वही सम्मान हेम चन्द्र को देगी जिसने अपने वर्तमान को जनता के सुन्दर भविष्य के लिए न्यौछावर किया था? इस प्रश्न का उत्तर भविष्य के गर्भ में ही छिपा है। उमेश डोभाल की एक कविता की पंक्तियां हैं।

 

सरपट भागते घोड़े की तरह नहीं

अलकनन्दा के बहाव की तरह

धीरे-धीरे आएगा वसंत!

पतझड़ के नंगे पेड़

वसंत की पूर्व सूचना दे रहे हैं

मिट्टी पानी और हवा से ताकत लेकर

तने से होता हुआ

शाखाओं-प्रशाखाओं में पहुंचेगा वसंत!

अंधेरे में जहां आंख नहीं पहुंचती है

लड़ी जा रही है एक लड़ाई

खामोश हलचलें

अंदर ही अंदर जमीन तैयार कर रही हैं

जागो! वसंत दस्तक दे रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।


 

 
         
 
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