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vad 37 05-03-2017
 
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साहित्य संस्कृति और समाज

 

राज्य बनने के बाद सिर्फ इतना बदलाव हुआ कि पहले जो पैसा लखनऊ के रास्ते उत्तराखण्ड में आता था वह दिल्ली से सीधे वहां पहुंच रहा है। एक और बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि पहले की अपेक्षा लूट खसोट बढ़ गई है

 

सबसे पहले हमें कुछ बातों को जान लेना बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड एक राज्य आंदोलन के बाद जन्मा जमीन का टुकड़ा भर है। इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है। उत्तराखण्ड एक पौराणिक शब्द है। स्कंद पुराण में दो जगहों पर इसका उल्लेख किया गया है। इसमें कुमाऊं को मानसखंड और गढ़वाल को केदार खंड कहकर संबोधित किया गया है। इतना ही नहीं कालिदास के कई खंडों में उत्तराखण्ड का जिक्र बार-बार आता है। उत्तराखण्ड नाम में ही इस राज्य की पूरी सांस्कृतिक विरासत छुपी है। लेकिन जब राज्य बना तो इसका नाम जानबूझकर उत्तरांचल रखा गया जिसे कई परेशानियों के बाद बदलवाकर उत्तराखण्ड करवाया गया। 

 

हालांकि उत्तराखण्ड भी किसी दूसरे राज्य जैसा ही एक राज्य है। दरअसल इस क्षेत्र को अलग इसलिए माना गया था क्योंकि यहां भौगोलिक परिस्थितियां पूरे उत्तर प्रदेश से एकदम भिन्न थीं। उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद इतना बदलाव हुआ कि उत्तराखण्ड के लिए पहले जो पैसा लखनऊ होकर आता था वह अब सीधे केन्द्र से मिल जाता है। हां इससे भी बड़ा एक और बदलाव यह हुआ है कि अब लूट-खसोट पहले से बढ़ गईं हैं। इसके कारण स्पष्ट है कि जो लोग राज्य के लिए मूवमेंट चला रहे थे वे सत्ता में नहीं आ सके और तो और ये तो विपक्षी दलों के तौर पर भी नहीं सामने आ सके। आंदोलन तो १९५३ से ही शुरू हो गया था और ये कांग्रेस और बीजेपी जो आज बारी-बारी से राज्य की सत्ता पर काबिज होती रहती है इन दोनों ने इसका पुरजोर विरोध भी किया था। उग्र आंदोलन की शुरुआत १९९४ में पिथौरागढ़ गवर्नमेंट कॉलेज में बीएड दाखिलों में ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियां आरक्षण के विरोध से हुई। ये विरोध जायज भी था क्योंकि उत्तराखण्ड में ओबीसी जातियों की संख्या सिर्फ दो प्रतिशत ही है। इस मुद्दे को लेकर वर्ष १९९४ सितंबर या अक्टूबर में दिल्ली में उत्तराखण्ड पत्रकार परिषद ने सर्वदलीय गोष्ठी का आयोजन किया था। इसमें चर्चा का मुख्य विषय था आरक्षण बनाम उत्तराखण्ड राज्य। इस चर्चा में डॉ बल्लभ जोशी प्रोफेसर भीम सिंह केसी पंत हरीश रावत त्रेयन सिंह नेगी अतुल कुमार अनजान मोहन उप्रेती मृणाल पांडे जैसे चर्चित लोग उपस्थित थे। लेकिन हुआ यह कि पूरी गोष्ठी राज्य विभाजन की मांग पर केन्द्रित हो गई। १९९२/९३ में प्लानिंग कमीशन ने हाडा (हिल एरिया डेवलेपमेंट कमेटी का गठन किया था। सुंदर लाल बहुगुणा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया था और एनडी जुयाल इसके सचिव थे। कमेटी की रिपोर्ट में हिमाचल और उत्तराखण्ड के हालातों की तुलनात्मक अध्ययन किया गया था। हिमाचल जब पंजाब का हिस्सा था तब प्रशासनिक रूप से विकेन्द्रीकरण नहीं हो पाया था। लेकिन राज्य बनने के बाद हिमाचल ने इस पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया। इसी रिपोर्ट को आधार बना काशी सिंह ऐरी के नेतृत्व में उक्रांद (उत्तराखण्ड क्रांति दल ने दिल्ली में एक रैली निकाली थी। लेकिन खासकर आज जो हालात बने उसके लिए मै उक्रांद को ही जिम्मेदार मानता हूं। इसमें बिखराव के चलते ही आज उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में कोई अंतर नहीं बचा। राज्य बनने के बाद जो लोग सत्ता और प्रशासन पर काबिज हुए वे सब मैदानी थे और उनमें पहाड़ के विकास की कोई दृष्टि ही नहीं थी। 

 

आप सिक्किम को देखें। इतनी मुश्किलें सामने होते हुए इस राज्य ने अपनी पंचायती राज व्यवस्था को देश के अग्रणी राज्यों से बेहतर करके दिखाया है। लेकिन यह बदलाव पवन चामलिंग की वजह से आया। उत्तराखण्ड को वहां के स्थानीय नेता चाहिए जो वहां के विकास के लिए क्षेत्रीय दृष्टि रखते हों। उत्तराखण्ड के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वहां हमेशा राष्ट्रीय राजनीति के राजनेता हावी रहे। इन लोगों ने हरिद्वार रुद्रपुर और देहरादून का विकास किया लेकिन पहाड़ का नहीं कर पाये क्योंकि इनके पास उसके लिए कोई विजन ही नहीं था। भवाली में एचएमटी ने अपनी एसेंबलिंग यूनिट यूपी डिजिटल्स के नाम से खोली भी थी। रानीबाग में एचएमटी का कारखाना भी लगा लेकिन राज्य बना तो उसे भी उपेक्षित कर दिया गया और अंततः वह बंद हो गया। यह विकास के विरोधाभास को भी प्रदर्शित करता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ नहीं कर पाए हम लोग। आज पाठ्यक्रम में उत्तराखण्ड की संस्कृति से जुड़ी हुई कोई किताब नहीं है। उत्तराखण्ड ने देश के साहित्य और संस्कृति में बड़ा योगदान दिया है लेकिन आज वहीं के लोगों को उसके बारे में कुछ भी नहीं पता। दरअसल सरकार को समझना होगा कि राज्य पक्षी और राज्य फूल बनाने से राज्य का विकास नहीं होता। जहां से पूरा देश पानी पी रहा है वहीं आज पीने का पानी सबसे बड़ी समस्या बनता जा रहा है। पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं लेकिन आपको तो राजनीति से ही फुरसत नहीं है। 

 

आज बांध को लेकर बड़ा विरोध सामने आ रहा है। लेकिन मैं आपको बता दूं कि रूस और अमेरिका में इससे ज्यादा संवेदनशील जगहों पर कहीं ज्यादा बड़े बांध बने हुए हैं। हम लोगों को सिर्फ बेवकूफ बना रहे हैं। मैं स्पष्ट तौर पर कहना चाहूंगा कि बांधों का आज जो विरोध हो रहा है वह नाजायज है। आप प्रदूषण को लेकर पॉलीथीन के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे। क्योंकि उससे आपकी पॉलिटिक्स नहीं चमक रही है। जैसी नकटी देवी वैसे भूत पुजेरी।यही लोग सत्ता में हैं और यही लोग विपक्ष में मौजूद हैं। १९७८ में उक्रांद का बीज बोया गया था। कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति डॉ देवीदत्त पंत इसके पहले अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। नैनीताल स्थित ५ बैंक रोड मकान में इसकी पहली बैठक आयोजित की गई थी। दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि उक्रांद ने उत्तराखण्ड में अपना आधार नहीं बढ़ाया। उक्रांद को इन लोगों ने हलद्वानी के ऊपर ही समेटकर रख दिया। रुद्रपुर बाजपुर जसपुर और काशीपुर जैसे गैर पहाड़ी क्षेत्रों को अछूत घोषित कर दिया। इन इलाकों के लोगों को साथ लिया जाता तो आज स्थिति कुछ और ही होती। मै ये कहना चाहता हूं कि पंत पांडे और तिवारी का ही उत्तराखण्ड नहीं है। आप जिन्हें नॉन पहाड़ी करार देते हैं वे सब भी उत्तराखण्ड के मूल निवासी हैं। इसी के चलते १९९८ में उत्तराखण्ड आंदोलन का ऊधमसिंहनगर में कड़ा विरोध हुआ था। मैंने उस वक्त भी इस पर एक बड़ा लेख लिखा था और उक्रांद को चेताया था। इतिहास में भी कई जगह ऊधमसिंहनगर को उत्तराखण्ड का हिस्सा बताया गया है। अंग्रेजों के शासनकाल में भी ऊधमसिंहनगर कुमाऊं कमिश्नरी का हिस्सा हुआ करता था। नेता परिसीमन का तो विरोध करते नहीं बस राजनतिक रोटियां सेंकने के मौके ढूंढ़ते रहते हैं। आज स्थिति यह है कि आपका कोई केन्द्रीय कार्यालय तक नहीं है। लेकिन आपको समझना होगा कि पार्टी ऑफिस आपके झोलों के सहारे नहीं चल सकती।

 

इसी के चलते जो पढ़-लिख गया वह तो पहाड़ से बाहर आ गया और जो बच गया वह नशे के सहारे जिंदगी गुजार रहा है। आप जब बाहर रहने लगे तो आपको प्रवासी घोषित कर दिया गया। आप किसी बदलाव के चलते वहां से जुड़ना चाहें भी तो आपको बाहरी कहकर खदेड़ दिया जाएगा। प्रवासी वहां जूते-डंडे खाने तो जा नहीं सकते। आज जिस कुमाऊं-गढ़वाल के विभाजन को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है वह दरअसल कहीं है ही नहीं। यह सब जानबूझकर फैलाया जा रहा है। इसी तरह राजनीतिक दल ठाकुर-ब्राह्मण पर अपनी राजनीति चमकाने में लगे रहते हैं। आज जो मीडिया उत्तराखण्ड में सत्ता के एक अंग की तरह दिखाई देती है उसी ने उत्तराखण्ड आंदोलन में एक बड़ी भूमिका निभाई थी। जब राज्य नहीं बना था तो लोगों में आक्रोश था भावना और संद्घर्ष का मेलजोल भी था पहचान की भी तलाश थी। लेकिन आज लोगों को जोड़ पाना मुश्किल है। राज्य बन चुका है अब लोगों को कंफर्ट जोन से बाहर निकालना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 

 

(लेखक संडे मेल नई दुनिया अमर उजाला जैसे समाचार पत्रों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वर्तमान में वह लोकसभा टीवी के संपादक हैं। यह आलेख अंकित फ्रांसिस से बातचीत पर आधारित है।

 

 
         
 
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