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साहित्य संस्कृति और समाज

 

अल्मोड़ा में जन्मे हिमांशु जोशी आजादी के बाद के कथाकारों में एक ऐसा प्रमुख नाम हैं जिन्हें आलोचकों से ज्यादा पाठकों की प्रशंसा मिली।तुम्हारे लिए छाया मत छूना मन समय साक्षी है कगार की आग उनके प्रमुख उपन्यास हैं। वे लंबे अरसे तक साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक भी रहे

 

हर क्षेत्र का अपना एक विशेष महत्व होता है और इसी तरह हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व होता है। ये साहित्य और संस्कृति से जुड़े क्षेत्र हैं। ये अपने में काफी दूरगामी प्रभाव लिए रहते हैं। कुछ जगहें ऐसी होती हैं जो बनी ही लीक से हटकर हैं। जैसे आप देखें कि गोवा है। गोवा सिर्फ इसलिए ऐसा नहीं है कि वहां पुर्तगाली आकर बस गए थे। देखेंगे तो वह सिर्फ एक जिले के बराबर है। इसी तरह पहाड़ की जो स्थितियां हैं वे वहां के निवासियों के लिए अभिशाप और वरदान दोनों ही साबित हुईं। पहली बात तो यह कि मैं इसे खंड-खंड में नहीं देखना चाहता। वैसे ही विखंडित हो रहा है सारा देश और हर कोने में लोग इस काम में जोरों-शोरों से लगे हुए हैं। विवेकानंद को बैलूर मठ की तरह से देश में दो और मठों की स्थापना करनी थी। एक मठ वे हिमालय में भी स्थापित करना चाहते थे। एक बार पहले भी वे मानसरोवर तक आए हुए थे लेकिन मठ की स्थापना के उद्देश्य से एक बार फिर हलद्वानी अल्मोड़ा के रास्ते होते हुए हिमालय गए। हालांकि यही इनकी अंतिम यात्रा भी साबित हुई। वहीं चंपावत के पास उन्होंने मायावती अद्वैत आश्रम की स्थापना भी की है। कहने का मतलब यही है कि पहाड़ का सौंदर्य अपने तरह का है और सागर का सौंदर्य एक अलग महत्व रखता है। 

 

आप देखेंगे कि ज्यों-ज्यों आप हिमालय के नजदीक जाते जायेंगे आपके विचारों में एक उदार परिवर्तन आपको महसूस होने लगेगा। आप चीजों को एक अलग दृष्टि से देखेंगे और यही बात है जो पहाड़ के आदमी को दूसरों से अलग बनाती है। पहाड़ के लोगों में मानवीय गुण हमेशा से दूसरों से ज्यादा पाए जाते हैं। पहाड़ के सौंदर्य के कारण ही सुमित्रानंदन पंत जैसे कवि वहीं पैदा हुए। खड़ी बोली के पहले कवि गुमानी पंत भी अल्मोड़ा में ही पैदा हुए। इन्होंने चार भाषाओं में एक साथ कविता लिखी। इनकी कविताओं में एक ही लाइन में थोड़ी कुमाऊंनी थोड़ी गुरखाली थोड़ी नेपाली और थोड़ी गढ़वाली का मिश्रण आपको देखने को मिलेगा। उन्हें अब ज्यादा कोई कोट नहीं करता लेकिन जब उनके सौ साल पूरे हो रहे थे तो हमने एक साप्ताहिक में उन पर कुछ लेख और उनकी कुछ रचनाएं प्रकाशित की थीं। दरअसल पहाड़ का सौंदर्य एक दिव्य सौंदर्य है। सौंदर्य के भी कई स्तर हो सकते हैं और पहाड़ को इसमें उच्च स्तर माना जा सकता है।

 

आधुनिक काल में भी पर्वतीय क्षेत्र में साहित्य से जुड़ी कई विभूतियां हुईं जिनका साहित्य में काफी अहम योगदान है। गुमानी पंत भी क्षेत्रीय भाषाओं से होते हुए हिंदी और संस्कृत तक पहुंचे थे। पहाड़ में साहित्य की परंपरा काफी पुरानी है और इसी कारण वहां के रचनाकारों का विशिष्ट योगदान भी रहा है। गुमानी की परंपरा में आगे सुमित्रा नंदन पंत इलाचन्द्र जोशी और पीतांबर दत्त बड़थ्वाल हुए। पीतांबर उत्तराखण्ड से पहले पीएचडी होल्डर भी थे। इसके बाद तो पूरी की पूरी एक जनरेशन ने ही साहित्य को कुमाऊं हो या गढ़वाल में अपने सिर-आंखों पर बिठाया। सुमित्रा नंदन पंत से भी पहले गढ़वाल में कई उल्लेखनीय रचनाकार हुए हैं। रामप्रसाद द्घिल्डियाल का नाम आज नहीं लिया जाता लेकिन उन्होंने पहाड़ में साहित्य को एक नई दिशा देने का काम किया था। हालांकि क्रिएटिव राइटिंग के फील्ड में किसी के लिखे के परीक्षण और निरीक्षण के पैमाने दूसरे किसी फील्ड से काफी अलग होते हैं। कहानीकार ज्यादा पॉपुलर होगा एक निबंधकार की अपेक्षा। चूंकि हर तरह की राइटिंग को पढ़ने वालों के दायरे में भी तो फर्क होता है। आप किसी कवि और वह भी नीरज जैसे किसी दूसरे रचनाकार की तुलना नहीं कर सकते। आपने हाल के दिनों में देखा होगा कि कई मंचीय कवियों को बड़ी प्रसिद्धि मिली है। उससे फर्क जरूर पड़ता है लेकिन इससे निराश नहीं होना चाहिए। अब पहले वाला जमाना रहा भी नहीं। पहले लेखक की लोग बड़ी इज्जत करते थे और उसके लिखे को बड़ी आत्मीयता से पढ़ते और गुनते भी थे। अपने दिल्ली के पचपन साल के अनुभव से कहूं तो कई लेखक थे जो सिर्फ चर्चा का विषय बने लोग उन्हें जल्दी भूल गए लेकिन कुछ लेखकों ने ऐसा लिख दिया जिनके नाम के उल्लेख के बिना उस विद्या पर बात ही नहीं की जा सकती जिसमें वे लिखते थे। अब पैमाने थोड़े बदल गए हैं और सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट का जमाना आ गया है। इसी ने सुविधापूर्ण लेखन को बढ़ावा भी दिया है। चन्द्र कुंवर बर्तवाल और शैलेश मटियानी ही उदाहरण हैं कि सच उभर कर खुद ही आ जाता है। आप किसी को कितना भी दबा लीजिए लेकिन उसकी आवाज को नहीं दबा सकते। शैलेश जब जीवित थे उन्हें तब कोई छापने को तैयार नहीं था। उन्होंने जितना संघर्ष किया या शायद ही किसी और ने किया हो। बल्कि शैलेश मिलते थे तो कहते भी थे कि देखो मैं कितना लिखता हूं। लेकिन ये मठाधीश मुझे अब भी लेखक मानने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे बहुत से लोग आज भी हैं जिनकी चर्चा को जानबूझकर दबा दिया जा रहा है।

 

आज तो पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या यही है कि लिखना पहाड़ों से धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। आप याद करें तो भारत की सांस्कृतिक राजधानी बनारस और साहित्यिक राजधानी इलाहाबाद हुआ करती थी। लेखक बनकर बसने या लेखन की ट्रेनिंग के लिए लोग इलाहाबाद को श्रेष्ठ जगह माना करते थे। वहां रहने का मतलब था कि आप साहित्य की एक सेफ जगह पर हैं। आज इलाहाबाद का क्या हाल है? दिल्ली में एक समय आचार्य चतुरसेन और जैनेन्द्र जैसे दो-चार लेखक रहा करते थे लेकिन आज हालात दूसरे हैं। आज जितना साहित्य से जुड़ा माहौल दिल्ली में है शायद देश के किसी हिस्से या किसी भी देश की राजधानी में न हो। यहां यह समझना होगा कि पहाड़ में लोगों का जीवन और क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा संघर्षपूर्ण है। सिर्फ लेखक होने से आपको अपने दूसरे कामों और जरूरतों से छूट नहीं मिल सकती। अंततः आपको भी घर लौटकर जाना होता है और कई तरह की जिम्मेदारियां आपको निभानी ही होती हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि आप जैसा चाहे लिखें और चूंकि आपको वह अच्छा लगता है तो बाकियों को भी वह जरूर ही पसंद आए। पहाड़ों में ये हुआ कि वहां कि सारी प्रतिभाएं धीरे-धीरे वहां से बाहर आ गईं और ऐसा किसी ने जानबूझकर नहीं किया। वहां उनका लेखन उनके लिए रोजी-रोटी नहीं जुटा पा रहा था। दूसरी बात कि लेखन की सफलता के लिए मीडिया का साथ जुड़ना भी जरूरी होता गया है। वहां कोई बड़ा रेडियो स्टेशन फिल्म स्टूडियो अखबार या पत्रिका कभी मौजूद नहीं रहे। मैं भी कुछ खास तो वहां का जीवन जी नहीं पाया हूं। बस वह जो पिछली पूंजी थी उसे ही आज तक संभाल- संभालकर खर्च किया है। 

 

पहाड़ में कोई सुविधा नहीं थी कि लेखक वहां सरवाइव कर पाता तो सभी नीचे की तरफ आते गए। पहाड़ के लेखक रवीन्द्रनाथ टैगोर के घर के तो थे नहीं। सभी ज्यादातर गरीब घरों से ही ताल्लुक रखते थे। दरअसल सरकार ने लेखकों के लिए आज तक कुछ नहीं किया। उदयशंकर वहां आठ साल तक रहे थे और आज भी वहां का पत्थर व अन्य चीजें उनकी रचनाशीलता में दिखाई पड़ती हैं। गुरुदत्त भी अल्मोड़ा में आठ-नौ साल तक रहे थे। वहीं उन्होंने नृत्य भी सीखा था। लेकिन हमने न कभी उदयशंकर पर कोई ध्यान दिया न गुरुदत्त पर। पहाड़ में इस तरह के किसी संस्थान के बारे में कभी सोचा भी नहीं गया। पहाड़ों को सिर्फ द्घूमने-फिरने और अय्याशी की जगह बनाने का काम किया गया। ऐसे में हुआ ये कि पहाड़ी लोग जो कि दूसरों की अपेक्षा में अधिक संवेदनशील होते हैं अवसरों की तलाश में पलायन करने लगे। पलायन का संबंध अस्तित्व से जुड़ा है या स्पष्ट तौर पर कहें तो रोजी- रोटी से जुड़ा है। 

 

हमारे यहां चाहे कोई भी सरकार रही हो नीति हर धान ढाई पसेरी वाली ही लागू हो रही है। सरकारें खुद ही मैदान और पहाड़ की नीतियों में अंतर नहीं कर पा रहीं जिससे विकास एक ढकोसला बनता जा रहा है। जो विकास का मॉडल कन्याकुमारी पर लागू हो रहा है वह जरूरी नहीं है कि पहाड़ पर भी ज्यों का त्यों लागू हो जाय। उत्तराखण्ड का विभाजन होने से कुछ ही समय पहले एक बार मेरी मुलाकात सुंदर लाल बहुगुणा से हुई। उस समय यहां यूनिवर्सिटी खोलने की बात चल रही थी। मैंने उनसे पूछा कि यहां बीए-एमए वाले कॉलेज तो पहले से ही बहुत सारे थे तो इस यूनिवर्सिटी की इतनी तत्परता से क्या जरूरत आन पड़ी। बहुगुणा ने मुझसे पूछा कि आपके कहने का क्या मतलब है। मैंने उनसे कहा कि आप ये तीन यूनिवर्सिटियों की जगह परफार्मिंग आर्ट्स का एक इंस्टीट्यूट बनाइये। उदयशंकर को रिवाइव कीजिए। पहाड़ का आदमी तो पैदाइशी कलाकार होता है। हालांकि अब तो वहां भी लोग काफी शातिर हो गए हैंलेकिन उनके भीतर एक कलाकार हमेशा मौजूद रहता है। आप बीए-एमए पढ़ा रहे हैं उससे क्या होगा। आपको एक संचार माध्यमों का इंस्टीट्यूट जिसमें फिल्म भी पढ़ाई जाये खोलना चाहिए था। इसके अलावा कोशिश करनी चाहिए थी कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की एक ब्रांच वहां खुलवा देते। एक बच्चा जो भेड़ चरा रहा है और जन्म से ही गाता है बांसुरी बजाता है उसे आप एनएसडी नहीं बीए कराने पर तुले हैं। फिर भी साहित्य अपनी अबाध गति से चलता है। हमें लगता है कि वो रुक रहा है लेकिन ऐसा नहीं होता। जिस जगह हिमालय नहीं भी है वहां भी कई अच्छे रचनाकार पैदा हुए हैं तो सिर्फ अकेले सुमित्रा नंदन पंत का ही नाम लिया जाय ये ठीक नहीं है। 

 

 उत्तराखंड में भी आज राजनीतिक तौर पर वही स्थितियां हैं जो कि पूरे देश में बनी हुई हैं। हमारे यहां नेतृत्व का भारी संकट है। आपके पास नेता ही नहीं हैं जो रास्ता दिखा सकें। जिन लोगों से क्लर्की का एग्जाम पास नहीं होगा वो लोग मुख्यमंत्री मंत्री और राज्यपाल बने हुए हैं। 

 

लेकिन जो स्थितियां हैं उनके बारे में अगर आप गंभीरता से सोचेंगे तो महसूस होगा कि डेमोक्रेसी का इस देश में मजाक बना दिया गया है। एंड ऑफ आइडियोलॉजी का नारा देने वाले अमेरिकी विचारकों को ये समझना होगा कि वे जो नारा दे रहे हैं वह खुद में एक नई विचारधारा है। 

 

आस्तिक और नास्तिक में भी कोई खास फर्क नहीं है। किसी के कहने से विचार बदलने होते तो ये लोग कब के दो दूनी चार भी बदल देते। इस सिस्टम में तो यह भी हो सकता है कि कल को सारे पार्लियामेंट मेंबर संसद में हाथ उठा कर कह दें कि दिन की जगह रात है तो क्या रात हो जायेगी और उनके कहने से सूरज डूब जायेगा। जहां तक विचारधारा की बात है तो अब हमारे पास न तो कोई विचार है और न कोई रास्ता। हमने अपने सारे रास्ते जला दिए हैं। चूंकि सत्ता दरअसल नासमझ लोगों के नाम पर आ गई है जिनके पास अपना कोई विचार नहीं है ये बस अंधानुकरण करने में लगे हैं। आप २४ साल की अगाथा संगमा को एमपी बना देते हैं। आप अगर कारपेंटर भी हैं तो कुछ तो सीखते हैं और कुछ तो वक्त उसमें लगता है। लेकिन यहां कुछ को तो पेट से सीख कर आए हुए मान लिया गया है। आपने इन्हीं नासमझियों के चलते राष्ट्र के भविष्य को अंधेरे में ढकेल दिया है। आप देखिए कि सब चुप हैं कोई लेखक पत्रकार या एक्टिविस्ट इस पर बोलने के लिए तैयार नहीं हैं। सब अपने-अपने संगठन बना इंटलेक्चुअल बने फिर रहे हैं लेकिन बोल नहीं रहे। हमारे छोटे-छोटे बच्चे जो गांव से आकर यहां देखते हैं ये लोग उनके आदर्श बनते जा रहे हैं। यही लोग एक पूरी पीढ़ी को गुमराह कर रहे हैं। हमारे आदर्श निराला सुमित्रा नंदन पंत और हरिऔध थे लेकिन इन बच्चों के पास तो कुछ बचा ही नहीं। जो खुद ही बौने हैं वो क्या आने वाली पीढ़ी को शिक्षाूल देंगे। गांधी भी पूर्ण नहीं थे लेकिन उनके बाद लगातार सत्ता में मौजूद लोगों में भारी गुणात्मक गिरावट देखने को मिली। गांधी अकेले भारत नहीं थे। गांधी तो समझौतापरस्त थे लेकिन तीनों को जोड़ देने से एक विजन सामने आता है। आज मैदान और पहाड़ या कुमाऊं और गढ़वाल का जो विभाजन सामने दिख रहा है वह सिर्फ इन लोगों ने अपनी राजनीति को चमकाने के लिए पैदा किया है। विभाजन की इसी मानसिकता ने पूरे देश को आज टुकड़ों में बांट कर रख दिया है। हमें अपने को व्यक्तिगत स्तर पर बदलना होगा इसके बाद ही किसी तरह की कोई आशा भविष्य के लिए बची रह सकती है। कहानी लिखने से विजन नहीं आता है लेकिन जब कहानी के साथ कोई विजन जुड़ जाता है तो कोई टालस्टॉय सामने आता है। 

(अंकित फ्रांसिस से बातचीत पर आधारित

 

 

 
         
 
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