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उत्तराखण्ड के बारह साल

उत्तराखण्ड के रचनाकारों का भारतीय साहित्य में योगदान निश्चय ही बहुत उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है। आप सुमित्रानंदन पंत से शुरू करें और चंद्रकुंवर बर्त्वाल बृजेन्द्र लाल शाह पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल वीरेन डंगवाल को देखें या इनके अलावा और भी कई बड़े नाम हैं जैसे विद्यासागर नौटियाल। इन सभी ने साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया। कई ने तो नये मानदंड स्थापित किए। आप चंद्रकुंवर बर्त्वाल को देखें वे पंत जी के समय में इतनी आधुनिक कविता लिख रहे थे। आप अब पढ़ते हैं तो आपको आश्चर्य होता है कि उनकी इतनी आधुनिक दृष्टि उस समय में थी। असल में उत्तराखण्ड के लेखकों का योगदान बहुत ही ऐतिहासिक और प्रशंसनीय रहा है। इसके अलावा जो आज भी लिख रहे हैं जैसे कि सुभाष पंत राजेश सकलानी विजय गौड़ वे भी काफी उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। मै आपको बता दूं कि सिर्फ साहित्य लेखन ही नहीं इतिहास जनजातीय और अन्य क्षेत्र के लेखन में भी पहाड़ के लोगों ने काफी योगदान दिया है

 

उत्तराखण्ड के संदर्भ में वामपंथी आंदोलन की क्या भूमिका रही है?

उत्तराखण्ड में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन बहुत पहले ही हो चुका था और प्रजामंडल आंदोलन में बहुत से कम्युनिस्ट भी शामिल थे। आंदोलन में श्रीदेव सुमन और हमारे एक कम्युनिस्ट साथी नागेन्द्र सकलानी शहीद हुए थे। काफी समय से वामपंथी आंदोलन वहां मौजूद रहा है।

 

राज्य आंदोलन में उक्रांद और उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी की बड़ी भूमिका रही। आज उक्रांद के टूटने से केन्द्र की तरह ही उत्तराखण्ड में भी विकल्पहीनता की स्थिति पैदा हो गई है। इन हालात में उत्तराखण्ड के राजनीतिक भविष्य को किस तरह से देखते हैं?

चुनावी राजनीति का जो भविष्य है वही भविष्य और हश्र उत्तराखण्ड का भी है। वैसे भी चुनावी राजनीति का भविष्य होता ही क्या है। आने वाले किसी भी चुनाव में चाहे वह लोकसभा हो या किसी राज्य के विधानसभा चुनाव या उत्तराखण्ड की ही बात करें तो सिर्फ स्थानीय फैक्टर ही काम करेंगे। केन्द्र में तो बिना क्षेत्रीय दलों के सहयोग के कोई भी पार्टी सत्ता में नहीं आ सकती। सपा बसपा बीजद एआईडीएमके और टीएमसी की भूमिका बढ़ती जायेगी। उत्तराखण्ड में बसपा और सपा जल्दी ही भूमिका निभाने के लिए तैयार हो जायेंगी। जातिगत राजनीति के खिलाड़ियों का भविष्य वहां भी उज्ज्वल है। मैं इसे उम्मीद की तरह नहीं बोल रहा हूं लेकिन यह संभावना है। कांग्रेस और भाजपा की अभी भी उत्तराखण्ड में स्थिति मजबूत क्योंकि यहां इनका परंपरागत वोट बैंक जैसे कि कांग्रेस का ब्राह्मण और भाजपा का ठाकुर खिसका नहीं है। 

 

उत्तराखण्ड की माटी से जुड़े रचनाकारों का भारतीय साहित्य में क्या योगदान रहा?

उनका योगदान निश्चय ही बहुत उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है। आप सुमित्रानंदन पंत से शुरू करें और चंद्रकुंवर बर्त्वाल बृजेन्द्र लाल शाह पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल वीरेन डंगवाल और राजेश सकलानी को देखें या इनके अलावा और भी कई बड़े नाम हैं जैसे विद्यासागर नौटियाल। इन सभी ने साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया। कई ने तो नये मानदंड स्थापित किए। आप चंद्रकुंवर बर्त्वाल को देखें वे पंत जी के समय में इतनी आधुनिक कविता लिख रहे थे। आप अब पढ़ते हैं तो आपको आश्चर्य होता है कि उनकी इतनी आधुनिक दृष्टि उस समय में थी। असल में उत्तराखण्ड के लेखकों का योगदान बहुत ही ऐतिहासिक और प्रशंसनीय रहा है। इसके अलावा जो आज भी लिख रहे हैं जैसे कि सुभाष पंत राजेश सकलानी विजय गौड़ वे भी काफी उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। मै आपको बता दूं कि सिर्फ साहित्य लेखन ही नहीं इतिहास जनजातीय और अन्य क्षेत्र के लेखनों में भी पहाड़ के लोगों ने काफी योगदान दिया है। इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि उनके पास रचनाकर्म और संस्कूति की एक समृद्ध विरासत रही है। आप अगर गिनने बैठें तो मनोहर श्याम जोशी हिमांशु जोशी और पंकज बिष्ट जैसे और भी सैकड़ों नाम निकलते ही जायेंगे। लेकिन मैं आपको स्पष्ट कर दूं कि इसका उत्तराखण्ड नाम के पर्वतीय राज्य से कोई संबंध नहीं है। ये सभी लोग इस राज्य गठन से बहुत पहले से लिख रहे हैं। इसमें इसका कोई योगदान नहीं है। 

 

सुमित्रा नंदन पंत के अलावा उत्तराखण्ड के किस कवि का योगदान सबसे ज्यादा रहा है?

चन्द्रकुंवर बर्त्वाल बहुत बड़े कवि हैं। इससे पहले गुमानी और मौलाराम आदि भी हुए हैं। वैसे स्पष्ट कर दूं कि मैं चन्द्रकुंवर बर्त्वाल को पंत जी से ज्यादा बड़ा कवि मानता हूं। बर्त्वाल ज्यादा बड़े कवि हैं और कई मायनों में हमारे लिए ज्यादा जरूरी हैं। इसके बाद लीलाधर जगूड़ी वीरेन डंगवाल राजेश सकलानी आदि का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

 

आपने चन्द्रकुंवर बर्त्वाल जी का जिक्र किया। क्या आपको नहीं लगता कि उन्हें जो स्थान मिलना चाहिए था वह नहीं मिला?

इसके कई कारण रहे। पहला तो ये कि उनका निधन काफी कम उम्र लगभग अट्ठाइस के रहे होंगे तभी हो गया था। दूसरी बात ये कि वे पहले इलाहाबाद में थे फिर अपने गांव चले आए। यहां आए तो उन्हें ट्यूबरकुलोसिस हो गया। तब टीबी का कोई इलाज था नहीं। इसी के कारण उनकी मृत्यु भी हुई। हां मैं मानता हूं कि उपेक्षा हुई उनकी। उनके संग्रह भी ज्यादा नहीं आ पाए और आलोचकों ने उन पर उस समय ज्यादा विचार भी नहीं किया। उस समय छायावाद का जोर था और बर्त्वाल छायावाद से भी उभरकर आगे आ गये थे। निराला से पत्र व्यवहार था उनका। उन्होंने छायावाद को तो लगभग छोड़ ही दिया था। उस समय निराला के अलावा सिर्फ चन्द्र कुंवर बर्त्वाल ही थे जिन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग किया। 

 

एक और नाम है जिनकी उपेक्षा की गई शैलेश मटियानी?

शैलेश जी और मेरा तो बहुत ही दोस्ताना संबंध रहा है। हां ये सच है कि उनकी उस समय काफी उपेक्षा की गई। लेकिन वे पहाड़ के बड़े लेखकों में शामिल हैं। मनोहर श्याम जोशी शैलेश मटियानीविद्यासागर नौटियाल राधाकृष्ण कुकरेती रमाप्रसाद द्घिल्डियाल पहाड़ी और भी काफी लोग हैं जिन्होंने अच्छी कहानियां लिखीं।

आप के शुरू के दो कविता संग्रह पहाड़ पर लालटेन और घर का रास्ता को छोड़ दें तो आप पर आरोप है कि आपकी बाद की कविताओं में पहाड़ पीछे छूटता गया।

दरअसल हम जो देखना चाहते हैं वो ढूंढ़ ही लेते हैं। ऐसा कुछ नहीं है जो आप कह रहे हैं। मेरा बाद का एक संग्रह है आवाज भी एक जगह है उसमें पहाड़ की उपस्थिति काफी है। इस संग्रह में पहाड़ के दो लोगों पर कविता है। एक ढोलवादक थे केशव अनुरागी और एक लोककवि थे गुणानंद पथिक जो कि कम्युनिस्ट पार्टी के भी सदस्य थे। गुणानंद जी वहां रामलीला आदि में भी हारमोनियम बजाया करते थे और मेरे पिता जी को भी हारमोनियम उन्होंने ही सिखाया था। उसमें मोहन थपलियाल की मृत्यु पर भी कविता है। मेरे इस संग्रह में पहाड़ लौटा है फिर से और मेरा जो नया संग्रह आने वाला है उसमें भी पहाड़ की अच्छी-खासी उपस्थिति देखने को मिलेगी आपको। लेकिन मैं एक बात मानता हूं कि मेरी कविताओं में पहाड़ मसलन उस तरह नहीं आता है जिस तरह जगूड़ी या बर्त्वाल जी की कविताओं में है। इसका एक कारण ये है कि मेरी कविताओं में पहाड़ और मैदान का द्वंद ज्यादा है। इसमें इन दोनों क्षेत्रों की टकराहट ज्यादा महत्व रखती है।

 

तो क्या यह आपके भीतर जारी मैदान में पहाड़ी बने रहने का संघर्ष है?

हां कहा जा सकता है कि ये वही जिद है। लेकिन आपको बता दूं कि मैं १९८० के आस- पास देहरादून आ गया था और देहरादून के बाद यहीं नीचे की ओर आता गया। उसके बाद तो पहाड़ जाता रहा लेकिन लौटा नहीं। इस तरह का तनाव शायद मेरी कविताओं में है। एक और बात कि मेरी कविताओं में पहाड़ के वर्तमान से ज्यादा उनकी स्मृति अधिक है। लेकिन स्मृति असल में कोई स्मृति नहीं होती है। अतीत कोई अतीत नहीं होता। अतीत भी मनुष्य का वर्तमान ही होता है क्योंकि उसके भीतर ही कहीं रहता है। 

 

उत्तराखण्ड का फणीश्वरनाथ रेणु किसे मानते हैं?

हालांकि इस तरह की तुलना करना मुझे पसंद नहीं है। लेकिन मै कहना चाहूंगा कि शैलेश मटियानी जी का महत्वपूर्ण योगदान है। अगर ऐसी तुलना की जाय तो रेणु जी भी बिहार के शैलेश मटियानी होंगे। 

 

जैसा कि आपने शुरू में कहा कि उत्तराखण्ड शब्द तो काफी बाद में आया है। लेकिन उत्तराखण्ड या पहाड़ शब्द जब आपके कानों में पड़ता है तो ऐसे कौन से दृश्य या यादें हैं जो आज भी पहले की तरह ताजा हैं और आंखों के सामने घूम जाते हैं?

हालांकि काफी अद्भुत प्रश्न है पर हां मेरे गांव की यादें हैं जो आज भी वैसे ही ताजा हैं। जिनके दृश्य आज भी एकदम स्पष्ट हैं। जैसे पहला कि मैं अपने बचपन में गांव में बहुत धूप सेंकता था। आज भी वही बिंब मेरे दिमाग में जिंदा है कि औंधा लेटे हुए अपनी पीठ पर मैं सूर्य को महसूस कर रहा हूं। दूसरी मुझे वे बूढ़े याद हैं जो अपने चश्मे से बीड़ी सुलगाया करते थे। सूरज की धूप से वे जब बीड़ी सुलगा लेते थे तो ये मुझे बड़ा चमत्कार लगता था कि अचाानक धुंआ कहां से उठने लग गया। तीसरा महिलाओं का घास- लकड़ी लाना मेरी स्मृति में एकदम स्पष्ट है। जब शाम को मैं अपने पिताजी के साथ वापस लौटता था तो बीस-पच्चीस महिलाएं पूरा दल बना करके बोझा लिए हुए लौटती थीं। अब चूंकि वे चप्पलें आदि नहीं पहने होती थीं तो उनके चलने से जो धम-धम की आवाज पैदा होती थी वह आज भी मेरे भीतर मुझे महसूस होती है। वहीं से मुझे आज भी प्रेरणा मिलती है कि अगर श्रम किया जाय तो धरती भी हिलती है। उस धम-धम की आवाज में मैं धरती को हिलता हुआ महसूस करता था।  पहाड़ की औरतें अथाह श्रम करती हैं। इसी पर मैने एक कहानी लिखी थी जिसमें जब लड़की पहाड़ से शादी कर मैदान आती है तो वह महीने भर तक सोती है। चूंकि मैंने पाया कि उन्हें मैदान आकर ही अपनी थकान उतारने का मौका मिल पाता है। इसी से मैंने सीखा और अपने जीवन में मैं लगातार श्रम करता आया हूं। मैंने अपने जीवन में कभी मुफ्त की रोटी नहीं तोड़ी।

 
         
 
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